Ranabai ke Pad
राग - मिश्र खमाज
रसना बाण पड़ी रटबा की ।
बिसरत नहीं घड़ी पल छिन-छिन, स्वांस स्वांस गाबा की ।।1।।
मनड़ो मरम धरम ओही जाण्यो, गुरु किरपा बल पा की ।।2।।
लख चौरासी जूण भटकती, मोह माया सूं थाकी ।।3।।
समरथ खोजी 'राना' पाया, जद यूँ काया झांकी ।।4।।
राग - पहाडी
म्हारो म्हारो करतांई जावै ।
मिनख जमारो ओ हे अमोलक, कोडी मोल फिंकावै ।।1।।
गरभ वास में कौल कियो तूं, जिणनै क्यों बिसरावै ।।2।।
पालनहार, करतार,विसंभर, तिरलोकी जस छावै ।।3।।
जिणने थां छिटकाय दियो जद, कुण थांने अपनावै ।।4।।
वाल्मकि सुक व्यास पुराणां, बेद भेद समझावै ।।5।।
कैं म्हारो तू थारो करतां, मिनख जमारो गमावै ।।6।।
'राना' सतगुरु खोजी सरणै, आवागमन मिटावै ।।7।।
सन्दर्भ
- डॉ पेमाराम एवं डॉ विक्रमादित्य, जाटों की गौरवगाथा , राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर, 2004
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