Manikaran

From Jatland Wiki
Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Kullu district map

Manikaran (मनिकर्ण) is an ancient pilgrim in Kullu district of Himachal Pradesh.

Location

Manikaran is located in the Parvati Valley on Parvati River, northeast of Bhuntar in the Kullu District of Himachal Pradesh. It is at an altitude of 1760 m and is located 4 km ahead of Kasol and about 35 km from Kullu.

This small town attracts tourists visiting Manali and Kullu to its hot springs and pilgrim centres. An experimental geothermal energy plant has also been set up here.

Origin

Variants

  • Manikarna मनिकर्ण, हि.प्र. (AS, p.710)

History

Maṇikarṇa in epics

Maṇikarṇa (मणिकर्ण, “precious ear-ring”) refers to one of the fifty-six vināyakas located at Kāśī (Vārāṇasī), and forms part of a sacred pilgrimage (yātrā), described in the Kāśīkhaṇḍa (Skanda-purāṇa 4.2.57). He is also known as Maṇikarṇavināyaka, Maṇikarṇagaṇeśa and Maṇikarṇavighneśa. These fifty-six vināyakas are positioned at the eight cardinal points in seven concentric circles (8x7). They center around a deity named Ḍhuṇḍhirāja (or Ḍhuṇḍhi-vināyaka) positioned near the Viśvanātha temple, which lies at the heart of Kāśī, near the Gaṅges. This arrangement symbolises the interconnecting relationship of the macrocosmos, the mesocosmos and the microcosmos.

Maṇikarṇa is positioned in the South-Eastern corner of the sixth circle of the kāśī-maṇḍala. According to Rana Singh (source), his shrine is located at “Satuababa Ashram, Manikamika Gali, CK 10 / 48”. Worshippers of Maṇikarṇa will benefit from his quality, which is defined as “the reliever from difficulties”. His coordinates are: Lat. 25.18654, Lon. 83.00875 (or, 25°11'11.5"N 83°00'31.5"E) (Google maps)

Maṇikarṇa, and the other vināyakas, are described in the Skandapurāṇa (the largest of the eighteen mahāpurāṇas). This book narrates the details and legends surrounding numerous holy pilgrimages (tīrtha-māhātmya) throughout India. It is composed of over 81,000 metrical verses with the core text dating from the before the 4th-century CE.

Source: Wisdom Library: Skanda-purana

https://www.wisdomlib.org/definition/manikarna


Maṇikarṇa (मणिकर्ण) is the name of a Buddha under whom Śākyamuni (or Gautama, ‘the historical Buddha’) acquired merit along the first through nine bhūmis, according to the Mahāvastu. There are in total ten bhūmis representing the ten stages of the Bodhisattva’s path towards enlightenment.

Maṇikarṇa is but one among the 500 Buddhas enumerated in the Mahāvastu during a conversation between Mahākātyāyana and Mahākāśyapa, both principle disciples of Gautama Buddha. The Mahāvastu is an important text of the Lokottaravāda school of buddhism, dating from the 2nd century BCE.

Source: Wisdom Library: Lokottaravāda

https://www.wisdomlib.org/definition/manikarna

मनिकर्ण, हि.प्र.

विजयेन्द्र कुमार माथुर[1] ने लेख किया है ...मनिकर्ण, हि.प्र. (AS, p.710): हिमाचल प्रदेश के जनपद कुल्लु के पास मनिकर्ण प्राचीन तीर्थ स्थित है. यहाँ मंडी कुल्लू मार्ग से होकर पहुँचा जा सकता है.

मनिकर्ण परिचय

हिमाचल प्रदेश के जनपद कुल्लु में स्थित मनिकर्ण हिंदु तीर्थ प्रतिवर्ष अपनी आस्था और सुंदरता के कारण लाखों श्रधालुऑ को अपनी ओर आकर्षित करता है। यहॉ एक ओर पवित्र पार्वती नदी का शरीर जमाने वाला बर्फीला पानी बहता है वहीं दूसरी ओर उबलते पानी के झरने सभी को मंत्रमुग्ध एवम अचम्भित कर देते हैं।

श्री राम मंदिर के पास, गर्म पानी के लगभग पंद्रह झरने, जिनका पानी लगभग पंद्रह फीट की ऊँचाई से, बहुत तेज वेग से गिरता है. पानी के साथ कभी-कभी बेश्कीमती पत्थर भी (मणी) भी निकलते थे। मनिकर्ण के गर्म जल के चश्मों के पानी का तापमान नब्बे डिग्री सेन्टिग्रेड से सौ डिग्री सेन्टिग्रेड रहता है। चश्मों का पानी एकदम साफ होता है और उसमे गंधक नही होती है। इन चश्मों के पानी मे पके चवल-दाल आदि का स्वाद विषेष स्वदिष्ट होता है। इस गर्म पानी मे पकने मे उतना ही समय लगता है, जितना कि चुल्हे की आग मे लगता है। यह आस्था है कि यहॉ के कुंडों मे नहाने से गठिया इत्यादि रोग भी ठीक हो जाते हैं।

मनिकर्ण धाम की समुद्र तट से ऊँचाई पचपन सौ फुट (दो हजार, छ:सौ उनसठ मीटर) है। जाड़ों मे यहॉ बर्फ गिरती है तथा गर्मियों मे यहॉ मौसम बहुत सुहावना रहता है। शंकर भगवान और माता पार्वती का तपोस्थान होने के कारण इस स्थान को पुराणों में ‘अर्धनारी क्षेत्र’ कहा गया है। यह स्थान भगवान शंकर को अत्यंत प्रिय होने के कारण, काशी में भी गंगा नदी पर अपने स्थान का नाम ‘मणिकर्णिका घाट’ रखा।

महाभारत के समय, देवराज इन्द्र ने अर्जुन को पाशुपति शस्त्र दिया। इसमें अर्जुन की परीक्षा लेने के लिये भगवान शंकर जी ने भील का रुप धारण करके इस स्थान पर अर्जुन से युध्ध किया। अर्जुन की युध्ध कला से प्रसन्न होकर शंकर भगवान ने अर्जुन को वरदान दिया। मनिकर्ण के गर्म पानी के चश्मों मे पके प्रसाद तथा भोजन खाने से तथा स्नान करने से अनेक रोगों का निदान हो जाता है तथा पाप नष्ट होकर मोक्ष की प्रप्ति होती है। मनिकर्ण तीर्थ की यात्रा करने से अनेक सिध्धियों की प्राप्ति होती है तथा मनोकामना पूर्ण होती हैं।

मनिकर्ण तीर्थ भगवान राम से भी जुड़ा हुआ है। इसका वर्णन प्राचीन हिन्दु ग्रन्थ रामायण में भी मिलता है। भगवान शंकर एवम राम एक दुसरे के अराध्य रहे हैं। भगवान शंकर की अराधना करने के लिये भगवान राम मनिकर्ण धाम आते रहते थे। इसके अतिरिक्त मनाली के पास वशिष्ठ मे भगवान राम के गुरु वशिष्ठ जी का स्थान है। भगवान राम अपने गुरु के पास भी आशीर्वाद एवम ज्ञान प्रप्ति के लिये आते रहते थे। समस्त हिमाचल प्रदेश क्षेत्र से अनेक देवी-देवता भी सिध्धि हासिल करने के लिये यहां तप करते हैं।

इस धाम से एक और कहानी जुड़ी हुई है। कुल्लु राज्य मे सोहलवी वी शतब्दि मे राजा जगत सिंह का राज्य था। राजा के अंतिम छ्ब्बीस वर्ष और देह त्याग होने तक, राजा जगत सिंह ने इसी तरह यहीं बिताये। राजा की पत्थर की मूर्ती यहां के हनुमान मंदिर मे स्थापित कर दी गयी जो आज भी यहां विराजमान है। राजा जगत सिंह के समय से ही विश्व विख्यात कुल्लु दशहरा मेले का आयोजन भी मनिकर्ण से ही प्रारम्भ हुआ। राजा के वंशज स्थापित परम्परा के अनुसार आज भी भगवान राम की सेवा करते हैं।

संदर्भ: मनिकर्ण हिंदु तीर्थ, May 1, 2019, ड.योगेशशर्मा

External links

References