Ranabai ke Pad
बधावणा
(1)राग - भूपाली
वारी वारी वारी वारी वारी वारी म्हारा परम गुरूजी ।
आज म्हारो जनम सफल भयो , मैं गुरुदेवजी न देख्या । टेक ।
भाग हमारा हे सखी, गुरुदेवजी पधारया ।
काम, क्रोध, मद, लोभ, ने ये, म्हारा दूर निवारया ।।1।।
सोव्हन कलश सामेलसा ये, मोतीड़ा बधास्यां ।
पग मंद पधरावस्यां ये, मिल मंगल गास्यां ।।2।।
बंदन वार घलावस्यां ये, मोत्यां चौक पुरावस्यां ।
पर दिखानां परनाम स्यूं ये, चरनां शीश निवास्यां ।।3।।
ढोल्यो रतन जड़ावरो ये, रेशम गिदरो बिछावस्यां ।
सतगुरु ऊंचा बिराजसी ये, दूधा चरण पखास्यां ।।4।।
भोजन बहुत परकार का ये, कंचन थाल परोसां ।
सतगुरु जीमे आंगणे ये, पंखा बाय ढुलास्यां ।।5।।
चरण खोल चिरणामृत ये, सतगुरुजी का लेस्यां ।
तन मन री हेली बातड़ली ये, म्हारा गुरूजी ने कह्स्यां ।।6।।
आज सुफल म्हारा नेणज ये, गुरुदेवजी ने निरखूं ।
कान सुफल सुन बेणज ये, दूरी नहीं सरकूं ।।7।।
आज म्हारे आनंद बधावणा ये, बायां मन भाया ।
'राना' रे घरां बधावणा ये, गुरु खोजीजी आया ।।8।।
राग - मिश्र खमाज
रसना बाण पड़ी रटबा की ।
बिसरत नहीं घड़ी पल छिन-छिन, स्वांस स्वांस गाबा की ।।1।।
मनड़ो मरम धरम ओही जाण्यो, गुरु किरपा बल पा की ।।2।।
लख चौरासी जूण भटकती, मोह माया सूं थाकी ।।3।।
समरथ खोजी 'राना' पाया, जद यूँ काया झांकी ।।4।।
राग - पहाडी
म्हारो म्हारो करतांई जावै ।
मिनख जमारो ओ हे अमोलक, कोडी मोल फिंकावै ।।1।।
गरभ वास में कौल कियो तूं, जिणनै क्यों बिसरावै ।।2।।
पालनहार, करतार,विसंभर, तिरलोकी जस छावै ।।3।।
जिणने थां छिटकाय दियो जद, कुण थांने अपनावै ।।4।।
वाल्मकि सुक व्यास पुराणां, बेद भेद समझावै ।।5।।
कैं म्हारो तू थारो करतां, मिनख जमारो गमावै ।।6।।
'राना' सतगुरु खोजी सरणै, आवागमन मिटावै ।।7।।
सन्दर्भ
- डॉ पेमाराम एवं डॉ विक्रमादित्य, जाटों की गौरवगाथा , राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर, 2004
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