Ayodhya me Yodha

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The author – Hawa Singh Sangwan


अयोध्या में योद्धा
(जाट मिशन का एक और क्रान्तिकारी प्रयास)


लेखक
हवासिंह सांगवान जाट
पूर्व कमांडैन्ट सी.आर.पी.एफ


Contents

मेरा कथन

जब 30 अक्तूबर 1990 को अयोध्या में स्थित तथाकथित बाबरी मस्जिद पर कार सेवकों ने पहला हमला किया तो मैं वहां सी.आर.पी.एफ. के एक कंपनी कमाण्डर के बतौर तैनात था। उस समय वहां क्या घटित हुआ उसको मैंने केवल देखा ही नहीं, उसको झेला भी था। लेकिन उस समय जो भी घटित हुआ उसका विवरण समाचार पत्र-पत्रिकाओं व दूरदर्शन अर्थात् मीडिया में सत्य कम, असत्य ज्यादा लिखा और दिखाया गया था। अर्थात् मीडिया का रुख निष्पक्ष नहीं था। जिसका मुझे अत्यन्त दुःख था। लेकिन साथ-साथ मुझे इस बात की खुशी भी थी कि वहाँ मैंने कभी कोई जाट कार सेवक नहीं दिखाई दिया, हालांकि वर्तमान में जाट कौम पाखण्डवाद के चुंगल में फंसती जा रही है, जैसे कि कांवड़ ढोने, काज (मृत्यु भोज) करने तथा मन्दिर बनवाने में लगे हैं और चौ० सर छोटूराम के आदर्शों के विपरीत चल रहे हैं।

मैं 18 साल तक यहीं सोचता रहा कि जब भी मुझे अवसर मिलेगा मैं अपने तरीके से इस घटना की वास्तविक कहानी और अपनी मनःस्थिति के बारे में लिखित रूप से साधारण लोगों तथा मेरी कौम तक अवश्य पहुंचाऊंगा। हालांकि उस समय मैंने इस घटना के बारे में कुछ भी नोट नहीं किया था। लेकिन बाद के इन वर्षों में समाचार पत्र-पत्रिकाओं व धार्मिक पुस्तकों आदि से इसके लिए विविध सामग्री संग्रह की इसके अतिरिक्त इस घटना से सम्बन्धित जो भी मेरे मस्तिष्क पटल पर शेष था उस सभी के आधार पर यह पुस्तक पाठकों को पेश कर रहा हूं।

इस पुस्तक को लिखने के लिए चौ० ओमपाल आर्य पूर्व प्रवक्ता गांव मिताथल, चौ० जोशपाल सिंह दहिया खजूरी खास दिल्ली (मूल निवासी करनावल जिला मेरठ) तथा चौ० सुरेन्द्र कुमार लाकड़ा सोनीपत का विशेष रूप से आभारी हूं जिन्होंने इस पुस्तक को लिखने के लिए मुझे उत्साहित किया। मेरी पुस्तक ‘असली लुटेरे कौन?’ के कुछ पाठकों ने मुझे भविष्य में लघु पुस्तिका लिखने का बार-बार सुझाव दिया, इसलिए प्रस्तुत पुस्तक को जहां तक संभव हो पाया है, संक्षेप में लिखा है।

- हवासिंह सांगवान जाट

पूर्व कमाण्डैंट, सी.आर.पी.एफ.


प्रथम अध्याय

अयोध्या का संक्षिप्त इतिहास

(ब्राह्मण ग्रंथों के आधार पर)

अयोध्या शब्द स्त्रीलिंग है जिसका अर्थ है जहां कभी कोई यु्द्ध न हो या जहां किसी का वध न हो या जिसे कोई विजयी न कर सके। अयोद्धा का अर्थ है जो लड़ न सके अर्थात् जो लड़ाई के योग्य ना हो अथवा युद्ध करने वाला न हो। इसलिए जो लोग लड़ाई के लिए समर्थ नहीं थे वे ऐसी जगह युद्ध के लिए पहुंच गए जो युद्ध करने के लिए बनी ही नहीं थी।

भारत के प्राचीन इतिहास की कड़ियां हमारे पुराणों में ही ढूंढनी पड़ती हैं क्योंकि इनके अतिरिक्त भारत का कोई भी इतिहास लिखा ही नहीं गया। यदि कोई लिखा भी गया तो वह नालन्दा व तक्षशिला विश्वविद्यालयों में उनके साथ ही तबाह हो गया था। हमारे वर्तमान के इतिहासकारों को भारत का इतिहास लिखने के लिए इन्हीं पुराणों का सहारा लेना पड़ता है, इसके अतिरिक्त कोई चारा नहीं। जबकि यह सर्वविदित है कि इन पुराणों में सत्य कम और मनघड़न्त कहानियां अधिक भरी हैं। इसलिए कई विद्वानों ने इन्हें झूठ के पोथे और कपोलकल्पित कहा है। स्वामी दयानन्द जी ने तो इन्हें बिल्कुल ही नकार दिया था।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार अयोध्या प्रारम्भ से ही सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रही है। इसे वैवश्वत मनु ने सरयू नदी के तट पर बसाया था जहां यह आज तक विद्यमान है। भागवत (9-8/17-9) के अनुसार राजा सगर के पुत्र असमंजस ने एक बार अयोध्या के बच्चों को .....

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अयोध्या का वर्तमान स्वरूप

अयोध्या उत्तर प्रदेश के जिले फैजाबाद में एक छोटा सा कस्बा है। यह कस्बा फैजाबाद शहर से इतना अधिक सटा हुआ है कि पता ही नहीं चलता कब फैजाबाद शहर की सीमाएं समाप्त हुई और अयोध्या कस्बे की सीमा आरम्भ हुई। अयोध्या के बीचोंबीच से राष्ट्रीय राजमार्ग सरयू नदी को पार करके बनारस (काशी) जाता है जिस पर लगभग आधा किलोमीटर लंबा-चौड़ा पुल बना है। इस कस्बे के पश्चिम से उत्तर पूर्व की तरफ सरयू नदी बहती है। अयोध्या में लगभग 4 हजार मन्दिर हैं इसलिए इसे मन्दिरों की नगरी भी कहते हैं। इन मन्दिरों में एक से एक बढ़कर विशाल मन्दिर तथा अलग-अलग पंथों के साधुओं के डेरे हैं जिन्हें छावनियां तथा अखाड़ा कहा जाता है। यहां दर्जनों सम्प्रदायों के साधु रहते हैं जैसे कि नागा सम्प्रदाय, गौरक्ष सम्प्रदाय, दिगम्बरी, निर्मोही, निर्वाणी व खाकी आदि। इनमें खालसा अखाड़ा भी है जिनकी शुरुआत मुगलकाल में सिख गुरुओं ने संघर्ष के लिए की थी। ये साधु कुंभ मेले में भी इसी प्रकार अपने तंबू लगाते हैं। वास्तव में ये साधु अयोध्या के गौरव के ठेकेदार तथा इसकी रक्षा का भार यही समझते हैं। इन साधुओं में दसनामी नागा साधु तो एक सम्प्रदाय के रूप में पण्डित शंकराचार्य जगत्गुरु ने बनाया था। इन छावनियों और अखाड़ों में सबसे बड़ी छावनी मनिराम छावनी है जिसमें कई हजार साधु रहते हैं इन छावनियों और डेरों से चिलम तंबाकू और सुल्फे गांजा चरस की गंध नवआगन्तुकों के नथूनों में घुसकर सिर पकड़ने को मजबूर कर देती है। इसके विपरीत इन्हीं डेरों, अखाड़ों व छावनियों से निकलने वाली देशी घी में बनते हलवा-पूरी की सुगन्धि आगन्तुकों को इनकी तरफ आकर्षित भी करती है।

इन साधुओं की दिनचर्या प्रायः एक जैसी रहती है। इस नगरी में लगभग पचास हजार साधु निवास करते हैं जिनमें से अधिकतर वद्ध साधु अपने ही डेरों में अंदर ही पड़े रहते हैं। कुछ साधु योग करते व दंड पेलते भी नजर आते हैं। इन डेरों व छावनियों में सफाई कम व गंदगी अधिक होती है जो कि एक अशोभनीय दृश्य उपस्थित करती है। कुछ डेरे साफ सुथरे और आश्रम प्रतीत होते हैं। इनमें छोटे-छोटे पुस्तकालय भी बने हैं।

एक के बाद एक विशाल मन्दिर बने हैं जो मन्दिर कम बल्कि तीन तारा और पंचतारा होटलों के समान प्रतीत होते हैं जिनमें सफेद संगमरमर के फर्श बने हैं तथा अलग-अलग सूट और उनमें सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। अति प्राचीन मन्दिर संकरी गलियों में बने हैं जिनमें रोशनी कम, अंधेरा ज्यादा रहता है। प्रत्येक मन्दिर में कई-कई अधनंगे पुजारी रहते हैं जो धोती बांधे और बदन पर जनेऊ और माथे पर त्रिपुण्ड धारण किए रहते हैं। लेकिन सभी की एकरूपता यह है कि लगभग सभी के तोंद अशोभनीय ढंग से बढ़े हुए हैं। इनमें से अधिकतर पुजारी पूरे दिन पान चबाते तथा मन्दिर में ही पीक डालते रहते हैं। बात करते भी इनके मुख से पान की पीक उछलती रहती है। पूरी अयोध्या में वाल्मीकि मन्दिर का हाल सबसे विशाल और सुंदर है जिसमें एक साथ हजारों आदमी तक सो सकते हैं। इस मन्दिर के हाल की दीवारों के सफेद संगमरमर के पत्थरों पर सम्पूर्ण रामायण अंकित की हुई है। कणक मन्दिर की गणना अति प्राचीन मन्दिरों से की जाती है जिसमें छोटी-छोटी सोने की मूर्तियां रखी हैं और चौबीसों घंटे पुलिस का पहरा रहता है। इसी के सामने वाली गली में प्राचीन हनुमान गढ़ी है जहां हनुमान का मन्दिर है। यह मन्दिर बहुत शंकरा और पुराने घड़ाई के पत्थरों से निर्मित है जो देखने में विशाल नहीं है। राम जन्मभूमि के साथ लगता हुआ ‘रामचरित मानस भवन’ है जो एक बहुत बड़ा आधुनिक तीन मंजिला मन्दिर है जिसके अंदर सफेद संगमरमर के पत्थरों का अधिक इस्तेमाल किया गया है। इसमें रहने के लिए कई सूट बनाए गए हैं जिसमें सभी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं। सम्पूर्ण प्राचीन अयोध्या में कही-कहीं टूटे हुए या तोड़े हुए बौद्ध मन्दिरों के अवशेष भी स्पष्ट देखे जा सकते हैं। रामजन्मभूमि के सामने और दक्षिण में एक टूटा-फूटा छोटा मकान है इसे सीता रसोई कहा जाता है। इसी के साथ थोड़ा आगे चलकर दक्षिण में बैकुण्ठ धाम है। इस रामजन्मभूमि कहे जाने वाले स्थान में बाड़े के अंदर एक बहुत ही साधारण और छोटी तीन गुम्बदों वाली मस्जिद खड़ी थी जिसकी कोई मीनार नहीं थी। यह बाकी सभी भवनों से अलग-थलग है जिसे बाबरी मस्जिद कहा जाता था।

अयोध्या में बाबरी मस्जिद का निर्माण

(हिन्दू व अंग्रेज इतिहासकारों के मत का संक्षेप)

बाबर अफगानिस्तान के बुखारा व परगना रियासत के एक अदना से बादशाह थे। आपसी लड़ाई झगड़े के कारण इसकी रियासत छीन ली गई तो यह अपने चंद साथियों के साथ इधर-उधर मारा-मारा फिरता रहा। इसने अपने पुराने सैनिकों को तरह-तरह के लालच देकर उन्हें इकट्ठा किया और इसने कई बार सिंध और पंजाब के रास्ते भारत में घुसने का प्रयास किया लेकिन वहां लड़ाकू कौमों के कारण असफल रहा। लेकिन कुछ समय बाद पंजाब के ही एक सूबेदार दौलतखां के बुलावे पर अधिक से अधिक (लगभग 40 हजार) सैनिक लेकर भारत पर आक्रमण करने के लिए पानीपत तक आ पहुंचा। उस समय भारत में इब्राहिम लोधी का दिल्ली पर राज था। चित्तौड़ पर एक और बहादुर राजा राणा सांगा का शासन था। अप्रैल 1526 में पानीपत के मैदान में इब्राहिम लोधी तथा राणा सांगा की सेनाओं के साथ घमासान युद्ध हुआ जिसमें राणा सांगा बुरी तरह घायल हुए तो उसी के सेनापति कीर्तिमल (भंभरोलिया) ने उसकी फौज का विश्वास कायम रखने के लिए उसने राणा सांगा का ताज पहनकर घनघोर लड़ाई लड़ी। इसी प्रकार साथ में लोधी की फौजें भी लड़ी लेकिन इस लड़ाई में राणा सांगा और सेनापति कीर्तिमल दोनों ही शहीद होने पर विजय 20 अप्रैल 1526 को बाबर के हाथ लगी। उसकी विजय का खूतबा 27 अप्रैल 1526 को मौलाना महमूद और शेख जैन ने पढ़ा था। तथा हिन्दुस्तान के बादशाह घोषित हुए। इन्होंने इब्राहिम लोधी की तरह आगरा को अपनी राजधानी बनाया। अपने एक अन्य सेनापति मीर बांकी को अवध का सूबेदार नियुक्त किया।

इसके दो वर्ष बाद अप्रैल 1528 में अयोध्या में एक सप्ताह रहकर राम मन्दिर को अपने सामने तुड़वाया तथा अपने सूबेदार मीर बांकी को इसी जगह मस्जिद तामीर करने का शाही फरमान जारी किया। यह फरमान फारसी लिपि में था जिसका वर्णन सत्यदेव परिव्राजक ने 6 जुलाई सन् 1924 में हिन्दी में अनुवाद करके ‘मॉडर्न रिव्यू’ में छपवाकर इसकी सच्चाई का दावा किया था, जो इस प्रकार है-

  • शहंशाह हिन्द मालिकुल-जहां बादशाह बाबर के हुकम व हजरत जलालशाह के हुकम बमुजिब अयोध्या में राम जन्मभूमि को मिस्मार करके उसकी जगह उसी के मलबे व मसाले से मस्जिद तामिर करने की इजाजत दे दी गई है। बजरिये इस हुकमनामे के तुमको बतौर इतिला के आगाह किया जाता है कि हिन्दुस्तान के किसी सूबे से कोई हिन्दू अयोध्या न जाने पाए। जिस शख्स पर यह सुबहा हो कि यह वहां जाना चाहता है उसे फौरन गिरफ्तार करके दाखिले जिंदा कर दिया जाए। हुकम की सख्ती से तामिल हो फर्ज समझकर।

इससे पहले इस प्रकार का उल्लेख किसी दस्तावेज में नहीं मिलता ।

मस्जिद निर्माण के बाद हिन्दू संघर्ष संक्षेप में

स्थानीय हिन्दू इतिहासकारों का मत -

जब से यह बाबरी मस्जिद बनी है हिन्दू इतिहासकारों के अनुसार वहां स्थानीय हिन्दू व साधु समाज यहां तक कि हिन्दू रियासतों के छोटे-छोटे राजाओं ने समय-समय पर अपना विरोध जताया तथा छुटपुट वारदातें होती रही लेकिन कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि इस संघर्ष में एक लाख 74 हजार हिन्दू शहीद हुए जबकि इतने लोग तो पानीपत की किसी लड़ाई में भी शहीद नहीं हुए न ही मन्दिर के लिए कभी कोई बड़ी लड़ाई लड़ी गई जिसमें इतना बड़ा नरसंहार हुआ हो। एक स्थानीय राजा रणविजय सिंह का नाम इस संघर्ष के लिए लिया जाता है जो इसी संघर्ष में मारा गया। बतलाया गया है कि उसके बाद उसकी पत्नी जयकुमारी का नाम आता है जिसने इस संघर्ष को आगे बढ़ाया। लाला सीताराम अपनी पुस्तक ‘अयोध्या का इतिहास’ में इस संघर्ष का विस्तार से वर्णन करते हैं। इसी प्रकार ‘दरबारे अकबरी’ में रानी जयराज कुमारी तथा स्वामी महेश्वरानन्द को अयोध्या की लड़ाई में मरने का वर्णन किया है। वहां के स्थानीय गांव सराय सिरसिडा तथा राजेपुर के लोगों ने भी एक बार मस्जिद के आगे का दरवाजा तोड़ डाला था। लेकिन मुगल सेना ने इन्हें मार डाला। एक बार 1556 में भी स्वामी बलरामाचार्य की अगुवाई में संघर्ष हुआ जिसमें मस्जिद में तोड़फोड़ की गई लेकिन यह संघर्ष भी बुरी तरह विफल रहा।

यह संघर्ष अकबर के समय में भी हुआ जिसको देखते हुए अकबर ने मस्जिद के बाहर एक चबूतरा बनवाकर वहां राम की पूजा करने की इजाजत दे दी। यह कार्य उसने बीरबल और टोडरमल की मध्यस्थता से किया था। यह समझौता जहांगीर तथा शाहजहां काल तक बरकरार रहा। इस अवधि में वहां किसी प्रकार का संघर्ष और विरोध नहीं हुआ। इस सभी का कारण अकबर बादशाह की उदारनीति तथा कूटनीति थी। इसी काल में बादशाह अकबर ने मथुरा और वृन्दावन आदि में हिन्दुओं को मन्दिर बनाने की अनुमति दे दी जिस कारण वहां अनेक मन्दिर बने। अकबर ने गोवध पर पाबंदी लगाई तथा जजिया कर को हटा दिया और राजपूत राजकुमारियों से विवाह रचाकर पूरे वातावरण को ही बदल डाला। हिन्दू और मुस्लिम एकता को स्थापित करने के लिए उसने ‘दीने इलाही’ नामक एक नए धर्म की स्थापना भी की। अब इस चबूतरे पर कीर्तन और आरतियां होने लगी थी। यह चबूतरा वहीं परिसर के अंदर मस्जिद के साथ बना था जिसके मध्य एक छोटी दीवार थी। अकबर के समय ही तुलसीदास हुए जिन्होंने ‘रामचरित मानस’ की रचना की और ये तुलसी जी अयोध्या के रहने वाले थे।

इसके बाद औरंगजेब ने अपने काल में इस राम चबूतरे को तोड़ने का आदेश दिया तथा उसने मथुरा और काशी के मन्दिर भी तुड़वाए। इसके बाद फिर संघर्ष आरम्भ हो गया। बाबा वैश्वदास ने सिखों के 10वें गुरु गोविन्द सिंह जी को पत्र लिखकर अयोध्या बुलाया और वे दोनों वहां ब्रह्मकुण्ड पर मिले। एक योजना के तहत सिख सेना तथा चिमटाधारी साधुओं ने वहां के हसनअली की सेना पर हमला बोल दिया, जिसमें सिख सेना और चिमटाधारी साधु बहुत हौंसले से लड़े जिसमें हसन अली मारा गया और उसकी फौज मैदान छोड़कर भाग गई। इसके बाद औरंगजेब ने स्वयं अयोध्या पर हमला बोला और चबूतरे को तहस-नहस करके मूर्तियां फिकवा दी। औरंगजेब की मृत्यु के बाद सन् 1790 में फिर से चबूतरा बना और पूजापाठ आरम्भ हो गया।

इसके बाद अंग्रेजी हुकूमत के समय भी मन्दिर-मस्जिद पर छोटा मोटा संघर्ष जारी रहा। सन् 1857 में भारत के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में हिन्दू-मुस्लिम सद्भावना बनी तो मुसलमानों और हिन्दुओं ने आपस में समझौता करने का मन बना लिया था, लेकिन अंग्रेजों की कुटिल नीति के कारण यह समझौता सिरे नहीं चढ़ पाया। यह संघर्ष देश आजाद होने पर भी थमा नहीं लेकिन यह हमेशा एक स्थानीय मुद्दा ही बना रहा। जब 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के पश्चात् राजीव गांधी एक विशाल जनमत के साथ प्रधानमन्त्री बने तो जनसंघ से बनी भाजपा का इस चुनाव में कोई अस्तित्व नहीं रहा तो इस पार्टी ने इस मुद्दे की तरफ ध्यान देना आरम्भ कर दिया। इससे पहले सन् 1964 में विश्व हिन्दू परिषद् का गठन हो गया था, वह भी इस पार्टी से मिलकर इस संघर्ष में सम्मिलित हो गए। हालांकि दिखावे के लिए अयोध्या के मठाधीशों व साधुओं को भी साथ रखा। अब यह केवल एक धार्मिक मुद्दा न रहकर भारतवर्ष का एक राजनैतिक मुद्दा बन चुका था। जिसका वर्णन आगे के अध्यायों में किया गया है।

मस्जिद-मन्दिर के अधिकार पर कानूनी संघर्ष

जैसे कि पहले भी लिखा जा चुका है कि इस अयोध्या नगरी में हजारों मन्दिर व छावनियां हैं जहां भिन्न-भिन्न पंथों के साधु और महंत रहते हैं। दूसरा, इस क्षेत्र में हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मों के लोग रहते आए हैं। हालांकि मुस्लिम कम, हिन्दू संख्या में अधिक हैं। लेकिन दोनों ही पक्षों के धार्मिक नेताओं ने समय-समय पर कानूनी दांव-पेच खेलते हुए बार-बार न्यायालयों में मुकदमें ठोकते रहे। इस प्रकार दोनों ही पक्ष अपना-अपना दावा जताकर इस विषय को हमेशा तरोताजा बनाए रखते हुए न्यायालयों में गए जिसका वर्णन इस प्रकार है-

1 पहला मुकदमा (मुकदमा नं० 280/1885 दिनांक 19-1-1885)
पहला मुकदमा अयोध्या के एक महंत रघुवरदास ने उपन्यायाधीश फैजाबाद की अदालत में दायर किया। इस मुकदमे में महंत ने चबूतरे पर मन्दिर बनवाने की अनुमति मांगी। यह मुकदमा एक साल तक चला जिसमें न्यायाधीश ने फैसला दिया कि राम चबूतरे पर मन्दिर बनने से मस्जिद में आवागमन में परेशानी होगी। इसलिए 24-3-1886 को जिला न्यायाधीश ने इसे खारिज कर दिया। लेकिन साथ-साथ न्यायाधीश एफ.ई.ए. चेनियार ने अपने फैसले में लिखा- “यह हिन्दुओं के लिए दुःखद है कि उसके एक पवित्र स्थान पर 356 वर्ष पहले मस्जिद बन गई थी जिसे अब सुधारा नहीं जा सकता।” इसके बाद 22/23 दिसम्बर 1949 की रात में राम चबूतरे पर रखी मूर्तियों को कुछ लोगों ने मस्जिद के अंदर ले जाकर रख दिया जिस पर अज्ञात लोगों के विरोध में एपफ.आई.आर. दर्ज कर दी गई। एफ.आई.आर. पर कारवाई करते हुए सिटी मैजिस्ट्रेट ने एक सरकारी रिसिवर नियुक्त कर दिया और फैजाबाद के तत्कालीन जिला अधिकारी के.के. नैयर ने सम्पूर्ण परिसर को विवादग्रस्त घोषित करके मस्जिद पर ताला लगवा दिया।
2 दूसरा मुकदमा (मुकदमा नं० 20/1950 दिनांक 16 जनवरी 1950)
दूसरा मुकदमा गोपाल सिंह विशारद ने फैजाबाद दीवानी अदालत में दायर किया जिसमें उसने फैजाबाद के पुलिस कमीश्नर तथा सिटी मैजिस्ट्रेट के विरुद्ध मांग की कि राम की मूर्तियों को वहां से हटाने पर रोक लगाई जाए। तीन मार्च 1951 को अदालत ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया तो मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय में पहुंच गया लेकिन उच्च न्यायालय ने भी फैजाबाद अदालत के फैसले को बहाल रखा। लेकिन 23-4-1950 को डिप्टी कलैक्टर ने अपने जवाब में कहा कि इस स्थान का प्रयोग मस्जिद के रूप में होता रहा न कि मन्दिर के रूप में।
3 तीसरा मुकदमा (मुकदमा नं० 25/1950 दिनांक 5 दिसम्बर 1950) 
महंत परमहंस रामचंद्र दास ने अदालत से प्रार्थना की कि मूर्तियों की सार्वजनिक पूजा के लिए इजाजत दी जाए लेकिन अदालत ने इसे स्वीकार नहीं किया। बाद में सन् 1990 में परमहंस ने अपना यह मुकदमा वापिस ले लिया जिसमें उनका कहना था कि 40 वर्ष लंबी कार्यवाही के बाद अदालत कोई फैसला नहीं कर पाई इसलिए वे ऊब कर अपना मुकदमा वापिस ले रहे हैं। महंत परमहंस अभी कुछ दिन पहले तक श्री रामजन्मभूमि न्याय के प्रमुख थे।
4 चौथा मुकदमा (मुकदमा नं० 26/1956 दिनांक 12 दिसम्बर 1956) 
यह मुकदमा अयोध्या में स्थापित निर्मोही अखाड़ा तथा उसके महंत की ओर से सरकार द्वारा नियुक्त रिसिवर प्रियादत्त राम के विरुद्ध किया था जिसमें मांग की गई थी कि रिसिवर को हटाकर विवादित स्थल पर पूरा प्रबंधन निर्मोही अखाड़े को सौंप दिया जाए। इस मुकदमे की कई-कई सालों बाद तारीख पड़ती रही और लटकता रहा।
5 पांचवां मुकदमा (मुकदमा नं० 12/1961 दिनांक 18 दिसम्बर 1961) 
यह मुकदमा सुन्नी सैंट्रल वक्फ बोर्ड उत्तर प्रदेश की तरफ से किया गया था जिसने बोर्ड से मांग की थी कि मस्जिद और उसके साथ वाली अगलबगल की पूरी जमीन गंज-ए-शहीदा नामक कब्रिस्तान के रूप में जाना जाता रहा है उसका कब्जा बोर्ड को दिलवाया जाए।

ये सारे मुकदमे चल रहे थे कि इस पूरे ही मामले में एक नया मोड़ आ गया जिसमें गोपालसिंह विशारद द्वारा 1950 में दायर किए गए मुकदमे के वकील उमेश चंद्र पांडे ने 21 जनवरी 1986 को एक नया आवेदन किया कि 1949 में जो ताला लगाया गया था उसे खोल दिया जाए। इस पर वकील का आवेदन स्वीकार हुआ लेकिन मुंसिफ मस्जिट्रेट ने पांडे जी की मांग नामंजूर कर दी। इसी पर 31 जनवरी 1986 को फैजाबाद जिला जज के यहां अपील हुई जिसमें जिला न्यायाधीश के. एम. पांडे ने ताला खोलने का आदेश दे दिया। इस आदेश के विरोध में फैजाबाद के एक मुसलमान ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बैंच में अपील की लेकिन वह खारिज हो गई। इसी प्रकार सुन्नी वक्फ बोर्ड ने भी अपील की थी लेकिन वह भी खारिज हो गई। आखिरकार ताला खोल दिया गया।


जनवरी 1989 में हिन्दू धर्मसंसद की तीसरी बैठक में मन्दिर के शिलान्यास की तारीख 9 नवम्बर तय कर दी गई जिसके विरोध में बोर्ड ने 18 अक्तूबर 1889 को इलाहाबाद में अपील की लेकिन वह खारिज हो गई। 27 अक्तूबर को सर्वोच्च न्यायालय ने भी शिलान्यास की अनुमति दे गई। 10 नवम्बर 1989 को एक शिला रखी गई लेकिन विधिवत् शिलान्यास 17 नवम्बर 1989 को हुआ जिसमें तत्कालीन केन्द्रीय गृहमन्त्री बूटासिंह एवं राज्य के मुख्यमन्त्री नारायणदत्त तिवारी भी मौजूद थे। ताला खुलने तथा शिलान्यास ये दोनों ही काम राजीव गांधी के काल में हुए थे।

6 छठा मुकदमा (मुकदमा नं० 236/1989 दिनांक एक जून 1989) 
यह मुकदमा अवकाश प्राप्त न्यायाधीश डी.एन. अग्रवाल ने फैजाबाद की दीवानी अदालत में दायर किया गया जिसको बाद में उच्च न्यायालय में स्थानान्तरित कर दिया गया जिसमें उसने दलील दी कि बाबर के सेनापति मीर बांकी ने राम जन्मस्थल पर बने मन्दिर को तोड़कर मस्जिद बना दी थी। वक्फ बोर्ड के वकीलों का कहना है कि इस मुकदमे के जरिए पहली बार संघ परिवार ने मन्दिर तोड़कर मस्जिद बनाने के इतिहास का कानूनी पन्ना खोला।


इस तरह कुछ 6 मुकदमों में से पहला मुकदमा जो आजादी से पहले का था, रद्द हो गया था। दूसरा मुकदमा परमहंस का जिसे उसने खुद वापिस ले लिया। बाकी शेष चारों मुकदमों को न्यायालय के आदेश से इलाहाबाद उच्च न्यायालय की विशेष लखनऊ बैच में 10 जुलाई 1989 को सुपुर्द कर दिये गए तब से यह मामला लखनऊ बैंच में चल रहा है। न्यायालय ने यथास्थिति बनाए रखने का फैसला दिया इसके बाद 1991 में उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार ने विवादित स्थल की 2.77 एकड़ भूमि दर्शनार्थियों के लिए खोली और उसके बाद नारायणदत्त तिवारी के काल में अधिगृहित की गई 54 एकड़ जमीन में से 43 एकड़ जमीन को एक रुपये सालाना किराए पर ‘रामजन्मभूमि न्यास’ को पट्टे पर दे दिया गया जिसके विरोध में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर हुई लेकिन न्यायालय ने आदेश दिया कि राज्य सरकार को ऐसा करने का अधिकार है।

न्यायालय के आदेश अनुसार यथास्थिति बनाए रखनी थी लेकिन इसके बावजूद 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया। इसके बाद केन्द्र में नरसिंह राव सरकार ने संसद से भूमि अधिग्रहण अधिनियम-1993 पारित कराकर 7 जनवरी 1993 को विवादित स्थल और उसके पास की कुल 67 एकड़ जमीन को पुनः अधिगृहित कर लिया। उसी दिन राष्ट्रपति ने संसद के नियम 143(1) के तहत राय लेने के लिए सम्पूर्ण मसले को सर्वोच्च न्यायालय के पास भेजा। सर्वोच्च न्यायालय ने 24 अक्तूबर 1994 के अपने फैसले में केन्द्र सरकार द्वारा अधिग्रहण को जायज ठहराते हुए पूरे मामले को निर्णय करने के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय को उचित जगह माना। इसी भूमि अधिग्रहण मामले में एक मुसलमान सर्वोच्च न्यायालय गया लेकिन न्यायालय ने 67 एकड़ भूमि अधिग्रहण को उचित मानते हुए यथास्थिति बनाए रखने का संकल्प दोहराया।

इसके अतिरिक्त भी 13 दिसम्बर 1992 को सी.बी.आई. ने 49 लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया जिसमें लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती भी बाबरी मस्जिद ढहाने के आरोपी हैं। इस मामले में कल्याण सिंह को परिसर में राम चबूतरा बनाने की इजाजत देने के कारण उसे एक दिन की सजा मिल चुकी है। इसके अतिरिक्त अवमानना के मसले पर आई.ए.एस. अधिकारी वासुदेव पिल्ले और इलाहाबाद बार कौंसिल के अध्यक्ष बी.सी. मिश्रा दंडित हुए हैं। हाल ही में अदालत की अवमानना के तहत अरुंधति राय को भी सजा हो चुकी है। इसके अतिरिक्त लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट केन्द्र सरकार के पास पहुंच चुकी है तथा उस पर कार्यवाही भविष्य के गर्भ में छिपी है।

6. मंदिर-मस्जिद सम्बन्धित कुछ महत्त्वपूर्ण तारीखें (सन् 1964 से सन् 1990)

1964 - संदीपनी आश्रम में जन्माष्टमी के अवसर पर धर्माचार्यों द्वारा ही विश्व हिन्दू परिषद् की स्थापना की गई।
8 अप्रैल 1984 - दिल्ली में प्रथम धर्म संसद की बैठक हुई जिसमें कई सम्प्रदायों के 328 साधु संत आए जिन्होंने रामजन्म भूमि को मुक्त कराने का निर्णय लिया।
26 मार्च 1985 - 50 लाख रामभगतों के बलिदानी जत्थे तैयार करने का निर्णय लिया गया।
18 अप्रैल 1985 - महंत रामचन्द्रदास ने रामनवमी तक ताला नहीं खोलने पर आत्मदाह की धमकी दी।
31 अक्तूबर 1985 - कर्नाटक के उडुप्पी कस्बे में दूसरे धर्म संसद की बैठक हुई जिसमें 851 साधु संतों ने भावी संघर्ष की योजना बनाई।
1 फरवरी 1986 - फैजाबाद के जिला न्यायालय ने ताला खोलने का आदेश दिया।
14 फरवरी 1986 - इस्लाम धर्मियों ने एक फरवरी के फैसले के विरोध में काला दिवस मनाया।
1 जनवरी 1987 - शाहबुद्दीन की अगुवाई में बाबरी मस्जिद-एक्शन कमेटी ने गणतन्त्र दिवस के बहिष्कार की घोषणा की।
13 मार्च 1987 - उत्तर प्रदेश सरकार ने श्री राम जानकी रथयात्राओं पर प्रतिबन्ध लगाया।
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12 अगस्त 1988 - बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी द्वारा अयोध्या में मार्च करके बाबरी मस्जिद में नमाज पढ़ने की घोषणा की।
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1 फरवरी 1989 - प्रयागराज में तीसरी धर्म संसद की बैठक की जिसमें कोई विशेष फैसला नहीं लिया गया।
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30 सितम्बर 1989 - शिला पूजन के कार्यक्रम को गांव-गांव और नगर-नगर तक पहुंचाने का फैसला लिया गया।
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17 अक्तूबर 1989 - विश्व हिन्दू परिषद् ने गृहमन्त्री श्री बूटासिंह को बतलाया कि शिला पूजन के कार्यक्रम को स्थगित नहीं किया जाएगा।
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2 नवम्बर 1989 - शिला पूजन के स्थान पर झण्डा गाड़ दिया गया।
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6 नवम्बर 1989 - तत्कालीन प्रधानमन्त्री, गृहमन्त्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री आदि ने देवराह बाबा से मिलकर शिलान्यास का स्थान बदली करने के लिए पेशकश की।
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7 नवम्बर 1989 - देवराह बाबा ने निर्णय लिया कि जहां झण्डा लगा है वहीं शिलान्यास होगा।
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8 नवम्बर 1989 - उत्तर प्रदेश सरकार ने शिलान्यास स्थल को विवादित भूमि नहीं बताया।
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9 नवम्बर 1989 - तीन महंतों की उपस्थिति में शिलान्यास स्थल पर गढ़ा खोदा गया।
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10 नवम्बर 1989 - बिहार के एक हरिजन श्री कामेश्वर चौपाल के हाथों पहली शिला रखी गई।
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6 फरवरी 1990 - तत्कालीन प्रधानमन्त्री वी.पी. सिंह ने मुक्ति यज्ञ समिति के सदस्यों को बातचीत के लिए बुलाया तथा समस्या के हल के लिए और कुछ समय मांगा।
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9 फरवरी 1990 - समिति ने प्रधानमन्त्री की अपील को स्वीकार कर लिया।
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12 अगस्त 1990 - भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा की घोषणा कर दी।
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25 सितम्बर 1990 - आडवाणी ने अपनी रथयात्रा सोमनाथ से शुरू कर दी।
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22 अक्तूबर 1990 - तत्कालीन प्रधानमन्त्री वी.पी. सिंह ने अयोध्या मसले को हल करने के लिए ज्योति बसु, बीजू पटनायक, शरद पंवार, चेन्ना रेड्डी, भैरों सिंह शेखावत और चिमन भाई पटेल सहित छः मुख्यमंत्रियों की संयुक्त समिति गठित कर दी।
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23 अक्तूबर 1990 - आडवाणी की रथयात्रा को बिहार में चित्रकूट नामक स्थान पर रोक कर उसे गिरफ्तार कर लिया गया अर्थात् लालू प्रसाद यादव (तत्कालीन मुख्यमन्त्री बिहार) ने आडवाणी के अश्वमेधरथ को बिहार में रोक दिया।
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24 अक्तूबर 1990 - आडवाणी की गिरफ्तारी के विरोध में भाजपा और अन्य हिन्दू संगठनों की ओर से भारत बंध का आह्वान किया गया जिस पर कुछ हिंसा भी हुई।

नोट - इससे आगे 30 अक्तूबर 1990 को अयोध्या में क्या घटित हुआ अगले अध्यायों में पढ़ें।

दूसरा अध्याय

1. बाबरी मस्जिद पर पहला आक्रमण (30 अक्तूबर 1990)

भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने 25 सितम्बर 1990 को सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथयात्रा आरम्भ की जिसका उद्देश्य देशभर के हिन्दुओं को यह याद दिलाना था कि अयोध्या में ‘रामजन्मभूमि’ के स्थान पर मस्जिद बनी हुई है जो हिन्दुओं के लिए अपमानजनक है। चाहे देखने में उनका उद्देश्य धार्मिक प्रतीत होता था लेकिन इसके पीछे राजनैतिक कूटनीति तथा राजनैतिक हैसियत बढ़ाने की लालसा स्पष्ट रूप से छिपी थी। मीडिया ने इस रथयात्रा को इतना उछाला जैसे कि आडवाणी जी किसी महायुद्ध के लिए निकल पड़े हैं और उनको एक सेनापति के तौर पर प्रोजैक्ट किया जा रहा था। हिन्दुओं को कार सेवकों के रूप में बतौर एक योद्धा प्रोजैक्ट किया जा रहा था और उन्हें लड़ाई के लिए अयोध्या पहुंचाने के लिए आह्वान किया जा रहा था। पूरे देश का वातावरण उत्तेजक तथा साथ-साथ बोझिल होता जा रहा था। कट्टर हिन्दुओं में जोश भरा जा रहा था, मुस्लिम समाज टकटकी लगाए यह सब देख और सुन रहा था। देश का आम नागरिक बेचैन था, कुछ इसे कौतुहल भरी दृष्टि से देख और सुन रहे थे। कुछ लोग तो इसे हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की लड़ाई के बतौर देख रहे थे। मुस्लिम नेताओं में छटपटाहट थी और वे इधर से उधर भागदौड़ कर रहे थे। हिन्दू नेता उत्सुकता भरी नजरों से रथयात्रा की सफलता पर नजर गड़ाए हुए थे।

केन्द्र में वी.पी. सिंह की सरकार थी जो मिली-जुली सरकार थी। इस सरकार को जीवित रखने के लिए भाजपा के सांसदों की आवश्यकता थी। वी.पी. सिंह की सरकार ने इस रथयात्रा को स्थगित करने के भरसक प्रयास किए लेकिन सरकार असफल रही तथा भाजपा के सांसदों का समर्थन वापिए लिए जाने पर सरकार अल्पमत में आ गई और एक कामचलाऊ सरकार बनकर रह गई। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी जिसे धर्म निरपेक्ष माना जा रहा था। मुस्लिम समाज का मुलायम सिंह पर विश्वास था और इस विश्वास को कायम रखने के लिए मुलायम सिंह बार-बार विश्वास दिला रहे थे कि वहां मस्जिद के पास चिड़िया तक को भी पर नहीं मारने दिया जाएगा। इस मसले पर मुलायम सिंह जी मुलायम न रहकर कठोर हो गए थे जो मुख्यमन्त्री के नाते उनका नैतिक कर्त्तव्य भी था।

मैं (लेखक) उस समय डी. कम्पनी 91 बटालियन सी.आर.पी.एफ. के कम्पनी कमाण्डर (डी.एस.पी.) बतौर पंजाब में तैनात था जहां मैं 7 जून 1986 से ही लगातार तैनात चला आ रहा था लेकिन बीच-बीच में पंजाब से बाहर भी कुछ समय के लिए तैनाती होती रहती थी। सन् 1990 में पंजाब का उग्रवाद अपनी चरम सीमा पर था। 26 सितम्बर 1990 को मेरी कम्पनी को तुरन्त दूसरे दिन सायं लुधियाना से फैजाबाद के लिए ‘किसान मेल’ पकड़ने का हुकम मिला जिसमें कोच आरक्षित करवा दिए गए थे। मेरी कम्पनी उस समय संगरूर जिले के सुनाम कस्बे में तैनात थी जो शहीद उधम सिंह की जन्मभूमि है। वहां के स्टेडियम में उनका एक ऊंचा शहीद स्मारक बना है। बटालियन का मुख्यालय भटिण्डा शहर में था और बाकी कम्पनियां इसी जिले के अलग-अलग कस्बों में तैनात थी।

दूसरे दिन निश्चित समय पर मेरी कम्पनी लुधियाना रेलवे स्टेशन पर पहुंच गई और रात के सवा नौ बजे फैजाबाद के लिए रवाना हो गई। नियमानुसार डब्बों में संतरी वगैरा की तैनाती को चैक करके मैं अपनी सीट पर चला गया। मैं सोच रहा था कि क्या राम मन्दिर और बाबरी मस्जिद का मसला पंजाब के उग्रवाद के मसले से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। दूरदर्शन व समाचार पत्रों में भी पंजाब का मसला कम, मन्दिर-मस्जिद विवाद ज्यादा छाया रहता था। मैं जानता था कि आडवाणी और भाजपा का कोई भी वरिष्ठ नेता कई सालों से डर के मारा पंजाब नहीं आया था। लेकिन इस रथयात्रा को पंजाब के उग्रवाद से भी अधिक महत्त्व दिया जा रहा था। पंजाब के इस मसले का किसी को भी कोई हल नहीं सूझ पा रहा था, पंजाब में हर रोज लोग मर रहे थे। लेकिन इसी पंजाब की आडवाणी और उनकी पार्टी को कोई चिंता नहीं थी। फिर भी भाजपा को अयोध्या में बाबरी मस्जिद की चिंता सता रही थी। मैं सोच रहा था कि हमारे राजनैतिक नेता कितने स्वार्थी और खोखले हो गए हैं?

पंजाब में मेरी तैनाती को 4 वर्ष से अधिक हो गए थे, इसलिए पंजाब में मारामारी को सहने की एक आदत सी हो गई थी। मुझे पंजाब में जो अपनापन मिला वह अपनी ड्यूटी के दौरान भारत भर में अन्य कहीं नहीं मिला। इतना खून खराबा होने पर भी पंजाब के लोग विशेषकर गांवों के किसान लोग बेखौफ जी रहे थे और उनके मिलन में हमेशा गर्माहट रहती थी। हम गांव की तलाशी के दौरान घर की औरतों की संदूकों, अलमारियों, बिस्तरों, यहां तक कि आले-दीवालों में रखे उनके आभूषणों तक को भी उलट-पुलट करते रहते थे। प्रातः तीन बजे से ही गांव को घेर कर बैठ जाते थे जिस कारण औरतें-आदमी बाहर शौचादि से निवृत्त होने भी नहीं जा सकते थे। हमारी इन घेराबंदी कार्यवाहियों से सबसे अधिक परेशानी औरतों व लड़कियों को उठानी पड़ती थी। लेकिन इस सभी के बावजूद भी घर की तलाशी के बाद, घर की बूढ़ी माताएं हमें यह कहना नहीं भूलती थी, ‘पुत्रा, दो परांठे तो छक ही जाओ।’ मना करने पर भी लस्सी पीने की जिद करती थी लेकिन हम मेहरबानी और ‘सतश्री अकाल’ कहकर वहां से आगे बढ़ जाते थे क्योंकि इस प्रकार किसी के घर से खाना पीना या कुछ लेना हमारी फोर्स की संस्कृति के एकदम विरुद्ध हैं लेकिन इन लोगों की जिंदादिली तथा मेहमाननवाजी की भावना को देखकर दिल पसीज जाता था। यह सभी पंजाब के बारे में सोचते-सोचते मैं सो गया।

28 सितम्बर को सायं ठीक 4 बजे हम फैजाबाद रेलवे स्टेशन पहुंच गए। वहां पहले से ही उत्तर प्रदेश पुलिस की गाड़ियां तैयार थी, जो हमें फैजाबाद की नवीन मंडी ले गई जहां कम्पनी के ठहरने की व्यवस्था की गई थी। मेरी कम्पनी शायद अर्धसैनिक बलों की फैजाबाद पहुंचने वाली पहली कम्पनी थी। इसलिए रहने की पूरी सुविधाएं मिल गई। इसके नजदीक ही अफसरों के रहने की भी व्यवस्था की गई थी। मेरी स्वाभाविक तौर पर कमाण्डर के नाते एक अच्छी आदत थी कि जब तक जवानों की रहने की व्यवस्था संतोषजनक न हो जाए, मैं अपने निवास को नहीं देखता था। इसी प्रकार मैं जवानों के खाने और छुट्टी का विशेष ध्यान रखता था जो मेरी आदत में शुमार था। इन बातों के लिए मैंने अपनी नौकरी में कोई समझौता नहीं किया जिस कारण मेरी अक्सर मेरी उच्च अधिकारियों व स्थानीय पुलिस अधिकारियों से झड़प होती रहती थी, जो मेरी नौकरी में एक आम बात रही।

दूसरे दिन प्रातः रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद स्थान पर स्थानीय पुलिस को हटाकर मेरी कम्पनी को तैनात करने से पहले मैंने इस पूरे क्षेत्र का जायजा लिया। लगभग 40×80 गज के क्षेत्र को लोहे की ढाई इंच मोटी पाइपों से एक बाड़ के तौर पर घेर रखा था। पाईपों के एक दूसरे से इतना अधिक सटा कर बांध रखा था कि वहां कोई कुत्ता भी प्रवेश नहीं कर सकता था। इस बाड़ की ऊंचाई लगभग 5 फुट थी। इस बाडे़ के अंदर उत्तर-पूर्व में एक खण्डहरनुमा मस्जिद खड़ी थी जिसके तीन गुम्बद और तीन दरवाजे थे लेकिन कोई मीनार नहीं थी। इसकी लम्बाई चौड़ाई 28×12 फुट होगी। दीवारों पर कई सालों से कोई सफेदी वगैरा नहीं हुई थी, जिस कारण यह बाहर से पूरी काली पड़ चुकी थी। इसके अंदर पूरी सफाई थी और किसी प्रकार का कोई सामान नहीं था। मस्जिद की छत लदा की बनी थी। इसके तीनों दरवाजों की चौखटों की जगह काले रंग के पत्थर लगे हुए थे। यहां फोटोग्रापफी पर प्रतिबंध था लेकिन फिर भी हमारे एक दो वरिष्ठ अधिकारियों ने इन पत्थरों के क्लोज-अप चित्र लिए थे। देखने में ये न तो किसी मन्दिर के लगते थे और न ही किसी मुगल शैली के। ऐसा कोई भी प्रत्यक्ष प्रमाण नजर नहीं आता था कि इस मस्जिद में किसी मन्दिर का मलबा लगा हो। यह चूने और पत्थर/ईंट की बहुत साधारण निर्मित मस्जिद थी जिसे देखने में यह बिल्कुल भी नहीं लगता था कि यह किसी बादशाह ने बनवाई होगी। इसके सामने दक्षिण तथा पूर्व की तरफ एक दीवार बनी थी जिसका एक दरवाजा बैकुण्ठ धाम की तरफ जाने वाली सड़क पर खुलता था। इस दरवाजे के साधारण किवाड़ काले पड़ चुके थे। इसी सड़क पर दूसरी तरफ एक टूटे फूटे साधारण मकान को सीता की रसोई बतलाया जा रहा था। मस्जिद के सामने वाली दीवार के साथ एक बहुत छोटे मंच के आकार का चबूतरा बना था जिस पर दो पुजारी पूजापाठ करते तथा आरती भी होती थी। इसे राम चबूतरा बतलाया जा रहा था। इसी चबूतरे से कुछ कदम दूर दक्षिण में एक 8×8 फुट तथा लगभग साढ़े तीन फुट गहरा गढ़ा बनाया गया था जिसमें पोलिथिन बिछाकर 13-14 रंग बिरंगी ईंटें रखी थी जिनमें से कुछ को चांदी की बतलाया जा रहा था। इन पर कुछ देशों के नाम लिखकर रखे गये थे। इस गढ़े को एक लोहे की छतरी बनाकर ढका गया था। छतरी की टांगें लोहे की पाईप की थी जिन्हें नीला रंग किया गया था।

इस घेरे के अंदर चमड़े की बनी किसी भी वस्तु का लाना मना था। इसलिए मैंनें अपने चमड़े का बैल्ट बदल कर वैब बैल्ट लगा लिया था तथा पिस्टल के खोल को भी बदली कर लिया था। इस घेरे के दक्षिण में गेट बना था तथा इसके साथ पेड़ के नीचे एक अर्धस्थायी नियन्त्रण कक्ष बना था जिसमें स्थानीय पुलिस व सी.आई.डी. के लोग बैठे-बैठे जम्हाई लेते रहते थे। दिन के समय हिन्दू धार्मिक यात्रियों का आवागमन लगा रहता था जिनको मैटल डिटैक्टर से होकर गुजरना पड़ता था। इस गेट पर एक बाड़े के अंदर और बाहर चारों तरफ मेरी कम्पनी को चौबीस घंटे के लिए तैनात कर दिया गया जिनको पारियों में बदलना पड़ता था। बाड़े के अंदर रहने वाले जवान व अधिकारी नंगे पैरों से ड्यूटी दिया करते। मुस्लिम यात्री बहुत कम आते थे। वहां बंदरों की भरमार थी जो दर्शकों के हाथों से थैले और सामान पर झपटते रहते थे। यहां कई पुराने पेड़ थे जो रात में इन्हीं बंदरों का बसेरा बनते थे।

(अयोध्या नगरी का विवरण प्रथम अध्याय के द्वितीय खण्ड में दे दिया गया है।)

आडवाणी जी अपने रथ के साथ सोमनाथ से चलकर देश के भिन्न-भिन्न राज्यों के बीच से चले आ रहे थे। जितने वे बढ़ रहे थे उतनी ही ज्यादा उत्तेजना अयोध्या, फैजाबाद और इसके चारों तरफ बढ़ रही थी, शायद पूरे देश में भी। उत्तर प्रदेश पुलिस तथा पी.ए.सी. में एक अलग तरह का उतावलापन देखने को मिला। इनमें बहुत से वर्दी में ही माथे पर तिलक लगाए और मुंह में पान को चबाते गलियों में थूकते नजर आते थे, साथ में ‘जयश्री राम’ का जयकारा भी लगाते रहते थे। अधिकतर अपने कमीज के ऊपर के बटनों को खोलकर चलते थे। अक्सर इनके एक हाथ में लाठी तथा दूसरे हाथ में अपनी टोपी रहती थी। कइयों के गले में काले धागे और ताबीज बंधे नजर आते थे। कईयों ने तो हाथों की सभी अंगुलियों में रंग बिरंगी अंगूठी पहनी होती तो कईयों के जूते भी रंग बिरंगे होते थे। कोई जूता कोई सैंडल तो कोई चप्पल ही पहनकर चलता था। रायफल वाले अपनी रायफल को ऐसे लटकाकर चलते थे जैसे यह कोई फालतू का बोझ है। कई सिपाही तो आंखों में सुरमा और काजल भी डाले हुए देखे गए। लेकिन इनमें अधिकतर ‘जय श्री राम’ और ‘राम लला’ का जयकारा अवश्य करते थे। इनको देखने पर यह पुलिस वाले कम, स्वयंसेवक ज्यादा नजर आते थे। इनकी शक्ल सूरत व भाषा से वे पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रतीत होते थे। मैंने जब से होश संभाला हमारे गांव में लोगों को ‘राम-राम’ का अभिवादन अवश्य करते सुना था लेकिन यह ‘राम लला’ शब्द यहां पहली बार सुना था। हमारे राम-राम का सम्बोधन सर्वशक्तिमान ईश्वर या भगवान के लिए प्रयोग किया जाता है, जबकि ‘राम लला - जय श्री राम’ का सम्बोधन यहां कुछ और ही कह रहा था।

कहते हैं खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है इसी प्रकार इनके बर्ताव और उनकी आदतों का असर मेरे जवानों पर पड़ने लगा और मेरे कुछ जवानों ने वर्दी पहने हुए तिलक लगाना शुरू कर दिया जो सरेआम किसी भी वर्दी का अपमान होता है। यह आचरण मेरे लिए देखरेख के अतिरिक्त स्थानीय उच्च अधिकारियों से भी बार-बार अलग-अलग कार्यों से मिलना पड़ता था। इसलिए अर्धसैनिक बलों की तरफ से मैं एक ऐसा अधिकारी था जिसे अयोध्या के चप्पे-चप्पे का ज्ञान और वहां घटने वाली घटनाओं की पल-पल की खबर रहती थी। इसलिए मुझे वहां का एक मुख्य चश्मदीद गवाह कहा जा सकता है।

29 अक्तूबर को ही आई.टी.बी.पी. कम्पनी को बाड़े में लगाने के बाद थोड़ा अंधेरा गहराने पर रामजन्मभूमि परिसर में बने गढ़े पर लगी छतरी की टांगें काटकर हटा दिया गया और अभी उसकी लगभग दो फुट ऊंची टांगें खूटों की तरह नजर आ रही थी। जब मैंने इस बारे में ज्ञात किया तो पता चला कि यह मुख्यमन्त्री के आदेशों से किया गया बतलाया गया लेकिन इसके काटने के पीछे क्या उद्देश्य था कुछ पता नहीं चल पाया। इसी रात से पूरे अर्धेसैनिक बल तथा स्थानीय पुलिस बलों को पूरी तरह सतर्क कर दिया गया। सूचनाएं पहुंच रही थी कि फैजाबाद के चारों तरफ के गांवों में हजारों कार-सेवक पहुंच रहे हैं, जिसका अर्थ था कि सुरक्षा बलों को पूरी रात सतर्क रहना पड़ेगा।

30 अक्तूबर को मैं प्रातः पांच बजे से ही अपनी कम्पनी की तैनाती के बड़े स्थान पर पहुंच गया था इसके कुछ समय बाद वहां मेरे पास मेरे कमाण्डैंट पहुंचे और उन्होंने सरयू नदी के पुल पर चलने के लिए कहा जो मेरी कम्पनी की ड्यूटी के स्थान से लगभग डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर था, जहां पर काफी कार-सेवक पहुंचने की सूचना थी। लेकिन यह क्षेत्र हमारी बटालियन की जिम्मेदारी क्षेत्र से बाहर था जो ढिल्लों कमाण्डैंट के अधिकार क्षेत्र में था। इस पर मैंने मेरे कमाण्डैंट से आग्रह किया कि वह क्षेत्र हमारे जिम्मेदारी से बाहर है इसलिए हमें ऐसे समय में अपने ही क्षेत्र में बने रहना चाहिए। लेकिन उन्होंने दोबारा से चलने को कहा तो मैं बगैर कोई वाद-विवाद किए उनके साथ चला गया। लेकिन मन ही मन मुझे पूरी शंका हो रही थी कि मैं अपनी कम्पनी का साथ छोड़कर दूसरी जगह गलत जा रहा था क्योंकि यह पूर्णतया नियम के विरुद्ध था। मैंने अपनी जीप जो स्थानीय प्रशासन ने उपलब्ध कराई थी, को कमाण्डैंट की जिप्सी के पीछे लगाया और पुल पर पहुंच गए। वहां जिसका कभी डंडा तो कभी टोपी नीचे गिर जाती थी जो मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था। इसी बीच मैंने फिर से कमाण्डैंट को अपनी ड्यूटी की जगह जाने की बात को दोहराया। बाकी सभी अधिकारी खड़े-खड़े देख रहे थे या जवानों को निर्देश दे रहे थे लेकिन मेरा कमाण्डैंट मेरी बात पर कोई ध्यान न देकर अनदेखा कर रहे थे।

मैं मेरे कमाण्डैंट की इन हरकतों पर बहुत हैरान और परेशान था। वास्तव में मेरे कमाण्डैंट पहले आर्मी की ‘सिगलन कोर’ में थे। उसके बाद सी.आर.पी. में आने पर भी वह लगातार सिगलन बटालियन में रहे जिनका कार्य संचार व्यवथा को देखना ही होता है। लेकिन कुछ ही दिन पहले पदोन्नत होकर हमारी जी.डी. बटालियन में कमाण्डैंट के तौर पर आए जिनसे मैं अच्छी तरह परिचित नहीं था। लेकिन अब मैं यह समझ चुका था कि इन को न्याय व्यवस्था की ऐसी ड्यूटी का बिल्कुल ज्ञान नहीं था। वैसे वे एक अच्छे इंसान, चुस्त और न्यायप्रिय उत्तम कमाण्डर थे जबकि दूसरी ओर मैं कई वर्षों से अलग-अलग पदों पर रहते हुए इस न्याय व्यवस्था की ड्यूटी से पूरी तरह परिचित था, जिसमें मैं जानता था कि अपने ही देश के नागरिकों से लड़ना अधिक कठिन होता है, बशर्ते किसी दुश्मन से चाहे उन्हें हम उग्रवादी या नक्सलवादी या होस्टाइल्ज या फिर इनसरजैंट कहे या फिर कोई हिंसक मजमा ही क्यों ना हो। मजमे से निपटने के लिए हमें अधिक होशियारी और धैर्य से काम लेना होता है। यहां जोश की जगह होश ज्यादा कारगर साबित होता है। ऐसी ड्यूटियों में किसी अधिकारी या सैनिक के भड़कने का परिणाम अधिक दुष्कर और असफलता होता है। दिमागी सन्तुलन का बिगड़ना व विचलित होना किसी भी अधिकारी व सैनिक के लिए परिपक्वता की कमी को दर्शाता है और अधिकारी के लिए तो इसमें माफी की कोई गुंजाइश नहीं होती। ऐसी ड्यूटियों के दौरान पुलिस और अर्धसैनिक बलों को गाली पत्थर भी सहन करने पड़ जाते हैं। लेकिन यहां पुल पर ऐसी अभी तक कोई बात नहीं थी।

जब पुल से कार-सेवकों को गिरफ्तार करके बसों में भरकर अस्थाई जेलों में भेजा जा रहा था तो मैंने कुछ गिरफ्तार जवान लड़कों की ओर ध्यान दिया जो हरियाणवी भाषा बोल रहे थे, तो मैंने उनसे पूछा कि वे कहां के रहने वाले हैं और कौन हैं ? इस पर उन लड़कों ने बतलाया कि वे हरियाणा से आए हैं। तो मैंने उनसे पूछा कि वे यहां किस लिए आए हैं ? तो उन्होंने तड़ाक से उत्तर दिया कि ‘मस्जिद तोड़ने आए हैं।’ इस पर मैंने उनको कहा कि तुम हरियाणा के होकर तुम्हें मस्जिद से क्या तकलीफ हो रही है ? यह कहकर मैं उन्हें बस में चढ़ते हुए देखता रहा। लगभग साढ़े 7 बजे तक वहां रहने के बाद मुझे पूरा माजरा तथा मेरे कमाण्डैंट की कार्यवाही समझ में आ गई थी। इसलिए मैंने अपने कमाण्डेंट को बगैर बतलाए वहां से निकलना बेहतर समझा और अपनी ड्यूटी स्थान पर जाने की जल्दी थी। जब मैं अपनी जीप के पास गया तो देखा कि जीप के सामने वाला शीशा (विंड स्क्रीन) पूरी तरह टूटा हुआ था और ड्राइवर घबराया हुआ रोनी सूरत में उन टूटे हुए शीशे के टुकड़े हटा रहा था। मैंने उनसे कहा घबराने की कोई बात नहीं, नया शीशा लगवा देंगे और चलो अपनी ड्यूटी के स्थान पर चलेंगे। आगे गाड़ी में शीशा न होने के कारण बड़ी ठंडी हवा लग रही थी इसलिए मैंने उसे जीप को धीरे चलाने के लिए कहा।

जब इस राष्ट्रीय राजमार्ग से हनुमान गढ़ी की तरफ जाने वाली सड़क के पास पहुंचा तो देखा वहां चार-पांच खाली बसें खड़ी थी जिनके ड्राइवर वहीं पास ही खड़े थे। पूछने पर उन्होंने बताया कि कार-सेवक यहां बसों को रुकवाकर इन बसों की टायरों की हवा निकाल कर वे राम जन्मभूमि की तरफ चले गए हैं। जब मैंने उनसे पूछा क्या साथ में कोई पुलिस वाले नहीं थे तो उन्होंने ना में सिर हिला दिया। लेकिन बाद में मुझे मालूम हुआ कि ये ड्राइवर भी राममय हो गए थे और इन्हीं की मिलीभगत से यह सब हुआ था। जब हनुमान गढ़ी के रास्ते से वहां बड़े स्थान पर अपनी ड्यूटी की जगह पहुंचा तो वहां देखा कि लोहे के बैरियर के पास 200-250 कार सेवक मेरे जवानों से आगे जाने के लिए जूझ रहे थे। मैंने वहां देखा सामने कोई सक्सेना नाम के एक स्थानीय पुलिस एस.पी. कुर्सी पर बैठे यह सब देख रहे थे। उसके पीछे दो कुर्सियों पर दो सिविल आदमी बैठे थे जो अपने आप को सिविल मजिस्ट्रेट बतला रहे थे। इन्हीं के साथ में स्थानीय पुलिस के एक डी.एस.पी. चार हथियार बंद सिपाहियों के साथ खड़े थे। पीछे चबूतरे पर बी.एस.एफ. की एक हथियार बंद प्लाटून अपने डी.एस.पी. (मुखर्जी या बैनर्जी) के साथ खड़ी थी। मैंने तुरन्त हालात का जायजा लिया। मेरी कम्पनी की 2 प्लाटून जिसमें लगभग 50 जवान लाठियों के साथ थे तथा एक हथियार बंद प्लाटून सभी मिलकर इन कार-सेवकों को पीछे धकेलने में लगे हुए थे। मैंने देखा पीछे सड़क पर और कार-सेवक भी आते जा रहे थे अर्थात् जिनको पुल से गिरफ्तार किया जा रहा था वे सभी एक-एक करके वहीं पहुंच रहे थे। इसलिए मेरे जवानों पर दबाव बढ़ता ही जा रहा था। हालात को बेकाबू होता देखकर मैंने हल्की लाठी चार्ज करके कार-सेवकों को वहां से खदेड़ने का हुकम दिया तो मैंने देखा कि अधिकतर जवान लाठियों को जमीन पर पीट रहे थे। जिस पर कार सेवकों का हौंसला और बढ़ गया और वे आगे बढ़ने की जिद्द करने लगे। इस पर मैंने एक जवान की लाठी ली और अपने बाएं हाथ से कार सेवकों को कूल्हों पर से पीटना आरम्भ कर दिया। मुझे अपना हर काम बचपन से ही बाएं हाथ से करने की आदत है (केवल खाने को छोड़कर)। उस समय मैं जवान भी था इस लिए मेरी बाएं हाथ की ताकत से एक लाठी एक नेता किस्म के व्यक्ति पर पड़ी तो वह धराशायी होकर गिड़गिड़ाने लगा और कहने लगा कि वह आंध्र प्रदेश का एक एम.एल.ए. है तो मैंने उसे कहा कि यह सी.आर.पी.एफ. की लाठी है इसे एम.एल.ए. या एम.पी. की कोई पहचान नहीं है। आप एम.एल.ए. होते हुए आपको पता नहीं कि यहां धारा 144 (कर्फ्यू) लगी हुई है। इस पर वह उठ कर पीछे की तरफ भागने लगा तो दूसरे कारो-सेवक भी भागने लगे। लेकिन कुछ ही देर बाद उससे दुगनी संख्या में कार-सेवक आने लगे तो मैंने फिर से लाठियों का प्रहार करना आरम्भ कर दिया और जवान भी पूरी तरह से इस काम में जुट गए। हालांकि पिर भी उन पर धार्मिक मनोविज्ञान काम कर रहा था। कार-सेवकों ने यह प्रचार कर रखा था कि पुलिस और अर्धसैनिक बल दिखावे के लिए लाठी चलाएंगे और रबर की गोलियां इस्तेमाल करेंगे, इसलिए कोई भी घबराने की जरूरत नहीं है। लेकिन हमने कोई दिखावा नहीं किया, कार सेवकों को पीछे से कुल्हों पर लाठियां मारी और जब वे कुल्हों को हाथों से सहलाने लगते थे तो स्वाभाविक था कि लाठियां हाथों पर भी पड़ती थी जिस कारण वो दर्द में तड़प कर भाग उठते थे। यह कार्यवाही इसी प्रकार से होती रही और कार-सेवकों की संख्या लगातार बढ़ती चली गई। इसी रफ्तार में हमारी लाठियों के पीटने की रफ्तार भी बढ़ती चली गई। मेरे जवानों पर जो धार्मिक मनोविज्ञान का प्रभाव था वह भी जाता रहा और कार-सेवकों का भी भ्रम टूट चुका था कि हम दिखावे की लाठी नहीं चला रहे हैं।

इस प्रकार लगभग 11 बजे तक बार-बार कार सेवकों पर लाठियां बरसानी पड़ी। उस दिन मैंने अपनी नेमप्लेट को अपनी वर्दी पर नहीं लगाया था जो नियमानुसार उचित था लेकिन लाठी चलाते समय मेरी हाथ की कलाई घड़ी कब और कहां गिरी, कुछ पता नहीं चला। अब कार-सेवकों की संख्या हजारों में हो गई थी जिनमें से काफी छतों पर चढ़े थे और ईंट-पत्थर बरसाने लगे थे। अब देसी और विदेशी मीडिया के लोग इसी जगह इकट्ठे हो गए थे। उन्हें भी पत्थरों व बीच-बीच में कार सेवकों के बीच लाठियां पड़ जाती थी। अधिक संख्या को देखते हुए मैंने मेरे कमाण्डैंट व अन्य अधिकारियों से सम्पर्क करने का बार-बार प्रयास किया लेकिन कभी कोई सम्पर्क नहीं हो पाया क्योंकि मेरी एक कम्पनी से इतनी ज्यादा संख्या में कार-सेवकों का सामना करना संभव नहीं रहा। इसके बाद मैंने अश्रु गैस का इस्तेमाल करवाया लेकिन बदकिस्मती से हवा का रूख भी हमारी तरफ था इसलिए गली होने के कारण गैस का असर कार-सेवकों की बजाय हम पर ज्यादा हो रहा था। जब दूसरी बार गैस के गोले फैंके तो मैंने देखा कि कुछ कार-सेवक गीली बोरियों के टुकड़ों से उन्हीं गोलों को उठाकर हमारी तरफ फैंक रहे थे। वास्तव में इस भीड़ में उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व महानिदेशक चतुर्वेदी जी भी थे जिसने यह युक्ति कार सेवकों को बतलाई थी। अभी कार-सेवक ईंट, पत्थर जो भी कुछ हाथ में आता था, हम पर फैंक रहे थे। कार सेवकों पर धार्मिक जनून पूर्णतया हावी था जिस कारण वे अपने इरादे पर डटे हुए थे। यह अभियान चलते-चलते 12 बज गए। मेरी मदद में कोई भी फोर्स का एक आदमी तक नहीं आया, और वहां पर उपस्थित स्थानीय पुलिस के दोनों अधिकारी, दोनों सिविल मैजिस्ट्रेट और बी.एस.एफ. की प्लाटून इस सारी कार्यवाही को मूकदर्शक बने देख रहे थे। चारों तरफ कार-सेवक ही कार-सेवक नजर आ रहे थे। इस भीड़ में विश्व हिन्दू परिषद् के अध्यक्ष अशोक सिंघल भी थे जिसके माथे पर कोई ईंट या पत्थर लग चुका था और खून बह रहा था। अब मेरी कम्पनी कार सेवकों के सामने आटे में नमक के बराबर भी नहीं थी।

इसी छोटे से चौक पर उत्तर प्रदेश परिवहन की बस भी खड़ी थी जिसमें मेरे जवान आते जाते थे वहां मेरी जीप के अतिरिक्त एस.पी. सक्सेना की जीप, स्थानीय पुलिस डी.एस.पी. की जीप, बी.एस.एफ. के कम्पनी कमाण्डर की जीप आदि को मिलाकर कुल सात गाड़ियां खड़ी थी। इसी चौक में एक बड़ा पीपल का पेड़ भी था जिसके नीचे हमारी दोनों गाड़ियां खड़ी थी। साथ में एक मचान बनाकर शार्ट-शर्किट कैमरा भी लगाया गया था जिसको एक उत्तर प्रदेश पुलिस का सिपाही नियन्त्रित कर रहा था। अभी यह सिविल पुलिस अधिकारी और मजिस्ट्रेट आदि पीछे की तरफ खिसक चुके थे। मेरे जवानों ने एक हाथ में पत्थरों से बचाव के लिए केन शील्ड ले रखी थी उसके बाद भी दो जवानों को हल्के पत्थर लगे।

कुछ देर बाद मैंने देखा कि भीड़ को चीरती हुई बीचों-बीच उत्तर प्रदेश परिवहन की एक बस आ रही थी जिससे लगातार जोर-जोर से हार्न बज रहा था। इसे समीप आने पर मैंने देखा कि इसमें 15-20 भगवाधारी साधु बैठे थे और एक साधु उसे चला रहा था। उसने बैरियर देखकर बस की रफ्तार को और बढ़ा दिया, जिस कारण मेरे जवानों को थोड़ा पीछा हटना पड़ा। यही बस बड़ी तेजी से बेरियर को तोड़ते हुए आगे निकल गई जिस पर मेरे कई जवान चमत्कारिक तौर पर मरने व चोट खाने से बच गए। ये एक चमत्कार ही था और ऐसे ही चमत्कार मैंने अपने 35 साल के सेवा काल में कई बार देखे।

बस उसी रफ्तार से आगे निकल गई और राम जन्मभूमि की तरफ चली गई। बस के टायरों में गोली मारकर बस को रोका जा सकता था लेकिन इतनी भीड़ में गोली चलाना कोई समझदारी नहीं थी। ज्यों ही बस निकली, इसी के साथ कार-सेवकों का पूरा रेला भी आगे निकल पड़ा जिसका रोकना मेरे लिए इतने कम जवानों से संभव नहीं था। चारों तरफ कार सेवक ही कार-सेवक थे। देखते-देखते भीड़ के कारण शोर्ट सर्किट टी.वी. मचान व टावर भी गिर चुका था और इसी भीड़ में से किन लोगों ने एक साथ सभी गाड़ियों में आग लगा दी, इसका कुछ पता नहीं चल पाया। जब एक साथ सभी गाड़ियां जल उठी तो पता चला कि सभी गाड़ियों में आग लगा दी गई है। यहां पर गोली चलाना न्याय संगत था लेकिन गोली चलाने पर कितने भी आदमी मर सकते थे। इसके अलावा कई हजारों आदमी रामजन्मभूमि की तरफ पहले ही पहुंच चुके थे। इसलिए गोली चलाने को मैंने तर्कसंगत नहीं समझा और अपने जवानों की सुरक्षा का ख्याल रखा। इस समय बी.एस.एफ. की प्लाटून, स्थानीय पुलिस का एस.पी. सक्सेना तथा दोनों सिविल मजिस्ट्रेट पता नहीं कहां चले गए, वे कभी नहीं दिखे। इसी समय स्थानीय पुलिस का डी.एस.पी. अपने चारों जवानों के साथ मेरे नजदीक आया और कहने लगा कि साहब गोली चलावाओ। तो मैंने कहा कि अब गोली चलाने का क्या फायदा होगा क्योंकि सभी गाड़ियां एक साथ जल रही थी और हजारों कार सेवक अन्दर की तरफ जा चुके थे। इसके अतिरिक्त वहां कोई सरकारी सम्पत्ति नहीं थी जिसमें कार-सेवक आग लगाते। इसके बावजूद स्थानीय डी.एस.पी. ने अपने सिपाहियों को गोली चलाने के लिए कहा जिन्होंने अपनी रायफल के मुंह पीपल के शिखर की तरफ करते हुए हवा में गोलियां चलाई। इस पर मैंने कहा कि पीपल पर बैठे कबूतर तो पहले ही आग लगने की वजह से उड़ चुके हैं फिर वहां किस को मार रहे हो? स्थानीय पुलिस के डी.एस.पी. ने शायद अपनी ड्यूटी को न्यायोचित ठहराने के लिए गोलियां चलवाई थी वरना इसका कोई औचित्य नहीं था। इसके बाद मैंने तुरन्त अपने जवानों को इकट्ठा किया और रामजन्मभूमि की ओर चल पड़े।

वहां रामजन्मभूमि अर्थात् बाबरी मस्जिद को चारों तरफ से कई हजार कार सेवकों ने घेर रखा था। दूसरे रास्ते भी कार सेवक पहुंच रहे थे। मैंने अपने आदमियों को रामजन्मभूमि के पश्चिम दक्षिण दिशा में कार-सेवकों को खदेड़ने का कार्य शुरू किया। इसी बीच सैकड़ों कार-सेवक बाड़े के अंदर कूद चुके थे जिसमें कुछ मस्जिद पर चढ़ने में सफल हो गए थे, जिनमें एक भगवा कपड़ों में साधु भी था। आई.टी.बी.पी. के हथियारबंद जवान मूकदर्शक बने यह सब देख रहे थे। इसी समय डी.आई.जी., जी.एल. शर्मा हैलमैट पहने और हाथ में कारबाईन लिए बाड़े के पास आए और उन्होंने आई.टी.बी.पी. के दो जवानों को गोली चलाने का आदेश दिया जिस पर गोली चलाने पर भगवां कपड़ों में साधु तथा एक अन्य कार सेवक गोली लगने से मस्जिद से आकर नीचे पड़े जैसे कि आम के पेड़ से आम टूटकर गिर जाता है। इस पर मस्जिद पर चढ़े दूसरे कार सेवक भी भागने लगे और चंद सैकिण्डों में बाड़ा भी खाली हो गया। अब कार सेवकों को पता चल चुका था कि फोर्स नकली नहीं, असली गोलियां चला रही है और कुछ ही मिनटों में पूरा क्षेत्र कार सेवकों से खाली हो गया था। भगवां साधु और दूसरा कार-सेवक गोली लगने से मर चुके थे। वहां पर आई.टी.बी.पी., सी.आर.पी.एफ. दूसरी फोर्सों के अतिरिक्त स्थानीय पुलिस के उच्चाधिकारी भी पहुंच चुके थे। यह सब कार्यवाही होते-होते सायं के लगभग चार बज चुके थे।

सायं लगभग 6 बजे सभी अधिकारियों की बैठक हुई जिसमें पूरे दिन की कार्यवाहियों तथा नुकसान का लेखा-जोखा लिया गया तथा आगे के लिए योजनाएं बनाई गई। लाठियां चलाने से मेरा बायां हाथ मुड़ नहीं पा रहा था। रात में हमारी बटालियन के सभी अधिकारी खाने के लिए एकत्रित हुए और दिन भर की घटनाओं पर चर्चा करने लगे। इस पर मैंने कमाण्डैंट के सामने अपनी बात को फिर दोहराया कि हर अधिकारी व जवान को अपने जिम्मेवारी के क्षेत्र में रहना चाहिए और आपसी सम्पर्क बनाए रखना जरूरी है। यदि आज ऐसा होता तो मेरी कम्पनी की मदद में हमारी बटालियन की नजदीक वाली कम्पनियां पहुंच सकती थी। इस पर हमारे कमाण्डैंट कहने लगे कि हमने पफौज में सीखा है कि सैनिक में मरने-मारने का मादा होना चाहिए। लेकिन हम अधिकारियों ने किसी ने उनके साथ कोई वाद-विवाद नहीं किया और सभी अपने-अपने निवास पर चले गए। हमारे डिप्टी कमाण्डैंट सुरेन्द्र पाल दिन भर कहां रहे और क्या किया, कुछ पता नहीं चला। कमाण्डैंट के पूछने पर भी वह सब गोल-मोल बात करते रहे। खैर, हम सभी समझ ही गए थे। मेरा बायां हाथ अधिक दर्द कर रहा था, इस वजह से मैंने अपने सहायक से पानी गर्म करवाया और काफी देर तक हाथ सेंकने के बाद मैं रात में देर से सो पाया।

दूसरे दिन प्रातः जब मैंने अखबार पढ़ा तो सारे अखबारों में ‘बड़े स्थान’ की घटनाओं को प्रमुख तौर पर छापा था जिसमें मेरा नाम जगह-जगह पहलवान सिंह लिखा गया था। समाचार पत्रों में जगह-जगह मुझे कार-सेवकों पर लाठी चलाते हुए दिखाया गया। स्थानीय समाचार पत्रों ने मुझे एक जालिम, अन्यायी और खूंखार अफसर लिखा था। इस पर दूसरे दिन मुझे कई अधिकारी मिलकर पूरी घटना जानने भी आये कि मैंने ऐसा क्या कर दिया था। मेरा नाम पहलवान सिंह इसलिए लिखा था कि मैं शरीर से स्वस्थ हृष्ट-पुष्ट अधिकारी था, जिसकी जेब पर नाम पट्टी नहीं लगी थी। मेरी जीप में मेरा कुछ निजी सामान जैसे कि थर्मस (चाय की) तथा स्वेटर आदि भी जल गए थे। अलग-अलग समाचार पत्रों में मस्जिद स्थान पर मरने वालों की संख्या 2 से अधिक बतलाई गई थी तथा हजारों को घायल बतलाया गया था, जो कहीं भी सच्चाई के पास नहीं था। कुल मिलाकर अर्ध सैनिक बलों को जोर-जबर करने वाले निर्दयी और अन्यायी दिखाया गया जिसका सरगना मुझे बतलाया गया। इस सभी से मैं बहुत हैरान और परेशान भी था और सोचता था कि क्या हम अपने देश के हित में कार्य नहीं कर रहे थे? क्या मीडिया को देशहित में सही रिपोर्ट नहीं छापनी चाहिए? क्या मीडिया का काम केवल देश के नागरिकों को भड़काने तक सीमित है? क्या देश के मीडिया का राष्ट्र के प्रति कोई दायित्व नहीं? क्या स्थानीय पुलिस और अर्ध सैनिक बलों के उद्देश्य अलग-अलग थे? यही कुछ सवाल थे जो इन अठारह वर्षों में मेरे दिमाग में घूमते रहे जिस कारण मैं यह पुस्तक लिखने पर विवश हुआ। इसी प्रकार 30 अक्तूबर 1990 को सरयू नदी के पुल से गिरफ्तारी के समय कार सेवकों में हरियाणा के लड़के भी थे, तो मेरे दिमाग में यह भी प्रश्न घूमता रहा।

2. बाबरी मस्जिद पर दूसरा आक्रमण (2 नवम्बर 1990)

हजारों कार-सेवक जो 30 अक्तूबर को प्रातः सरयू नदी के पुल से घुस आए थे और जिन्होंने मस्जिद पर आक्रमण कर दिया था लगभग सारे के सारे अयोध्या के मन्दिरों में पनाह लिए हुए थे। इसके अतिरिक्त भी राष्ट्रीय राजमार्ग की दूसरी ओर अयोध्या के मनीराम छावनी तथा वाल्मीकि भवन आदि में हजारों साधु पहले से ही थे और कार-सेवक व उनके नेता 31 अक्तूबर की रात को ही घोषणा कर चुके थे कि दो नवम्बर को फिर से मस्जिद पर धावा बोला जाएगा। 2 नवम्बर को प्रातः ही प्रशासन व हमारे पास यह सूचना पहुंच चुकी थी कि 10 बजे साधु व कार-सेवक सबसे पहले सभी मनीराम छावनी के पास इकट्ठे होंगे। यह 2 नवम्बर सैक्टर का क्षेत्र था जो कमाण्डैंट एस.आर. यादव के अधीन था। आर.एस. यादव सी.आर.पी.एफ. कैडर के अधिकारी थे जिन्हें कानून व्यवस्था की ड्यूटी पर पूरा अनुभव था। यह अधिकारी बड़ा चतुर था और बहुत कम स्थानीय उच्चाधिकारियों के सामने आता था। इस बात को भांपते हुए जिला पुलिस प्रमुख जोशी ने हमारे कमाण्डैंट डी. सम्पत को उकसाना आरम्भ कर दिया कि केवल वे ही ऐसी स्थितियों से अच्छी तरह निपटते हैं। इसलिए उन्होंने 2 नवम्बर को लगभग 11 बजे वहां मनीराम छावनी के पास हालात का जायजा लेने तथा समयानुसार निपटने के लिए कहा। यह फैसला पूर्णतया अनुचित था क्योंकि वहां पहले से ही कमाण्डैंट एस.आर. यादव तैनात थे और दूसरा जिला प्रमुख को उन्हें ऐसा कहने का भी कोई अधिकार नहीं था। लेकिन स्थानीय पुलिस अधिकारियों को उन पर कोई भरोसा नहीं था क्योंकि वे उसे बहुत चालाक अधिकारी समझते थे। लेकिन कुछ भी हो, कमाण्डैंट डी. सम्पत को दूसरे के अधिकार क्षेत्र में भेजना तथा इस बात को उनके द्वारा स्वीकार करना एकदम अनुचित था। लेकिन मेरे कमाण्डैंट ने न तो इस बात पर ध्यान दिया न ही मेरे सुझावों पर ध्यान दिया और न ही 30 अक्तूबर की घटनाओं से कुछ सीखा। जब 2 नवम्बर को मनीराम छावनी के पास हजारों कार-सेवक इकट्ठा होकर मस्जिद के लिए कूच करने वाले थे तो कमाण्डैंट डी. सम्पत कुछ सिपाहियों को अपने साथ लेकर उस जगह के लिए चल पड़े। मेरी कम्पनी की ड्यूटी उसी बड़े स्थान पर लगी हुई थी। मनीराम छावनी की तरफ से आने वाले कार सेवकों को हनुमान गढ़ी के ही रास्ते से होकर मेरी कम्पनी के ड्यूटी क्षेत्र से ही गुजरना पड़ता। इस दिन मेरी कम्पनी की मदद के लिए हनुमान गढ़ी के ही रास्ते में दो और कम्पनियों को तैनात कर दिया गया था। कमाण्डैंट डी. सम्पत ज्यों ही मनीराम छावनी के क्षेत्र में पहुंचे जिस पर वहां मन्दिरों व भवनों की छतों से राम सेवकों ने पत्थर फैंकने आरम्भ कर दिए। इन्हीं में से कोई एक पत्थर/ईंट कमाण्डैंट डी. सम्पत के सिर में लगा जिससे उनका खून बहने लगा। खून बहता देख कमाण्डैंट ने अपने जवानों से कहा कि तुम देख रहे हो कि तुम्हारे कमाण्डैंट के सिर से खून बह रहा है। इतना सुनते ही उस क्षेत्र में तैनात कमाण्डैंट यादव के जवानों ने एकदम से फायर खोल दिया और तड़ातड़ गोलियां चलानी आरम्भ कर दी। इन गोलियों की आवाज़ हमारे तक भी पहुंच रही थी, कुछ देर के बाद मैंने देखा कि कमाण्डैंट डी. सम्पत अपने सिर पर सफेद पट्टी बांधे अपने जवानों के साथ पैदल ही चले आ रहे थे। लेकिन सब कुछ शांत हो चुका था। कोई एक भी कार-सेवक हमारे तक नहीं पहुंच पाया और इस फायरिंग के बाद वहां सब तितर-बितर हो गए। बाद में मालूम करने से पता चला कि वहां फायरिंग में नौ लोग मरे थे और कुछ घायल हुए थे। वहां भी स्वदेशी और विदेशी मीडिया उपस्थित था जिस कारण फायरिंग की यह घटना कुछ ही समय में देश व विदेशों में फैल गई जिसमें बतलाया गया कि अर्ध सैनिक बलों की गोलियों से सैकड़ों कार-सेवक मारे गए और हजारों घायल हुए। दूरदर्शन पर सभी जगह केवल यही खबर चल रही थी, जिसमें कमाण्डैंट डी. सम्पत की जगह कमाण्डैंट सम्पत सिंह बतलाया जा रहा था। जब यह खबर सभी जगह फैली तो कमाण्डैंट के घर हैदराबाद (आंध्र प्रदेश) से उनके परिवार वालों, रिश्तेदारों व जानकारों के फोन पर फोन आने लगे और उन सभी का एक ही कहना था कि उन्होंने यह जघन्य अपराध क्यों कर डाला था? सैकड़ों हिन्दू क्यों मार दिए? कमाण्डैंट स्वयं हिन्दू थे इसलिए उनको और अधिक कोसा जा रहा था। उन्होंने सभी को यह समझाने का प्रयास किया कि कुल 9 लोग मरे हैं और 30-35 घायल हुए हैं और ये सभी उसकी ड्यूटी का एक हिस्सा था। लेकिन किसी ने भी उसकी बात पर विश्वास नहीं किया क्योंकि मीडिया ने झूठ की बरसात कर दी थी और इस बरसात से पूरे देश के लोग बुरी तरह भीग चुके थे। वैसे भी यह एक आदत बन चुकी है कि लोग अपने आदमी पर यकीन नहीं करते दूसरों पर जल्दी यकीन कर लेते हैं। यही सब कमाण्डैंट के साथ हो रहा था। यह सभी सुनते-सुनते वह स्वयं को दोषी समझ कर घोर पश्चात्ताप करने लगे। इसलिए वे खाने के लिए भी सायं को मैस में नहीं आए तो मालूम करने पर पता चला कि उन्होंने खाना खाने से इंकार कर दिया है। इस पर हम सभी बटालियन के अधिकारी उनके निवास पर पहुंचे तो वे बड़े उदास और दुःखी थे। लेकिन हमारे कहने के बावजूद भी उन्होंने खाने से इंकार कर दिया और उन्होंने दुःखी होकर कहा- ‘हम ड्यूटी के दौरान कुछ न करें तो भी गलत है और करें तो भी गलत है।’ हमने उन्हें बहुत समझाया कि इसमें कोई भी पश्चात्ताप करने की आवश्यकता नहीं है। यह सब हमारी ड्यूटी का भाग है। जब उन्हें खाने से साफ मना कर दिया तो हम सब खाना खाकर अपने-अपने निवास पर चले गए।

प्रातः सभी समाचार पत्र इसी समाचार से अटे पड़े थे। कमाण्डैंट डी. सम्पत को सम्पत सिंह लिखकर एक मुख्य हत्यारे के तौर पर घोषित कर रखा था। विश्व हिन्दू परिषद् व बजरंग दल आदि ने कमाण्डैंट और हमारी बटालियन को मुख्य हत्यारा बतलाकर अपराधी घोषित कर दिया था लेकिन इस घटना के कारण मेरा नाम समाचार पत्रों से गायब हो चुका था और 30 अक्तूबर की घटना को लोग भूल चुके थे। लेकिन जिस प्रकार की झूठी खबरें समाचार-पत्रों व दूरदर्शन पर आ रही थी उसके कारण मेरे दिल में मीडिया के प्रति रोष और घृणा पैदा हो गई थी। लेकिन अयोध्या और फैजाबाद के लोगों को हमारे प्रति घृणा थी और वे लोग हमें घृणा की दृष्टि से ही देखने लगे थे। दूसरे दिन हमारे महानिदेशक श्री पी.एस. भिंडर आ गए थे और उन्होंने हम सब अधिकारियों के साथ बैठक की (मीटिंग का पूरा विवण देना गोपनीय कानून के खिलाफ है, इसलिए मैं इसका वर्णन नहीं करना चाहता)। मीटिंग के बाद मुझे मृतकों व घायलों की अपने तरीके से एकदम सही गिनती करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। जहां मृतकों के पोस्टमार्टम हुए तथा जहां-जहां घायल व्यक्ति दाखिल थे मैंने जाकर पूर्णतया कागजात को देखा तथा एक-एक घायल को अपनी आंखों से देखा तो पाया कि कुल 9 लोगों की मौत हुई और 34 आदमी अधिक या कम घायल हुए थे जिनमें अधिकतर की हालत खतरे से बाहर थी। लेकिन ये आंकड़े किसी भी समाचार पत्र व टी.वी. समाचार से मेल नहीं खाते थे। लेकिन मेरे उच्चाधिकारियों ने इन्हें सत्य स्वीकार किया। इससे पहले हमारे उच्चाधिकारियों में वहां भ्रमण के लिए आने वालों में आई.जी. कार्तिकेन भी प्रमुख थे जो स्व० प्रधानमन्त्री राजीव गांधी हत्याकाण्ड की जांच में एस.टी.एफ. के प्रमुख बने।

जैसे कि ऊपर लिखा जा चुका है कि अयोध्या और फैजाबाद की जनता ने अर्धसैनिक बलों को हत्यारा समझ लिया था जिसमें उनकी विशेष घृणा सी.आर.पी.एफ. से थी और सी.आर.पी. में से हमारी बटालियन उनकी घृणा की पात्र बन गई थी, जिसका परिणाम यह हुआ कि हमें दुकानों से कोई भी सामान देने से मना कर दिया जाता था। मुख्यमन्त्री मुलायम सिंह यादव ने जांच के आदेश दे दिए थे और साथ-साथ उस समय की मुलायम सरकार भी कट्टर हिन्दुओं की घृणा की पात्र बन गई थी। परिणामस्वरूप हमारी बटालियन की कम्पनियों को तुरन्त प्रभाव से लखनऊ भेज दिया गया जहां हम कुछ दिन रहने के बाद वापिस पंजाब लौट आए।

फैजाबाद के तत्कालीन डी.आई.जी. जी.एल. शर्मा पंजाब में सुनाम कस्बे के रहने वाले थे। जब मैं अपनी कम्पनी के साथ वापिस सुनाम पहुंचा तो पता चला कि 2 नवम्बर की घटना के उपरांत कट्टर हिन्दुओं ने उनके घर पत्थर फैंके और उनके रिश्तेदारों को बहुत तंग किया, यहां तक कि उनके मकान को जलाने का भी प्रयास किया गया। वहां के पूरे हिन्दू समाज में उनके विरोध में पूरा प्रचार किया गया तथा उनको मुसलमानों की औलाद तक कह डाला। इस पर मुझे पं० नेहरू का वह वाक्य याद आता है जिसमें उन्होंने कहा था, हिन्दू निश्चित तौर पर उदार व सहनशील नहीं है। हिन्दू से ज्यादा संकीर्ण व्यक्ति दुनियां में कहीं नहीं है। हालांकि पं० नेहरू स्वयं कट्टर हिन्दू थे इसलिए उन्होंने सन् 1947 में प्रधानमन्त्री बनने पर ब्राह्मणों ने यज्ञ किया तो उनको गंगा जल पिलाकर ‘राजडण्डा’ भेंट किया, जो उन्होंने स्वीकार कर लिया।

अयोध्या के इस कांण्ड को भाजपा, विहिप तथा बजरंग दल ने इतना अधिक उछाला कि इसके लाखों करोड़ों कैसेट बनाकर आम जनता में बांटे गए, जिनमें सरयू नदी से शवों को निकालते दिखाया गया और प्रचार किया गया कि इनको अर्ध सैनिक बलों ने मारकर पानी में फैंक दिया था। यह प्रचार सत्य के कहीं भी पास नहीं था। मैंने भारत की सभी बड़ी नदियों को देखा है। गंगा को गंगोत्री से लेकर बंगाल में फरक्का बांध तक देखा, उसके बाद यह बंगला देश में प्रवेश कर जाती है। इस बांध को बाराज कहा जाता है क्योंकि इस पर पानी को रोकने के लिए लोहे के गेट बने हैं। मैंने वहां देखा कि इन गेटों को बंद करने पर वहां कई-कई लाशें आकर ठहर जाती थी। इनमें अधिकतर लाशें जो गरीबों के द्वारा दाह संस्कार न कर पाने पर बहाई गई, उनके मृतकों की लाशें होती थी जिनके पास दाह संस्कार के पैसे नहीं होते थे। इनमें कुछ ऐसी लाशें भी होती थी जो किसी कारणवश डूब कर मर जाते थे या मार दिए जाते थे। इसी गंगा किनारे दोनों तरफ पूर्वी उत्तर प्रदेश से लेकर बंगाल तक सबसे अधिक गरीब लोग रहते हैं।

जितनी शवों की दुर्गति इस क्षेत्र में होती है उतनी हिन्दुस्तान में कहीं और नहीं होती। मैंने बंगाल में एक बार एक शव को साईकिल के पीछे कैरियर पर बाल्टी में बंधा देखा है और इन शवों को कृष्ण नगर के पास जंगल में फैंक दिया जाता है जहां इन्हें गीदड़ और कौवे खाते रहते हैं, जहां से दुर्गन्ध मीलों दूर तक फैलती रहती है। भारत के हिन्दुओं में दाह संस्कार तथा विवाह शादी की परम्पराएं अलग-अलग जगह एक दम भिन्न है। लेकिन सरयू नदी से उस समय जो भी लाशें निकाली गई उनका दोष सभी अर्ध सैनिक बलों के माथे मंढ़ दिया गया। यह भी प्रचार किया गया था कि उस समय सुश्री उमा भारती को सभी प्रयासों के बाद भी पुलिस गिरफ्तार नहीं कर पायी जबकि सच्चाई यह है कि उमा भारती को हमारी महिला बटालियन की टुकड़ी ने अयोध्या में खोज निकाला था और स्वयं कम्पनी कमाण्डर श्रीमती अपराजिता (डी.एस.पी.) ने उसे गिरफ्तार किया था।


3. बाबरी मस्जिद पर तीसरे अर्थात् अंतिम आक्रमण की तैयारियां

(3 नवम्बर 1990 से 5 दिसम्बर 1992) (भाजपा व दूसरे धार्मिक संगठनों द्वारा)

बाबरी मस्जिद पर दूसरा आक्रमण 2 नवम्बर 1990 की घटना ने उत्तर प्रदेश ही नहीं, लगभग पूरे देश के कट्टर हिन्दुओं व साधारण हिन्दुओं के पारे को हिदू के नाम से सातवें आसमान पर पहुंचाने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी गई। भाजपा, विहिप, बजरंग दल व शिवसेना आदि हिन्दू संगठनों ने योजनाबद्ध तरीके से कार्य करना शुरू कर दिया। गांव-गांव गाड़ियां घूमने लगी और नारा था, मन्दिर वहीं बनाएंगे। हर गांव और कस्बे में एक-एक ईंट और चंदा इकट्ठा करने की मुहिम चलाई गई जिसमें हर हिन्दू को मन्दिर के लिए योगदान की बार-बार अपील की गई। चंदे के तौर पर लगभग 8 करोड़ रुपये इकट्ठा किया गया। मन्दिर में लगाने के लिए लाल पत्थर की भारी-भारी शिलाएं राजस्थान से ढोकर लाई जाने लगी और उन्हें तराशने का काम शुरू हो गया। देश के प्रत्येक हिन्दू के दिमाग में यह बात बैठाने का प्रयास किया गया कि राम जन्मभूमि पर बाबरी मस्जिद बनी है, यह मस्जिद हिन्दुओं के माथे पर कलंक है और जब तक यह कलंक नहीं मिटेगा तब तक हिन्दू इज्जत से नहीं रह पाएगा। लेकिन अफसोस है कि हिन्दुओं ने हजारों साल गुलामी के कलंक को धारण किए रखा और भारत के इतिहास में कहीं भी हिन्दुओं को हिन्दू के नाम से इकट्ठा होकर उस कलंक को मिटाने का कभी कोई प्रयास नहीं किया। यदि सत्य कहा जाए तो उस हजारों साल की गुलामी के कारण भी ज्ञान बुद्ध, तिलक, रैमीदास व जयचंद सरीखे स्वयं हिन्दू थे। यह गुलामी का कलंक मस्जिद के कलंक से कहीं अधिक बड़ा था। इस मस्जिद के कलंक को ऐसे दर्शाया गया जैसे कि देश के सम्पूर्ण हिन्दुओं की तरक्की और उनका उत्थान इसी मस्जिद के कारण रुका पड़ा है। इसलिए यह सम्पूर्ण देश की भी समस्या है। इस प्रचार का पहला परिणाम यह हुआ कि देश का आम हिन्दू भी भ्रमित हो गया जिस कारण मई 1991 के चुनाव में पहली बार उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी और श्री कल्याण सिंह को उत्तर प्रदेश के हिन्दुओं के कल्याण के लिए मुख्यमन्त्री बनाया गया। भाजपा को अपनी मेहनत का इनाम उत्तर प्रदेश में मिल चुका था लेकिन सम्पूर्ण भारत में वह शेष था। सम्पूर्ण उत्तर भारत में यह नारा गूंजने लगा और इसकी आवाज पूरे देश में गूंज रही थी-

एक धक्का और दो, पूरी मस्जिद तोड़ दो।

लेकिन केन्द्र में कांग्रेस की अल्पमत सरकार इसी समय मई 91 में बन चुकी थी। कल्याण सिंह ने उत्तर प्रदेश का मुख्यमन्त्री बनते ही अपना ध्यान रामजन्मभूमि/ बाबरी मस्जिद पर लगाया। 7 अक्तूबर 1991 को उत्तर प्रदेश सरकार ने पर्यटन के लिए मस्जिद की साथ वाली 2.77 एकड़ जमीन पर्यटन अनुभाग को संख्या 3814/41-33-86 के द्वारा अधिनियम सन् 1894 के तहत अधिगृहित कर ली । इस भूमि पर कुछ ढाबों व छोटी-छोटी दुकानों को भी गिरा दिया गया। यह जमीन पर्यटन विकास एवं तीर्थ यात्रियों को सुविधा के नाम पर अधिगृहित की गई थी। इसके बाद 4 फरवरी 1991 को इस अधिगृहित भूमि सहित राम जन्मभूमि तथा बाबरी मस्जिद के चारों ओर एक दीवार का निर्माण कर दिया गया। 5 मार्च 1992 को उत्तर प्रदेश सरकार ने राम जन्मभूमि न्यास को 42 एकड़ भूमि पट्टे पर दे दी। 6 मई 1992 को इसी भूखण्ड पर संकटमोचन मन्दिर, साक्षी गोपाल मन्दिर, सुमित्रा मन्दिर व गोपाल भवन आदि के पास की कई दुकानों को भी गिरा दिया गया। यहां पर ‘राम कथा पार्क’ बनाने की योजना बतलाई गई।

15 जुलाई 1992 को विश्व हिन्दू परिषद् ने ‘चातुर्मास’ की तैयारियां शुरू कर दी। राष्ट्रीय एकता परिषद् का एक प्रतिनिधि मण्डल अयोध्या आया और उसने अपनी सिपफारिशें सरकार को दी जिसके आधार पर 23 जून तथा 18 जुलाई 1992 को बैठकें हुई तथा इस रिपोर्ट पर गहन विचार हुआ। इसी बीच भूमि अधिगृहण के विरोध में इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई जिस कारण भारत के गृहमन्त्री ने 12 जुलाई 1992 को अयोध्या का दौरा किया जिसमें मुख्यमन्त्री को प्रधानमन्त्री से बात करने के लिए कहा गया कि वे धार्मिक नेताओं को मनाएं। राष्ट्रीय एकता परिषद् कोई हल खोजने के प्रयासों में थी तो दूसरी ओर कट्टर हिन्दुओं का साधु समाज व हिन्दू परिषद् पर कट्टर हिन्दू कार-सेवकों का दबाव बढ़ता ही जा रहा था कि जल्दी से जल्दी कार-सेवा शुरू की जाए। यह कार-सेवा क्या थी, बड़ा स्पष्ट था। बाबरी एक्शन कमेटी भी अपने प्रयास में लगी थी कि मस्जिद की कोई हानि न होने पाए। 23 जुलाई को उच्चतम न्यायालय ने निर्माण गतिविधियों पर रोक लगा दी तथा यथास्थिति का आदेश दे दिया।

हालातों को गर्माता देखकर 23 जुलाई 1992 को प्रधानमन्त्री नरसिंह राव ने विहिप से बात की। इस समस्या के समाधान के लिए 4 महीने का समय तय किया गया। इसके बाद एक विशेष प्रकोष्ठ ‘अयोध्या सैल’ का गठन किया गया। इसका काम दस्तावेजों के आधार पर एक सारांश तैयार करना था। इसके अतिरिक्त सभी न्यायिक दस्तावेजों को भी इकट्ठा करना था जिसका अध्यक्ष एक आई.ए.एस. अधिकारी को बनाना तय हुआ।

दूसरी बार बातचीत का दौर गृहमन्त्री की अध्यक्षता में 3 अक्तूबर 1992 को चला जिसमें विहिप व बाबरी एक्शन कमेटी के अतिरिक्त इसमें निमित इतिहासकार तथा पुरातत्त्व विशेषज्ञ भी सम्मिलित हुए। 16 अक्तूबर 1992 को विहिप तथा बाबरी एक्शन कमेटी की दूसरी बैठक हुई जिसमें 23 अक्तूबर 1992 का दिन निश्चित किया जिसमें प्रमाणों के साथ-साथ बयान भी दर्ज होने थे तथा साथ-साथ दस्तावेजों का आदान-प्रदान भी होना था। लेकिन कुछ हद तक ही ऐसा हो पाया।

सन् 1975-80 के बीच अयोध्या में पुरातत्त्व विभाग द्वारा की गई खुदाई की रिपोर्ट पर विवाद हुआ क्योंकि विहिप प्रो० बी.बी. लाल की रिपोर्ट पर अड़ी हुई थी। उधर इतिहासकार पुरातत्त्व विशेषज्ञ, विहिप तथा बाबरी एक्शन कमेटी सभी अपने-अपने निष्कर्ष दे रहे थे इस कारण कोई भी आम सहमति नहीं बन पाई।

इसके बाद सरकार ने 8 नवम्बर 1992 का दिन दोनों पक्षों की बातचीत के लिए निश्चित किया लेकिन विहिप तथा साधु समाज ने कार-सेवा का दिन 6 दिसम्बर का निश्चित करके केन्द्र सरकार के सभी प्रयासों पर पानी फेर दिया। हालांकि इसके बावजूद भी 8 नवम्बर 1992 को विहिप तथा बाबरी एक्शन कमेटी के लोग आपस में मिले लेकिन विहिप ने 6 दिसम्बर 1992 को कार-सेवा का दिन स्थगित करने से बिल्कुल मना कर दिया। परिणामस्वरूप आगे की बातचीत पर पूर्णतया विराम लग गया।

सन् 1990 की घटनाओं से लेकर 8 नवम्बर 1992 तक की सभी कार्यवाहियां मीडिया में विस्तार से आती रही जिसके परिणामस्वरूप यह मसला पूरे भारत में पूर्णतया चर्चित हो चुका था। जो हिन्दू इससे पहले इस मसले के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे आज अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न मानने लग गए थे। कुछ हिन्दू तो यह खबरें सुन कर उत्तेजित रहते थे तथा कट्टर हिन्दू, हिन्दुओं को लगातार भड़काए रखना चाहते थे। कहने का अर्थ है कि देश के अधिकतर हिन्दुओं का तथाकथित हिन्दुत्व जागृत हो गया था। परिणामस्वरूप देश का धार्मिक और राजनैतिक तापमान अपने उच्चतम बिन्दु पर पहुंच गया था और इससे प्रभावित हिन्दू अब 6 दिसम्बर 1992 की तारीख की प्रतीक्षा कर रहे थे।

4. बाबरी मस्जिद पर अंतिम आक्रमण (6 दिसम्बर 1992)

लगभग दो साल के अंतराल में भारतीय आम नागरिक को भी ‘रामजन्मभूमि’ और बाबरी मस्जिद मसले पर सोचने को मजबूर कर दिया था क्योंकि बाबरी मस्जिद पर पहले आक्रमण 30 अक्तूबर 1990 से यह मुद्दा भारतीय मीडिया ही नहीं, विदेशों तक छाया रहा क्योंकि भाजपा ने इसे केवल धार्मिक मुद्दा न छोड़कर राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बना दिया था। ऐसा कोई दिन नहीं था जिस दिन इस मसले पर समाचार पत्रों या दूरदर्शन पर कोई समाचार न हो। एक साधारण हिन्दू के मन में भी यह धारणा बनाने का प्रयत्न हुआ कि बाबरी मस्जिद हिन्दुत्व का नासूर है। इसी प्रकार दूसरी ओर हर भारतीय मुस्लिम धर्मी नागरिक के दिल में बाबरी मस्जिद के अस्तित्व का एक प्रतिष्ठा का प्रश्न बनना स्वाभाविक था लेकिन इनकी प्रतिष्ठा उत्तर प्रदेश सरकार तथा केन्द्र सरकार के रहमोकर्म और विश्वास पर टिकी थी। लेकिन इस प्रतिष्ठा की सुरक्षा का जिम्मा उस राज्य सरकार अर्थात् उत्तर प्रदेश की सरकार पर अधिक था जिसके राजनीतिक एजेण्डे में मस्जिद का वहां से हटाया जाना था जो स्वयं भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी और इसके मुख्यमन्त्री श्री कल्याण सिंह थे। वहीं दूसरी ओर केन्द्र में कांग्रेसी सरकार ढुलमुल नीति अपनाए एक कमजोर नेता नरसिंहे राव के हाथ में थी। इसी कारण बाबरी मस्जिद की सुरक्षा निश्चित तौर पर खतरे में थी। मीडिया ने इस दो साल की अवधि में भारतीय नागरिक की धार्मिक भावनाओं को इतना भड़का दिया था कि वे अधिकतर भारतीय न रहकर हिन्दू और मुसलमान रह गए थे और अपनी-अपनी एकता पर बल दे रहे थे। वे भूल गए थे कि देश की आजादी के लिए हिन्दुओं और मुसलमानों ने समान रूप से खून बहाया था।

लगभग दो साल के इस प्रचार का परिणाम बाबरी मस्जिद के ध्वंस की ओर अग्रसर था। 6 दिसम्बर 1992 का दिन कार-सेवा के लिए पहले ही निश्चित हो चुका था और इसका उद्देश्य एकदम स्पष्ट था। 5 दिसम्बर देर सायं तक लाखों हिन्दू कार सेवा के नाम से अयोध्या पहुंच चुके थे। मनीराम छावनी में ही 20-25 हजार साधु लोग ठहरे हुए थे। बाल्मीकि भवन जिसका हाल बहुत विशाल है, में कहीं भी पैर रखने की जगह शेष नहीं थी। यही हालात अयोध्या के शेष सभी मन्दिरों, डेरों व छावनियों का था। फैजाबाद के सभी होटल पत्रकारों से ठसाठस भरे थे। फिर भी कईयों को ठहरने की जगह नहीं मिली थी और उन्होंने रात भर टहल कर या बरामदों में बैंचों पर लेट कर रात बिताई थी। सभी कार-सेवक हिन्दू जानते थे कि अभी उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार न होकर भाजपा पार्टी की तरफ से कल्याण सिंह की सरकार थी जिनके एजेंडे में लिखा था, मन्दिर वहीं बनाएंगे। इसका अर्थ बड़ा स्पष्ट था कि मस्जिद को तोड़कर वहां पर राम मन्दिर का निर्माण किया जाएगा जिसके लिए तैयारियां हो चुकी थी। जबकि कार-सेवा का स्थान मस्जिद के पीछे बना एक आयताकार गढ़ा बतलाया गया था लेकिन इसे कोई भी समझ सकता था कि इस गढ़े के चारों ओर दो या ढाई लाख कार सेवक सेवा तो क्या उन्हें खड़े होने की भी जगह नहीं थी। कार सेवकों में किसी प्रकार का मन में भय नहीं था, केवल उत्साह था। उन्हें पूरा इत्मीनान था कि उन पर कोई लाठी गोली चलने वाला नहीं, इसी का परिणाम था कि अयोध्या और फैजाबाद में दो लाख से ढाई लाख तक कार-सेवक पहुंच चुके थे। जगह-जगह स्थाई भोजनालय बन गए थे। एक अलग ‘कारसेवक पुरम’ भी बना दिया गया था।

कणक मन्दिर के पीछे वाली खाली जगह पर विश्व हिन्दू परिषद् ने अपना मंच/पाण्डाल बना लिया था जिस में शाम ढलते ही भड़काऊ और उत्तेजक भाषण शुरू हो गए थे। उमा भारती और ऋतम्भरा जैसी आक्रामक साध्वियां भी वहां पहुंच चुकी थी। विहिप के अध्यक्ष अशोक सिंघल (जिनके पूर्वज पहले जैन धर्मी थे, विदित रहे इन्हीं जैन धर्मियों को कभी कट्टर हिन्दुओं ने उबलते तेल के कढ़ाहों में डालकर भून दिया था) भी पहुंच चुके थे। रात होते-होते लाल कृष्ण आडवाणी तथा मुरली मनोहर जोशी सरीखे बड़े नेता भी पहुंच चुके थे। ‘जय श्री राम’ के नारे लगातार लगाए जा रहे थे जिससे कार सेवकों में जोश बढ़ता ही जा रहा था। उमा भारती अपने भाषणों में कह रही थी, ‘जब एक-एक अली की छाती पर चढ़ेंगे, दश-दश बजरंग बली।’ लेकिन उनसे यह सवाल करने वाला कोई नहीं था कि क्या एक अली (मुसलमान) की ताकत दस हनुमान के बराबर है? ठंडी रात में लाऊड स्पीकरों की आवाज को सुनने वाले अयोध्या में अल्पसंख्यक मुस्लिम भी थे। इन्हीं में मीर बांकी वंशज भी थे लेकिन वे सब लाचार होकर इन भाषणों को सुन रहे थे और सोच रहे थे कि यह मसला जो आज तक एक स्थानीय मसला था, राष्ट्रीय मसला कैसे हो गया?

मुख्यमन्त्री कल्याण सिंह ने अदालत और केन्द्र दोनों को ही यह वायदा किया हुआ था कि मस्जिद को कोई नुकसान नहीं होने दिया जाएगा तो फिर 6 दिसम्बर 1992 को उस वायदे का क्या हुआ? साथ-साथ यह भी ऐलान किया जा रहा था कि कार-सेवकों पर पुलिस लाठी और गोली नहीं चलाएगी। इस बात का विश्वास स्वयं मुख्यमन्त्री कल्याण सिंह भी दिला रहे थे। लेकिन यह कभी नहीं बतलाया गया कि यदि कार-सेवक मस्जिद पर हमला बोलेंगे तो उन्हें रोकने का क्या उपाय होगा? क्या कल्याण सिंह के पास कोई चमत्कारिक शक्ति थी जो मस्जिद की सुरक्षा करती? मैं पाठकों को याद दिला दूं जब 1026 में गजनी सोमनाथ मन्दिर में लूटने आया तो वहां पर भीमदेव हिन्दू राजा का राज था जब गजनी ने वहां सोमनाथ के निकट अपना डेरा डाला तो उसकी मंशा स्पष्ट थी। इस पर राजा भीमदेव ने गजनी को संदेश भिजवाया कि गजनी को जितना भी सोना-चांदी व धन-दौलत चाहिए, दिया जाएगा लेकिन मन्दिर पर आक्रमण न किया जाए तो उसके उत्तर में गजनी ने कहा, वह मूर्ति भंजक है और इसका फैसला उसकी तलवार करती है। इस पर मन्दिर के पुजारी ने राजा भीमदेव को विश्वास दिलाया कि चिंता करने की कोई बात नहीं है क्योंकि गजनी की सेना मन्दिर में प्रवेश करते ही अंधी हो जाएगी। लेकिन वही हुआ जो अंधविश्वास में होता है, गजनी ने मन्दिर में तोड़फोड़ कर अपनी इच्छा पूर्ण की। तो क्या कल्याण सिंह को यह विश्वास था कि कार-सेवक किसी चमत्कारिक शक्ति के कारण मस्जिद को नुकसान नहीं पहुंचा पाएंगे और लगभग ढाई लाख कार सेवक अंधे हो जाएंगे? अभी यहां यह देखना शेष था कि गजनी की सेना और कार-सेवकों में कितना अंतर रह गया था?

योजनाबद्ध तरीके से 6 दिसम्बर को प्रातः लगभग 11 बजे कार सेवा शुरू हुई जिसमें कुछ साधुओं ने सरयू नदी के जल का एक लोटा जल तथा एक मुट्ठी रेत गढ़े में डाला लेकिन इत्तफाक से उस समय वहां विहिप का कोई प्रतिनिधि नहीं था। इसी के साथ ‘जय श्री राम’ के नारे लगने लगे। लोग नारे लगा रहे थे, ‘राम लला हम आयेंगे, मन्दिर वहीं बनाएंगे।’ ‘याचना नहीं अब रण होगा - संघर्ष महाभीषण होगा।’ जयकारा है वीर बजरंग-बली - हर-हर महादेव, जयकारा है महाकाली - हर हर महादेव। भीड़ का जोश बढ़ता ही जा रहा था। वहीं दूसरी ओर भाजपा व विहिप के मंच से भी लगातार नारों की आवाजें बढ़ती जा रही थी। लेकिन इसमें सबसे बड़ी आश्चर्य की बात यह थी कि लगभग ढाई लाख कार सेवकों के लिए कार सेवा के लिए दिखावे में आयताकार गढ़े के पास कुछ हथौड़े, गैंती व कुदाल रखी हुई थी और इन हथौड़ों से इस गढ़े की खुदाई कैसे हो सकती थी? देखते ही देखते सबसे पहले इन नारों के बीच 10-12 युवा मन्दिर/मस्जिद परिसर के बाड़े में घुस गए और फिर मस्जिद की गुंबदों पर चढ़ गए। यह सब कुछ पुलिस मूकदर्शक बनकर देख रही थी, क्योंकि उन्हें लाठी व गोली चलाने का आदेश नहीं था। क्यों नहीं था, यह बड़ा स्पष्ट है कि सभी कुछ भाजपा की सोची समझी योजना के अनुसार ही हो रहा था, वरना जब पुलिस को लाठी व गोली चलाने का आदेश नहीं था तो वहां उसे खड़ा करने का क्या उद्देश्य था? यदि पुलिस वालों को लाठी व गोली चलाने का आदेश होता तो भी वे क्या करते, यह सब संदेह के घेरे में है? पत्रकार धड़ाधड़ फोटो ले रहे थे। 10-12 युवकों ने गुंबदों पर चढ़ते ही हथौड़े चलाने शुरू कर दिए। पुलिस की लाचारी या अघोषित स्वीकारिता को देख भीड़ और भी उत्तेजित हो गई और देखते ही देखते 200-250 लोग और घुस गए या चढ़ गए तथा कार सेवा के लिए लाए गए उपरोक्त औजारों से मस्जिद को तोड़ना शुरू कर दिया। यही तो कार-सेवकों की कार-सेवा थी जिसको वे अंजाम दे रहे थे। औजार जो भी थे, तोड़ने के लिए प्रयोग किए जा रहे थे, परिसर में जितने भी लोग आ सकते थे घुस गए थे बाकी बाहर खड़े होकर जोर-जोर से नारे लगा रहे थे, मन्दिर तोड़ने वालों का हौंसला बढ़ा रहे थे।

जब कुछ पत्रकारों ने इस कार सेवा के फोटो लेने शुरू किए तो उनके कैमरे छीन लिए गए और तोड़ दिए गए। कुछ को घूंसें भी पड़े तो कईयों की पिटाई से खून भी बह निकला। अर्थात् मस्जिद की कार सेवा के साथ-साथ पत्राकारों की भी भली-भांति सेवा की जा रही थी। यह सब देखते-देखते पुलिस वालों का हौंसला भी आसमान छूने लगा और वे पुलिस वाले न रहकर अब मन से कार-सेवक बन चुके थे। देखते-देखते सभी पत्रकारों के कैमरों को नाकाम कर दिया गया था। भीड़ ने जब एक साथ मिलकर यह नारा दोहराया- एक धक्का और दो, पूरी मस्जिद तोड़ दो। तो उत्तर प्रदेश के राष्ट्रवादी पुलिस वालों से नहीं रहा गया। इस समय तक लगभग 12 बजे तक मस्जिद की तीनों गुंबदों को तोड़ दिया गया था। अब सभी कारसेवकों में यह पुण्य कमाने की होड़ लगी थी तो फिर पुलिस वाले अपने को इस पुण्य कर्म से कैसे वंचित रख सकते थे ? उन्होंने अपने हथियारों (राईफलों) को दूसरे के हाथों में थमा दिया और इस पुण्य के लिए जुट गए। वे बिल्कुल ही भूल गए थे कि उनका इस देश के लिए क्या कर्त्तव्य है और वे किस कारण वे अपने बच्चों को पालने के लिए सरकार से तनख्वाह ले रहे हैं? उन्होंने दूसरे कार-सेवकों से हथौड़े छीन लिए और शेष मस्जिद को तोड़ने में जी-जान से लग गए। वे केवल मस्जिद को ही नहीं तोड़ रहे थे, बल्कि देश के प्रति अपने विश्वास, कर्त्तव्य-पारायणता और निष्ठा को तोड़ रहे थे। इसमें कोई संदेह नहीं था कि यदि पत्रकारों के कैमरे न तोड़े होते तो पुलिस वालों का यह देशद्रोह कैमरे में कैद हो जाता और उनकी नौकरी भी मस्जिद की तरह टूट (छूट) जाती।

यह कार्य बिना किसी रोकटोक व बिना किसी अवरोध के साथ लगभग 5 बजे तक चलता रहा जब तक कि मस्जिद की नींव तक को न उखाड़ दिया गया। इस पूरे समय में जिले के सभी प्रशासनिक अधिकारी या तो नदारद थे या तमाशबीन। इन लोगों को क्या आदेश दिया गया था या फिर कोई अनुचित आदेश दिया गया था तो उसे इन्हें किस आधार पर स्वीकार कर लिया? अब वहां मस्जिद और राम चबूतरे का कहीं नामोनिशान नहीं था। चारों ओर इनका मलबा नजर आ रहा था।

लेकिन अभी एक और कार सेवा शेष थी जिस सेवा को हमारे भारतीय नागरिकों को मैंने पहले भी इस देश में जगह-जगह करते देखा था। अब वह कार सेवा थी कि अयोध्या में मुस्लिम धर्मी नागरिकों की बस्तियों व उनके घरों में आग लगाना और निहत्थे बेकसूर लोगों को मारना पीटना। यह कार सेवा अब कार सेवकों ने उसी जोश से शुरू कर दी। उनकी बस्तियां जला दी गईं, कईयों को मार खानी पड़ी, कितने अपने जीवन से हाथ धो बैठे और कितने घायल हुए, इसका आज तक कोई ब्योरा प्राप्त नहीं है। खानापूर्ति के लिए वहां पुलिस ने गोलियां भी चलाई। यह सब कुछ इसी गांधी के देश में हुआ जिसका गुणगान करते यह देश कभी थकता नहीं। हमारे देश के संविधान में दिया गया धर्मानिरपेक्षता का वचन मुस्लिम धर्मी गरीबों के घरों की तरह धू-धू करके जल रहा था। कल्याण सिंह का न्यायालय तथा केन्द्र को दिया गया वचन खाक हो चुका था। ऐसे निष्क्रिय कर्फ्यू मैंने पहले भी मेरठ, मुरादाबाद, हैदराबाद और अहमदाबाद आदि में देखे थे। परिणामस्वरूप उसी दिन देर सायं 9-10 बजे कल्याण सिंह की सरकार मस्जिद के मलबे की तरह ढेर हो गई और वहां राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।


उस दिन अयोध्या और दिल्ली में हर क्षण क्या हो रहा था ?
समय कार्य
11.00 स्थानीय साधुओं ने दिखावटी कार सेवा का शुभारम्भ किया तथा विहिप और भाजपा के नेताओं को सम्बोधित किया।
12.00 मस्जिद के तीनों गुंबदों को तोड़ दिया गया इसकी सूचना, सूचना ब्यूरो तथा केन्द्रीय अर्ध सैनिक बल के कंट्रोल रूम के माध्यम से केन्द्र में बैठे प्रधानमन्त्री और गृहमन्त्री को दी गई जिसमें यह भी बतलाया गया कि राज्य पुलिस, पी.ए.सी. तथा स्थानीय प्राधिकारियों ने किसी प्रकार का कोई हस्तक्षेप नहीं किया।
12.10 के० गृह सचिव ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव से बात करने की कौशिश की परन्तु वे उपलब्ध नहीं थे। इस पर उन्होंने उत्तर प्रदेश पुलिस के महानिदेशक से केन्द्रीय बलों का इस्तेमाल करने के लिए कहा।
12.25 केन्द्रीय गृहमन्त्री ने मुख्यमन्त्री के घर पर उत्तर प्रदेश सरकार के गृह सचिव से बात की और उन्हें तुरन्त केन्द्रीय बलों का इस्तेमाल करने के लिए कहा। इस पर प्रमुख सचिव ने मुख्यमन्त्री से परामर्श लेने की बात कही।
12.30 के० गृहमन्त्री ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री से मस्जिद पर आक्रमण करने के बारे में अपनी चिंता प्रकट की तथा सभी सुरक्षा के उपाय करने के लिए भी कहा और साथ-साथ केन्द्रीय बलों को इस्तेमाल करने के लिए भी कहा। इस पर मुख्यमन्त्री ने कहा कि उन्हें परस्पर विरोधी रिपोर्ट मिल रही है वे जांच करके पूरी स्थिति से अवगत कराएंगे लेकिन उन्होंने गृहमंत्री को वापिस फोन नहीं किया।
12.35 के० गृह सचिव ने वहां पर तैनात आई.टी.बी.पी. के महानिदेशक को स्थानीय प्रशासन की सहायता करने के आदेश दिए।
12.40 आई.टी.बी.पी. के महानिदेशक ने के० गृह मन्त्रालय को बतलाया कि फैजाबाद में डोगरा रेजिमैंट सैंटर से आर.ए.एफ. की दो कम्पनियां कूच करने के लिए तैयार हैं तथा राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारी पुलिस नियन्त्रण कक्ष में हाजिर हैं।
12.45 जिलाधिकारी फैजाबाद ने सी.आर.पी.एफ. के उपमहानिरीक्षक से 30 कम्पनियां भेजने का अनुरोध किया जिस पर तुरन्त आदेश दे दिया गया।
12.50 आई.टी.बी.पी. के महानिदेशक ने सी.आर.पी.एफ. के उप महानिरीक्षक को बतलाया गया कि वे जिलाधिकारी से कहें कि इन बलों को लेने के लिए साथ में मजिस्ट्रेटों को भेजें।
1.00 केन्द्रीय गृहमन्त्री ने उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को स्थिति से अवगत कराया और सुरक्षा के लिए कार्यवाही पर प्रार्थना की।
1.15 एक मजिस्ट्रेट और एक सर्कल आफिसर केन्द्रीय अर्ध सैनिक बलों के साथ जाने के लिए डी.आर.सी. पहुंचे।
1.25 केन्द्रीय अर्धसैनिक बलों की 3 बटालियन मजिस्ट्रेट और सर्कल आफिसर के साथ डी.आर.सी. से रवाना हुई और शेष बटालियन मजिस्ट्रेट का इंतजार करती रही।
1.40 केन्द्रीय गृह सचिव ने आदेश दिया कि अयोध्या तथा दूसरे स्थान में भी के० बलों के इस्तेमाल के लिए रैड अलर्ट की स्थिति में रखा जाए।
1.45 आई.टी.बी.पी. के महानिदेशक ने केन्द्रीय गृह मन्त्रालय को सूचित किया कि ढांचे का काफी नुकसान हो चुका है लेकिन उत्तर प्रदेश पुलिस कोई कार्यवाही नहीं कर रही है।
1.50 जिला प्रशासन ने कुल 50 कम्पनियों की मांग की और मजिस्ट्रेटों को उन स्थानों पर भेजने का अनुरोध किया जहां अर्ध सैनिक बलों को ठहराया जाना था।
2.00 केन्द्रीय गृहमन्त्री ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से फिर से ढांचे की सुरक्षा में की गई कार्यवाही के बारे में पूछताछ की।
2.20 आई.टी.बी.पी. के महानिदेशकों ने गृह मन्त्रालय को सूचित किया कि जो तीन बटालियन डी.आर.सी. से रवाना हुई थी उन्हें रास्ते में सड़कों पर अवरोधों, प्रतिरोधों और अन्य रुकावटों का सामना करना पड़ रहा है। बीच-बीच में इन पर पथराव भी किया जा रहा है। जब इन्होंने इस बारे में जिला अधिकारी से संदेश मिला है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री ने आदेश दिया है कि किसी भी स्थिति में गोली नहीं चलाई जाएगी। परिणामस्वरूप तीनों बटालियनें वापिस लौट आई।
2.25 केन्द्रीय गृह सचिव ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक से बात कर उन्हें स्थानीय प्रशासन द्वारा बल को वापिस भेजने के बारे में बतलाया और उससे अनुरोध किया कि वे बल के प्रयोग के लिए आवश्यक अनुदेश जारी करें। इस पर उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक ने बतलाया कि मुख्यमन्त्री का आदेश है कि गोली चलाने का सहारा न लिया जाए लेकिन बल के अन्य प्रकारों का उपयोग किया जा सकता है।
2.30 गृह सचिव ने उ० प्र० के मुख्य सचिव से बात की।
2.35 गृह सचिव ने रक्षा सचिव से बात की कि वे हैलीकॉप्टर तैयार रखें ताकि किसी बल को तुरन्त भेजने की जरूरत पड़ने पर भेजा जा सके। इसके साथ-साथ एक या दो परिवहन विमान भी तैयार रखने को कहा गया।
3.30 से 4.30 गृह सचिव को बतलाया किया कि अयोध्या में धार्मिक दंगे शुरू हो गए हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को स्थिति को बिगड़ने से रोकने के लिए कहा। उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक ने बतलाया कि गोली चलाए बिना स्थिति पर काबू नहीं किया जा सकता है। जिसके लिए मुख्यमन्त्री से आदेश प्राप्त किये जा रहे हैं। गृह सचिव ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव से भी कार्यवाही करने का अनुरोध किया। गृह सचिव ने थल सेनाध्यक्ष से भी बात की और उन्हें देश के अन्य भागों में भी धार्मिक स्थिति के बिगड़ने पर सेना को तैयार रखने के लिए कहा। इस पर सेनाध्यक्ष ने बतलाया कि उन्हें पहले से ही हिदायतें जारी कर दी हैं। गृह सचिव ने रक्षा सचिव से भी इस बारे में विस्तार से बातचीत की।
4.45 अयोध्या की घटनाओं के बारे में गृह मन्त्रालय ने सभी राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों और पुलिस प्रमुखों को सूचित किया तथा स्थानीय बलों व स्थानीय सेना अधिकारियों से सम्पर्क रखने को कहा।
5.00 गृह मन्त्री ने उत्तर प्रदेश के राज्यपाल से दोबारा बात की।
5.05 गृह मंत्रालय ने रक्षा मंत्रालय को सतर्क किया कि बलों को ले जाने के लिए विमानों की जरूरत पड़ सकती है और उन्होंने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को बतलाया कि सभी जगह बलों व सेना को बतला दिया गया है कि जिलाधिकारी की मांग पर तुरन्त कार्यवाही करे और साथ-साथ यह भी बता दिया गया है कि मुख्यमंत्री या मुख्य सचिव ने उन्हें कार्यवाही न करने के लिए कहा है, इसे स्वीकार न किया जाए क्योंकि हम सभी की संवैधानिक जिम्मेदारियां भी हैं।
5.35 गृह मंत्रालय ने रक्षा मंत्रालय से कहा कि वह 7 दिसम्बर 1992 को 11 बजे लखनऊ में 3 ए.एन.-32 विमान तैयार रखे क्योंकि विमान द्वारा अर्ध सैनिक बलों को बड़े पैमाने पर ले जाने तथा लखनऊ से फैजाबाद पहुंचने में आसानी हो।
5.40 इस समय तक अयोध्या में अर्ध सैनिक बलों की रवानगी के लिए कोई आदेश प्राप्त नहीं हुआ था। अतिरिक्त जिला मैजिस्ट्रेट फैजाबाद मजिस्ट्रेट प्राप्त करने की कौशिश कर रहे थे जिन्हें तुरन्त मजिस्ट्रेटों की व्यवस्था करने के लिए कहा गया।
6.30 अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट कैम्प में आए जहां सेना की टुकड़ियां तैयार थी लेकिन उनके साथ कोई मजिस्ट्रेट नहीं था। उन्होंने कहा कि मजिस्ट्रेट कोतवाली से मिलेंगे। दूसरी ओर सेना ने फैजाबाद के जिलाधिकारियों तथा पुलिस प्रमुख को लिखित में सूचित कर दिया था कि सेना की टुकड़ियां 12 बजे से तैयार हैं लेकिन मजिस्ट्रेटों के न होने के कारण और तैनाती के स्पष्ट आदेश न होने के कारण उनकी तैनाती नहीं की जा सकती है।
6.45 मूर्तियां उसी स्थान पर पुनः रख दी गई जहां पहले विवादित ढांचा खड़ा था।
7.10 तैनाती के लिए तैयार रखी गई 50 कम्पनियां में से 6 कम्पनियां अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट और एस.डी.ओ. पुलिस के साथ तैनाती के लिए फैजाबाद कोतवाली पहुंची शेष कम्पनियां रवाना नहीं हो सकी क्योंकि उनके साथ मजिस्ट्रेट नहीं थे।
7.30 मूर्तियों के लिए एक अस्थाई ढांचे के निर्माण का कार्य आरम्भ किया गया। इस सारे समय में केन्द्रीय गृह सचिव प्रधानमन्त्री से लगातार सम्पर्क बनाएं रहे तथा इसी दिन सायं 6 बजे केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल की बैठक बुलाई गई तथा मन्त्रिमण्डल ने राष्ट्रपति को संविधान के अनुच्छेद 356 के अनुसार उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश की गई और इस सिफारिश को स्वयं गृहमन्त्री राष्ट्रपति भवन ले गए जहां 9.10 पर घोषणा कर दी गई। राज्यपाल की सहायता के लिए 3 वरिष्ठ अधिकारियों को सलाहकार के रूप में नियुक्त कर दिया गया। इसके बाद अयोध्या से कार सेवकों को निष्कासित करने की कार्यवाही शुरू की गई।

जांच आयोग

इसके बाद 16 दिसम्बर को बाबरी मस्जिद ढांचे को गिराए जाने पर केन्द्रीय सरकार ने इसकी जांच के लिए पंजाब और हरयाणा उच्च न्यायालय के आसीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री मनमोहन सिंह लिब्राहन को लगाया गया। इनकी नियुक्ति जांच आयोग अधिनियम 1952 (1952 का 60) की धारा 3 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए की गई जिसे निम्नलिखित विषयों पर जांच करनी थी-

  • (क) 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद परिसर में घटित होने वाले घटनाक्रम तथा उससे सम्बन्धित सभी तथ्य और परिस्थितियां जिनके अंतर्गत राम जन्मभूमि/बाबरी मस्जिद ढांचे का गिराया जाना भी है।
  • (ख) राम जन्मभूमि/बाबरी मस्जिद ढांचे को गिराए जाने में या उसके सम्बन्ध में मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद् के सदस्यों, उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों और व्यक्तियों, सम्बन्धित संगठनों और अभिकरणों द्वारा निभाई गई भूमिका।
  • (ग) उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा यथाविदित या व्यवहार में लागू किए गए सुरक्षा उपायों और अन्य व्यवस्थाओं में कमी जिनके परिणामस्वरूप 6 दिसम्बर 1992 को रामजन्मभूमि/बाबरी मस्जिद परिसर अयोध्या नगर और फैजाबाद में उन घटनाओं की परिणति हुई।
  • (घ) 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में प्रचार माध्यम से सम्बन्धित व्यक्तियों पर हमले में परिणत होने वाले घटनाक्रम और उससे सम्बन्धित सभी तथ्य और परिस्थितियां और
  • (ङ) जांच के विषय से सम्बन्धित कोई अन्य विषय।

आयोग को अपनी रिपोर्ट तीन महीनों के अंदर प्रस्तुत करने को कहा गया।

यह आयोग अब तक का देश में सबसे लम्बा अवधि का आयोग रहा जिसकी अवधि 48 बार बढ़ाने के बाद तथा लगभग 8 करोड़ रुपया खर्च होने के बाद इसने अपनी रिपोर्ट लगभग साढ़े पंद्रह वर्ष बाद जून 2009 में केन्द्रीय सरकार को सौंपी। अब यह देखना है कि इस आयोग की रिपोर्ट पर सरकार क्या करती है या अधिकतर दूसरे आयोगों की रिपोर्ट की तरह ही मंत्रालय की अलमारियों में धूल चाटती रहेगी?


तीसरा अध्याय

1. मस्जिद ध्वस्त होने पर प्रतिक्रिया और परिणाम

पहले स्थानीय फैजाबाद के लोगों के अतिरिक्त लगभग शेष भारत के आम लोग इस बात से अनजान थे कि अयोध्या में कोई बाबरी मस्जिद श्री रामजन्मभूमि के स्थान पर बनी है और यह भी नहीं जानते थे कि वहां कोई विवाद है। इस बात को केवल वहां के स्थानीय निवासियों हिन्दू और मुसलमान को ही पता था कि वहां कोई विवादित स्थल है। लेकिन जब सन् 1984 से इस मसले को राजनैतिक मसला बनाकर बार-बार उछाला गया तो साधारण लोगों को भी पता चलता गया और हिन्दू समाज की भावना इससे जुड़ती चली गई। इसी प्रकार भारत के मुस्लिम समाज की भी स्थिति बनती गई। भारत के अधिकतर मुसलमानों ने इस प्रचार के बाद ही बाबरी मस्जिद का नाम सुना था। सच्चाई तो यह है कि न ही तो पूरा हिन्दू समाज राम जन्मभूमि से परिचित था न ही कोई अधिक मुसलमान बाबरी मस्जिद से। इस मस्जिद में बनने के बाद बहुत ही कम मुसलमान नवाज पढ़ने गए होंगे लेकिन प्रचार ने मुस्लिम समाज की भावनाओं को इस मस्जिद से जोड़ दिया और यह मसला उनके लिए हिन्दुओं की तरह उनकी अस्मत और स्वाभिमान का प्रतीक बन गया। जब 6 दिसम्बर को बाबरी मस्जिद के गिराए जाने पर स्वाभाविक था कि केवल भारत में ही नहीं संसार के समस्त मुस्लिम समाज में इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई जहां सन् 47 के दंगों में भी कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई थी। उदाहरण के लिए काश्मीर और हरियाणा का मेवात क्षेत्र। सन् 47 के दंगों में काश्मीर में कोई हुडदंग नहीं मचा और न ही एक आदमी तक कोई घायल हुआ और यही स्थिति मेवात क्षेत्र की थी। मेवात क्षेत्र के मुसलमान हिदुओं की तरह दीवाली और होली आदि त्यौहारों को मनाते आए थे। महाराजा सूरजमल और महाराजा जवाहर सिंह आदि की सेनाओं में भी मेवात मुसलमानों की अच्छी खासी संख्या रहती थी जिसमें बहुत से ओहदेदार भी थे। यही स्थिति जम्मू-कश्मीर की थी जिसमें राजा गुलाब सिंह से लेकर राजा हरिसिंह तक (राजपूत डोगरा हिंदू) की सेनाओं के साथ भी ऐसा ही था। लेकिन बाबरी मस्जिद की ध्वस्त होने की घटना ने यहां के मुसलमानों की भावनाओं को सन् 47 में उत्पन्न हुई भावनाओं से भी कहीं अधिक उग्र बना दिया था और यहां के मुसलमानों ने इस घटना की प्रतिक्रिया में वहां छोटे-मोटे मंदिरों को जलाया और नुकसान पहुंचाया। इसी घटना की प्रतिक्रिया में भारतवर्ष के काफी मुसलमानों में अधिक घातक विचार पैदा होने लगे जो स्वाभाविक था। इसी घटना के कारण भारत के कुछ मुसलमानों में हिन्दुओं के प्रति यहां तक की देश के प्रति भी नफरत पैदा हो गई।

मैं 7 जून 86 से 23 मार्च 1992 तक की अधिक अवधि में उग्रवाद के समय पंजाब में तैनात रहा और इस उग्रवाद को निकट से देखा और झेला था। लेकिन कहीं भी एक भारतीय मुसलमान को पंजाब के उग्रवाद में लिप्त नहीं पाया गया। जब कि बिहार से खेती मजदूर बनकर पंजाब में आने पर उनमें से कुछ ने अपनी आस्था सिख धर्म में रखी और उनमें से कुछ उग्रवादी बन गए थे। यह सर्वविदित है कि पंजाब के उग्रवाद का पालन पोषण करने वाली इस्लामिक देश पाकिस्तान की सरकारी एजेंसी आई.एस.आई. थी लेकिन यह एजेंसी एक भी भारतीय मुसलमान को (जम्मू-कश्मीर क्षेत्र छोड़कर) कभी भी उग्रवादी नहीं बना पाई और न ही उग्रवाद का समर्थक। इसी प्रकार इस घटना से पहले कोई भी भारतीय हिन्दू आतंकी कार्यवाहियों में सम्मिलित नहीं पाया गया जबकि आज अनेक जेलों में बंद हैं और हिन्दुओं ने कई आतंकी संगठन गुप्त रूप से स्थापित कर दिए हैं। वहीं दूसरी ओर इस्लाम धर्मी संगठन ‘सिमी’ के सदस्य जेहादी हमलों में लिप्त पाए गए। जब कुछ कश्मीरियों ने पाकिस्तान के इशारे पर सन् 1988 में वहां उग्रवाद शुरू किया तो सन् 1992 तक (मस्जिद के ध्वस्त होने तक) सभी प्रयासों के बावजूद कभी जेहादी कश्मीर से बाहर नहीं निकल पाए थे जबकि इस घटना के बाद भारत में जगह-जगह उनको पनाह देने वाले उत्पन्न हो गए और इसी कारण जेहादी देश के कोने-कोने तक वारदात करने में सफल रहे। भारत सरकार भी इन दोनों तरफ की प्रतिक्रिया स्वरूप उत्पन्न स्थितियों का कोई ठोस प्रतिबंध या समाधान नहीं कर पाई और सरकार की इस बारे में ढुलमुल नीति के कारण हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही कम और ज्यादा आतंकी कार्यवाहियों में लिप्त हो गए। यह सब इसी रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद के विवाद का ही परिणाम है।

बाबरी मस्जिद की घटना की सबसे बड़ी प्रतिक्रिया 23 मार्च 1993 को हुई जिसमें पहली बार भारत के ही मुस्लिम नागरिकों ने मुम्बई में बहुत ही योजनाबद्ध तथा गोपनीय तरीके से बड़े पैमाने पर भयंकर बम विस्फोट किए जिसमें 296 भारतीय नागरिकों की जानें गई जिसमें सभी धर्मों के भारतीय नागरिक थे। मुम्बई के बड़े-बड़े स्थलों को निशाना बनाया गया जिसमें देश का प्रमुख स्टॉक एक्सचेंज भवन भी शामिल था। इसके बाद काश्मीरी आतंकवादी देश के कोने-कोने तक पहुंच गए जिनके साथ शेष भारत के मुसलमानों के नाम भी जुड़ने तथा पकड़े जाने लगे। उत्तर प्रदेश के कई कस्बों का नाम तो इसी कारण भारत में ही नहीं भारत से बाहर भी विख्यात हो गया जहां के दर्जनों इस्लाम धर्मी स्कूल कॉलेजों में जाने वाले लड़के इन आतंकी कार्यवाहियों में लिप्त हो गए। इन्हीं के सहयोग से बंगलौर, कलकत्ता, बनारस, मुम्बई, अहमदाबाद, जयपुर और दिल्ली तक अलग-अलग सार्वजनिक स्थानों जैसे कि रेलवे स्टेशन और रेलगाड़ियां, भीड़ भरे बाजार और मंदिरों तक में विस्फोट किए गए जिनमें सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं और उससे भी अधिक घायल हुए।

इसी बाबरी मस्जिद के ध्वस्त होने पर आतंकियों ने भारतीय मुसलमानों की भावनाओं के मद्देनजर हिन्दू धर्म स्थलों पर एक के बाद एक आक्रमण किए। उदाहरण के लिए 30 मार्च 2002 को जम्मू के 150 साल पुराने रघुनाथ मन्दिर पर हमला हुआ जिसमें 10 लोग मारे गए, 24 सितम्बर 2002 को गुजरात के अक्षरधाम मन्दिर पर हमले में 24 लोग मारे गए थे। यहां तो आतंकवादियों ने श्रद्धालुओं को भी बंधक बना लिया था, जिसके लिए एन.एस.जी. के कमांडो तक को बुलाना पड़ा था। 24 नवम्बर को दुबारा फिर रघुनाथ मन्दिर पर हमला हुआ जिसमें 12 लोग मारे गए। इसी कड़ी में आतंकवादी 5 जुलाई 2005 को इसी अयोध्या में इसी विवादित जगह पर पहुंच गए। हालांकि सी.आर.पी.एफ. के जवानों की सतर्कता के कारण वहां पांचों आतंकवादियों को बगैर कोई नुकसान पहुंचाए ढेर कर दिया गया। यह स्पष्ट है कि धार्मिक स्थलों को निशाना बनाने के पीछे आतंकवादियों का ध्येय देश में धार्मिक दंगे भड़काना होता है। लेकिन साथ-साथ उनका उद्देश्य भारत के मुसलमानों की सहानुभूति बटोरने के लिए बाबरी मस्जिद के बदले की भावना को भी प्रदर्शित करना होता है। इसके पीछे जबरदस्त मनोविज्ञान काम करता है जिसके तहत मुस्लिम आतंकवादी भारतीय मुस्लिम नागरिकों को जो बाबरी मस्जिद ध्वस्त होने से दुःखी और कुंठित हुए थे, को यह संदेश देना चाहते हैं कि वे भारत के हिन्दुओं के बड़े से बड़े धर्मस्थलों को भी निशाना बनाने की हिम्मत रखते हैं। इस सबके मध्य बाबरी मस्जिद ध्रुवीकरण ही घूमता है।

जबकि दूसरी ओर इन्हीं आतंकवादियों ने काश्मीर में अपने ही धर्म स्थलों तक को नहीं बख्शा। वे बार-बार जान बूझकर वहां मस्जिद और दरगाहों में पनाह लेने की खबर सुरक्षाबलों तक पहुंचा कर उनके हाथों इन धार्मिक स्थलों को तबाह करने का न्योता देते हैं ताकि सुरक्षा बलों को बदनाम किया जा सके। इसी कड़ी में चौदहवीं सदी में बनी काश्मीर में संत शेख नुसरुद्दीन वली की दरगाह विख्यात चरारे-शरीफ तक को मई 2001 में ध्वस्त कर डाला था। इसके पीछे भी इनका यही उद्देश्य था, लेकिन बर्बादी का दोष सुरक्षा बलों पर डालने में पूर्णतया विफल रहे लेकिन फिर भी कश्मीर का साधारण मुस्लिम नागरिक इन बातों को पूर्णतया समझ नहीं पाता और सुरक्षाबलों के विरोध में खड़ा हो जाता है।

इसके बाद सन् 2002 में गुजरात के गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के कोच (डिब्बा) संख्या एस-6 में आग लगी या लगाई गई जिसमें 59 हिन्दू लोग मारे गए या झुलस गए जिसकी प्रतिक्रिया में पूरा गुजरात ही झुलस गया। यह सब प्रतिक्रिया की ही प्रतिक्रिया थी। गुजरात में हजारों बेगुनाह मुस्लिम-धर्मी मारे गए और घायल हुए और कितने ही अपने ही देश और प्रदेश में बेघर हो गए। जिस पर नानावटी आयोग तथा पूर्व न्यायाधीश यू.जी. बर्नी समिति बनाई गई जिनकी रिपोर्टों पर कारवाई होना शेष है। जो भी हो, गुजरात के मुख्यमन्त्री तक बुरी तरह आरोपों के घेरे में हैं। इन सभी घटनाओं के पीछे रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद की घटना कार्य कर रही है जिसके लिए कौन दोषी है? बड़ा स्पष्ट है। मुम्बई में 23 मार्च 1993 के बंम धमाकों की अब जांच पूर्ण हो चुकी है तथा अपराधियों को सजा मिल चुकी है केवल उनको छोड़कर जो इस अवधि में स्वर्ग सिधार गए और देश से भगोड़े हैं। उदाहरण स्वरूप मुख्य अपराधी दाऊद इब्राहिम।

मैं पाठकों को याद दिला दूं कि रघुनाथ मन्दिर पर दोनों हमले, गुजरात में अक्षरधाम पर हमला, यहां तक कि आतंकवादी संसद के दरवाजे तक पहुंच गए, जो सभी भारतीय जनता पार्टी के काल में हुआ। 5 जुलाई 2005 का अयोध्या पर हमला कांग्रेस पार्टी के काल में हुआ। इसके अतिरिक्त कई जगहों पर बम ब्लास्ट दोनों ही पार्टियों के शासनकाल में हुए थे। हर बार भारत की सभी राजनैतिक पार्टियों ने इनकी निंदा की लेकिन अयोध्या के हमले पर हमारी कुछ राजनैतिक पार्टियों से पहले ही पाकिस्तान ने तत्पर निंदा की। भाजपा के समय हमलों में विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने भाजपा के किसी बड़े नेता व सरकार से त्यागपत्र की मांग नहीं की थी। लेकिन भाजपा ने अयोध्या हमले पर गृहमन्त्री से त्याग पत्र की मांग की थी तथा इसी प्रकार दिल्ली में बम ब्लास्ट होने पर की थी। 26-11-2008 को मुम्बई हमले पर तो केन्द्रीय गृहमन्त्री तथा महाराष्ट्र के मुख्यमन्त्री और गृहमन्त्री को त्यागेपत्र देने के लिए विवश किया गया और उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। यह सच है कि जिम्मेदारी तो निश्चित होनी चाहिए लेकिन इन हमलों पर राजनीति क्यों ?

2. मस्जिद के ध्वस्त होने के बाद कुछ महत्त्वपूर्ण अन्य दिन

24 अक्तूबर 94 तत्कालीन मुख्यमन्त्री कल्याण सिंह को 1991 में राम चबूतरा बनने देने के कारण अदालत ने एक दिन की जेल की सजा सुनाई। इसी दिन सर्वोच्च न्यायालय ने विवादित स्थल के सम्बन्ध में सुझाव देने से इनकार कर दिया।
25 फरवरी 95 विश्व हिन्दू परिषद् ने मथुरा और बनारस में बाबरी मस्जिद जैसी कारवाई करने की धमकी दी।
14 अक्तूबर 2000 आर.एस.एस. के आगरा सम्मेलन में राम मन्दिर को गुख्य मुद्दा बनाया गया।
12 नवम्बर 2000 बाबरी मस्जिद मामले में कांग्रेस ने आरोपित मंत्रियों के इस्तीफे की मांग की।
4 दिसम्बर 2000 बाबरी मस्जिद मसले पर लोकसभा की कार्यवाही स्थगित।
5 दिसम्बर 2000 प्रधानमन्त्री वाजपेयी ने भाजपा मन्त्रियों की इस्तीफे की मांग को ठुकरा दिया।
6 दिसम्बर 2000 प्रधानमन्त्री वाजपेयी ने राममन्दिर को लेकर बयान दिया कि अभी यह काम अधूरा है।
7 दिसम्बर 2000 प्रधानमन्त्री वाजपेयी ने बयान दिया कि राम मन्दिर निर्माण को लेकर मुसलमानों को कोई आपत्ति नहीं है।
10 दिसम्बर 2000 प्रधानमन्त्री वाजपेयी ने कहा कि उच्चतम न्यायालय का अयोध्या मसले पर फैसला आखिरी होगा।
11 दिसम्बर 2000 अयोध्या मसले पर गतिरोध के कारण संसद का कामकाज ठप्प रहा।
13 दिसम्बर 2000 प्रधानमन्त्री वाजपेयी के बार-बार बयान बदलने की विपक्ष ने तीखी आलोचना की।
14 दिसम्बर 2000 अयोध्या मसले पर लोकसभा में मतदान सरकार के पक्ष में हुआ।
19 दिसम्बर 2000 अयोध्या मसले पर सरकार राज्य सभा में परास्त।
7 जनवरी 2001 बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने अयोध्या मसले पर विहिप के वार्ता के प्रस्ताव को खारिज किया।
18 जनवरी 2001 अखाड़ा परिषद् ने विहिप सम्मेलन के बहिष्कार की धमकी दी।
17 मार्च 2001 आर.एस.एस. ने कहा कि मार्च 2002 में राम मन्दिर का निर्माण शुरू हो जाएगा।
9 मई 2001 सोनिया गांधी ने आरोप लगाया कि अयोध्या मामले पर कारवाई न किए जाने की साजिश है।
26 अक्तूबर 2001 प्रधानमन्त्री वाजपेयी ने कहा कि अयोध्या मसला मार्च तक सुलझा लिया जाएगा।
18 अक्तूबर 2001 विहिप के कारण अयोध्या में निषिद्ध क्षेत्र का उल्लंघन।
19 अक्तूबर 2001 विहिप के वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज।
31 अक्तूबर 2001 विहिप के महासचिव गिरफ्तार।
6 दिसम्बर 2001 मस्जिद गिराए जाने की बरसी पर संसद में हंगामा।
10 दिसम्बर 2001 अयोध्या मसले पर लोकसभा की कारवाई स्थगित।
20 नवम्बर 2002 विहिप कार्यकर्ताओं का दिल्ली में जमावड़ा।
27 जनवरी 2002 तेलगु देशम पार्टी ने मन्दिर निर्माण के लिए चल रही कौशिशों पर चेतावनी दी।
31 जनवरी 2002 अयोध्या मसले पर भाजपा और विहिप की दूरियां बढ़ी और विहिप को कानूनी परिणामों के प्रति चेतावनी दी गई।
1 फरवरी 2002 अयोध्या मसले पर आर.एस.एस. और विहिप की दूरियां बढ़ी।
10 फरवरी 2002 विहिप ने राम मन्दिर निर्माण की धमकी दी तो प्रधानमन्त्री वाजपेयी ने इस्तीफे की धमकी दी।
18 फरवरी 2002 विहिप ने 15 मार्च को राम मन्दिर निर्माण की तारीख तय की।
22 फरवरी 2002 बाबरी मस्जिद ने मन्दिर निर्माण के विरोध में आन्दोलन छेड़ने की धमकी दी।
25 फरवरी 2002 वाजपेयी ने सर्वदलीय बैठक बुलाई।
26 फरवरी 2002 अयोध्या मसले पर संसद में हंगामा।
28 फरवरी 2002 विहिप ने गुजरात ट्रेन आगजनी के विरोध में देशव्यापी बंद का आह्वान किया जिस कारण गुजरात में हिंसा भड़की और महाविनाश हुआ।
मई 2009 पूर्व प्रधानमन्त्री उत्तर प्रदेश कल्याण सिंह जी जिसे इसी राम मन्दिर बाबरी विवाद पर न्यायालय से एक दिन की सजा मिल चुकी है और इन्हें ही बाबरी मस्जिद विध्वंस का विशेष आरोपी माना गया है और मुलायम सिंह यादव ने इन्हें अपनी पार्टी (समाजवादी) में सम्मिलित करने का प्रयास किया तथा कल्याण सिंह ने चुनाव में सपा का समर्थन किया।


इस बीच बाबरी मस्जिद पर गठित लिब्राहन आयोग अपने काम में लगा हुआ था तथा भाजपा, विहिप तथा बजरंग दल आदि से जुड़े हुए लोगों की गवाही चलती रही, जिसमें आरोपी अपनी-अपनी दलीलें देते रहे। अंत में सभी ने उच्च न्यायालय का फैसला मानना स्वीकार कर लिया। इसी दौरान न्यायालय ने मस्जिद के नीचे और चारों ओर जमीन को खोदकर प्रमाण एकत्र करने के लिए कहा गया और खुदाई में नीचे प्राचीन भारतीय सभ्यता के चिह्न पाए गए जिनमें से कुछ विकृत छोटी-छोटी खण्डित मूर्तियों के अवशेष मिले बताया गया है।

विश्व हिन्दू परिषद् ने प्रस्तावित राम मन्दिर का नक्शा जारी किया जिसमें मन्दिर की लम्बाई 268 फुट तथा चौड़ाई 140 फुट बतलाई गई, मन्दिर की ऊंचाई 128 फुट तथा मन्दिर में परिक्रमा का मार्ग 10 फुट चौड़ा बतलाया गया। मन्दिर में हल्के गुलाबी रंग के पत्थर का इस्तेमाल होगा जो भरतपुर (राज०) के बंसी पहाड़पुर क्षेत्र में पाया जाता है। मन्दिर दुमंजिला बनाने का प्रावधान है जिसमें कहीं भी लोहा इस्तेमाल नहीं होगा। जिसमें प्रत्येक मंजिल में 106 खम्भे लगेंगे जिनकी कुल संख्या 212 होगी। प्रत्येक खम्बे पर 16 मूर्तियां बनेंगी। मन्दिर में कुल 24 दरवाजें होंगे जिनकी चौखटें सफेद संगमरमर की होंगी। पत्थरों पर नक्काशी का कार्य अयोध्या और राजस्थान में जारी है।

3. लेकिन बाबरी मस्जिद की सच्चाई क्या है?

(पुस्तक ‘कितने पाकिस्तान’ व ‘स्टोन एण्ड फेदर्स’ के आधार पर)

अभी तक पाठकों ने हिन्दू इतिहासकारों व कुछ अंग्रेज इतिहासकारों द्वारा राम मन्दिर और बाबरी मस्जिद के विषय में दिए गए मतों के बारे में पढ़ा है जिसमें हिन्दू पुराणों में अयोध्या का वर्णन तो आता है लेकिन कहीं भी इनमें राम मन्दिर का वर्णन नहीं मिलता है। एक इतिहासकार ने अवश्य यवनों द्वारा राम मन्दिर को तोड़ने की बात कही है। लेकिन भारत के भिन्न-भिन्न मन्दिरों को लूटने और तोड़ने का वर्णन मिलता है लेकिन राम मन्दिर का कहीं भी नहीं। प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम की 1857 की लड़ाई हिन्दू और मुसलमान दोनों ने ही कंधे से कंधा मिलाकर लड़ी थी। जिसमें दिल्ली के बादशाह बहादुरशाह जफर को अपना नेता चुना था। यह लड़ाई लगभग 9 महीने तक चली थी जिसमें लाखों हिन्दुओं और मुसलमानों ने देश की आजादी के लिए खून बहाया था। इस लड़ाई ने अंग्रेजों के ही नाक में दम कर दिया था। अंग्रेजों को यह आभास हो चुका था कि जब तक इस देश में हिन्दू और मुसलमान एकता कायम रहेगी तो उनका शासन करना सुगम नहीं रहेगा। इसीलिए उन्होंने इस एकता को भंग करने के लिए बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाई थी। जिसमें सबसे पहले भारतीय इतिहास को विकृत करना तथा हिन्दू धर्म को अधिक से अधिक प्रचारित करना था। क्योंकि इससे पहले यह देश सदियों से मुगलों के आधीन रहा था। इस कार्य के लिए उन्होंने अपने दो महान् इतिहासकारों मिस्टर इलियट और डाऊसन को चुना था। इसी कड़ी में उन्होंने हिन्दू और मुस्लिम में स्थायी शत्रुता पैदा करने के लिए कई और षड्यन्त्रों को जन्म दिया और वे इसमें सफल भी रहे। जिसमें भारतवर्ष में ही एक अन्य देश पाकिस्तान बनाया तथा बाबरी मस्जिद की कटुता के बीज बोए। इस बारे में विद्वान् लेखक कमलेश्वर ने एक पुस्तक ‘कितने पाकिस्तान?’ लिखी जिसे केन्द्रीय सरकार की साहित्य अकादमी ने पुरस्कृत किया। इसी प्रकार पुनः इन मन्दिरों के तोड़ने की सच्चाई पर कांग्रेसी नेता पट्टाभिसीतारमैया ने एक पुस्तक ‘स्टोन एण्ड फैदर्स’ लिखी जो इन सभी अंग्रेजों की शैतानी से पर्दा हटाती है। जिनके अनुसार बाबरी मस्जिद तथा बनारस में बनी मस्जिद की सच्चाई इस प्रकार है-

  • इस मस्जिद की नींव इब्राहिम लोधी ने 17 सितम्बर 1523 (1930 हिजरी ????) की अयोध्या में एक खाली पड़ी जमीन पर रखी जो 10 सितम्बर 1524 को बनकर तैयार हुई। इसका पत्थर (शिलालेख) भी इब्राहिम लोधी के नाम से रखा गया था। यह मस्जिद लगभग 25 फुट लम्बी तथा 12 फुट चौड़ी, तीन दरवाजे तथा तीन गुम्बदों वाली बगैर मीनार की एक बहुत ही साधारण मस्जिद थी। इब्राहिम लोधी अवश्य एक मुस्लिमधर्मी था लेकिन उसकी दादी हिन्दू धर्म की थी जिसका खून लोधी की रगों में बहता था और उसके संस्कारों का लोधी पर गहरा प्रभाव था। इसी कारण उसने भारत में कहीं भी कोई मन्दिर नहीं तुड़वाया। उस समय तक बाबर और तुलसी नाम का कोई भी व्यक्ति भारत में नहीं था। हां, तुलसी जी पैदा अवश्य हो गए थे जो अयोध्या की गलियों में नंगे घूमते रहे होंगे। लगभग सन् 1524 में बाबर नामक व्यक्ति ने बुखारा व फरगना नाम के अपनी रियासत छिन जाने पर पंजाब के एक सूबेदार दौलत खां के बुलावे पर अपनी सेना सहित भारत आया जिसका मुकाबला पानीपत के मैदान में इब्राहिम लोधी और राणा सांगा की सेनाओं से हुआ जिसमें विजय बाबर के हाथ लगी और इस विजय का खुतबा मौलाना महमूद और शेख जैन ने 27 अप्रैल 1526 को पढ़ा। आगरा को अपनी राजधानी बनाया और मीर बांकी को अवध का सूबेदार नियुक्त किया। इसी मीर बाकी के वंशज आज भी वहां के स्नेहुआ गांव में रहते हैं जो कभी इस मस्जिद में नमाज पढ़ने जाते थे। ये भी इस मस्जिद की पूरी सच्चाई को जानते हैं।
  • अंग्रेजों ने अपनी नीति ‘बांटो और राज करो’ को कायम रखते हुए सन् 1889 में आर्कियालोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के डायरेक्टर, अंग्रेज ए. फ्रयूहरर को यह जिम्मेदारी सौंपी कि इस मस्जिद से इब्राहिम लोधी के नाम के शिलालेख को मिटवाकर वहां बाबर का शिलालेख लगा दिया जाए जिसमें लिखा था कि इस मस्जिद को 1528 की गर्मियों में अयोध्या के प्राचीन राम मन्दिर को मिसमार करके वहां मस्जिद तामीर करवाई जहां 1,74000 हिन्दू मारे गए। इस षड्यन्त्र को प्रमाणित करने के लिए बाबरनामा के साढ़े पांच महीने अर्थात् 3 अप्रैल 1528 से 17 सितम्बर, 1528 तक के दिनों के पन्ने गायब करवा दिए गए जो आज तक भी प्राप्त नहीं हो पाए हैं। लेकिन यह षड्यन्त्र करते समय फ्रयूहरर साहब से एक भूल हो गई कि उसने ‘आर्कियालोजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया’ की फाइलों को जलाया नहीं जिसमें इस षड्यन्त्र के सम्पूर्ण प्रमाण उपलब्ध हैं। इस षड्यन्त्र का दूसरा प्रमाण है कि सन् 1869 में फैजाबाद-अयोध्या की कुल आबादी 9949 थी जो बारह वर्षों में सन् 1881 में 11643 हो गई अर्थात् कुल 2000 आबादी बढ़ी तो फिर 1528 में एक लाख चौहतर हजार हिन्दू कहां से आ गए थे? तीसरा प्रमाण है कि यदि बाबर को मन्दिर तोड़ना ही था तो हिन्दुओं का एक और भगवान श्रीकृष्ण जी का मन्दिर मथुरा में जो उसकी राजधानी आगरा से मात्रा 50 किलोमीटर की दूरी पर है, क्यों नहीं तोड़ा ? यह सभी प्रमाण अंग्रेजों के षड्यन्त्र की ओर इशारा कर रहे हैं।
  • इसी प्रकार की कहानी बनारस के विश्वनाथ मन्दिर की है जिसे औरंगजेब द्वारा तोड़कर वहां एक मस्जिद बनवाई गई लेकिन इस मन्दिर को औरंगजेब ने क्यों तोड़ा था इस बारे में इतिहासकारों ने उस सच्चाई को कभी नहीं लिखा। इसका तथ्य था कि औरंगजेब के ही काल में ही एक बार कच्छ की हिन्दू रानी इस मन्दिर में अपने काफिले के साथ विश्वनाथ भगवान के दर्शन करने आई थी। मन्दिर का पण्डा रानी को भगवान के साक्षात् दर्शन कराने के बहाने मन्दिर के गर्भगृह में ले गया और वहां रानी को बैठाकर बाकियों को बाहर निकाल दिया। इसके बाद उसने मन्त्रोच्चारण करना शुरू कर दिया जब रानी ध्यान मग्न हो गई तो उस को अचानक काबू कर बलात्कार कर दिया। कुछ समय तक जब रानी बाहर नहीं आई तो उसके लोगों ने देखा कि वह वस्त्राभूषण विहीन अचेतावस्था में गर्भगृह में पड़ी थी। इस पर एक बहुत बड़ा बवाल खड़ा हो गया और इस घटना की सूचना सारे बनारस शहर में फैल गई। इत्तफाक से औरंगजेब उस समय उसी क्षेत्र में था। जब उसे पण्डों की यह काली करतूत ज्ञात हुई तो उसे बड़ा क्रोध आया और उसने कहा - ‘जहां बलात्कार हो वहां भगवान् का घर कैसे हो सकता है?’ उसने इस तथ्य की जांच स्वयं रानी और पण्डे से मिलकर की। घटना की सच्चाई पाए जाने पर उसने इसे ‘पापगृह’ कह कर तोड़ने का आदेश दे दिया और तुरन्त तुड़वा दिया। मन्दिर को तोड़ने पर रानी को बहुत दुःख हुआ जिस पर उसने औरंगजेब को अपनी याचना भेजी कि इसमें मन्दिर का क्या दोष है? दोष तो पण्डों का है। इस याचना पर विचार करते हुए उसने एक मस्जिद बनाने का आदेश दिया जिसमें कोई गर्भगृह नहीं होता तथा आदेशानुसार उसने रानी की बात को रखते हुए अल्लाह (भगवान) का घर मस्जिद बनवा दी जिसे ‘बनारस फरमान’ से जाना जाता है। अब पाठक स्वयं विचार करें कि दोषी पण्डा था या औरंगजेब?
  • आज अयोध्या, बनारस तथा मथुरा के इन मन्दिर मस्जिदों की सुरक्षा में सी.आर.पी.एफ. की लगभग तीन बटालियनों के अतिरिक्त स्थानीय पुलिस पर भारतीय जनता का करोड़ों रुपया खर्च हो रहा है, इस सबके लिए कौन जिम्मेदार है?

4. हिन्दू धर्म और इस्लाम धर्म कितने प्राचीन और उनमें आपसी क्या विवाद है?

सम्पूर्ण प्राचीन भारतीय साहित्य में कहीं भी ‘हिन्दू’ शब्द या हिन्दू धर्म का उल्लेख नहीं है। सम्राट अशोक के शासक पुत्र बृहद्रथ बौद्ध राजा की हत्या उसी के विश्वासपात्र सेनापति पुष्यमित्र ब्राह्मण ने धोखे से की थी और उसके बाद उसने ब्राह्मण धर्म को राजकीय धर्म बनाया। पुष्यमित्र शुंगवंशी ब्राह्मण थे। इनके वंशज द्युमत्सेन तथा शशांक आदि बहुत ही कट्टरपंथी शासक हुए जिन्होंने बौद्ध धर्म के विरोध में अर्थात् इसे पीछे छोड़ने के लिए अपने शासनकाल में ब्राह्मण साहित्य की रचना करवाई जो आज पुराणों, स्मृतियों व अन्य धार्मिक ग्रन्थों के रूप में जाने जाते हैं। जिसका एक ही उद्देश्य था कि भारत से बौद्ध धर्म को पूर्णतया समाप्त कर दिया जाए और वे इस कार्य में सफल भी हुए। इतिहासकारों का स्पष्ट मत है कि बौद्धकाल में सम्पूर्ण भारत में गणतान्त्रिक शासन व्यवस्था थी लेकिन ब्राह्मणराज में तथा बाद में राजपूत राजाओं ने एकतंत्र राज्यों की स्थापना की। इन पुराणों और स्मृतियों में भी हिन्दू धर्म का प्रयोग नहीं है लेकिन बाद में इनके भाष्यों तथा टीका-टिप्पणियों में हिन्दू शब्द या धर्म को घसीटा गया है। पुराणों में सबसे प्राचीन पुराण स्कन्द पुराण को बतलाया गया है जो लगभग 1200 वर्ष पुराना है। इससे पहले केवल तीन वेदों की रचना की गई थी तथा चौथा वेद इसके बाद लिखा गया। इन वेदों में कहीं भी हिन्दू शब्द या धर्म का नाम नहीं है। इन पुराणों में सत्य कम असत्य ज्यादा लिखा गया है जिसको कई इतिहासकारों ने माना है। स्वामी दयानन्द जी ने पुराणों को सिरे से नकार दिया और इन्हें गपोड़ कहा। इसी प्रकार भारत का प्राचीन इतिहास रहा लेकिन कहीं भी हिन्दू शब्द या हिन्दू धर्म का नाम नहीं।

इसलिए हमें इन तथ्यों को जानने के लिए लगभग 1600 वर्ष पूर्व चीनी यात्री फाह्यान के यात्रा वृत्तान्त की ओर लौटना होगा जिसने सन् 399 से सन् 414 तक भारत की यात्रा की। हालांकि उसकी यात्रा का मुख्य उद्देश्य बौद्ध धर्म का अध्ययन करना था। लेकिन फिर भी उसने भारत में धार्मिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था पर बेबाक टिप्पणियां की हैं जिसमें उसका कोई स्वार्थ या पक्षपात प्रतीत नहीं होता और न ही उसे ऐसा करने की आवश्यकता थी। उन्होंने अपना लेखन चीनी भाषा में किया जिसका अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं में अनेक इतिहासकारों ने अनुवाद किया जिनमें से एक महत्त्वपूर्ण लेखक और इतिहासकार जैम्स लिग्गी का अंग्रेजी में अनुवाद उपलब्ध है जिसका संक्षेप में हिन्दी अनुवाद इस प्रकार है-

फाह्यान ने अफगानिस्तान से होकर स्वात घाटी में प्रवेश किया। वहां से पेशावर पहुंचा। इसके बाद चलकर मथुरा पहुंचा, जिसे उसने मोरों का शहर लिखा है। वहां से वह बनारस गया उसके बाद वह पटना व बौद्धगया में गये। लगभग 14 वर्ष तक इस क्षेत्र में भ्रमण किया और अध्ययन करता रहा। इसके बाद वह सीधा श्रीलंका पहुंचा जहां से समुद्र के रास्ते अपने वतन चीन पहुंच गया।
अनुवादक जेम्स लिग्गी स्वयं एक इतिहासकार थे, ने अफगानिस्तान से लेकर बनारस तक के क्षेत्र को जट-जट्टु का क्षेत्र - अर्थात् जाट बाहुल्य क्षेत्र लिखा है । उस समय तक राजपूत जाति का उद्भव नहीं हुआ था। उसने अफगानिस्तान से लेकर बौद्ध गया तक के क्षेत्र में बौद्ध विहारों का वर्णन किया है जहां इनमें हजारों हजार बौद्ध भिक्षु रहते थे। जहां की स्थानीय जनता स्वेच्छा से भिक्षुओं के लिए राशन पानी का प्रबन्ध करती थी। इस क्षेत्र में कहीं भी जीव हत्या नहीं होती थी, नशे का नाम तक नहीं था केवल चाण्डाल जाति के लोग मच्छी पकड़ते थे जिन्हें धीरे-धीरे पुजारी बनाया जा रहा था। हर तरफ खुशहाली थी। लोग घी दूध का अधिक प्रयोग करते थे। इस क्षेत्र में कुछ लोग वैष्णव पंथ को मानने वाले थे। फाह्यान ने इसे धर्म नहीं, पंथ लिखा हैं। कहीं-कहीं ब्राह्मण थे जो छोटे-छोटे मन्दिरों में पूजा किया करते थे, जिसे उसने केवल ब्राह्मणवाद ही कहा है। अनुवादक ने अंग्रेजी में ‘Heretics Brahmans’ अर्थात् ‘विधर्मी ब्राह्मण’ बतलाया है।
अनुवादक ने धर्म के आधार पर लोगों की जनसंख्या लिखी है जिसमें हिन्दू न लिखकर ब्राह्मणवादी लिखा है। वैष्णव, बौद्धों तथा जैनियों की जनसंख्या अलग-अलग बतलाई है। मथुरा, बनारस, पटना और गया आदि को बौद्ध धर्म के केन्द्र लिखा है। अपने इस चौदह वर्ष के प्रवास के दौरान फाह्यान कभी भी अयोध्या नहीं गया जिससे प्रतीत होता है कि उस समय अयोध्या का कोई महत्त्व नहीं था। हालांकि आज भी अयोध्या में बौद्ध धर्म व उसके मठों के अवशेष देखे जा सकते हैं। इससे स्पष्ट है कि उस समय तक उत्तर भारत में हिन्दू और हिन्दू धर्म का कोई प्रचलन नहीं था। दक्षिण भारत का फाह्यान ने कोई उल्लेख नहीं किया।

तो फिर ‘हिन्दू’ धर्म व शब्द का प्रचलन कैसे हुआ?

उच्चारण भेद के कारण हम एक ही शब्द को अलग-अलग जगह में उसका अलग-अलग उच्चारण करते हैं। उदाहरणार्थ छोटे से राज्य हरियाणा में ‘कहां’ शब्द का रोहतक क्षेत्र में ‘कड़ै’, अहीरवाल क्षेत्र में ‘कठै’, भिवानी क्षेत्र में ‘कित’, तथा हिसार क्षेत्र में ‘कड़ियां’ बोला जाता है। यही शब्द पंजाब में ‘कित्थे’ तथा जम्मू व हिमालच क्षेत्र में ‘कुत्थे’ हो जाता है। इसी प्रकार हमारे देश के उत्तर पूर्वी राज्यों में ‘ट’ अक्षर की जगह ‘त’ इस्तेमाल किया जाता है और ये ट्रेन (रेलगाड़ी) को ‘त्रेन’ बोलते हैं। इसी प्रकार बिहार के मैथिली क्षेत्र में ‘ड़’ की जगह ‘र’ बोला जाता है तो दक्षिण के मालाबार क्षेत्र में ‘ज’ की जगह ‘श’ का प्रयोग होता है। फाह्यान यात्री ने स्वयं सिंधु नदी का उच्चारण सिन्थु Shin-thu तथा यमुना नदी को ‘फुहा’ Poo-ha लिखा है। चीनी लोग भारत को सिन्थु देश ही कहते हैं। इसी प्रकार अरबी उच्चारण में ‘स’ की जगह ‘ह’ का इस्तेमाल होता है। इसी प्रकार ‘सप्ताह’ और ‘हफ्ता’ उच्चारण भेद है जो इसका प्रमाण है। इसलिए अरबवासी सिंधु नदी को हिन्दू नदी बोलते थे। इसी प्रकार इस नदी के क्षेत्र में रहने वाले लोगों को भी हिन्दू कहा जाने लगा। इसलिए एक प्राचीन कहावत बनी-

हर कोस-कोस पर बदले पानी।

हर बीस कोस पर बदले वाणी।।

इस समय तक इस क्षेत्र में केवल बौद्ध धर्मी, जैन धर्मी, वैष्णव पंथी तथा ब्राह्मण पंथी लोग ही रहते थे। जब बौद्ध धर्म धीरे-धीरे लुप्त होता गया या किया गया तो इन ब्राह्मणपंथी व वैष्णव पंथियों को हिन्दू कहा जाने लगा। इसी प्रकार उसी ब्राह्मण साहित्य और ब्राह्मण धर्म को हिन्दू कहा जाने लगा। इसी बीच वैदिक काल को भी ब्राह्मण धर्म से जोड़ दिया गया। वरना वैदिक धर्म ब्राह्मणवाद से भिन्न था। इस प्रकार हिन्दू शब्द को सिंधु शब्द से अपहरण करके सम्पूर्ण हिन्दुत्व तैयार हुआ और यह सभी इस्लामधर्मी आक्रमणकारी आने के बाद फैला।

लगभग 1500 वर्ष पहले इस्लाम धर्म का जन्म अरब में हो चुका था तथा हजरत मोहम्मद साहब इसके पहले पैगम्बर थे। इस धर्म की विचारधारा चाहे कितनी भी सरल और स्पष्ट क्यों न हो, लेकिन खलीफाओं ने इस विचारधारा को एक मिशनरी के तौर पर कम तथा तलवार के बल पर अधिक फैलाने का प्रयास किया जो तरीका यूरोप में पूर्णतया असफल रहा लेकिन मध्य एशिया, सिंध तथा कुछ सीमा तक भारत में सफल रहा। इसमें सबसे बड़ी कठिनाई यह रही कि खलीफाओं में श्रेष्ठता के लिए आपस में भयंकर युद्ध होते रहे। सिंध और प० पंजाब के जाटों ने ब्राह्मणवादी कट्टर नीति और अंधविश्वासी विचारधारा के कारण तथाकथित हिन्दू धर्म (ब्राह्मणपंथ) को छोड़कर इस्लाम धर्म अपनाया, जिनके साथ कुछ अन्य जातियों ने भी इसे अपना लिया। इसके बाद शेष भारत में भी कुछ लोगों ने इसे डर और लालच में भी अपनाया जैसे कि काश्मीर आदि में। जाटों ने इस धर्म को डर और लालच में कभी नहीं अपनाया बल्कि कट्टर ब्राह्मणवादी व पाखण्डी विचारधारा के कारण अपनाया। इसका दूसरा कारण जाट मूर्तिपूजक नहीं था तथा ईश्वर की निराकार एकेश्वर शक्ति में विश्वास रखता था जो इस्लाम धर्म की विचारधारा से मेल खाती थी। इसी कारण पूर्वी पंजाब में जाटों ने पाखण्डी विचारधारा के विरोध में सिख धर्म को अपनाया। क्योंकि गुरु नानक जी की विचारधारा स्पष्ट तौर पर पाखण्डवाद और भेदभाव के विरुद्ध थी और जहां तक यह विचारधारा पहुंच पाई उसे खुले दिल से अपनाया गया। शेष भारत के जाट काफी समय तक बौद्ध धर्म को समाप्त होने पर भी उसी विचारधारा अनुसार चलते रहे। जब जाटों ने पाखण्डवादी विचारधारा के विरुद्ध स्वामी दयानन्द को पाया तो जाट उनके साथ हो लिए और आर्यसमाजी कहलाए। जबकि जाट स्वामी जी के पूर्ण उद्देश्य को नहीं समझ पाए क्योंकि ये आर्यसमाज परिष्कृत ब्राह्मणवाद या हिन्दूवाद ही था। यदि ऐसा नहीं था तो फिर स्वामी जी के विरोध के बावजूद हिन्दू शब्द को क्यों अपनाया गया? हालांकि मूलरूप से इस आर्यसमाज का धर्म भी वैदिक धर्म रहा है, जो पाखण्डवाद और पुराणवाद का विरोधी था। लेकिन यही आर्यसमाज वैदिक धर्म को अलग से स्थापित करके मान्यता नहीं दिलवा पाया जिस कारण जाट बीच मंझधार में ही फंस गए। इसलिए आज ये शेष जाट न तो वैदिक रहा और न ही ब्राह्मणवादी अथवा न हिन्दू। इसी कारण आज इन जाटों को इसी ‘हिन्दू कोड’ (हिन्दू मैरिज एक्ट 1955) के कारण गौत्र विवाद में अपमानित होना पड़ रहा है। यह ऐतिहासिक दस्तावेजों से स्पष्ट है कि जाट न तो हिन्दू हैं और न ही वर्ण व्यवस्था के आधीन।

जैन धर्म और बौद्ध धर्म ढाई हजार वर्ष प्राचीन और समकालीन हैं। ईसाई धर्म को आज 2009 साल पूरे होने वाले हैं जबकि इस्लाम धर्म और यहूदी धर्मों को 1500 वर्ष हो चुके हैं। लेकिन यहूदी अपने धर्म को ईसाई और इस्लाम से पुराना तथा इन धर्मों का जनक मानते हैं। वैष्णव धर्म तथा ब्राह्मण धर्म समकालीन हैं और हिन्दू कहा जाने वाला धर्म इन्हीं की उपज है जो केवल सिख धर्म से पुराना है इसलिए इसे सनातन धर्म (प्राचीन धर्म) कहना उचित नहीं। वैसे देखा गया है कि मन्दिरों में पुजारी भेंट की जगह भिक्षा मांगते हैं जो अन्य किसी धर्म में इतना भिखारीपन नहीं है।

जहां तक दोनों धर्मों के आपसी विवाद की बात है, ऐसे दस्तावेज कहीं उपलब्ध नहीं हैं कि इनमें आपस में कभी धर्म के नाम से कोई लड़ाई लड़ी गई हो। औरंगजेब को एक कट्टर मुस्लिम के नजरिये से देखा जाता है लेकिन जब हम इतिहास में झांक कर देखते हैं तो पाते हैं कि जब वह सत्ता के लिए अपने भाई दाराशिकोह से लड़ा जो एक सर्वविदित हिन्दू-परस्त था, के साथ हिन्दू कहे जाने वाले राजा उसके साथ न होकर औरंगजेब के साथ थे और उनके सेनापति भी थे। इसी प्रकार हम देखते हैं कि जब सन् 712 में बिन-कासिम ने सिंध पर धावा बोला तो उसकी जीत का श्रेय मंत्री ज्ञानबुद्ध ब्राह्मण हिन्दू को जाता है। मो० गजनी का सेनापति तिलक ब्राह्मण था तो पानीपत की पहली लड़ाई में बाबर का साथी रैमीदास ब्राह्मण था (विदेशी इतिहासकारों ने इसे नाई भी लिखा है)। इसी लड़ाई में इब्राहिम लोधी के साथ राजा राणा सांगा था। जब अकबर ने महाराणा प्रताप पर चढ़ाई की तो जयपुर के राजपूत राजा मानसिंह तथा स्वयं राणा प्रताप का सगा भाई शक्तिसिंह अकबर के साथ थे। लेकिन राणा प्रताप का सेनापति हाकिम सूर मुस्लिम धर्मी था। औरंगजेब और शिवाजी के युद्ध में राजपूत राजा जसवंत और जयसिंह औरंगजेब के सेनापति थे। लेकिन शिवाजी के तोपखाने का सेनापति मुकीन पठान मुस्लिम धर्मी था। इसी प्रकार महाराजा रणजीत सिंह तथा महाराजा सूरजमल की सेनाओं में एक तिहाई सैनिक और ओहदेदार मुस्लिम धर्मी थे। इस प्रकार के अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि कभी कोई हिन्दू मुस्लिम संघर्ष नहीं था ये केवल सत्ता के लिए संघर्ष थे जो हमेशा चलते रहे। यदि वास्तव में देखा जाए तो राम जन्मभूमि उर्फ बाबरी मस्जिद संघर्ष भी सत्ता का ही संघर्ष है, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं।

इसलिए तो भारतीय जनता पार्टी जो पहले कहा करती थी कि राम मन्दिर बनाने के लिए वे हर तरह की कुर्बानी देंगे लेकिन सत्ता में आते ही उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि इसके लिए हम अपनी सत्ता को कुर्बान नहीं कर सकते और रामजन्मभूमि का मसला न्यायालय के सुपुर्द कर दिया।

हिन्दू व मुस्लिमधर्मियों में कभी भी धर्म के लिए कोई लड़ाई नहीं लड़ी गई जबकि प्रथम स्वतन्त्रात संग्राम 1857 में हिन्दू मुसलमान दोनों ने ही कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। इसी कारण अंग्रेजों ने इनमें फूट डालने के लिए यह खुराफात की। इसी का परिणाम है कि पहली बार सन् 1915 में हिन्दुओं ने अपनी हिन्दू महासभा बनाई। सन् 1925 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आर.एस.एस.), सन् 1951 में जनसंघ, सन् 1964 में विश्व हिन्दू परिषद्, सन् 1966 में शिव सेना, सन् 1980 में भाजपा और सन् 1984 में बजरंग दल की स्थापना की गई। इस प्रकार हम देखते हैं कि हिन्दुओं के सम्पूर्ण संगठन अंग्रेजी काल या उसे बाद बने हैं, यही इसके प्रमाण हैं।

उपरोक्त तथ्यों से यह स्पष्ट हो जाता है कि हिन्दू धर्म सनातन धर्म नहीं है और न ही कभी हिन्दू धर्म और मुस्लिम धर्म में विवाद था।

5. कुछ अनुत्तरित प्रश्न और निष्कर्ष

बाबरी मस्जिद को ध्वस्त करने के बाद केन्द्रीय सरकार ने न्यायाधीश एम.एस. लिब्राहन अयोग को 16 दिसम्बर 1992 को गठित कर दिया था जिसे अपनी रिपोर्ट 3 महीने के अंतराल में देने को कहा गया था लेकिन उसने अपनी रिपोर्ट रिकार्ड-तोड़ समय बीतने के बाद ही सरकार को सौंपी, जो अभी तक सरकार के पास गोपनीय बनी हुई है। इसी रिपोर्ट में क्या लिखा गया है और केन्द्रीय सरकार क्या कारवाई करेगी, भविष्य के गर्भ में है। लेकिन पीछे लिखे अध्यायों व अपने निजी अनुभव के आधार पर मेरे मन में कुछ प्रश्न उत्पन्न हुए हैं तथा इस विवाद पर जो निष्कर्ष निकला मैं पाठकों के विचार के लिए पेश कर रहा हूं-

(1) अयोध्या में बाबरी मस्जिद के निर्माण पर बाबर ने जो फरमान जारी किया जिसका उल्लेख अध्याय 1(3) में किया गया है। इस फरमान की सत्यता पर अंदेशा होता है कि बाबर ने किस आधार पर उसी मलबे और मसाले से मस्जिद बनाने का फरमान जारी कर दिया? क्योंकि पुराने मसाले को कभी दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। दूसरा - उस काल में कोई मसाला होता ही नहीं था निर्माण के लिए केवल पिसा हुआ चूना होता था। जहां तक मलबे की बात है, यह मलबा बहुत ही घटिया किस्म का था जो किसी विख्यात मन्दिर का नहीं हो सकता। तीसरा- इस्लाम धर्म में मन्दिरों को बुतखाना मान कर अपवित्र ही समझा गया था जैसा हिन्दू लेखकों ने माना है तो किस प्रकार अपवित्र मलबे को मस्जिद में लगाने का बाबर हुकम दे सकता था? चौथा- बाबर को उस समय भारत का बादशाह बने दो साल हो गए थे तो क्या वे एक सुंदर और मजबूत मस्जिद बनाने में भी समर्थ नहीं थे?

(2) आज तक लगभग 247 लेखक श्री राम की कहानी अर्थात् रामायण लिख चुके हैं जिसमें सबसे प्राचीन ऋषि वाल्मीकि-कृत रामायण है। कहते हैं कि यह राम के समय लिखी गई थी और उसके आश्रम में लव और कुश भी पले थे। उसके बाद दूसरी रामायण तुलसीदास जी ने लिखी जो सन् 1528 में इसी अयोध्या की गलियों में एक बालक के रूप में घूमते थे और उन्होंने अपनी 50 वर्ष की अवस्था में बादशाह अकबर के काल में ‘रामचरितमानस’ नामक एक विशाल ग्रन्थ की रचना की और श्रीराम के भक्त भी रहे तो फिर उन्होंने राममन्दिर तोड़ने वाली घटना पर एक भी चौपाई लिखने का समय क्यों नहीं मिला? या तो यह घटना घटी ही नहीं थी या फिर राम मन्दिर था ही नहीं, या फिर अकबर ने इसे न लिखने के लिए इनको कोई रिश्वत दी? इसी प्रकार बाद के 245 रामायण के लेखकों में से किसी एक ने भी इस घटना का उल्लेख क्यों नहीं किया?

(3) इतिहास में बाबर से पहले भारत में जगह-जगह बाहरी आक्रमणकारियों द्वारा मंदिर तोड़ने का वर्णन है लेकिन राम मदिर तोड़ने व लूटने का वर्णन क्यों नहीं? जबकि इसी अयोध्या में कणक मन्दिर को लूटने का बार-बार वर्णन आता है?

(4) क्या बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी, विश्व हिन्दू परिषद् और लिब्राहन आयोग ने सन् 1889 की आर्कियालॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया के डायरेक्टर मिस्टरा ए० फहरर की फाइलों को ढूंढने और पढ़ने का प्रयास किया?

(5) मुसलमान आक्रमणकारियों द्वारा भारत के हिन्दू मन्दिरों को लूटने और तोड़ने का भारतीय इतिहासकारों तथा हिन्दुओं ने बार-बार उल्लेख किया है लेकिन बौद्धों के मठ तोड़ने का सम्पूर्ण उल्लेख क्यों नहीं? इनके लिए कौन दोषी है? आज भी भारत के हिन्दू और सिख जाट अपने हर नुकसान पर ‘मठ मार दिया - मठ मार दिया’ क्यों कहते हैं?

(6) विश्व हिन्दू परिषद् के महासचिव प्रवीण तोगड़िया बार-बार अपने भाषणों में कहते हैं (जनता की अदालत दूरदर्शन में भी) 95 प्रतिशत मुसलमानों के पूर्वज हिन्दू थे तो उन 100 प्रतिशत बौद्धों के वंशज आज कौन हैं?

(7) फाह्यान यात्री ने अपनी यात्रा के वृत्तान्त में ‘उत्तर भारत’ के वर्णन में ‘जट्टथरा’, ‘लोहान’ व ‘तातरान’ आदि का उल्लेख किया- ये कौन थे? और आज इनके वंशज कौन है?

(8) फाह्यान ने उत्तर भारत में चाण्डाल जाति का उल्लेख किया है जो उस समय मछली पकड़ने का काम करती थी जिसे पुजारी बनाया जा रहा था। वे आज कौन-सी जाति है?

(9) फाह्यान के वृत्तान्त के अनुवादक जेम्स लिग्गी ने अफगानिस्तान व स्वात घाटी के वासियों को भी जट्ट-जूटा का क्षेत्र लिखा है जिसे आज मीडिया तालीबानी क्षेत्र कह रहा है। इसी प्रकार भारत का मीडिया जाटों की खाप पंचायतों को भी तालिबानी करार दे रहा है। दोनों में क्या समानता है?

(10) भारतवर्ष तो सन् 1947 में ही आजाद हो गया था फिर हिन्दू संगठनों को सन् 1984 से रामजन्मभूमि को मुक्त कराने का विचार क्यों आया? अक्तूबर सन् 90 तथा दिसम्बर 92 में अयोध्या और फैजाबाद में तैनात वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी क्या संविधान की रक्षा कर रहे थे या रामजन्मभूमि की या हिन्दू धर्म की?

(11) दिसम्बर 1992 में अयोध्या में रामजन्मभूमि मस्जिद स्थल पर स्थानीय पुलिस क्या राष्ट्रवादी थी या हिन्दूवादी?

(12) 6 दिसम्बर 1992 को मस्जिद की रक्षा के लिए स्थानीय पुलिस को लाठी और गोली चलाने का आदेश नहीं था तो फिर पुलिस को वहां किसलिए तैनात किया गया था? तथा मस्जिद की रक्षा का क्या उपाय था? या क्या पुलिस वाले कोई सत्संग करने आये थे?

(13) जब 6 दिसम्बर 1992 को स्थानीय पुलिस वाले स्वयं जब मस्जिद को तोड़ने लग गए अर्थात् रक्षक से भक्षक बन गए तो इससे आगे इन्हें क्या कहा जाए?

(14) 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में साधु और संतों का कार सेवा के लिए उपस्थित रहना तो स्वीकार्य है क्योंकि वे धार्मिक नेता हैं लेकिन भारतीय संविधान की शपथ लेने वाले भाजपा के राजनीतिक नेता वहां किसलिए थे?

(15) उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमन्त्री श्री कल्याणसिंह को अयोध्या मसले में अपराधी पाये जाने पर एक दिन की सजा मिल चुकी है क्योंकि उन्होंने मुख्यमन्त्री होते हुए रामचबूतरे का निर्माण करके पक्ष लिया था। लेकिन जब 2009 में इसी व्यक्ति को मुलायम सिंह यादव ने अपनी पार्टी (समाजवादी पार्टी) में सम्मिलित कर लिया तो क्या मुलायमसिंह ने अपनी पार्टी के सिद्धान्तों पर कुठाराघात और मुस्लिम समाज के साथ विश्वासघात नहीं किया? हालांकि बाद में फिर अलग हो गए हैं।

निष्कर्ष 
इस संसार में कोई भी मानव पैदा होने के समय अपनी इच्छानुसार किसी विशेष धर्म के परिवार में इच्छा से पैदा नहीं हो सकता है। वह जैसे-जैसे बड़ा होता है तो उसे उसके जन्मजात धर्म की सीख दी जाती है अर्थात् वह आयु अनुसार दक्ष होता जाता है। धारण करने को धर्म कहते हैं और इन्सान वही धारण करता चला जाता है जो उसे कहा जाता है, समझाया जाता है, पढ़ाया जाता है या किसी तरह के भाव भरकर उकसाया जाता है। सैद्धान्तिक तौर पर धार्मिक मामला आस्था या विश्वास पर आधारित पूर्णतया व्यक्तिगत होता है और होना भी चाहिए। दूसरे का धर्म दूसरे के लिए चिंता का विषय है लेकिन व्यवहार में हमारे यहां ठीक इसके विपरीत है। कुछ लोग दूसरे के धर्म को छोटा और घृणित कहकर उसका अतिक्रमण करते हैं और अपने धर्म को श्रेष्ठ बतलाकर उससे चिपटे रहने के लिए दूसरों को भी विवश करते हैं, यही कट्टरपंथ है। सभी धर्मों में आस्था के नाम पर कम या अधिक अंधविश्वास का साया है लेकिन कुछ की नींव तो आस्था के नाम पर पाखण्डवाद वा अंधविश्वास पर टिकी है। बहुत से लोगों ने धर्म को सेवा का साधन न मानकर अपने पेट भरने का साधन बना रखा है। यही लोग अपने धर्म की व्याख्या अपने स्वार्थ अनुसार करके दूसरों के दिमाग पर अपना अधिकार करना चाहते हैं। तब यह धर्म मनोविज्ञान का काम करता है और यह मनोविज्ञान इतना सबल हो जाता है कि साधारण इन्सान भी कट्टरपंथी बन कर हिंसा को जन्म दे देता है जबकि इसका मूल धर्म से कहीं कोई लेना-देना नहीं होता। धर्म की अंधभक्ति ज्यादा नुकसान करती है जो कट्टरपंथियों को जन्म देकर अपने धर्म की मनमानी व्याख्या करते हैं। इसलिए इन कट्टरपंथियों ने हमेशा प्रचार किया है, अपना धर्म हमेशा दूसरे के धर्म से श्रेष्ठ है। यही कट्टरपंथी विचारधारा बुद्धि की सोचने की शक्ति को विराम देती है और इसके बाद अंधभक्ति की ओर धकेल देती है। इसके बाद उसमें अच्छे और बुरे की पहचान करने की क्षमता समाप्त हो जाती है।

मैं यहां धर्म की तुलना करने की आवश्यकता नहीं समझता, मैं तो धर्म के अनुयायियों के द्वारा धर्म की व्यवस्था, व्याख्या तथा उनके कार्यकलापों की तुलना करना चाहता हूं। मैं तो धर्म के अंधभक्तों की बात करना चाहता हूं चाहे वे किसी भी धर्म के अनुयायी क्यों न हों? यदि बाबर ने राम मन्दिर को तोड़कर मस्जिद बनाई तो वह केवल इस्लाम धर्म का अंधभक्त था और जिन लोगों ने बाबरी मस्जिद को तोड़ने के लिए लोगों को उकसाया और तोड़ा वे भी हिन्दू धर्म के अंधभक्त थे। दोनों में कोई अंतर नहीं फिर हिन्दू धर्म सहनशील और विवेकशील कैसे हुआ? क्या अपनी कमजोरियों को छिपाने के लिए आज तक यह ढिंढोरा पीटा जाता रहा? यदि कोई मुझे पत्थर मारे और मैं भी उसका जवाब पत्थर से दूं तो यह बहादुरी कहलाएगी लेकिन जब मैं डर के मारे उसके पत्थर का उत्तर न दूं और कुछ समय बाद मौका पाकर किसी की आड़ लेकर उस पर पत्थर फैंकने लग जाऊं तो मैं बहादुर नहीं, एक बुजदिल और कायर ही कहलाऊंगा। राम मन्दिर/मस्जिद की यही कहानी है। क्या यह सच नहीं है कि हिन्दुओं के पूर्वज ज्ञानबुद्ध, तिलक, रैमीदास, जयचंद आदि स्वयं आक्रमणकारियों को यहां लेकर आए थे? तो बाबर यहां क्या हमारी पूजा करने आए थे? उस समय इस देश के करोड़ों हिन्दू क्या कर रहे थे? उनमें एकता नहीं थी तो उसके लिए कौन जिम्मेवार थे? क्या अरब वाले या यूरोप वाले? इस देश की एकता भंग करने वाले कौन थे? इस देश में लगभग 600 रियासतों के निर्माण के लिए कौन लोग जिम्मेवार थे? अशोक के बेटे राजा बृहद्रथ की हत्या करके इस देश को किसने तोड़ा? इस समय तक तो यहां कोई इस्लाम, ईसाई व सिक्ख धर्म नहीं था फिर कौन इसका जिम्मेवार है? पाकिस्तान बनाने में क्या जिन्ना और अंग्रेज ही जिम्मेदार थे? बाकी हिन्दू नेता क्या कर रहे थे? बड़ा अफसोस है कि 1,74000 हिन्दू अपनी शहीदी देकर भी बाबर की 40 हजार सेना से मुकाबला नहीं कर पाए। अब हम कहेंगे कि हमारे पास बाबर की तरह उन्नत हथियार (तोपखाना) नहीं थे तो फिर हमारे वेदों का विज्ञान कहां चला गया था? हमारे 33 करोड़ देवी-देवता उस समय क्या कर रहे थे जिनके हाथों में भयंकर हथियार दिखाए जाते हैं? उस समय तक तो अंग्रेज चोर भी नहीं आए थे जिन्हें चोर कहा जाता है, जो वेदों का ज्ञान चुराकर यूरोप ले गए। रामायण और महाभारत काल तक तो हम मिसाईलों का प्रयोग कर रहे थे लेकिन मुस्लिम आक्रमणकारियों के आते ही यह हमारा शस्त्रभण्डार कहां लुप्त हो गया?

दूसरा तर्क दिया जाता है कि मस्जिद में लगे पत्थर किसी मन्दिर के थे। इन पत्थरों को मैंने स्वयं लगभग एक महीने तक देखा लेकिन इन पर न तो कोई धार्मिक चिह्न व चित्र थे न ही मुगलकालीन आकृतियां थीं। तीसरा तर्क दिया जाता है कि न्यायालय के आदेश पर जो वहां खुदाई हुई तो उस समय टूटी-फूटी हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियां मिली थी। जबकि वास्तव में यह बौद्ध धर्म के अवशेष हैं। यह स्पष्ट है कि यह बहुत ही साधारण और छोटी मस्जिद थी जिस कारण इसकी नींव भी गहरी नहीं खोदी गई थी और हम जानते हैं कि अयोध्या अति प्राचीन नगर रह चुका है जहां बौद्ध और ब्राह्मण राजा तरह-तरह के मठ व मन्दिर बनवाते रहे होंगे जिसमें कुछ प्राचीन गिरते रहे और नये बनते रहे होंगे। इसलिए यह भी स्पष्ट है कि खुदाई में धार्मिक मूर्तियां मिलना बिल्कुल संभव है। हरियाणा में देखा गया है कि गांवों में लोगों की बैठकों के नीचे कुएं और गुफाएं तक मिली हैं। जहां आज पुरातत्त्व विभाग इनकी खोज में लगा है। फिर बाबरी मस्जिद घटना को तो अभी तक 500 साल भी पूरे नहीं हुए हैं। इस मस्जिद के ध्वस्त होने से न तो कुछ हिन्दुओं को मिला न ही इस देश को, मिला है तो अपने ही देश के मुसलमानों से नफरत तथा देश की तबाही में इजाफा इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। इस मस्जिद को ध्वस्त करने के पीछे भाजपा का एक मात्र उद्देश्य था केन्द्र की सत्ता प्राप्त करना। इसलिए उन्होंने बार-बार कहा कि वे राम मन्दिर के लिए अपनी जान तक कुर्बान कर देंगे लेकिन ज्योंहि सत्ता में आए तो उन्होंने कहा कि हम मन्दिर के लिए सरकार कुर्बान नहीं कर सकते अर्थात् सत्ता जान (राम) से भी प्यारी हो गई। यदि भविष्य में वहां किन्हीं कारणों से मन्दिर बन भी गया तो वह देश में प्रेम कम, घृणा अधिक फैलाएगा, और कुछ नहीं। यही इसकी हकीकत है।

••• इति •••


लेखक का परिचय

Hawa Singh Sangwan

नाम - हवासिंह सांगवान जाट सुपुत्र स्वर्गीय चौ. श्योनन्द सांगवान जाट

जन्मस्थान - गाँव व डॉकखाना मानकावास, तहसील चरखी दादरी व जिला भिवानी (हरयाणा)।

जन्मतिथि - 16 मार्च सन् 1947 (सरकारी तौर पर)


आठवीं तक की शिक्षा अपने गाँव से तथा मैट्रिक की परीक्षा पड़ोसी गाँव चरखी से सन् 1965 में पास की, कालेज की शिक्षा ‘दयानन्द कॉलेज’ हिसार तथा ‘जनता कॉलेज’ चरखी दादरी से प्राप्त की और सन् 1969 में स्नातक की डिग्री मिलने पर 6 अक्टूबर सन् 1969 को सी.आर.पी.एफ. में हैड कांस्टेबल के पद पर श्रीनगर में नियुक्त हुये । कड़ी मेहनत और आत्मविश्वास के बल पर चलते हुए जनवरी 2001 में कमांडैंट के पद पर पहुंचे और प्रथम अप्रैल 2004 को साढ़े-34 साल सेवा करने के बाद सेवानिवृत्त हुये । सरकारी रिकार्ड में अधिक आयु होने के कारण भविष्य के प्रमोशन से वंचित रहे ।


इस साढ़े-34 साल के सेवाकाल में लेह-लद्दाख के ‘हॉट सप्रिंग’ से ‘कन्या कुमारी’ तथा नेफा (अरुणांचल) के ‘हॉट सप्रिंग’ (चीन, ब्रह्मा व भारत सीमा का ट्राई जंक्शन) से गुजरात के खंभात कस्बे (इसी कस्बे के नाम से वहाँ समुद्र की खाड़ी का नाम खंभात की खाड़ी पड़ा) तक लगभग सम्पूर्ण भारत को देखने का अवसर मिला । सी.आर.पी.एफ. की सेवा की बदौलत-पैदल व खच्चर के सफर से लेकर चेतक-हेलिकॉप्टर तथा एयर-बस तक यात्रा करने का और रेलवे के गले-सड़े प्लेटफार्म व टूटे-फूटे गाँवों की झोपड़ियों से लेकर फाईव-स्टार होटलों में रहने तक का अवसर प्राप्त हुआ । इस अवधि में बंगाल का नक्सलवाद, तेलंगाना आंदोलन (सन् 1973), पी.ए.सी. विद्रोह, बंगाल में बंग्लादेशियों की घुसपैठ, पंजाब का उग्रवाद, गुजरात पुलिस का आंदोलन, आसाम में गणपरिषद् का आंदोलन व ‘उल्फा’ का उग्रवाद, मिजोरम व मणिपुर के स्थानीय आंदोलन व उग्रवाद, कश्मीरी उग्रवाद, बोडो उग्रवाद, सन् 1990 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद व मन्दिर विवाद और मेरठ, मुरादाबाद व हैदराबाद के साम्प्रदायिक दंगे आदि-आदि तथा इसके अतिरिक्त देशभर में अनेक जगह चुनाव के कार्यों में भाग लिया । इस अवधि में अनेक प्रशंसापत्र तथा मैडल मिले । लेकिन लेखक का मानना है कि उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी कि पूरे सेवाकाल में कभी भी अपने आत्मसम्मान को ठेस तथा अन्याय से समझौता नहीं किया और इसके लिए उनको सन् 1986 में पंजाब व हरयाणा उच्च न्यायालय तथा सन् 2000 में जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय में भारत सरकार व सी.आर.पी.एफ. के विरुद्ध जाना पड़ा और पूर्णतया न्याय मिला । इसी कारण साढ़े-34 साल के सेवाकाल में से 28 साल भारत के अशांत क्षेत्रों में गुजारने पड़े ।


उनकी दूसरी उपलब्धि यह है कि सम्पूर्ण भारत को नजदीक से देखने व विभिन्न समाजों को जानने का अवसर मिला । सन् 1988 के बाद जहाँ-जहाँ भी रहे वहाँ के इतिहासों का अध्ययन किया तथा अपनी जाट जाति को सामने रखकर हमेशा तुलनात्मक दृष्टि को अपनाकर गंभीरता से इसका विश्लेषण व चिंतन किया । इसी परिणामस्वरूप अपनी जाट जाति के बारे में लिखने पर विवश हुए । मोबाइल नम्बर 9416056145.


नोट - लेखक ने अपने नाम के साथ उनकी जाति (जाट) इसलिए जोड़ दिया कि उनको दूसरी जातियों में सांगवान गोत्र के लोग मिले हैं । उदाहरण के लिए कुम्हार, श्यामी, धानक और वाल्मीकि । सांगवानों के गांवों से जाने के कारण बाहर इन्होंने अपने नाम के पीछे सांगवान लिखना आरम्भ कर दिया ।


किताब में त्रुटियों का रहना स्वाभाविक है । अतः पाठकों से नम्र निवेदन है किसी भी त्रुटि के रहने पर उसे हमें ज्ञात कराएं ताकि अगले संस्करण में उसे शुद्ध किया जा सके ।


जय जाट !



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