Bhojpur Raisen

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Location of Bhojpur in Raisen District

Bhojpur (भोजपुर) is place of historical and religious importance in Goharganj tahsil of Raisen district in Madhya Pradesh.

Origin

Bhojpur takes its name from king Raja Bhoja (reg. c. 1000–1055 CE)

Variants

Location

Bhojpur is situated on the Betwā River, 28 km from Bhopal, the state capital of Madhya Pradesh. The site is located on sandstone ridges typical of central India, next to a deep gorge through which the Betwā River flows. Two large dams, constructed of massive hammer-dressed stones, were built in the eleventh century to divert and block the Betwā, so creating a large lake. The approximate size of the lake is shown in the site plan given here. Actually this temple is present on the centre of ancient OM Valley, recently it has been proved by satellite image.

Jat Gotras

History

Bhojpur takes its name from king Raja Bhoja (reg. c. 1000–1055 CE), the most celebrated ruler of the Paramāra dynasty.[1] There is no archaeological evidence from Bhojpur before the eleventh century, a fact confirmed by local legends which recount how Raja Bhoja made a vow to build a series of dams "to arrest the streams of nine rivers and ninety-nine rivulets". A location was found in the kingdom that allowed the king to fulfil this vow and the dams were duly built at Bhojpur.[2]

Although the dams were constructed of cyclopean masonry, one of them was opened on the orders of Hoshang Shah of Malwa in the fifteenth century. According to Persian chronicles, he ordered the dam to be broken at the request of local merchants in Bhopal and Vidisha whose caravans were being raided by bandits taking refuge at an inaccessible spot protected by the lake.[3]

भोजपुर मध्य प्रदेश

विजयेन्द्र कुमार माथुर[4] ने लेख किया है ...भोजपुर (AS, p.680): मध्य प्रदेश के जिला रायसेन में भोपाल से 15 मील दक्षिण की ओर इस मध्यकालीन नगर के खण्डहर हैं। अब यह छोटा सा ग्राम है। नगर वेत्रवती या बेतवा नदी के तट पर स्थित था। जान पड़ता है कि इस नगर का नाम मालवा के प्रसिद्ध राजा भोज के नाम पर पड़ा होगा। भोजपुर का क्षेत्र पठार है और यह निर्जन और शुष्क दिखाई देता है।

भोजपुर का मुख्य ऐतिहासिक स्मारक यहाँ का भव्य शिव मन्दिर है। जिसका ऊपरी भाग दूर-दूर तक दिखाई देता है। इसका निर्माण राजा भोज के ही समय में ही हुआ था और इस प्रकार यह आज से प्रायः एक सहस्र वर्ष प्राचीन है। मन्दिर अपनी मूलावस्था में बहुत ही भव्य तथा विशाल [p.681]: रहा होगा—यह अनुमान उसकी वर्तमान दशा से भली-भाँति किया जा सकता है। इसकी वर्तमान ऊँचाई 50 फुट है, किन्तु ऊँचाई के अनुपात में उसकी चौड़ाई अधिक है, जिससे जान पड़ता है कि प्राचीन समय में इसकी ऊँचाई अब से बहुत अधिक रही होगी। मन्दिर की रचना विशाल प्रस्तर खण्डों से की गई, जिसमें से कई आज भी आसपास खड़े हैं। ये पत्थर मसाले से जुड़े थे, जो अब पत्थरों के बीच-बीच में से निकल गया है। मन्दिर का प्रवेशद्वार भूमि से प्रायः 7फुट ऊँचा है। सीढ़ियाँ पत्थर की बनी हैं। द्वार के दोनों ओर देवी-देवताओं की मूर्तियाँ हैं, जो सम्भवतः उत्तर गुप्तकालीन हैं।

एक छोटा मन्दिर सीढ़ियों से ऊपर है, जो मुख्य मन्दिर की दीवार में ही कटा हुआ है। इसमें एक विष्णु मूर्ति प्रतिष्ठापित है। यह विष्णु मन्दिर दो स्तम्भों पर आधारित है। स्तम्भों की वास्तुकला उच्चकोटि की है। विष्णु की प्रतिमा के भिन्न अंगों का अनुपात, भावभंगिमा और खड़े होने की मुद्रा—ये सभी शिल्पशास्त्र की दृष्टि से सुन्दर एवं सुतथ्य हैं। मूर्ति पर जिन आभूषणों का अंकन है वे सभी गुप्तकाल में प्रचलित थे। प्रवेशद्वार से नीचे उतरने के लिए अनेक सीढ़ियाँ हैं, जो भूमितल तक बनी हुई हैं। मन्दिर अन्दर से चतुष्कोण है, यद्यपि बाहर से ऐसा नहीं जान पड़ता। इसका फ़र्श पत्थर का बना है। इसके केन्द्र स्थान में उस आधार स्तम्भ की रचना की गई है, जिस पर शिवलिंग स्थापित है। इस आधार स्तम्भ में तीन चक्र पहनाए गए हैं। नीचे से तीसरे के बीच में शिवलिंग स्थापित है। यह आधार स्तम्भ भूमि से लगभग दस फुट ऊँचा है। काले पत्थर के बने हुए शिवलिंग की ऊँचाई आठ फुट है और परिधि भी काफ़ी चौड़ी है। कहा जाता है कि इतना विशाल शिवलिंग भारत में अन्यत्र नहीं है। शिवलिंग और उसकी आधार शिलाएँ इस प्रकार जुड़ी हैं कि वे एक ही पत्थर में से कटी प्रतीत होती हैं।

मन्दिर के बाह्य भाग का शिल्प भी सराहनीय है। इसकी चौकोर छत पर, जो अब नष्ट हो गई है, अदभुत कारीगरी है। कुछ विद्वानों का विचार है कि देवगढ़ के गुप्तकालीन मन्दिर की तुलना में भोजपुर का मन्दिर श्रेष्ठ जान पड़ता है। यद्यपि इसकी ख्याति देवगढ़ के मन्दिर की भाँति न हो सकी। छत की नक़्क़ाशी के लिए भोजपुर के शिल्पियों ने उसे कई वृत्तों में विभाजित किया है और इसमें से प्रत्येक के अन्दर कलात्मक अलंकरणों के जाल पिरोए हुए हैं। यह छत चार विशाल प्रस्तर स्तम्भों पर टिकी है। जिनकी मोटाई और ऊँचाई पर्याप्त अधिक है। इनकी तुलना साँची तथा तिगाँव के स्तम्भों से की जा सकती है। इनका निम्न भाग अपेक्षाकृत साधारण है, किन्तु जैसे-जैसे दृष्टि ऊपर जाती है इनकी कला का सौंदर्य बढ़ता जाता है और सर्वोच्च भाग [p.682]:पर पहुँचते-पहुँचते कला की पराकाष्ठा दिखाई पड़ती है। मन्दिर की बाह्य भित्तियाँ सादी हैं। इसमें प्रदक्षिणापथ भी नहीं है।

इस शिव मन्दिर से थोड़ी ही दूर पर एक छोटा सा जैन मन्दिर है जो प्राचीन होते हुए भी ऐसा नहीं दीखता, क्योंकि परवर्ती काल में इसका कई बार पुनर्निर्माण हुआ था। यह मन्दिर चौकोर है और इसकी छत भी गुप्तकालीन मन्दिरों की छतों की भाँति सपाट हैं। मन्दिर किसी जैन तीर्थकर का है। इसकी मूर्ति विवस्त्र है और प्रायः बीस फुट ऊँची है। मूर्ति के दोनों ओर ।यक्ष-यक्षिणियों की प्रतिमाएँ हैं।

भोजेश्वर मंदिर

भोजेश्वर मंदिर अथवा भोजपुर शिव मंदिर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 32 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। रायसेन ज़िले की गोहरगंज तहसील के औबेदुल्लागंज विकास खण्ड में स्थित प्राचीन काल के इस मंदिर को यदि उत्तर भारत का सोमनाथ भी कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। भोजपुर गाँव में पहाड़ी पर यह विशाल शिव मंदिर स्थापित है। भोजपुर मंदिर तथा उसके शिवलिंग की स्थापना धार के प्रसिद्ध परमार राजा भोज द्वारा की गई थी। अत: राजा भोज के नाम पर ही इस स्थान को भोजपुर और मंदिर को 'भोजपुर मंदिर' या 'भोजेश्वर मंदिर' कहा गया। बेतवा नदी के किनारे बना उच्च कोटि की वास्तुकला का यह नमूना राजा भोज के मुख्य वास्तुविद और अन्य विद्वान् वास्तुविदों के सहयोग से तैयार हुआ। मन्दिर की विशालता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसका चबूतरा 35 मीटर लम्बा है।[5]

प्रसिद्धि: भोजपुर के शिव मंदिर की प्रसिद्धि यहाँ स्थापित शिवलिंग की वजह से और भी अधिक है। पुरातत्व विभाग द्वारा इस मंदिर को विश्व धरोहर में शामिल कराने के प्रयास जारी हैं। कला और संस्कृति के दृष्टि से यहाँ की धरती प्राचीन काल से ही महत्त्वपूर्ण रही है। स्थापत्य कला में भी भोजपुर नामक स्थान पर भोजेश्‍वर के नाम से विख्यात शिव मंदिर काफ़ी महत्त्वपूर्ण रहा है, जिस कारण इसे "पूर्व का सोमनाथ" कहा गया।

इतिहास: मध्य काल के आरंभ में महान् राजा भोज ने 1010-1053 ई. में भोजपुर की स्थापना की तथा यहाँ पर भगवान शिव का एक भव्य मंदिर भी बनवाया। इस नगर को प्रसिद्धि देने में भोजपुर के 'भोजेश्वर शिव मंदिर' का भी प्रमुख योगदान रहा है। यह मंदिर निर्माण कला का अदभुत उदाहरण है। मंदिर वर्गाकार है, जिसका बाह्य विस्तार बहुत बडा़ है। मंदिर चार स्तंभों के सहारे पर खड़ा है। देखने पर इसका आकार हाथी की सूंड के समान लगता है। यह मंदिर तीन भागों में विभाजित है। इसका निचला हिस्सा अष्टभुजाकार है, जिसमें फलक बने हुए हैं। शिव मंदिर के प्रवेश द्वार के दोनों पार्श्वों में दो सुंदर प्रतिमाएँ स्थापित हैं, जो सभी को आकृष्ट करती हैं।

मंदिर का शिवलिंग: भोजेश्वर शिव मंदिर में स्थापित शिवलिंग की ऊँचाई प्रभावित करने वाली है। अधिक ऊँचाई वाला यह शिवलिंग स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। शिवलिंग को वर्गाकार एवं विस्तृत फलक वाले चबूतरे पर पाषाण खंडों पर स्थापित किया गया है। मंदिर का शिखर अपूर्ण है, जो कभी भी पूरा नहीं बन पाया। इसको पूरा करने के लिए प्रयास अवशेष रूप में आज भी मौजूद हैं। भोजेश्‍वर मंदिर के पास ही जैन मंदिर भी हैं, जिसमें तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ देखी जा सकती हैं। इतिहासकारों के अनुसार इसके निर्माण की अवधि भी भोजेश्‍वर मंदिर के समय की बताई जाती है। स्थापत्य

मंदिर का निर्माण रूप एवं शैली बहुत ही सुंदर एवं आकर्षक है। विस्तृत चबूतरे पर बना यह मंदिर कई भागों में विभाजित है। मंदिर को देखने पर भारतीय मंदिर की वास्तुकला के बारे में बहुत बातें ज्ञात होती हैं। जैसे इस हिन्दू मंदिर के गर्भगृह के ऊपर बना अधुरा गुम्बदाकार छत भारत में ही गुम्बद निर्माण के प्रचलन को दर्शाता है। कुछ इतिहासकार इसे भारत में सबसे पहले गुम्बदीय छत वाली इमारत भी कहते हैं। कुछ किवदंतियों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण पांडवों द्वारा माता कुंती की पूजा के लिए किया गया था तथा इस शिवलिंग को एक रात्रि में निर्मित किया गया था। इस विश्व प्रसिद्घ शिवलिंग की ऊँचाई इक्कीस फिट से भी अधिक है। एक ही पत्थर से निर्मित इतनी बड़ी शिवलिंग अन्य कहीं देखने को नहीं मिलती।

'भोजपुर शिव मंदिर' या 'भोजेश्वर मंदिर' मध्य प्रदेश के शिव मंदिरों में से मुख्य मंदिर है। इस मंदिर का विशाल एवं भव्य रूप देखकर हर कोई इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता। भोजेश्वर मंदिर के पश्चिम में कभी एक बहुत बड़ी झील हुआ करती थी। उस झील उस पर एक बाँध भी बना हुआ था, लेकिन अब सिर्फ उसके अवशेष ही यत्र-तत्र बिखरे पड़े हैं। बाँध का निर्माण बहुत ही बुद्धिमतापूर्वक किया गया था। दो तरफ़ से पहाड़ियों से घिरी झील को अन्य दो ओर से बालुकाइम के विशाल पाषाण खंडों की मदद से भर दिया गया था। ये पाषाण खंड चार फीट लंबे और 2.5 फीट मोटे थे। छोटा बाँध लगभग 44 फीट ऊँचा था और उसका आधार तल तगभग 300 फीट चौड़ा तथा बड़ा बाँध 24 फीट ऊँचा और ऊपरी सतह पर 100 फीट चौड़ा था। उल्लेखनीय है कि यह बाँध तकरीबन 250 मील के जल प्रसार को रोके हुए था। इस झील को होशंगशाह ने (1405-1434 ई.) में नष्ट करवा दिया।

किंवदंती: गौंड किंवदंती के अनुसार होशंगशाह की फौज को इस बाँध को काटने में तीन महीना का समय लग गया था। कहा जाता है कि इस अपार जलराशि के समाप्त हो जाने के कारण मालवा के जलवायु में परिवर्तन आ गया था। एक अन्य किंवदंती के अनुसार यह भी कहा जाता है कि इस झील के समाप्त हो जाने के कारण मालवा की जलवायु में भी परिवर्तन हो गया था। इस प्रसिद्घ स्थल पर वर्ष में दो बार वार्षिक मेले का आयोजन किया जाता है, जो 'मकर संक्रांति' व 'महाशिवरात्रि पर्व' के समय होता है। इस धार्मिक उत्सव में भाग लेने के लिए दूर दूर से लोग यहाँ पहुँचते हैं।

लिंगराज से समानता: एक समय था, जब भोजपुर से भोपाल तक फैली झील के अन्तिम छोर पर भोजेश्वर मन्दिर खडा दिखाई देता था। मन्दिर निर्माण के लिये जिस पत्थर का प्रयोग किया गया था, उसे भोजपुर के ही पथरीले क्षेत्रों से प्राप्त किया गया था। मन्दिर के समीप और दूर तक पत्थरों और चट्टानों की कटाई के अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं। 'अर्ली स्टोन टेम्पल्स ऑफ़ ओडिसा' की लेखिका विद्या देहेजिया के अनुसार भोजपुर के शिव मन्दिर और भुवनेश्वर के 'लिंगराज मन्दिर' व कुछ और मन्दिरों के निर्माण में समानता दिखाई देती है। मन्दिर से कुछ दूर बेतवा नदी के किनारे पर माता पार्वती की गुफ़ा है। क्योंकि गुफ़ा नदी के दूसरी ओर है, इसलिये नदी पार जाने के लिये नौकाएँ उपलब्ध हैं। यद्यपि भोजपुर का प्रसिद्ध शिव मन्दिर वीरान पथरीले इलाके में खडा है, परन्तु आज भी यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ में कोई कमी नहीं आई है। प्रतिवर्ष 'महाशिवरात्रि' पर यहाँ लगने वाला मेला देखने लायक़ होता है।

जाट इतिहास

राजा भोज - पंवार गोत्री जाट, जिनका इतिहास आज भी गांव के लोगों की जनश्रुतियों में है। [6]

महाविद्वान् महाराजा भोज परमार (जाट) की माता शशिप्रभा नागवंश की कन्या थी।[7]

दिलीपसिंह अहलावत लिखते हैं - ....इन ब्रह्मक्षत्रों ने बौद्ध भावनाओं का परित्याग करके आबू के उस विशाल यज्ञ में क्षत्रियत्व की नवीन दीक्षा ग्रहण की। इस वंश का राजा भोज सर्वाधिक दानी विद्वान् प्रतापी नरेश हुआ। इसने धारा नगरी को राजधानी बनाकर संवत् 1059 (सन् 1002 ई०) से संवत् 1099 (सन् 1042 ई०) तक 40 वर्ष तक शासन किया। यह जाट सम्राट् था। इस वंश के कुछ लोग राजपूत संघ में मिल कर राजपूत कहलाये और कुछ राजपूतों ने इस्लाम धर्म अपना लिया। भोज तथा जगदेव पंवार की परम्परा में हिन्दू जाटों के आज भी बहुत गांव हैं।[8]

परमार भोज परमार वंश के नवें राजा थे। परमार वंशीय राजाओं ने मालवा की राजधानी धारानगरी (धार) से आठवीं शताब्दी से लेकर चौदहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक राज्य किया था। भोज ने बहुत से युद्ध किए और अपनी प्रतिष्ठा स्थापित की जिससे सिद्ध होता है कि उनमें असाधारण योग्यता थी। यद्यपि उनके जीवन का अधिकांश युद्धक्षेत्र में बीता तथापि उनने अपने राज्य की उन्नति में किसी प्रकार की बाधा न उत्पन्न होने दी। उसने मालवा के नगरों व ग्रामों में बहुत से मंदिर बनवाए, यद्यपि उनमें से अब बहुत कम का पता चलता है।

कहा जाता है कि वर्तमान मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल को राजा भोज ने ही बसाया था , तब उसका नाम भोजपाल नगर था , जो कि कालांतर में भूपाल और फिर भोपाल हो गया। राजा भोज ने भोजपाल नगर के पास ही एक समुद्र के समान विशाल तालाब का निर्माण कराया था, जो पूर्व और दक्षिण में भोजपुर के विशाल शिव मंदिर तक जाता था। आज भी भोजपुर जाते समय , रास्ते में शिवमंदिर के पास उस तालाब की पत्थरों की बनी विशाल पाल दिखती है। उस समय उस तालाब का पानी बहुत पवित्र और बीमारियों को ठीक करने वाला माना जाता था। कहा जाता है कि राजा भोज को चर्म रोग हो गया था तब किसी ऋषि या वैद्य ने उसे इस तालाब के पानी में स्नान करने और उसे पीने की सलाह दी थी जिससे उसका चर्मरोग ठीक हो गया था। उस विशाल तालाब के पानी से शिवमंदिर में स्थापित विशाल शिवलिंग का अभिषेक भी किया जाता था।

Bhojeśvar temple

Bhojpur is famous for the incomplete Bhojeśvar temple dedicated to Shiva. The temple houses one of the largest liṅga-s in India, 5.5 m (18 ft) tall and 2.3 m (7.5 ft) in circumference. It is crafted out a single rock. The building is under the protection of the Archaeological Survey of India.

The Bhojpur temple is believed to have been constructed by the 11th-century Paramara king Raja Bhoja. Tradition also attributes to him the establishment of Bhojpur and the construction of now-breached dams in the area.[9] Because the temple was never completed, it lacks a dedicatory inscription. However, the name of the area ("Bhojpur") corroborates its association with Bhoja.[10]

The attribution of the temple to Bhoja is based on the testimony of Merutuṅga, who reports in the Prabandhacintāmaṇi that Bhoja bestowed on the poet Māgha "all the merit of the new Bhojasvāmin temple that he was about to build himself", and then "set out for the country of Mālava".[11] The style of the sculpture on the building confirms an early to mid-eleventh-century date for the structure.

The Udaipur Prashasti inscription of the later Paramara rulers states that Bhoja "covered the earth with temples" dedicated to the various aspects of Shiva, including Kedareshvara, Rameshwara, Somanatha, Kala, and Rudra. Tradition also attributes the construction of a Saraswati temple to him (see Bhoj Shala). The Jain writer Merutunga, in his Prabandha-Chintamani, states that Bhoja constructed 104 temples in his capital city of Dhara alone. However, the Bhojpur temple is the only surviving shrine that can be attributed to Bhoja with some certainty.[12]

According to a legend in Merutunga's Prabandha-Chintamani, when Bhoja visited Srimala, he told the poet Magha about the "Bhojasvāmin" temple that he was about to build, and then left for Malwa (the region in which Bhojpur is located).[13] However, Magha (c. 7th century) was not a contemporary of Bhoja, and therefore, the legend is anachronistic.[14]

The building as it stands consists of the inner cella or garbhagṛha, supported by massive pillars, surmounted with an elegant corbelled dome. The outer walls and superstructure of the temple were never built.


The temple at Bhojpur is unique in being left unfinished, with a series of large architectural parts still located in the quarries where the stones were cut and fashioned. In addition, there are a significant number of architectural drawings engraved on the flat surfaces of the quarry showing mouldings, pillars, and temple plans.[8] Also of note is the large earthen ramp behind the temple which shows how medieval craftsmen raised the large blocks of stone into position. Cave of Pārvatī

Immediately opposite the temple, on the west side of the gorge facing the Betwā, is a rock-shelter or cave, now occupied by religious mendicants. Popularly known as Pārvatī's Cave, the cave contains a number of sculptures and architectural fragments dating to the eleventh century.


On the low plateau above the Cave of Pārvatī and opposite the Bhojpur temple are the remains of Bhoja's palace. Only the foundations survive. The complex is laid out as a grid in a square, with a courtyard in the centre (see site plan above). It is oriented on an exact north-south axis as prescribed in the Samarāṅganasūtradhāra, an architectural treatise ascribed to Bhoja.[15] Among the many features of interest are unfinished carved blocks and graffiti engraved on the rock floor. The latter includes diagrams for games and a series of names dating to the eleventh century and later. The palace is a unique survival, being the only medieval building of its kind in northern India. Its association with Bhoja and its close conformity to a text ascribed to the king mark it out as a site of national and international cultural importance. The site of the palace, like the neighbouring dams, is unprotected. The remains of the palace are being slowly destroyed as local people collect stones for modern building purposes.

Jain temples

Bhojpur also has an unfinished Jain temple containing a 6-meter-tall statue of Bhagwan Shantinath and two statues of Bhagwan Parshvanath (left) and Bhagwan Suparshvanatha (right). On the base of the central images of Lord Shatinath there is an inscription mentioning king Bhoja, the only epigraphic evidence connecting Bhoja to the site.[4] The Suparshanath image on left has an inscription date samvat 1157 which mentions Naravarman, the nephew of king Bhoja, and mentions that the two smaller idols were installed by the grandson of Nemichandra of Vemaka community, who had installed the main image in the middle[5]The same temple complex hosts shrine for Ācārya Manatunga who wrote Bhaktamara Stotra.

This huge temple was established in year 1100 AD. The miraculous idol of principal deity Bhagwan Shantinath in standing posture (22½ feet in height) is installed in the huge sanctum of this temple. On the both sides of this idol, 2 standing beautiful idols of Bhagwan Parshvanath & Suparshvanath (7th Teerthankar) 8 feet in height each are installed. Near the feet of Bhagwan Shantinath, artistic whisk bearers are carved on both sides.

Notable persons

External links

Gallery

References

  1. Arvind K. Singh, "Interpreting the History of the Paramāras," Journal of the Royal Asiatic Society 3, 22, 1 (2012), pp. 13–28.
  2. John Malcolm, Report on the Province of Malwa, and adjoining Districts (Calcutta, 1822), p. 19.
  3. U. P. Day, Medieval Malwa: a Political and Cultural History, 1401–1562. (Delhi, 1965): appendix.
  4. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.680
  5. भारतकोश-भोजेश्वर मंदिर
  6. Hawa Singh Sangwan: Asli Lutere Koun/Part-I,p.61
  7. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter III,p.242
  8. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter VI (Page 525)
  9. Mankodi, Kirit (1987). "Scholar-Emperor and a Funerary Temple: Eleventh Century Bhojpur". Marg. National Centre for the Performing Arts. 39 (2): p.72.
  10. Willis, Michael (2001). "Inscriptions from Udayagiri: locating domains of devotion, patronage and power in the eleventh century". South Asian Studies. 17 (1): 41–53.
  11. Cited in M. Willis, "Dhār, Bhoja and Sarasvatī: from Indology to Political Mythology and Back," Journal of the Royal Asiatic Society 22, 1 (2012), p. 130. Online version: http://journals.cambridge.org/action
  12. Mankodi, Kirit (1987). "Scholar-Emperor and a Funerary Temple: Eleventh Century Bhojpur". Marg. National Centre for the Performing Arts. 39 (2): p.61.
  13. Merutunga Ācārya (1901). The Prabandhacintāmani or Wishing-Stone of Narratives. Translated by Charles Henry Tawney. Asiatic Society. p. 49.
  14. Hermann Jacobi (1889). "On Bhâravi and Mâgha". Wiener Zeitschrift für die Kunde des Morgenlandes. Department of Oriental Studies, University of Vienna. 3: 141.
  15. Mattia Salvini, "The Samarāṅganasūtradhāra: Themes and Context for the Science of Vāstu," Journal of the Royal Asiatic Society 22, 1 (2012), pp. 35–55. Online version: http://journals.cambridge.org/action/displayJournal?jid=JRA

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