आखिर जीत हमारी/भाग 8 - युद्ध की ज्वाला

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आखिर जीत हमारी
(वीर रस का एक ऐतिहासिक उपन्यास)
लेखक
रामजीदास पुरी
(उर्फ सय्याह सुनामी)
Digital text of the printed book prepared by - Dayanand Deswal दयानन्द देसवाल


भाग 8 - युद्ध की ज्वाला

रात्रि के घोर अन्धकार में लिपटे दूर तक विस्तृत मैदान में अगणित तम्बुओं, छौलदारियों और मंडपों के धुंधले से अस्पष्ट रेखाचिन्ह क्षितिज को छू रहे थे और स्थान-स्थान पर देदीप्यमान अग्नि-ज्वालायें तथा मशालें उनको आलोकित कर रहीं थीं । तूफानों को पेट में छुपाए लहरें उठाते समुद्र की भान्ति एक मध्यम-सा गरजता शोर वहाँ उठ रहा था । मगध, मालवा तथा चालुक्य की चतुरंगिणी सेनाओं ने यहाँ पड़ाव डाला था । इसके अतिरिक्त रुद्रदत्त द्वारा संगठित पचहत्तर हजार युवक भी यहीं ठहरे थे जो अपने देश, धर्म तथा संस्कृति के अपमान और माताओं बहनों पर हूणों द्वारा किये गये अत्याचारों का बदला लेने के लिए, विजय अथवा मृत्यु का प्रण लेकर यहाँ पहुंचे थे । युद्धक्षेत्र के किनारे किसी राजधानी के खंडहरों के बीच बने एक मन्दिर के भीतर इस महान् सेना के सेनापति बैठे हुए कतिपय योजनायें बना रहे थे । मन्दिर द्वार की सीढ़ियों के बाहर नंगी तलवार का पहरा था । द्वार स्तंभों पर तेल में भीगे बिनौलों से भरी दो बड़ी-बड़ी हांडियाँ जल रहीं थीं जिनके थिरकते हुए प्रकाश में आंगन के ताक में रखी देवमूर्तियों की परछाइयाँ विभिन्न आकार बनाती और उछलती कूदती दिखाई देतीं थीं ।


मन्दिर का गुम्बद, कलश के पास से थोड़ा सा टूटा हुआ था जिसमें से आकाश झांक रहा था । परन्तु सुन्दर रंग-बिरंगे पत्थरों का फर्श पूर्णतया ठीक था । जब फर्श की धूल-मिट्टी झाड़ दी गई तो इसकी सुन्दरता खिल उठी । भक्तों की भुलाई-बिसराई मूर्ति जिसके चरणों में फल-फूल भेंट करके धूप और जोत जला दी गई थी, पूर्ववत् आशीर्वाद और स्फूर्तियां बरसाती प्रतीत होने लगी । यद्यपि मालवा के राजा ने जिस की सीमा में यह स्थान था, इस मन्दिर की देख-रेख तथा मरम्मत का आदेश दे दिया था किन्तु इस समय वह इसी भग्न स्थल पर ही सामरिक सभा बुलाने पर बाध्य थे ।


मगध सम्राट्, उसका सेनापति और महामंत्री, मालव का राजा, एक चालुक्य सरदार, रुद्रदत्त, महाबाहु, धूमकेतु, दोनों ईरानी थे । इनके चेहरों के उतार-चढ़ाव को देखकर ऐसा प्रतीत होता था कि विचार-विमर्श में कोई मतभेद आ उपस्थित हुआ है जिसे दूर करना बड़ा कठिन प्रतीत होता है । कुछ क्षण तक सब चुपचाप बैठे रहे, आखिर रुद्रदत्त ने मौन भंग किया । वह बोला कि मगध राज्य के योग्य एवं वीर सेनापति इस बात पर अड़े हुए हैं कि सारी सेना का नियंत्रण उन्हीं के हाथ में हो, और जिस प्रकार की सामरिक चालों, व्यूह रचनाओं से वह युद्ध का संचालन करना चाहें, उसमें कोई दूसरा हस्तक्षेप न करे । इसके अतिरिक्त वह यह भी चाहते हैं कि मगध, मालवा और चालुक्य की राज्य सेनायें ही युद्ध में भाग लें और राष्ट्रवादी युवक पीछे रहें और उन युवकों से उसी समय काम लिया जाय जब कि युद्ध-क्षेत्र की परिस्थिति अपने हितों के विपरीत जाती दिखाई दे । इस निश्चय के समर्थन में वह कहते हैं कि ये युवक हूण-शत्रुता तथा देशभक्ति में भले ही राज्य-सेनाओं से बढ़े हुए हों, परन्तु युद्धकला के ज्ञान और अनुभव के बारे में अभी तक वह उनके सामने बच्चे हैं । इसके अतिरिक्त मेहरगुल जैसे विदेशी आक्रमणकारी की रक्त की प्यासी सेना की तुलना में, जिसने बड़े-बड़े राज्य तलपट कर डाले, इन लोगों से बड़े-बड़े मोर्चों पर काम लेना हानिकारक होगा ।


"जी हां ! आप स्वयं ही सोच सकते हैं ।" मगध सेनापति बोला ।


रुद्रदत्त ने अपना व्याख्यान जारी रखा, "इसके विपरीत मेरा विचार है कि राज्य सेना और राष्ट्रवादी दलों का नेतृत्व महाबाहु को सौंप दिया जाये । इसलिए नहीं कि हमारे राष्ट्रवादी दल मगध सेनापति की आज्ञा से लड़ना नहीं चाहते अथवा मैं विजय की कीर्ति अपने महाबाहु को दिलाना चाहता हूँ, बल्कि बात यह है कि हमारे युवकों को जिस प्रकार से तैयार किया गया है उन्हें मगध सेनापति उस ढंग से लड़ा नहीं सकते और इधर हमारे युवक उस ढंग से लड़ना नहीं जानते जिस ढंग से सेनापति लड़ाना जानते हैं । किन्तु अकेला महाबाहु ही एक ऐसी व्यक्ति है जो युद्धकला के इस नवीन ढ़ंग के साथ-साथ मगध सेनापति के ढंग से भी पूर्णतया परिचित है । आप स्वयं जानते हैं कि तक्षशिला विश्वविद्यालय में युद्धकला विज्ञान के यह प्रसिद्ध विद्यार्थी रह चुके हैं ।


उसने एक दीर्घ निश्वास खींचा, परन्तु कोई न बोला । वह पुनः कहने लगा, "परन्तु ऐसी परिस्थिति में, जब कि एक-दूसरे के विरुद्ध राय देने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपनी ही राय को ठीक समझता हो और कोई भी अपनी बात छोड़ने को तैयार न हो, तो ऐसी नाजुक घड़ी में जब शत्रु की सेनाओं का आगे बढ़ते आना पुनर्विचार अथवा पुनरीक्षण का अवकाश भी न देता हो, तो ऐसे समय में यही उचित है कि सुलझाव के लिए कोई बीच का मार्ग अपना लेना चाहिये । यह स्पष्ट है कि हूण सम्राट् सारे भारतवर्ष पर दासता का जुआ रखने के लिए पहले मालवा के राजा पर आक्रमण करने की तैयारियाँ कर रहा था, क्योंकि मालवा के महाराजा ने शत्रुओं के साथ सन्धि का निश्चय कर लेने के पश्चात् भी अपना विचार बदल लिया था । परन्तु इसी समय जब उसे सूचना मिली कि चालुक्य सरदार और मगध सम्राट् भी मालवा के महाराज के साथ मिलकर टक्कर लेने की तैयारी कर रहे हैं और उनके अतिरिक्त हिन्दू राष्ट्रवादियों का एक दल भी उनसे मिल गया है, तो उसने लामबंदी और भी तेज कर दी । परन्तु हमारे राष्ट्रवादियों ने योजनानुसार हूण सम्राट् के सम्बंधियों तथा कर्मचारियों को, चकित कर देने वाली वीरता के साथ भरे दरबार में मृत्यु के घाट उतारकर उसे इतना भड़का दिया कि यदि पहले वह एक मास तक आक्रमण करता तो अब युद्ध के लिए झट तैयार हो गया । वास्तव में प्रयोजन ही यह था कि यदि क्रोध और शीघ्रता की झुंझलाहट में वह पूरी तैयारी न होने के पूर्व ही पग उठा ले और उसके सैनिक गठन में त्रुटियाँ रह जायें तो उस पर सुगमता से चोट की जा सकती है । हमारे गुप्‍तचरों की सूचना है कि यही बात हो गई है । हूण सम्राट् मेहरगुल ने अपने निश्चय से पहले ही कूच कर दिया है । उसकी युद्ध सम्बन्धी योजनाओं के अधूरेपन की सूचनाएं हमारे तक पहुंच चुकी हैं । भगवान् ने चाहा तो हमारी ही विजय होगी । किन्तु इस समय हम अपनी युद्ध सम्बन्धी योजनाओं में उपस्थित समस्या का हल ढूंढ़ रहे हैं । यदि महाबाहु और मगध सेनापति ठीक समझें तो मेरा तो यही विचार है कि जिस मार्ग से अब हूण सेना बढ़ी आ रही है, उससे पर्याप्‍त अन्तर छोड़कर महाबाहु रात्रि के अन्धकार में अपने युवकों को स्यालकोट की ओर ले जाये । जब हूण सेना इस ओर को बहुत आगे निकल आये और हमारी सेनाओं से टक्कर लेने लगे तो यह अपने युवकों को दो भागों में बांटकर, एक से हूण सेना पर रात को धावा बुलवा दे और दूसरी टुकड़ी हूणों की खाद्य सामग्री और यातायात के साधनों को नष्ट करती हुई उनकी राजधानी पर टूट पड़े । क्यों ?


अपना सुझाव देकर उसने मगध सेनापति की ओर देखा ।


"हाँ, यह ढंग ठीक है । मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं ।"

"और महाबाहु, आपको?"


महाबाहु बोला, "सैनिक का कार्य आपत्ति प्रकट करना नहीं, आज्ञा का पालन करना है ।" उसके चेहरे पर किसी प्रकार के हठ तथा क्रोध के कोई भी चिन्ह न थे ।


रुद्रदत्त कहने लगा, "मेरा अभिप्राय आपत्ति अथवा आज्ञा से नहीं, बल्कि मैं तो यह जानना चाहता हूँ कि युद्धकला के अनुसार तो इस योजना में कोई त्रुटि नहीं है ?"


महाबाहु का चेहरा गम्भीर हो गया । उसने कहा, "यदि मगध सेनापति इधर युद्ध में किसी प्रकार की त्रुटि न आने दें तो मैं अपने काम को तो पूरी तरह निभा दूंगा । यदि वह शत्रु को एक पग भी आगे न बढ़ने देंगे तो हमारे सूरमाओं की खड़ग उनको पीछे भी न हटने देंगीं और चक्के के दो पाटों में आये हुए हूणों को हम पीस कर रख देंगे ।"


रुद्रदत्त गहरी चिन्ता में पड़ गया जैसे इस निश्चय में अभी कोई अधूरापन रह गया हो और वह उसे भी दूर कर डालना चाहता हो ।


कोई न बोला । गहरा मौन छा गया । सुलगती धूप के धूंएं की लकीर ऊपर उठकर ताना-बाना बनाती रही और मूर्ति के सुन्दर दैवी मुख से ज्योति की किरणें फूटती रहीं । द्वार में से बाहर दिखाई देने वाला नक्षत्र-समूह बता रहा था कि रात का दूसरा पहर समाप्‍त होने को है ।


अन्त में रुद्रदत्त बोला, "यदि मगध के सेनापति अनुचित न समझें तो मैं चाहता हूँ कि हमारे दस हजार वीरों की एक सेना इस ओर लड़ने वाले राज्यसैनिकों से पर्याप्‍त दूरी पर उपस्थित रहे । ईश्वर न करे, यदि युद्ध स्थिति हमारे पक्ष में बिगड़ने लगे और महाबाहु अपने सैनिकों को लेकर आने में विलम्ब कर जाये, तो ये लोग युद्धक्षेत्र में कूदकर हमारी सहायता करेंगे ।"


सेनापति बोला, "दूरदर्शिता के दृष्टिकोण से आपका विचार ठीक है । ऐसा ही कीजिए ।"


रुद्रदत्त ने एक गहन निश्वास लिया परन्तु इसे संतोष से बाहर निकालने का अवसर न मिला । सहसा चौंककर उसने अपनी गर्दन पर इस प्रकार हाथ मारा जैसे कोई आग की चिंगारी उस पर आ गिरी हो । छोटी-सी कोई जीवित वस्तु उसकी पीठ पर गिरी जिस पर चौंककर, महाबाहु ने अपने खडग की मूठ से दो-तीन वार किए ।


इसी के साथ किसी बोझल वस्तु के भद से गिरने का शब्द बाहर सुनाई दिया परन्तु इस पर किसी ने भी ध्यान न दिया ।


"तक्षक ! शैलचूर ? कैटलू ? हमदराबाद ...?"


बाहर से आए हुए आयुर्वेदाचार्य ने मूर्ति के चरणों में जलते हुए दीपक को उठाकर मरे हुए सर्प को देखा और कहा - "कैटलू है, अति विषैला और अप्राप्य श्रेणी का ।"


मालव महाराज अपने राजवैद्य को बुलाने दौड़े । मगध सम्राट् तथा चालुक्य सामन्त भी अपने राजवैद्यों को बुलाने के लिए बाहर निकल गए ।


आयुर्वेदाचार्य ने पीछे से आवाज लगाई, "यदि जहरमुहरा न मिले तो आग का एक अंगारा भिजवा दो और घृत से भरा मिलास ।" वह बुड़बुड़ाया, "साधारण जहरमुहरे से भी कोई काम बनता दिखाई नहीं देता । क्या ही अच्छा होता मेरी औषधियाँ मेरे ही पास होतीं । काटा भी तो दुष्ट ने ठीक गर्दन पर है ।"


ईरानी युवक बहराम बोला, "मैंने सुना है कि कुछ तबीब घाव पर मुँह लगाकर साँप का विष चूस लिया करते हैं । यदि आज्ञा हो तो मैं इसे चूसकर देख लेता हूँ । मैं यदि मर भी गया तो कोई बात नहीं । रुद्रदत्त के प्राणों पर मुझ जैसे सहस्रों जीवन भेंट किए जा सकते हैं ।"


"चूस लो । परन्तु तुम्हारे मुँह में कोई घाव तो नहीं ? तुम्हें दांतों का कोई रोग तो नहीं ?


"जी नहीं ।"


रुद्रदत्त, जो अपनी मानसिक शक्ति से विष के प्रभाव को दबाने का प्रयास कर रहा था, बोला, "विचित्र प्रकार का विष है, मेरा सारा शरीर जल उठा है, हाथ-पांव की ऐंठन बढ़ती जा रही है, और आँखों के सामने अंधकार छा रहा है ।"


बहराम ने कई बार घाव को चूसकर थूक दिया ।


परन्तु रुद्रदत्त की हालत बिगड़ती गई, "मेरा सांस रुक रहा है और मस्तिष्क और आँखें निकम्मी हो रही हैं । मैं मरने से नहीं डरता, परन्तु दुःख इस बात का है कि प्रिय भारतवर्ष को विदेशी आक्रमणकारियों से मुक्त कराने का जो प्रण किया था, उसे पूरा न कर सका ।"


आयुर्वेदाचार्य बोला, "चिन्ता न करो, मैं तुम्हें मरने से बचा लूंगा ।"


"यदि तुम मुझे मरने से बचा लोगे तो मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि मैं भारत एवं भारतीयता को मरने से बचा लूंगा ।"


"यदि मगध के राजवैद्य के पास मुहरे न मिले, यदि मेरी बताई औषधियाँ भी उसके पास न हुईं और तुम्हारे हृदय अथवा नाड़ी की गति भी रुक गई तो भी मैं तुम्हें बचा लूंगा । मैं गोबर के ढेर में तुम्हारे शव को सुरक्षित कराके, तीव्रगामी घोड़े पर चढ़कर माधोपुर पहुंचूंगा और वहाँ से मुहरें तथा औषधियाँ लाकर फिर से तुम्हारे मृत शरीर में जीवन डाल दूँगा ।"


मूर्छा बढ़ी आ रही थी, मृत्यु की परछाइयां लिए हुए ।


"मूर्छा को बढ़ने दो, अपने मानसिक बल से इसे न रोको, कहीं इसी संघर्ष में तुम्हारे मस्तिष्क की कोई नस न फट जाये ।"


"महाबाहु ! यदि कुछ न हुआ तो मेरी मृत्यु के पश्चात् सभी कुछ तुम करना ...उत्साह ...साहस... दूरदर्शिता ...." बस इतना कहकर रुद्रदत्त बेसुध हो गया ।


महाबाहु, जो थोड़ा समय पूर्व ही उत्साहित तथा महान् साहसी बना हुआ था, रुद्रदत्त के मूर्छित होते ही डगमगा गया । उसने बड़े जोर से अपने दिल को दोनों हाथों से पकड़ लिया ।


"यह हुआ कैसे?" महाबाहु ने यह प्रश्न अब पूछा । पहले इधर-उधर दवा-दारू लाने की भाग-दौड़ में इस ओर ध्यान ही न गया था । "मन्दिर की छत में साँप कहां से आया ?"


तीनों राजवैद्य दौड़े हुए आए, उनके पीछे कुछ अनुचरों के हाथ में घी तथा चिंगारियां थीं ।


आयुर्वेदाचार्य ने पूछा, "आप में किसी के पास जहरमुहरे हैं ? सांप काटने की कोई औषधि है ?"


"श्रीमान्, यह किसको ध्यान आ सकता था कि युद्धक्षेत्र में भी ऐसी आवश्यकता पड़ सकती है ।"


आयुर्वेदाचार्य ने अधिक पूछताछ किये बिना एक भृत्य से चिमटा पकड़ा और आग का एक दहकता अंगारा रुद्रदत्त की गर्दन पर रख दिया । त्वचा चिड़चिड़ शब्द करके जली । वेदना से रुद्रदत्त की आंखों के मूर्छित पर्दे तनिक तड़पे और चेतना की इस थोड़ी-सी अवधि से लाभ उठाकर आयुर्वेदाचार्य ने गर्म घी का गिलास रुद्रदत्त को पिला देना चाहा, परन्तु एक घूंट से अधिक घी रुद्रदत्त के गले के नीचे न उतरा ।


तीनों महाराज भी भीतर पहुंचे । मालवा नरेश ने पूछा, "परन्तु यह साँप मन्दिर की छत से गिरा कैसे ?"


परन्तु आयुर्वेदाचार्य ने इस बात का उत्तर देने अथवा इस की बाबत पूछने का अवसर न दिया । वह रुद्रदत्त के मूर्छित शरीर को धरती पर लिटाता हुआ बोला, "रुद्रदत्त की मृत्यु निश्चित है । यदि इसकी मानसिक शक्ति प्रबल न होती तो अब तक कभी के स्वर्ग सिधार चुकते । अब चौथाई घड़ी के भीतर इसकी नाड़ी और हृदय की गति रुक जायेगी और प्राणपखेरू उड़ जायेंगे । परन्तु मैं देश के इस अनोखे और ऊंचे सपूत को मरने नहीं दूंगा । मेरे लिए एक वायु के समान दौड़ने वाला घोड़ा और चार सशस्‍त्र सैनिक तैयार करा दें । वहां से मुहरे और रसायन लेकर लौट आऊंगा । अभी आप लोग गोबर का बड़ा ढ़ेर लगवा दें और रुद्रदत्त के शरीर को उस ढ़ेर में दबवा दें । सूर्योदय होने पर जब सेनायें यहाँ से कूच करने लगें, उस समय रुद्रदत्त के शरीर की देख-रेख के लिए यहां विश्वस्त सैनिकों की एक टुकड़ी छोड़ जायें । मेरा विचार है कि सर्प अकस्मात ऊपर से नहीं गिरा होगा, इसमें भी किसी षड्यन्त्र की प्रतीति होती है ।"


"मेरा भी यही विचार है", मालव नरेश ने कहा ।


इतने ही में सैनिकों ने आकर सूचना दी कि घोड़े और सैनिक तैयार हो गये हैं । आयुर्वेदाचार्य कुछ कहे बिना अपने कार्य पर चल पड़े ।


"यह सर्प अवश्य ही किसी ने फेंका होगा", चालुक्य सामन्त ने सबके मन से उभर आते सन्देह को सामने लाते हुए कहा ।


"परन्तु किसने?" मगध सम्राट् ने पूछा ।


चिन्ता और शोक में डूबे महाबाहु ने अपने कन्धों को हिलाया । बाहर द्वार पर कुछ व्यक्ति किसी आवश्यक कार्य के लिए भीतर जाने की प्रार्थना करते सुनाई दिये । एक आवाज को पहचानकर मालव नरेश ने कहा, "मेरे दरबारी गुप्‍तचर श्रीकान्त हैं ! बुलाओ, ताकि पूछें कि राजधानी से ऐसे असमय में कैसे पहुंचे हैं ?"


एक चालुक्य सामन्त श्रीकान्त को बुला लाया । गठे बदन और गम्भीर चेहरे वाला युवक भी उसके साथ था । दोनों ने एक साथ प्रणाम किया और महाराज को प्रश्न करने का अवसर न देते हुए श्रीकान्त ने पूछा, "क्या अभी-अभी यहां कोई दुर्घटना हुई है ?"


"हाँ!" महाबाहु ने उत्तर दिया । तीनों महाराज तथा अन्य व्यक्ति आश्चर्य से गुप्‍तचर की ओर देखने लगे ।


बाहर पथरीले मार्ग पर दौड़ते हुए घोड़ों की टापें सुनाईं दीं ।


श्रीकान्त बोला, "संभवतया हमें क्षण-भर की ही देरी हो गई । परन्तु इसके लिए मैं दोषी हूं, मेरा साथी नहीं । आज से पांच दिन की बात है कि मालव में देशभक्त वीरों को सूचना मिली कि पदच्युत प्रधानमंत्री कारागार में बन्दी होते हुए राजद्रोही कार्यों में संलग्न है और बन्दीगृह का एक स्वामी शत्रु पहरेदार से राजदरबार की सूचनायें मंगवाता है और मालव नरेश पर भी प्रहार करने की कोई भीषण योजना बना रहा है । जांच करने पर यह बात सत्य प्रमाणित हुई है । इस युवक ने यह सूचना मुझे दे दी । मैंने इस काम पर अपने आदमियों को लगाकर पता निकाला कि कंवलनयन नामक एक व्यक्ति ने, जो प्रकटतया गलियों में स्त्रियों के श्रंगार की वस्तुएं बेचता है, नदी पर के एक वनवासी सपेरे को सेर भर चांदी देकर इस बात पर सहमत कर लिया है कि वह राज-राजेश्वर मालवधीश पर एक भयंकर विषैला साँप फेंककर उन्हें मार डाले । सम्भव है कि यदि सपेरे को यह ज्ञान होता कि कंवलनयन मालवाधीश को ही मृत्यु के घाट उतरवाना चाहता है तो वह उस दुष्कर्म के लिए तैयार न होता । परन्तु उस नीच ने सपेरे को बताया कि यह सांप एक कंजूस साहूकार पर फेंकना है जो धन के ढ़ेर को इकट्ठा किये बैठा है और उससे न स्वयं लाभ उठाता है, न किसी दूसरे को उठाने देता है । उसकी योजना थी कि वह किसी न किसी तरह राजप्रासाद में घुसकर यह सांप महाराज पर फिंकवाये, परन्तु उसे पता चल गया था कि मालव नरेश उत्तर-पश्चिमी मंडल में सेना की भर्ती के लिए जा चुके हैं । अतः कंवलनयन उसे छल कपट से इधर ले आया । जब सपेरा इधर आया तो उसे वास्तविकता का ज्ञान हो गया और वह स्पष्ट इन्कार कर गया । परन्तु नीच कंवलनयन ने जो इस काम को पूरा करने पर तुला हुआ था, सेर भर चांदी और देकर यह सांप सपेरे से खरीद लिया और उसे लेकर स्वयं इस ओर चल पड़ा । यदि हमें यह भी पता लग जाता कि वह यह कार्य स्वयं करेगा तो हम इधर आने में कोई देर न करते । किन्तु हम समझते रहे कि यह काम सपेरा ही करेगा । इस कारण वह जब तक हमारे लोगों की आंखों के सामने उपस्थित है तब तक कोई भय और शीघ्रता की बात नहीं है । परन्तु सारे तथ्य का ज्ञान हमें कंवलनयन के इधर चलने के डेढ़ पहर बाद हुआ । हमने तुरन्त घोड़े कसवाये और फुर्ती से इधर चल पड़े । मन्दिर की पिछली दीवार पर प्रकाश तो है किन्तु वहां प्रहरी नहीं खड़ा किया । यदि वहां प्रहरी होता तो निश्चय ही कंवलनयन वहां नहीं पहुंच सकता था । जब से इस राष्ट्रवादी के साथ मेरा परिचय हुआ है, मैं इसके साहस को देख देखकर चकित होता रहा हूं । किन्तु आज रात तो इस युवक ने अपने चमत्कार से मुझे और भी विस्मित कर दिया । हम अन्धाधुंध घोड़े दौड़ाते आ रहे थे । मेरी आंखें रात के डूबे अंधेरे मार्ग को देखती आ रही थीं कि अकस्मात् मन्दिर से चार सौ गज की दूरी पर इसने अपने धनुष पर बाण चढ़ाया और मन्दिर के कलश से चिमटी किसी वस्तु पर खींच मारा - "ईश्वर करे" वह युवक बड़बड़ाया, "सांप इसने अभी फेंका न हो ।"


"देखो-देखो !" मालव महाराज ने कहा ।


दो सरदार रक्त में लथपथ एक मृत शरीर को उठा लाये, बाण उसकी गर्दन से आर-पार निकल चुका था ।


मालव महाराज ने एक लम्बा सांस लिया, फिर राष्ट्रवादी युवक को प्रशंसा भरी दृष्टि से देखता हुआ बोला, "तुमने सराहनीय कार्य किया है, तुम्हें इसके लिए क्या दिया जाये ?"


"राजराजेश्वर, देशसेवा का प्रण लेते समय हमने देने का ही प्रण लिया है, लेने का नहीं । मैंने अपना कर्त्तव्य पालन किया है और कर्त्तव्य ही स्वतः अपना पारितोषिक होता है ।"


युवक के उस आदर्श की उच्चता इस प्रकार चमकी जिस प्रकार अंधेरी रात में कोई ज्योति जल उठती है ।


सब चुपचाप खड़े रहे । एक क्षण के लिए महाबाहु तथा धूमकेतु के चेहरों पर गौरव का अनुभव हुआ । फिर मिट गया । श्रीकान्त ने फिर पूछा, "आह! परन्तु राजराजेश्वर, मैं यह पूछना तो भूल ही गया कि सांप ने किसको काटा है और अब वह किस अवस्था में है ?"


मालव महाराज इस प्रश्न का उत्तर न दे सके । अन्य लोग भी चुप रहे । महाबाहु बोला, "श्रीकांत, इस विषधर ने हमारे आन्दोलन के संचालक श्री रुद्रदत्त को काटा है । वे मूर्छित हैं । उनका श्वास रुक गया है और नाड़ी थम गई है ।"


"ओह ! आह !!"

महाबाहु उन्हें धैर्य देते हुए बोला, "परन्तु घबराने की कोई बात नहीं है । हमारे आयुर्वेदाचार्य चार सैनिकों के साथ घोड़ों को सरपट दौड़ाते हुए औषधियां और मुहरे लाने गए हैं और कल सायं से पूर्व ही यहां आ जायेंगे । उन्होंने विश्वास दिलाया था कि वह श्री रुद्रदत्त को मरने न देंगे । हो सकता है कि तुमको इसकी सूचना मिल चुकी हो कि हूण सम्राट् मेहरगुल अपने सैनिकों के साथ आक्रमण के लिए चल पड़ा है । हमारी ओर से यह निश्चित हुआ है कि उससे दो पड़ाव के पश्चात् टक्कर ली जाये । इस कारण हमें सेनाओं को लेकर दिन निकलते ही यहाँ से कूच कर देना होगा । हमारे जाने के पश्चात् आप, यह युवक, मालव के राजवैद्य और मगध सेना के पचास सैनिक यहाँ रहेंगे । आयुर्वेदाचार्य के वापस आने तक तुम्हारा यह काम रहेगा कि रुद्रदत्त के शरीर की पूर्ण सावधानी से रक्षा करें और इसके पश्चात् भी, जब तक वह पूर्णतया स्वस्थ न हो जायें, उनकी देख-रेख करते रहें । आचार्य के आदेशानुसार अब रुद्रदत्त के शरीर को गोबर में दबा दिया जाये । इसके लिए पुजारी की पास वाली कोठरी ठीक रहेगी । भिक्षुणियां हमारे साथ जायेंगी । जब रुद्रदत्त की चेतना लौट आए और मृत्यु का भय टल जाये तो इसकी सूचना हमें युद्धक्षेत्र में भिजवा दी जाये ताकि हम निश्चिन्त होकर लड़ें । हम ईश्वरीय कार्य कर रहे हैं । भगवान् ही हमारा सहायक होगा । अच्छा नमस्कार ! आइये श्रीमान् !"


युद्ध के लिए सजाये हाथियों की श्रृंखलाएं खनखनाईं और एक घोड़ा हिनहिनाया ।


रात की शेष घड़ियां शीघ्र ही बीत गईं । अभी उषा की लालिमा भी पूर्व में प्रकट न हुई थी कि महाबाहु तथा उसके वीर साथी शस्‍त्रों से लैस होकर कूच के लिये तैयार थे । एक भाग राजकीय सेनाओं के साथ रहने के लिए छोड़ दिया गया ।


चार विशालकाय युवकों तथा वेदान्ताचार्य के साथ महाबाहु भिक्षुणियों के तंबू पर पहुंचा, जिन्हें प्रातः साथ चलने की सूचना दी जा चुकी थी ।


महाबाहु ने आवाज लगाकर तंबू का पर्दा उठाया । भिक्षुणियां तैयार बैठी थीं । वह बोला, "पचास कजावों वाले ऊंट आपके लिए तैयार खड़े हैं, आप उन पर सवार हो जायें । मेरी इच्छा तो यही थी कि आप समरभूमि से दूर किसी सुरक्षित स्थान पर ठहरें । फिर भी...."


वृद्ध भिक्षुणियां बोलीं, "हम रणभूमि में अवश्य आपके साथ चलेंगीं । हमने भिक्षुओं को त्याग और तप करते और मालायें फिराते तो देखा है किन्तु अब हमारे नेत्र इस दृश्य को भी देखना चाहते हैं कि किस प्रकार योद्धा अपने खड़गों से बिजलियाँ बरसाते हैं और अपने प्राणों की आहुतियां देते हैं । तुम बार-बार यही कहते थे कि देशसेवा सबसे बड़ी तपस्या है और घोर संग्राम में बोटी-बोटी कटकर मरने वाला सूरमा सबसे बड़ा तपस्वी है । हम चाहती हैं कि तुम्हारे इस कथन को साक्षात् रूप में देखें ।"


"अच्छा आओ ।"


मध्यम से प्रकाश में राष्ट्रवादियों के जत्थे क्रम से चल पड़े । भिक्षुणियों के सवार होने पर ऊंटों ने बिलबिलाकर रात के सन्नाटे को भंग किया और शुभ आशीर्वाद की भांति उषा की लाली उभर आई ।


कूच से थोड़ा समय पूर्व पचास युवक सरपट घोड़े दौड़ाते अन्धकार एवं शीत को रौंदते हुए उस प्रदेश की ओर आगे निकल गये जिस ओर शेष सेना ने जाना था । यह अग्रिम दस्ता था । यद्यपि जिस मार्ग से इन दस्तों ने जाना था वह आम रास्ता नहीं था, तदापि अग्रिम दस्ते के युवक मार्ग में यह प्रबन्ध करते गए कि उनकी सेना के कूच की सूचना शत्रु को किसी प्रकार भी न लगे ।


दिन को किसी घने वन में रुककर और रात को दिन के ठहराव की पूरी कसर निकाल देने वाली रफ्तार से चलकर महाबाहु अपने जत्थों को ऐसे स्थान पर ले गया जहाँ स्यालकोट और उस स्थान का अंतर लगभग एक जैसा ही रह गया था, जहाँ उसके अनुमानुसार भारतीय सेना तथा हूण फौज में टक्कर होनी थी । यहाँ पहुंचकर ज्ञात हुआ कि हूण फौज आज दोपहर यहाँ से होकर निकल गई है ।


इस स्थान पर जहाँ इन्होंने पड़ाव डाला था, एक ओर घने वन और दूसरी ओर टीले थे । कोई भी गाँव यहाँ से छः-सात कोस से कम की दूरी पर नहीं था । परन्तु उन गाँवों में रहने वाले भी हूणों के नाम से घर छोड़कर कहीं-कहीं भाग गये थे । अब दूर-दूर तक कहीं भी किसी प्राणी का नामोनिशान तक भी दिखाई न देता था । हूणों के गुप्‍तचर तथा सीमा के कुछ विद्रोही वहां अवश्य मौजूद थे किन्तु अग्रिम दस्ते के युवकों ने उन्हें बड़ी सावधानी से बन्दी बना लिया था । अब इस सेना की सूचना न किसी हूण को थी न ही किसी भारतीय को ।


रात को चारों ओर पहरा कड़ा करके पशुओं को चारा डालकर वीरों ने एक पहर तक नींद ली और फिर उठकर शौचादि से निपटकर भोजन बनाने की तैयारियां करने लगे । एक पहर में खा-पीकर तैयार हो गये । इनकी संख्या सवार तथा पदाति कुल मिलाकर साठ हजार थी । निश्चय यह हुआ था कि धूमकेतु तथा बहराम तीस हजार युवकों को लेकर हूण सेना पर पीछे से टूट पड़ें और शेष तीस हजार वीरों को लेकर महाबाहु हूण राजधानी स्यालकोट पर टूट पड़े और वहाँ हूण सम्राट् की बेगमों, सम्बन्धियों, राजकोष तथा शस्त्रागारों पर अधिकार करके उस ठिकाने को ही नष्ट कर डालें जहाँ से आक्रमणकारियों की यह आंधी उठ-उठकर विनाश और विध्वंस मचाती है ।


महाबाहु को अपने सैनिक अनुभव के आधार पर पूरी आशा थी कि यदि इसके बताए हुए ढंग से आक्रमण किए गए तो भारतीय सेना और पीछे जाने वाला राष्ट्रवादियों का दल हूण सेना को हरा देंगे । इधर वह आप हूण राजधानी को नष्ट करके उस पर अधिकार कर लेगा और पांच हजार युवकों को इसकी रक्षा के लिए छोड़कर शेष पच्चीस हजार के साथ वह फुर्ती से युद्ध क्षेत्र में जा पहुंचेगा और वहाँ यदि परिस्थिति कुछ बिगड़ती दिखाई दी तो झट उसे जा संभालेगा । उसके ये अनुमान इतने ठीक थे जितनी प्रत्येक बार ठीक उतरने वाली कोई और बात हो सकती है ।


अब ढ़ील देने का समय नहीं था । उसने अपने वीरों को दो भागों में बांटकर और दूसरे आक्रमण का निश्चय करके ऐसा प्रतीत होता था कि इनका आधा समय किसी ने छीन लिया है । एक-एक क्षण अनमोल था । परन्तु कूच की आज्ञा देने से पहले महाबाहु ने अपने युवकों को अपना कर्त्तव्य निभाने और देश के लिए बोटी-बोटी कट मरने का साहस देने के लिए भाषण देना आवश्यक समझा ।


आज्ञा पाकर सारे युवक दो भागों में बंट गए, फिर अलग-अलग भागों के साथ अपने-अपने जत्थे के बीच में अपने सेनानायक का भाषण सुनने के लिए चुपचाप खड़े हो गए । महाबाहु एक ओर से होकर एक ऊँचे स्थान पर आ खड़ा हुआ । सेना में एकदम मौन छा गया । महाबाहु ने भाषण देना आरम्भ किया –


"वीर युवको ! जब से तुमने देशरक्षा के लिए अपना तन, मन, धन न्यौछावर करने का प्रण लिया है, मेरे अनेक भाषण तुमने सुने हैं । भारत का नाम संसार भर में ऊँचा और उज्जवल बनाने के लिए त्याग और बलिदान के मार्ग पर चलने की, तुमने अपने देश के देवताओं और महापुरुषों को साक्षी करके प्रतिज्ञायें की हैं । इसके लिए न तुम्हें किसी प्रकार का प्रलोभन दिया गया था न भय दिखाया गया था । यह देश तुम्हारा अपना घर है, और अपने घर के लिए किसी डर अथवा लालच से काम नहीं लिया जाता । जब किसी घर में आग लगाई गयी हो अथवा चोर, डाकू उसे लूटने के लिए आ गए हों, तो घर वाले उसे बचाने के लिए किसी लालच या डर के कारण अपने प्राण संकट में नहीं डाला करते । उसको बचाते हुए किसी पुरस्कार प्राप्‍त करने का विचार उनके मन में नहीं हुआ करता । आज हमारा देश अत्याचारी हूणों के आक्रमणों से नष्ट हो रहा है । कहीं देवालय गिराये जाते हैं, कहीं स्त्रियां भगाईं जाती हैं । कहीं बस्तियां लुटती हैं, कहीं गौएं कटती हैं । प्रत्येक ओर एक हाहाकार मचा हुआ है । धरती काँप रही है । जनता लहू के आँसू बहा रही है । अत्याचारी हूणों ने भारत के शान्तिप्रिय लोगों पर जो अत्याचार किए हैं, वह आज किसी से छुपे हुए नहीं हैं । उनको सुनकर कानों में छाले और हृदयों में छेद पड़ जाते हैं । उन्होंने हमारे दुधमुंहें बच्चों को बरछों की नोकों में पिरोया, हमारी सतवती सुहागनों की मांगों का सिन्दूर जूतों से पोंछा और हमारी बहिनों माताओं के सत चौराहों और बाजारों में भंग किए । आज हम शत्रु से उन अत्याचारों का बदला लेने के लिए, यदि बदले का शब्द हमारे पूर्वजों के आचार के अनुसार कानों को बुरा लगता हो, तो उन्हें दण्ड देने के लिए तैयार होकर जा रहे हैं । यदि हम सत्य पर हैं, यदि देश रक्षा ईश्वरीय कार्य है तो निःसन्देह हमारी विजय होगी और शत्रु के मृतक शरीर कफन और चिता के सम्मान से वंचित इस देश की धरती पर गीदड़ों और गिद्धों का ग्रास बनेंगे जहाँ उन्होंने आंधियां उठा रखी हैं । किन्तु एक बात तुमको भूलनी नहीं चाहिये कि तुम्हारी टक्कर उस युद्धकुशल जाति से है जिसकी फौजों ने आधी पृथ्वी के बड़े-बड़े सम्राटों को सिंहासनों से उठाकर मरणासन्न कर दिया है । हूण सिपाही न केवल युद्धकला में निपुण हैं अपितु शरीरिक दृष्टि से भी बलवान होते हैं । परन्तु इसकी तुलना में तुम्हारी पीठ पर देशभक्ति की ऐसी शक्ति विद्यमान है जिसके सम्मुख बड़ी से बड़ी शक्ति भी नहीं ठहर सकती । देशरक्षा के जोश के आगे लूटमार की इच्छा के पाँव जम नहीं सकते । हमने अपनी खडगों के बांध से न केवल शत्रु के बढ़ने को रोक देना है, अपितु उसके आक्रमणों को विफल बना देना है और उसे सदा-सदा के लिए नष्ट कर देना है । अपमानित हजारों देवियों की खून से रोती आँखों, और निरपराध मारे गए लाखों बच्चों और बूढ़ों के सड़ते हुए शवों का ध्यान रखकर मैं तुम में से आधे वीर युवकों के साथ हूण राजधानी स्यालकोट पर आक्रमण करता हूँ । शेष युवक हमारी राजसेना से लड़ती शत्रुसेना पर टूट पड़ें । मैं विश्वास दिलाता हूं कि विजय हमारी ही होगी ।"


भाषण समाप्‍त होते ही दोनों दल अपने-अपने निश्चित स्थानों की ओर चल पड़े ।


भारतीय सेना अभी बरसाती नदी के इस पार ही थी, कि गुप्‍तचरों ने सूचना दी कि हूण फौज दस कोस पर आ पहुंची है । मगध सेनापति जिसके हाथ में अपने राज्य की सेना के साथ-साथ मालव और चालुक्य सेनाओं की कमान भी थी, चाहता था कि यदि नदी को पार करके शत्रु से मुठभेड़ हो तो अच्छा है ।


नदी के उस स्थान पर जहाँ राजकीय सेनायें इस समय आ पहुंची थीं, न कोई पुल था, न नौकाओं का बेड़ा जिसमें चढ़ाकर सेनाओं को पार उतार दिया जाता । दो छोटी, पुरानी, निकम्मे नौकाएं, सम्भवतः मनु महाराज के काल की, दुर्बल रस्सी से बंधी थीं जिनमें तीस-तीस व्यक्तियों से अधिक एक बार न आ सकते थे और जिसके खेवट, चप्पुओं और बाँसों को कहीं छुपाकर सेना के भय से पता नहीं कहां भाग गए थे । नये प्रबन्ध का समय नहीं था । जो सामग्री पास थी, उसी से काम निकालना था । मगध के सेनापति ने बारह-बारह हाथी नदी के पाट से थोड़ा-थोड़ा अन्तर बीच में रखकर बिठा दिए । दोनों ओर बांसों समेत लिपटी हुई छोलदारियां और खम्बे एक किनारा हाथियों की पीठ पर और दूसरा नदी के तट पर रखवा दिए और इन पुलों पर से होकर पैदल सेना दूसरी ओर उतरने लगी ।


परन्तु न जाने गुप्‍तचरों से ही शत्रु की फौज का अन्तर बताने में कुछ गलती रह गई थी । न जाने हूण सिपाही ही साधारण मानवीय वेग की अपेक्षा हवा के पंखों पर उड़ते आ रहे थे कि अभी कोई दो हजार भारतीय सैनिक ही पार उतरे होंगे, हूण फौज के अग्रिम दस्ते, धूल उड़ाते सिर पर आ पहुंचे और अपनी निरन्तर विजयों और प्राकृतिक युद्धप्रियता के कारण आते ही इस बल से आक्रमण कर दिया कि एक बार तो भारतीय सेना का धैर्य डगमगा गया । दो सौ पग के अन्तर पर पहुंचकर उन्होंने अपने घोड़ों की बागें खींची, नीचे कूदे और घोड़ों का मुंह पीठ पीछे करके उनके पुट्ठों पर एक जोर का कोड़ा मार दिया, जिससे वह जिधर से आए, उधर की ओर हवा हो गए । सम्भवतः यह कोई निश्चित किया हुआ संकेत था, जिससे पीछे आने वाली विशाल सेना को पता लग जाए कि उनका अग्रिम दस्ता शत्रु से छुरी कटारी हो गया है और इन पर और पैदल सिपाही सवार होकर इनके साथ आ मिलें ।


अपने घोड़ों को उल्टा भगाकर वह आगे बढ़े । उनके सिरों पर लोमड़ी की खालों और समूरों के टोप, शरीरों पर बैल के चमड़े के खफतान, हाथों में लम्बे बरछे और चौड़ी ढालें थीं । चौड़े फल के कुल्हाड़े और खंजर कमरों से बंधे थे । इतना बिफर कर उन्होंने आक्रमण किया कि कि भारतीय सैनिकों को, जो नदी से पार उतर गये थे और शत्रु को आता देखकर जिनके सरदार उनको क्रम से खड़ा करने लगे थे, आधे से अधिक को मार, शेष को उठाकर नदी की धार में पटक दिया, जो तैरते-डूबते हाथियों समेत उल्टे किनारे की ओर हट आए ।


परन्तु हूण सैनिक सुस्ताना अथवा अपनी फौज की प्रतीक्षा करना नहीं जानते थे । बिफरे हुए दरिन्दों की भांति वे पानी में गिरे हुए भारतीय सैनिकों पर कूदे और एक हाथ से उन पर बरछों से वार करते और दूसरे से तैर कर पानी के बहाव को काटते हुए तट की ओर बढ़े । तट पर चढकर अपनी थोड़ी संख्या और शत्रु की टिड्ड़ी दल की चिन्ता किए बिना भूखे भेड़ियों की भांति पागल होकर उन पर टूट पड़े ।


मगध सेनापति इस अचानक आक्रमण से घबराने के साथ-साथ क्रोध के मारे आपे से बाहर हो गया । वह आक्रमणकारियों के छोटे से दल की इतनी वीरता और अपने सैनिकों की ऐसी घबराहट से झल्ला उठा, परन्तु इसके साथ ही उसने हूणों की बढ़ी आती सेना पर भी दृष्टि रखी ।


तट के पास पहुंचकर हूण सिपाहियों ने थोड़े गहरे पानी में पाँव जमाए और हाथों के बरछे सामने खड़े भारतीय सिपाहियों पर, जो इन पर तीरों की बौछार करने लगे थे, ताक कर मारे और आप कटि से खंजर निकाल, चौड़ी, चकोर अथवा तिकोनी ढ़ालें सामने करके किनारे पर चढ़ने लगे । इस समय वह कमाई हुई नीली इस्पात की खंजरें हाथों में पकड़े, उन्हें इस प्रकार फिरा रहे थे जैसे बिजलियाँ चमक रहीं हों ।


इन सिपाहियों की संख्या साधारण अनुमान के अनुसार चार हजार से अधिक न थी जिसके ऊपर, किनारे पर चढ़ने के संघर्ष में तट पर खड़े भारतीय सैनिकों का दस्ता बाण वर्षा कर रहा था । कुछ ने उन पर तेज धार के चक्कर भी फेंके । कितनों के खंजर पकड़े हाथ बाणों से कटकर पानी में जा गिरे और कितनों के कंधे और घुटने बिंध गए । वे बुरी तरह घायल होकर गिरे और लहू मिली लहरों में बढ़ते दिखाई दिए । फिर भी उन में से आधे तट पर चढ़ आए किन्तु भारतीय सेना का एक दस्ता दीवार बनकर उनके सामने आ गया । धनुर्धारी एक ओर हट गए थे ।


हूण चाहे कितने ही वीर थे परन्तु भारतीय सैनिकों की दुगुनी चौगुनी संख्या के सामने उनका कोई वश न चला । भारतीय सैनिकों ने उनको अपनी तलवारों की नोकों पर धर लिया । आधे वहीं खेत रहे और शेष धकेलकर नदी में गिरा दिए गए । इतनी देर में शेष सेना सिर पर आ पहुंची थी ।


हूण सेनापति को भी यह आशा न थी कि भारतीय सेनाएं इतनी निकट आ पहुंची होंगी । उसका अनुमान था कि नदी पार करके कोई कोस आगे जाकर कहीं मुठभेड़ होगी । उसने निश्चय किया था कि नदी के किनारे पहुंचकर उसके सिपाही दोपहर का खाना खायेंगे, घोड़ों और सांडनियों को भी दाना-चारा डाला जाएगा, इतने में सेनाओं का बेड़ा, जिसका उन्होंने कई दिन से गुप्‍त ढ़ंग से प्रबन्ध कर रखा था, तैरता हुआ आ पहुंचेगा । परन्तु अब एकदम शत्रु को सामने देखकर और नौकाओं को न पाकर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ । भारतीय सेनाएं रात की नींद को हराम करके मारा-मार करती इतनी दूर आ गई हैं, यह बात तो उसकी समझ में आ सकती थी, परन्तु नौकाओं के न मिलने का कारण उसकी समझ में न आया । यदि भारतीय सेनाओं ने उनको पकड़ लिया होता तब भी एक बात थी, किन्तु उनका तो नदी के एक सिरे से दूसरे सिरे तक कहीं चिह्न तक दिखाई न देता था ।


इस आश्चर्य को पहले इस गौरव के अनुभव ने दबाया, कि उसके हरावल दस्ते ने पूरी वीरता के साथ शत्रु के साथ टक्कर ली । फिर वह इस दुःख में बदल गया कि हरावल दस्ते के तीन चौथाई वीर मौत के घाट उतर गए हैं । यदि यह थोड़ा समय पहले पहुंच सकते, तो ...


हूण सेनापति ने आज्ञा दी कि पूरा रिसाला, नौ हजार का नौ हजार, तीन टुकड़ियों में बंटकर नदी को पार करे और जब वह दूसरे किनारे पर जाकर शत्रु पर आक्रमण करे तो उसकी ओट लेकर शेष फौज नदी को तैर कर पार कर जाए ।


दो-दो सौ की पच्चीस पंक्तियां बनाकर पाँच हजार बीच में और दो-दो हजार दायें-बायें फैलकर हूण रिसाले के वीर सिपाहियों ने सामने से आती तीरों और चक्कोरों की बौछारों को ध्यान में न लाते हुए अपने घोड़े वेग से बहती नदी में डाल दिये । आज्ञा पाकर पैदल सिपाहियों की एक भारी संख्या सवारों की रकाबें और घोड़ों दुमें थाम कर साथ हो गई ।


नदी के ऊँचे किनारे टूट-टूट कर फैल गए । उनके पास का पानी गदला हो गया । लहरों में झाग उठने लगे और पानी का तल ऊंचा हो गया ।


भारतीय सेना के धनुर्धरों के दस्ते इस बात पर तुल गए कि चाहे कुछ हो, शत्रु के सिपाहियों को तट पर पग रखने नहीं देंगे । वह इस फुर्ती से बाण चलाते थे कि आश्चर्य होता था । एक दस्ता दंदानों वाली धारों के चक्कर फेंक रहा था, जो एक से अधिक गर्दनें उड़ाते चले जाते थे । नदी के ऊपर तीर और चक्कर इस प्रकार छाए हुए थे कि धूप की किरणों को पानी की सतह पर पड़ने से रोक दिया था । इधर हूण घुड़सवारों, बल्कि सारी हूण फौज की सफलता इसी में थी कि रिसाला नदी पार करके भारतीय सेनाओं पर टूट पड़े । भारतीय सैनिकों ने रिसाले के सवारों के साथ-साथ उनके घोड़ों को भी बींध डाला । माथे थूथनियों पर अचूक बाण खा-खाकर घोड़े तड़पे, और उन्होंने सवारों को पानी में गिरा दिया । वे बेसुध और मूर्छित होकर बह गए । अब उस पार खड़ी हूण फौज अपने रिसाले की सहायता के लिए भारतीय धनुर्धारियों पर बाण बरसाने लगी । इससे उनको पर्याप्‍त सहारा मिला, यदि वह उनके पानी में उतरते ही बाणवर्षा आरम्भ कर देती तो इतनी हानि न होती ।


हूण सेना के बाणों की बाढ़ के मारे, भारतीय सैनिक उनके बाणों को काटते, बचाते, बाध्य होकर थोड़ा पीछे हटे । इतने में ही हूण घुड़सवारों की टुकड़ी तट पर आकर अंधाधुन्ध भाले चलाने लगी, और इसके साथ पार उतारे पैदल हूण सिपाही जिनके चमड़े के खफतानों से अभी तक पानी की बूंदें टपकती थीं, तलवारों से आग बरसाने लगे । इधर दाएं-बाएं की घुड़सवार टुकड़ियाँ और उनकी सहायता से पार पहुंचे हुए पैदल सिपाहियों ने भारतीय सेना में पहलुओं पर चोट करके उसके ऊपर घेरा डालने का प्रयत्‍न किया । इधर इस उलझाव से लाभ उठाकर शेष हूण फौज भी तैरती हुई पार आने लगी ।


घुड़सवारों के साथ पार उतरे पैदल हूण अपने रिसाले से हटकर अपनी तलवारों के हाथ दिखा रहे थे । परन्तु रिसाला जो विनाश कर रहा था, वह असह्य था । वह इस प्रयत्‍न में लगा था कि भारतीय सेना को दो भागों में बांट देने के लिए बीच में दरार को अधिक चौड़ी करके भारतीय सेना की शक्ति को तोड़ डाले । वह रोष के साथ जयकारे लगाता और बरछे चलाता प्रलय मचाने लगा । परन्तु मगध के सेनापति की युक्ति ने इनके रोष को मिट्ती में मिला दिया । इसकी आज्ञा पाकर दो सौ सैनिक हाथी जिन पर निडर धनुर्धारी सवार थे, दीवार बनकर उनके सम्मुख आ डटे । तुर्किस्तान और अरबी घोड़ों से कालपी और आसाम की चट्टानें ट्कराने लगीं ।


रिसाले की शक्ति को असफल होते देखकर, दाएं-बाएं आक्रमण करने वाली टुकड़ियां अपने स्थानों से हटकर इससे आ मिलीं और उनकी कतारें एक के पश्चात् एक हाथियों के दस्ते पर लगातार आक्रमण करने लगीं । परन्तु पहाड़ों जैसे सैनिक हाथी अपने स्थानों से न हटे । बरछों और बाणों के प्रहारों की परवाह न करते हुए अपने पाशविक आवेश में आकर घुड़सवारों को सूंडों में पकड़-पकड़ कर हवा में उछाल दिया । दानवाकार भारतीय पशुओं ने डटकर तुर्किस्तानी घोड़ों को धकेल-धकेल कर गिराया और कुचल डाला । इनकी स्तम्भों जैसी टांगें शत्रु के घोड़ों और सवारों के लहू से लथपथ हो गईं । उन पर उनके मांस की बोटियां चिमट गईं और आंतड़ियों के रस्सों के समान लिपटती टूटती गईं । निकट था कि रिसाला बुरी तरह हार खाकर पीछे हटे, कि इनकी शेष फौज स्थान-स्थान से नदी को पार करती दल बादल की भाँति तट पर चढ़ आई और इसका बड़ा भाग अन्य स्थानों पर आक्रमण करने की अपेक्षा हाथियों के दस्ते पर ही टूट पड़ा । उनकी इच्छा थी कि उसे चारों ओर से घेरकर बीच में ले लें और जिस प्रकार बन पड़े, उसे समाप्‍त कर डालें ।


हूण सेनापति, जो इस भाग की कमान करता था, सम्भवतः यह समझता था कि यदि वह हाथियों को समाप्‍त कर सका तो शेष हिन्दुस्तानी सेना जी छोड़कर हथियार डाल देगी । चाहे कुछ हो, हूण फौज का सारा बल अब हाथियों के इस दस्ते को नष्ट करने पर लग रहा था ।


हूण सिपाही अपने देश के भूखे भेड़ियों की भाँति खूंखार बनकर आक्रमण कर रहे थे । हाथी यद्यपि एक-एक हल्ले में बीस-बीस को कुचल डालते थे । परन्तु उनके आक्रमण का जोर भी न घटता था । एक परा टूटता था, तो दूसरा उसका स्थान ले लेता था, एक दस्ता घायल होकर पीछे हटता था तो दूसरा आगे आ जाता था । उन्होंने अपनी तलवारों से कितने ही हाथियों की सूंडें काट डालीं, कुल्हाड़े और गदाएं मार-मारकर उनके सुन्दर दांत जिन पर सोने की चूड़ियां चढ़ीं थीं, तोड़ डाले और आँखों और पेटों में बार-बार बरछे भौंके ।


यद्यपि हाथी अब भी शत्रु के लिए यमदूत सिद्ध हो रहे थे, परन्तु मगध सेनापति को अनुभव हो रहा था कि इनके प्राण संकट में हैं । यदि इनको शीघ्र ही युद्धक्षेत्र से न हटा लिया गया तो मौत से भिड़ जाने वाले बर्बर हूणों का टिड्डी दल प्रत्येक प्रकार की हानि की चिन्ता किए बिना उनको समाप्‍त कर डालेगा ।


परन्तु क्या ही अच्छा था कि यह विचार उसको थोड़े समय पहले आ गया होता । हाथियों के समरांगण से हटाए जाने का ठीक समय वह था, जब शेष हूण फौज इधर आने के लिए नदी में उतरी थी । उसने अपने विशेष सैनिकों को आज्ञा दी कि वह हूण सिपाहियों को पीछे हटा दें जो हाथियों के चहुं ओर घेरा डालने के प्रयास में आसपास के भारतीय दस्तों को चीरते, ऊपर से होकर एक धनुष के रूप में दोनों ओर से बढ़े आ रहे थे । परन्तु यह विशेष सैनिक हूण तलवारों की बिजलियों को न रोक सके । वह शत्रु के साथ वीरता के साथ टकराए अवश्य, किन्तु भारी प्राण हानि उठाने के पश्चात् बुरी तरह घायल होकर पीछे हटे । इतने समय में हूणों ने झट हाथियों के गिर्द घेरा डाल लिया और वह पहले से दस गुनी कठोरता और भयानकता से उन पर आक्रमण करने लगे ।


हाथियों के पूरे दस्ते का मारा जाना सैनिक दृष्टिकोण से एक ऐसी हानि थी जिसकी न केवल इस समय युद्धक्षेत्र में कमी पूरी होनी ही असम्भव थी, बल्कि जिससे, ईश्वर न करे, पराजय की सम्भावना भी उत्पन्न होती थी । दूसरी ओर शत्रु की पैदल फौजें भारतीय सेनाओं पर अंधाधुंध प्रहार कर रहीं थीं । दूर तक फैले हुए समरांगण में शत्रुदल की संख्या पचहत्तर हजार से किसी प्रकार कम प्रतीत न होती थी । क्या किया जाए ? एक क्षण के लिए जैसे मगध सेनापति का मस्तिष्क बेकार सा हो गया । वह मगध सम्राट् और मालव महाराज के साथ एक ऊँचे टीले पर खड़ा था ।


"यदि हाथी मारे गए सेनापति ?" मगध सम्राट् ने पूछा ।

"तो बहुत बुरा होगा पृथ्वीनाथ !"


मालव नरेश ने याद दिलाया, "हमारे वह दस हजार राष्ट्रवादी युवक उस टीले के पीछे आज्ञा की प्रतीक्षा में खड़े हैं । उनके युद्धक्षेत्र में बुलाने के लिए इससे उपयुक्त समय और कौन सा आएगा ?"


"आह !" मगध सेनापति ने कहा, "उनका तो मुझे ध्यान ही न था ।"


आवश्यक आदेश लेकर कई घुड़सवार राष्ट्रवादी नवयुवकों को युद्धक्षेत्र में लाने के लिए गए । जैसे किसी को भिड़ों का छत्ता आ चिपटता है, उसी प्रकार एक-एक हाथी पर सौ-सौ रोष से बिफरे हुए हूण गदाओं, बरछों और तलवारों से प्रहार कर रहे थे । यद्यपि होदों में बैठे भारतीय धनुर्धारी ऊपर तीर बरसा रहे थे, परन्तु बाणों की बौछार उनको परे हटाने में असफल सिद्ध हो रही थी । यदि एक हूण मरता तो चार उसका स्थान ले लेते थे । सामने के हाथियों का बुरा हाल हो रहा था । होदों से ढकी पीठों को छोड़कर उनके शरीर का कोई अंग घायल होने से न बचा था । उनसे वह कष्ट सहा नहीं जा रहा था । वह चीखने लगे थे ।


इनके सवार पीछे से होदों में कूदे और महावतों ने हथौड़ों से लोहे की नौकीली सीखें विवश हुए हाथियों के मस्तिष्कों में ठोक दीं । हाथी बेसुध होकर गिरे, और बीसियों हूणों को नीचे दबा लिया ।


राष्ट्रवादी युवकों का दल वृक्षों से ढके एक टीले की ओट में दूर पीछे तक फैला खड़ा था और इस बात से दुःख अनुभव कर रहा था कि इन्हें क्यों देश के शत्रु के विरुद्ध खड़ग के जौहर दिखाने का अवसर नहीं दिया जाता । वह ओट में खड़ा युद्धक्षेत्र स्थिति को देख रह था, परन्तु विवश था । अब जो इसे युद्धक्षेत्र में कूदने की आज्ञा मिली तो वह अपने नायक की कमान में, घात से निकलकर हाथियों के दस्तों पर आक्रमण करने वाली हूण टोलियों पर सहसा टूट पड़ा ।


मगध का सेनापति जो श्री महाबाहु के इन युवकों को अनाड़ी और अनुभवहीन बताकर किसी खातिर न लाता था, अब जान गया कि देश के लिए मर-मिटने वाले किस प्रकार के लड़ाके हैं । जिस प्रकार सूर्य की किरणों से बादल फट जाते हैं, उसी प्रकार इनके तूफानी आक्रमण से हूण सिपाहियों की वह जत्थाबन्दी, जिसने हाथियों को घेर रक्खा था, टुकड़े-टुकड़े हो गई । बीच में स्थान छोड़कर उन्होंने हाथियों के अधिकारियों को कहा कि वह जीवित बचे हाथियों को बाहर निकाल ले जाएं । उसने वैसा ही किया । उन्नीस हाथी मर चुके थे और इकत्तीस बुरी तरह घायल होकर चीख रहे थे । इनके महावतों को मौत ने इतना अवकाश नहीं दिया था कि इनके मस्तिष्क फाड़कर उन्हें घावों की पीड़ा से छुड़ा दें और मौत की ठंडी नींद सुला दें ।


हाथियों को घेरे से बाहर निकलते देखकर हूण असफलता के अपमान और क्रोध की दोहरी आग से जल उठे । बचे-खुचे घायल हाथियों को उन्होंने मार गिराया और राष्ट्रवादी युवकों पर टूट पड़े जो उनकी असफलता के कारण बने थे । उन्होंने चारों ओर से सिमट कर उन पर धावा कर दिया और हाथियों की भांति उनको घेरे में लेने के लिए संघर्ष करने लगे । परन्तु मगध सेनापति इन वीरों को जिन्होंने एकदम युद्ध का पासा पलट दिया था, खोना न चाहते थे । उसने अपने अधिकारियों को आदेश दिया कि जैसे भी हो, उनको हूणों के घेरे से बचाया जाये । अब दोनों ओर की दूर तक फैली हुई पंक्तियाँ एक समूह-सा बनाकर एक दूसरे के शीश उड़ाने लगीं और युद्धक्षेत्र सिमट गया ।


परन्तु इतनी बड़ी सेनाओं के लिए यह युद्धक्षेत्र बहुत छोटा था । अपने ही सैनिकों के वार अपने आदमियों को लग सकते थे, इसलिए राष्ट्रवादी दल के दक्ष और रणधीर नायक ने अपने सिमटे और घिरे हुए युवकों को फैल जाने की आज्ञा दी । वह तलवारों से आग बरसाते दाएं-बाएं फैल कर प्रलय मचाने लगे ।


हूण बादशाह मेहरगुल और उनका सेनापति चकित थे । उन्हें आशा न थी कि भारतीय इतने वीर और लड़ाके हो सकते हैं । उन्होंने ईरान तथा तूरान की अनगिनत फौजों को इससे भी आधी सेना के साथ अनेक बार हराया था । भारतीयों की सफल वीरता का दूसरा अर्थ था हूण आक्रमणकारियों का अपमान और हूण साम्राज्य का विनाश । हूण वीरता का हिन्दुस्तान के युद्धक्षेत्र में चौपट हो जाना सहन नहीं किया जा सकता था । उन्होंने अपने सिपाहियों को आदेश दिया कि अपने प्रहारों की तेजी को और बढ़ा दें, कुछ अतिरिक्त फौजी दस्ते युद्धक्षेत्र में झोंक दिये ।


अब एक-एक हूण सिपाही आग का गोला होकर प्रहार करने लगा और घमासान युद्ध आरम्भ हो गया । तलवारों के वारों से कटे हुए मुण्ड हवा में उछलते थे । लहू की उड़ती हुई छींटों से आसपास का आकाश लाल हो रहा था । दृष्टि सीमा तक फैले हुए समरांगण में तलवारें बिजलियों की भांति चल रहीं थीं । मरने वालों का लहू और चर्बी लड़ने वालों के टखनों और पिंडलियों तक आ रहे थे और यह बह-बह कर बरसाती पानी के सदृश नालियां बनाता नदी में गिरता था । वायु में प्रत्येक वस्तु को लपेट ले जाने वाली मौत की गन्ध उत्पन्न हो रही थी । लड़ाके सूरमा मृत सिपाहियों के शवों के ढेरों पर से होकर एक-दूसरे पर चोट करते थे और इन ढेरों की संख्या असंख्य होती जाती थी । बार-बार उठते नारों और जयकारों से आकाश गूंज रहा था ।


ऐसा लगता था कि दोनों फौजों के सिपाहियों के मस्तिष्क में अब वीर कायर, दुर्बल बलवान, हूण हिन्दू का विचार निकल गया है । मार देने और मर जाने का पागलपन उनके सिरों पर सवार हो गया है । भयानक से भयानक युद्ध में घुस जाने, कड़े से कड़े घेरे को तोड़ डालने के लिए उन्होंने अपने प्राणों को दाव पर लगा दिया था ।


दोनों फौजें एक दूसरे पर टूट पड़ती थीं । आन की आन में सैंकड़ों योद्धा कटकर मौत के घाट उतर जाते थे परन्तु दोनों सेनायें अपने स्थान से हटने का नाम न लेतीं थीं । उनमें थरथरी, मोड़, झुकाव अवश्य उत्पन्न होते थे परन्तु खलबली मचती दिखाई न देती थी ।


दोनों सेनाओं के सेनापति और सम्राट् अपने योद्धाओं की वीरता और साहस प्रदर्शन के दृश्य में इतने मग्न थे कि यदि उन पर कोई पीछे से प्रहार करने के लिए आता, तो सम्भवतः वह न चौंकते ।


परन्तु धीरे-धीरे अज्ञात ढ़ंग से, किन्तु वास्तव में ऐसा अनुभव होता था, कि भारतीय सेनायें पीछे हट रही हैं । यद्यपि वह चप्पा-चप्पा धरती के लिए घोर संग्राम कर रहीं थीं परन्तु लगता था कि हूण आगे बढ़ रहे थे । चिन्ता की गहरी छाया मगध सेनापति और भारतीय नरेशों के हृदयों तक छाने लगी ।


सब कई क्षणों तक गहरी सोच में डूबे रहे । हूण फौजों का दबाव लगातार बढ़ता रहा ।


"क्या सोच रहे हो सेनापति ?" मगध सम्राट् ने पूछा ।


सेनापति के चेहरे पर उदासी फैलती प्रतीत होती थी । उसने अपने धैर्य को स्थिर रखने की चेष्टा करते हुए उत्तर में सम्राट् से प्रश्न किया, "पृथ्वीनाथ क्या सोच रहे हैं ?" उसके इस कथन में घबराहट थी ।


"पहले तुम बताओ ।" सम्राट् ने आज्ञा दी । सम्राट् के शब्दों में गजहठ के साथ एक और भाव भी झलक रहा था अन्तिम दाव खेलने वाली वीरता, आत्म-बलिदान - इन दोनों में से न जाने कौन सा ?


"मैं आपकी सेवा में यह निवेदन करने के लिए सोच रहा था कि युद्ध का रंग-ढंग कुछ बिगड़ता दिखाई दे रहा है । इसलिए आप मालव महाराज और चालुक्य सरदार को लेकर युद्धक्षेत्र से निकल जाएं और किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंच जायें । हम यहाँ जी तोड़कर शत्रु से लोहा ले रहे हैं । यदि विजय प्राप्‍त हुई तो ठीक है । परन्तु यदि ईश्वर न करे ....."


"और हूणों से सन्धि का विचार भी तुम्हारे मन में आया हो..." सम्राट् ने पूछा । उनकी आँखों में लाली थी, उस लाली से भिन्न जो युद्धक्षेत्र के रक्तमय रंग से उत्पन्न हुई हो ।


सेनापति बोला, "सन्धि का विचार आया अवश्य था परन्तु इसे परे हटा देना पड़ा क्योंकि मालव महाराज ने सन्धि का वचन देकर उसे तोड़ दिया है । इसलिए अब हूण सम्राट् इस बारे में हमारे शब्दों पर विश्वास न करेगा ।"


घोड़े पर चढ़े मगध सम्राट् की छाती तन गई और मूंछें ऊपर को उठ गईं । वह अपने सेनापति की ओर धूल-भरी दृष्टि से देखता हुआ बोला, "अब सुनो मैं क्या सोच रहा था । मैंने निश्चय किया है कि मालव महाराज और चालुक्य सरदार मेरा साथ दें तो ठीक, नहीं तो मैं अकेला अपने संरक्षक दस्ते को लेकर युद्धक्षेत्र में कूद जाऊं । विजय यदि नहीं मिलती तो आत्म-बलिदान दे डालूं । देश की रक्षा हेतु लड़ता-लड़ता अपने प्राणों की आहुति दे डालूं । भारतीय जनता के हजारों सपूतों को गाजर मूली की तरह कटवाकर यदि हम तीन सम्राट् अपने प्राण बचाकर समर भूमि से टल गए तो प्रजा यह कहेगी कि यह धर्मयुद्ध नहीं था, केवल अपने राज्य और रंगरलियों को बनाए रखने के लिए राजाओं ने स्वार्थ की लड़ाई लड़ी थी ।"


"पृथ्वीनाथ !" मगध सेनापति बोला, "राजनीति के दृष्टिकोण से यह आत्म-बलिदान नहीं, आत्महत्या है । यदि हम यहाँ से बचकर चले गए तो यहाँ की हार को किसी और समय जीत में बदल सकेंगे । हम इससे दस गुणी सेनाएं भरती करेंगे । अब हमारे साथ दो राजा हैं, फिर हिन्दुस्तान के दस-बीस राजाओं को अपने साथ मिलायेंगे । इस युद्धक्षेत्र के अनुभव से अपनी सैनिक तैयारियों की त्रुटियाँ दूर कर लेंगे ।"


मालव महाराज मगध सम्राट् से बोला, मैं स्वयं आप के साथ युद्ध में कूद जाना चहता हूं । देखिये ! श्री महाबाहु के राष्ट्रवादी युवक किस प्रकार चप्पा-चप्पा धरती के लिए भयानक साके कर रहे हैं । क्या मरते समय एक राजा को एक सिपाही से अधिक पीड़ा होती है ? सुख की सेजों पर तो राजा सोए, और बाणों की शैया पर जनता के युवक लेटें, धिक्कार है ऐसे राज्य को ।"


चालुक्य सामन्त बोला, "हारकर बच निकले वालों के चेहरों पर प्रकृति का एक-एक कण फटकार भेजता है । फटकारी और दुतकारी हुई आत्माएं लोक परलोक में सुख नहीं पातीं । मैं रणभूमि से हटकर कहीं नहीं जाऊंगा ।"


मगध सम्राट् बोला, "सेनापति, सेना की कमान मालव महाराज को दे दो और तुम समरांगण से अपने दो विश्वस्त अधिकारियों को लेकर निकल जाओ । मैं यह आज्ञा क्रुद्ध होकर नहीं देता, बल्कि प्रसन्नता से देता हूँ । यदि हम हार गए तो जैसा कि तुम ने कहा था, दस गुनी सेना भरती कर लेना और हिन्दुस्तान के दस-बीस और राजाओं को साथ मिलाकर शत्रु से टक्कर लेना ।"


"पृथ्वीनाथ !" मगध सेनापति बोला । उसकी आवाज में थरथराहट थी । "मैंने सावधानी और दूरदर्शिता के विचार से निवेदन किया था, नहीं तो ...." इससे अधिक वह कुछ न कह सका । राजाओं के प्रकट हुए विचारों से चोट खाकर उसके वीरता और बलिदान के भाव जाग उठे । उसने अपनी तलवार सूती और घोड़े की बाग पकड़ता हुआ बोला, "आइए देखें, मेहरगुल की गर्दन को पहले किसकी खड़ग छूती है ?"


अपने सेनापति और राजाओं को रणक्षेत्र में कूदते देखकर भारतीय सेना का दबता हुआ उत्साह पुनः प्रचण्ड हो गया और उनकी खड़गें फिर विध्वंसकारी वार करने लगीं और हूण दबाव में आ गए । उनके प्रचण्ड वारों का प्रहार खाकर हूणों का दल अपने स्थान पर रुक गया । परन्तु यह रोक थोड़े समय तक ही विद्यमान रही ।


यद्यपि हूण सेनापति पर्याप्‍त समय से मैदान में लड़ रहा था, परन्तु हूण सम्राट् मेहरगुल, मध्य एशिया का वह खूनी दरिन्दा जो कहा करता था कि मैं खुदा का कोड़ा हूँ और अपराधी जातियों को दंड देने के लिए धरती पर उतारा गया हूँ, अभी तक युद्ध में नहीं कूदा था । भारतीय राजाओं को युद्ध में उतरते देखकर पाशविक आवेश में उसने अपनी चार हाथ लम्बी खड़ग सूती और रनवीश अशरफ के दो हजार अनुभवी वीर सिपाहियों को साथ लेकर भारतीय सूरमाओं के परे के परे साफ करता, पंक्तियों में दरारें डालता, रौंदता, कुचलता आगे बढ़ने लगा । इस साक्षात काल का मगध सेनापति ने केवल कुछ क्षण सामना किया, फिर वह बुरी तरह घायल होकर गिर पड़ा । पचासों घोड़े और सैनिक उसके शव को कुचलते, रौंदते ऊपर से निकल गए । परन्तु मालव महाराज ने उसका बदला ले लिया, उसने एक भरपूर बाण मारकर हूण सेनापति की गर्दन उड़ा दी ।


मेहरगुल मगध सम्राट् को मौत के घाट उतारकर भारतीय सेना के पैर उखाड़ देना चाहता था और मगध सम्राट् के दिल में हार जीत का विचार भुलाकर एक बार मेहरगुल से दो-दो हाथ करने की तीव्र इच्छा भड़क रही थी । दोनों पूरा जोर लगाकर एक दूसरे के सिर पर जा पहुंचने के लिए संघर्ष कर रहे थे । दो जातियाँ एक दूसरे की शत्रु, दोनों में से एक को मिटा देने पर तुली हुईं थीं । राक्षस जैसे डील वाला हूण सम्राट् भयंकर और खूनी, मतवाले हाथी की भांति बढ़ा आ रहा था परन्तु मगध सम्राट् छोटे और पतले शरीर वाले भूखे सिंह के सदृश देश रक्षा और कर्त्तव्य के जोश में भरकर अपने शत्रु पर झपटना चाहता था । दोनों ओर की सेनाएं जानती थीं कि यह टक्कर बहुत कड़ी और भयानक होगी और इसका परिणाम युद्ध के भाग्य का निर्णय कर डालेगा । मेहरगुल और उसके असंख्य दस्तों के प्रहारों की रोक के लिए बचे खुचे राष्ट्रवादी युवकों ने अपनी चौड़ी छातियों की दीवार बना दी और उनकी खडगें हूण की आग के मुकाबले बिजलियां बरसाने लगीं । किन्तु हूण फिर पहले की भाँति आगे आने लगे और भारतीय सेना के पाँव उखड़ते दिखाई देने लगे । परन्तु इस समय तक सहायता, जिसने आना था, आ ही पहुँची ।


धूमकेतु के पैंतालीस हजार ताजादम राष्ट्रवादी युवक नदी की ओर से अचानक युद्धक्षेत्र में आ कूदे ।


उड़ती हुई धूल में जब वह नदी के पास पहुंचे थे, तो ठीक उस समय नौकाएं लाने के लिए भेजा हुआ आलस्यगामी हूण अधिकारी दो सौ नौकाओं का बेड़ा लिए आ पहुँचा । उन्होंने अपनी फौजों और भारतीय सेनाओं को तो उस पार लड़ते देख लिया था परन्तु दूसरी ओर से आने वाले भारतीय राष्ट्रवादी दस्तों को उन्होंने यही समझा कि यह उन्हीं की कुमक है । निकट आने पर जब उन्हें पहचाना, तो इससे पहले कि वह नौकाओं को आगे निकाल ले जाए अथवा डुबो दे, इन दस्तों ने सहसा हमला करके हूण अधिकारियों को मार डाला, खेवटों को पानी में पटक दिया और स्वयं नौकाएं खेते पार उतर आए । लड़ने वालों ने भी नौका वालों की भाँति इनको अपने कुमक समझा । इस ओर से और आ भी कौन सकता था ? किसको संभावना थी कि भारतीयों के दल इस ओर से भी आ सकते हैं ?


राष्ट्रवादियों के इन दस्तों ने युद्ध का पासा पलट दिया । कुमक आते देखकर भारतीय दलों का डूबता हुआ साहस फिर उभरा, और वह फिर जमकर वीरता से लड़ने लगे ।


मरने वाले हूणों की संख्या एकदम दुगुनी, चौगुनी, दस गुनी हो गई थी, अब तो सौ गुणी तक पहुंच गई । अब समरांगण में केवल बारह सौ शाही दस्ते के हूण अपने बादशाह के प्राणों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे थे ।


"आह नीच !" मगध सम्राट् और मालव महाराज ने अपनी तलवारें रोक लीं ।


मेहरगुल ने सन्धि का झंडा ऊँचा कर दिया था । "हम भारतीय शूरवीरों से प्राणों की भीख मांगते हैं", हूणों का दोभाषिया ऊँची आवाज में बोला ।


"रण में बर्बरों का वध कर डालो ।"


"सन्धि के बहाने बचकर निकल जाने वाले शत्रु को जीवित न छोड़ो ।" राष्ट्रवादी अधिकारी चिल्लाए ।


परन्तु सन्धि की प्रार्थना को ठुकरा देना मगध कुल के सम्राटों की वीरता की नीति के विरुद्ध था । उसने आज्ञा दी कि युद्ध बन्द करने का रणसिंघा बजा दिया जाए ।


एक शब्द पीतल के वाद्ययंत्र से निकला और बिजली की भांति चलने वाली तलवारें अपने स्थान पर रुक गईं । रुकते-रुकते भी राष्ट्रवादी युवकों ने सात सौ हूण उड़ा दिए ।


राष्ट्रवादी युवकों का एक और दल जो स्यालकोट को जीतकर लौटा था, श्री महाबाहु की कमान से दिनों के पड़ाव घंटों में मारता आ पहुंचा और नौकाओं द्वारा झट नदी पार करके अपनी सेना से आ मिला । महाबाहु ने आवाज दी, "मगध सम्राट् ! शत्रु की सन्धि की प्रार्थना स्वीकार न करें ।"


मेहरगुल ने आगे बढ़कर पहले मगध सम्राट् के चरणों को छुआ, फिर मालव महाराज और चालुक्य सामन्त के । इसके पश्चात् वह महाबाहु और धूमकेतु के चरणों की ओर बढ़ा परन्तु महाबाहु क्रोध और घृणा से एकदम कई पग पीछे हट कर बोला, "दूर रहो" । उसका हाथ अपनी खड़ग के मूठ की ओर गया ।


"जी महाबाहु ।" मगध सम्राट् उदारता की मूर्ति बना हुआ बोला, "मैंने इसको प्राणदान दे दिया है और चरणों पर गिरे शत्रु पर प्रहार करना मगध के क्षत्रिय सम्राटों के धर्म के विरुद्ध है ।"


"सम्राट् ! आप धर्म के नाम पर अधर्म कर रहे हैं । इस मानवता के कलंक और प्रकृति के फोड़े को, जिसने लाखों स्त्रियों के सुहाग उजाड़ दिए, करोड़ों बच्चों को अनाथ बना डाला, इस महाराक्षस को, जिसकी आज्ञा से इसकी राक्षसी सेना ने हजारों सतवंतियों के सत तोड़े और लाखों गौओं के गले काटे, क्षमा करना और जीवित छोड़ देना भारी भूल है । मैं और मेरे साथी इसका कड़ा विरोध करते हैं ।"


"महाबाहु ! मैं तुम्हारे विरोध और अपनी भूल को मानता हूँ । परन्तु मैंने इसकी सन्धि की प्रार्थना स्वीकार कर ली है । तुम अच्छा न समझोगे कि एक क्षत्री अपने दिए वचन से फिर जाए ।"


परिस्थिति ऐसी थी, जिसमें थोड़ी सी हठ आपस का ही बिगाड़ खड़ा कर देती । दूरदर्शी महाबाहु ने इसे बिगड़ने का अवसर न दिया ।


मेहरगुल ने अपना पटका खोलकर गले में डाल लिया । अपराधियों की भाँति वह कुछ बोला जिसे दुभाषियों ने दोहराया ।


"हूण सम्राट् कहते हैं कि प्राणदान दिया जाए । हम आपके देश हिन्दुस्तान को छोड़कर अपने देश को लौट जायेंगे । हमें केवल स्यालकोट तक जाने की आज्ञा मिल जाए जहां से हम अपनी बेगमों को साथ ले सकें । हम किसी प्रकार का धोखा नहीं करेंगे । हमारे साथ चाहे अपनी सेना की दो टोलियां भेज दीजिए ।"


महाबाहु बोला - "अब तो तुम हिन्दुस्तान से निकलोगे ही । न निकलोगे तो ढूंढ-ढूंढ कर समाप्‍त कर दिए जाओगे । स्यालकोट में अब तुम्हारा क्या रखा है ? उस पर हमारे राष्ट्रवादी युवकों का अधिकार हो चुका है और भारत का झंडा उस पर लहरा रहा है । तुम अपनी बेगमों और शहजादियों को सुरक्षित अवस्था में अपने देश ले जाना चाहते हो, जबकि हमने स्यालकोट के गढ़ में से सात हजार भगाई हुई युवा लड़कियां तुम्हारी कैद में से निकाल ली हैं जिन्हें तुम लोगों ने बलात्कार करके अधमुई बना डाला था ? इन देवियों के अपमान का बदला लेने के लिए एक बार जी में आया था कि तुम्हारी बेगमों और शहजादियों को जनता में बांट दूं जिससे दूसरी जातियों के सम्मान लूटने वाले राक्षस हूणों को पता लग जाए कि उनके सम्मान और गौरव को भी नष्ट किया जा सकता है । परन्तु हमारे युवक इतने गिरे हुए चरित्र के नहीं हैं । हम युद्धक्षेत्र में सन्मुख लड़ने आए हजारों की अपेक्षा लाखों शत्रुओं को मौत के घाट उतार सकते हैं किन्तु संसार भर को मानवता और उच्चता का पाठ पढ़ाने वाली भारतीय संस्कृति के समर्थक होते हुए हमारे युवक ऐसा नीच कार्य नहीं कर सकते । तुम्हारी स्त्रियां, बहिनों और बेटियों की भांति हमारी देखरेख में सुरक्षित हैं । तुम्हारे यहां से जाने के पश्चात् उन्हें तुम्हारे पीछे-पीछे तुम्हारे देश को भेज दिया जाएगा ।"


"हम भारतीयों के ऊंचे शिष्टाचार की प्रशंसा करते हैं । आपने हमें और हमारे बाल-बच्चों को प्राणदान दिया, इसके लिए तुम्हारा कोटि-कोटि धन्यवाद । हम कश्मीर और लद्दाख के मार्ग से जायेंगे ।"


पता नहीं कब दिन ढ़ला, पता नहीं कब सूर्य पश्चिमी क्षितिज को छूने लगा ।


सब के पांव को एक बार और छूकर, मार खाए हुए कुत्ते की भांति हारा हुआ हूण सम्राट् मेहरगुल गर्दन झुकाए पैदल, मरी हुई चाल के साथ एक ओर को चल पड़ा । उसके सरदार पीछे-पीछे हो लिये जिनको दूर खड़े ऊंटों पर चढ़ी भिक्षुणियों ने भी देखा ।


घायल पड़े दम तोड़ते सिपाहियों की हुंकारें, घायल घोड़ों और हाथियों की चीखें वातावरण को भयंकर और शोकमय बना रही थीं । युद्धक्षेत्र में से लहू ढलवां धरती पर धारायें बनाता यहाँ वहाँ प्रत्येक स्थान से, शब्द उत्पन्न करता नदी में गिर रहा था । दूर कहीं वन में उल्लू बोल रहे थे ।


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