Konark: Difference between revisions

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== Konark Sun Temple ==
== Konark Sun Temple ==


The Sun Temple was built in the 13th century and designed as a gigantic chariot of the Sun God, Surya, with twelve pairs of ornamented wheels pulled by seven horses. Some of the wheels are 3 meters wide. Only six of the seven horse still stand today. The temple fell into disuse after an envoy of [[Jahangir]] desecrated the temple in the early 17th century.
The [[Sun Temple]] was built in the 13th century and designed as a gigantic chariot of the Sun God, Surya, with twelve pairs of ornamented wheels pulled by seven horses. Some of the wheels are 3 meters wide. Only six of the seven horse still stand today. The temple fell into disuse after an envoy of [[Jahangir]] desecrated the temple in the early 17th century.
 
There was a diamond in the centre of the idol which reflected the sun rays that passed. In 1627, the then Raja of [[Khurda]] took the Sun idol from Konark to the Jagannath temple in [[Puri]].The Sun temple belongs to the [[Kalingan]] school of Indian temple architecture. The alignment of the Sun Temple is along the East-West direction. The inner sanctum or vimana used to be surmounted by a tower or shikara but it was razed in the 19th century. The audience hall or jagamohana still stands and comprises majority of the ruins. The roof of the dance hall or natmandir has fallen off. It stands at the eastern end of the ruins on a raised platform.


There was a diamond in the centre of the idol which reflected the sun rays that passed. In 1627, the then Raja of Khurda took the Sun idol from Konark to the Jagannath temple in Puri.The Sun temple belongs to the [[Kalingan]] school of Indian temple architecture. The alignment of the Sun Temple is along the East-West direction. The inner sanctum or vimana used to be surmounted by a tower or shikara but it was razed in the 19th century. The audience hall or jagamohana still stands and comprises majority of the ruins. The roof of the dance hall or natmandir has fallen off. It stands at the eastern end of the ruins on a raised platform.
== कोणार्क  ==
== कोणार्क  ==
[[Vijayendra Kumar Mathur|विजयेन्द्र कुमार माथुर]]<ref>[[Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur]], p.233</ref> ने लेख किया है ... '''कोणार्क''' ([[AS]], p.233) [[Orissa|उड़ीसा]] राज्य की प्राचीन राजधानी था। किंवदन्ती के अनुसार चक्रक्षेत्र (जगन्नाथपुरी) के उत्तरपूर्वी कोण में यहाँ अर्क या सूर्य का मन्दिर स्थित होने के कारण इस स्थान को कोणार्क कहा जाता था। पुराणों में कोणार्क को [[मैत्रेयवन]] और [[पद्मक्षेत्र]] भी कहा गया है.  
[[Vijayendra Kumar Mathur|विजयेन्द्र कुमार माथुर]]<ref>[[Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur]], p.233</ref> ने लेख किया है ... '''कोणार्क''' ([[AS]], p.233) [[Orissa|उड़ीसा]] राज्य की प्राचीन राजधानी था। किंवदन्ती के अनुसार चक्रक्षेत्र (जगन्नाथपुरी) के उत्तरपूर्वी कोण में यहाँ अर्क या सूर्य का मन्दिर स्थित होने के कारण इस स्थान को कोणार्क कहा जाता था। पुराणों में कोणार्क को [[मैत्रेयवन]] और [[पद्मक्षेत्र]] भी कहा गया है.  

Revision as of 16:17, 21 January 2019

Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Konark (कोणार्क) is a town in the Puri district in Odisha, India.

Location

It lies on the coast by the Bay of Bengal, 60 kms from the capital of the state, Bhubaneswar. It is the site of the 7th-century Sun Temple, also known as the Black Pagoda, built in black granite during the reign of Narasimhadeva-I. The temple is a World Heritage Site. The temple is now mostly in ruins, and a collection of its sculptures is housed in the Sun Temple Museum, which is run by the Archaeological Survey of India.

Origin

The name Konârka is derived from the Sanskrit word Kona (meaning angle) and word Arka (meaning sun) in reference to the temple which was dedicated to the Sun god Surya.[7]

Variants

  • Arkakshetra (आर्कक्षेत्र) = Padmakshetra (पद्मक्षेत्र) = Konark (कोणार्क) (AS, p.39)
  • Konark (कोणार्क) (उड़ीसा) (AS, p.233)

History

In 1559, Mukunda Gajapati came to throne in Cuttack. He aligned himself as an ally of Akbar and an enemy of the Sultan of Bengal, Sulaiman Khan Karrani. After a few battles, Odisha finally fell. The fall was also aided by the internal turmoil of the state. In 1568, the Konark temple was damaged by the army of Kalapahad, a general of the Sultan.[1] Kalapahad is also said to be responsible for damages to several other temples during the conquest.

Konark Sun Temple

The Sun Temple was built in the 13th century and designed as a gigantic chariot of the Sun God, Surya, with twelve pairs of ornamented wheels pulled by seven horses. Some of the wheels are 3 meters wide. Only six of the seven horse still stand today. The temple fell into disuse after an envoy of Jahangir desecrated the temple in the early 17th century.

There was a diamond in the centre of the idol which reflected the sun rays that passed. In 1627, the then Raja of Khurda took the Sun idol from Konark to the Jagannath temple in Puri.The Sun temple belongs to the Kalingan school of Indian temple architecture. The alignment of the Sun Temple is along the East-West direction. The inner sanctum or vimana used to be surmounted by a tower or shikara but it was razed in the 19th century. The audience hall or jagamohana still stands and comprises majority of the ruins. The roof of the dance hall or natmandir has fallen off. It stands at the eastern end of the ruins on a raised platform.

कोणार्क

विजयेन्द्र कुमार माथुर[2] ने लेख किया है ... कोणार्क (AS, p.233) उड़ीसा राज्य की प्राचीन राजधानी था। किंवदन्ती के अनुसार चक्रक्षेत्र (जगन्नाथपुरी) के उत्तरपूर्वी कोण में यहाँ अर्क या सूर्य का मन्दिर स्थित होने के कारण इस स्थान को कोणार्क कहा जाता था। पुराणों में कोणार्क को मैत्रेयवन और पद्मक्षेत्र भी कहा गया है.

कथा: एक कथा में वर्णन है कि इस क्षेत्र में सूर्योपासना के फलस्वरूप श्रीकृष्ण के पुत्र सांब का कुष्ठ रोग दूर हो गया था और यहीं चंद्रभागा में बहते हुए कमल पत्र पर उसे सूर्य की प्रतिमा मिली थी। आइना-ए-अकबरी में अबुल फ़ज़ल लिखता है कि यह मन्दिर अकबर के समय से लगभग सात सौ तीस वर्ष पुराना था, किन्तु मंडलापंजी नामक उड़ीसा के प्राचीन इतिहास-ग्रंथों के आधार पर यह कहना अधिक समीचीन होगा कि इस मन्दिर को गंगावंशीय लांगुल नरसिंह देव ने बंगाल के नवाब तुग़ानख़ाँ पर अपनी विजय के स्मारक के रूप में बनवाया था। इसका शासन काल 1238-1264 ई. में माना जाता है। एक ऐतिहासिक अनुश्रुति में मन्दिर के निर्माण की तिथि शक संवत 1204 (=1126 ई.) मानी गई है। जान पड़ता है कि मूलरूप में इससे भी पहले इस स्थान पर प्राचीन सूर्य मन्दिर था। सातवीं शती ई. में चीनी यात्री युवानच्वांग कोणार्क आया था। उसने इस नगर का नाम चेलितालों लिखते हुए उसका घेरा 20ली बताया है। उस समय यह नगर एक राजमार्ग पर स्थित था और समुद्रयात्रा पर जाने वाले पथिकों या व्यापारियों का विश्राम स्थल भी था। मन्दिर का शिखर बहुत ऊँचा था और उसमें अनेक मूर्तियाँ प्रतिष्ठित थीं। जगन्नाथपुरी मन्दिर में सुरक्षित उड़ीसा के प्राचीन इतिहास ग्रंथों से पता चलता है कि सूर्य और चंद्र की मूर्तियों को भयवंशीय नरेश नृसिंहदेव के समय (1628-1652) में पुरी ले जाया गया था।


कोणार्क पूर्वी-मध्य उड़ीसा राज्य, पूर्वी भारत, बंगाल की खाड़ी के तट पर भुवनेश्वर से सड़क मार्ग द्वारा 65 किलोमीटर और पुरी से समुद्री मार्ग द्वारा 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। कोणार्क उड़ीसा प्रांत में पुरी के निकट, चिल्का झील से प्राची नदी तक फैली हुई रेतीली पट्टी के उत्तरी छोर पर समुद्र तट पर स्थित है।

कोणार्क का नाम दो शब्दों को जोड़ कर बना है- कोण जिसका अर्थ है कोना और अर्क जिसका अर्थ है सूर्य। यह हिन्दू मन्दिर के लिए प्रसिद्ध है, जो भारतीय स्थापत्य का सर्वश्रेष्ठ नमूना है। मंदिर में स्थापित कोणार्क की मूर्ति के नाम पर ही इस शहर का नाम कोणार्क पड़ा है।

सूर्य (अर्क) के मन्दिर बन जाने से यह नाम कोनार्क या कोणार्क हो गया। सूर्य मंदिर मुख्य लेख : सूर्य मंदिर कोणार्क

कोणार्क अपने 13वीं शताब्दी के सूर्य मंदिर, सूर्य देउला के लिए प्रसिद्ध है। पहले ‘काले पैगोड़ा’ कहलाने वाले इस मंदिर का उपयोग कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) की ओर यात्रा कर रहे नाविकों द्वारा जहाज़रानी सीमाचिह्न के रूप में किया जाता था। यह कहना ग़लत है कि यह कभी पूरा नहीं बना था। इतिहासकार के. एस. बेहोरा, जिन्होंने कोणार्क पर शोध किया था, के अनुसार सूर्य मंदिर नरसिंह प्रथम (1238-41) ने 13वीं शताब्दी में पूर्ण करवाया और देवता की प्राण-प्रतिष्ठा की। यहाँ 16वीं शताब्दी तक पूजा भी की गई, संभवतः उस समय आयी किसी गंभीर प्राकृतिक आपदा के कारण बाद में पूजा रोक दी गई।

वास्तुकला

वास्तुकला की उड़ीसा शैली के उत्कृष्टतम नमूने इस मंदिर के भग्नावशेषों का बाद में जीर्णोद्धार किया गया। यह मंदिर सूर्य देवता को समर्पित है। इसकी अभिकल्पना उनके रथ को प्रतिबिंबित करने के लिए की गई थी। जिसमें आधार पर उत्कीर्णित पत्थर के 12 विशाल पहिए और सात पत्थर के घोड़े हैं। सूर्य देउला की ऊँचाई लगभग 30 मीटर है और पूर्ण होने पर यह 60 मीटर से अधिक ऊँचा हो जाता है। बाहरी भाग सुसज्जित मूर्तियों से युक्त हैं। जिनमें से अनेक में प्रणय दृश्यों का चित्रण है। बस्ती और मंदिर भगवान कृष्ण के पुत्र सांब की किंवदंती से जुड़े हैं। जो सूर्य देव के आशीर्वाद से कोढ़मुक्त हुए थे। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के सूर्य मंदिर संग्रहालय में मंदिर के भग्नावशेषों के मूर्तिशिल्पों का अच्छा संग्रह है।

External links

References

  1. Patnaik, Durga Prasad (1989). Palm Leaf Etchings of Odisha. Abhinav Publications. p. 4
  2. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.233