Muhammad Tughlak

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Muhammd Salman Khan Tughluq (also Prince Fakhr Malik, Jauna Khan; died 20 March 1351) was the Turkic Sultan of Delhi through 1324 to 1351.[1] He was the eldest son of Ghiyas-ud-din Tughlaq. He was born in Kotla Tolay Khan in Multan. His wife was the daughter of the raja of Dipalpur.[2] Ghiyas-ud-din Tughlaq sent the young Muhammad to the Deccan to campaign against king Prataparudra of the Kakatiya dynasty whose capital was at Warangal. Muhammad succeeded to the Delhi throne upon his father's death in 1325. From his accession to the throne in 1325 until his death in 1351, Muḥammad contended with 22 rebellions, pursuing his policies consistently and ruthlessly.


As his reign began, Muḥammad attempted, without much success, to enlist the services of the ʿulamāʾ, the Muslim divines, and the Ṣūfīs, the ascetic mystics. Failing to win the ʿulamāʾ over, he tried to curtail their powers, as some of his predecessors had, by placing them on an equal footing with other citizens. The Sultan wanted to use the Ṣūfīs’ prestigious position to stabilize his authority as ruler. Yet they had always refused any association with government and would not accept any grants or offices except under duress. Muḥammad tried every measure, conciliatory or coercive, to yoke them to his political wagon. Although he humiliated them, he could not break their opposition and succeeded only in dispersing them from the towns of northern India.The transfer of the capital in 1327 to Deogir (now Daulatabad) was intended to consolidate the conquests in southern India by large-scale—in some cases forced—migration of the people of Delhi to Deogir. As an administrative measure it failed, but it had far-reaching cultural effects. The spread of the Urdu language in the Deccan may be traced to this extensive influx of Muslims.

Muhammad bin Tughluq was renowned as the wealthiest man in the Muslim world at that time. He patronized various scholars, Sufis, qadis, viziers and other functionaries in order to consolidate his rule. As with Mamluk Egypt, the Tughlaq Dynasty was a rare vestigial example of Muslim rule in Asia after the Mongol invasion. On the strength of his years of study in Mecca, Ibn Battuta was appointed a qadi, or judge, by the sultan. He found it difficult to enforce Islamic laws beyond the sultan's court in Delhi, due to lack of Islamic appeal in India.[3]

Between 1328 and 1329, the Sultan increased the land tax in the Doab—the land between the Ganges (Ganga) and Yamuna rivers—but the taxpayers resisted it, especially because a severe drought coincided.

Muḥammad’s last expedition, against the rebel Ṭaghī, ended with his death at Sonda in Sindh in 1351.

Currency issued by Muhammad Tughlaq

Forced token currency coin of Muhammad bin Tughlak

Historian Ishwari Prasad writes that different coins of different shapes and sizes were produced by his mints which lacked the artistic perfection of design and finish. In 1330, after his failed expedition to Deogiri, he issued token currency; i.e. coins of brass and copper were minted whose value was equal to that of gold and silver coins. Historian Ziauddin Barani felt that this step was taken by Tughluq as he wanted to annex all the inhabited areas of the world for which a treasury was required to pay the army. Barani had also written that the sultan's treasury had been exhausted by his action of giving rewards and gifts in gold. This experiment failed, because, as said by Barani, "the house of every Hindu became a mint". During his time, most of the Hindu citizens were goldsmiths and hence they knew how to make coins. In the rural areas, officials like the muqaddams paid the revenue in brass and copper coins and also used the same coins to purchase arms and horses. As a result, the value of coins decreased and, as said by Satish Chandra, the coins became "as worthless as stones". This also disrupted the trade and commerce. The token currency had inscriptions marking the use of new coins instead of the royal seal and so the citizens could not distinguish between the official and the forged coins. Records show that the use of token currency had stopped in 1333 as Ibn Batuta who came to Delhi in 1334 and wrote a journal, made no mention of this currency.[4]

Death and Collapse of the empire

Muhammad bin Tughluq died in 1351 on his way to Thatta, Sindh in order to intervene a war between members of the Soomro tribe. He had lived to see his empire fall apart. During his reign new kingdoms broke away in south India and the Deccan. Several south Indian rulers like Prolaya Vema Reddy of the Reddy dynasty, Musunuri Kaapaaneedu and the Vijayanagara Empire liberated whole south India from the Delhi Sultanate and the Bahmani kingdom was founded by Hasan Gangu.[5] The unpopularity and failures of this person also led to the collapse of the empire.

मुहम्मद शाह तुगलक और जाट

संवत् 1383 (सन् 1326 ई०) में मुहम्मद शाह तुगलक के शासनकाल में आनन्दपाल राणा की अध्यक्षता में सर्वखाप पंचायत की बैठक हुई जिसमें निम्नलिखित बातों पर विचार किया गया -

  1. मुहम्मद शाह तुग़लक की जनता के प्रति कठोर नीति।
  2. उसने राजस्व और अन्य करों को बढ़ा दिया जिनको जनता अदा नहीं कर सकती, जिस से अनेक कठिनाइयां एवं बेचैनी फैल गई है।

इस बैठक में सर्वसम्मति से निम्नलिखित प्रस्ताव पास किए गए -

  • 1. कृषि एवं जीवन को एक समान महत्त्व दिया जाना चाहिए, क्योंकि भोजन के बिना जीवन नहीं रह सकता।
  • 2. शाही कर अधिकारियों की लूट से किसानों की रक्षा की जाये।
  • 3. बादशाह के विरुद्ध विद्रोह करने वाली सैन्यशक्तियों से पंचायती सेना मिलकर बादशाह के विरुद्ध युद्ध करे।
  • 4. खापों का आपसी मेल-मिलाप स्थापित किया जाये जिससे सर्वखाप पंचायत शक्तिशाली बने और सभी जातियों और वर्गों के लोगों को पंचायत के झण्डे तले एकत्र होकर शाही लूट से किसानों तथा जनता को बचाया जाये।

यह प्रस्ताव बादशाही दरबार में भेज दिया गया।[6]

मुहम्मद बिन तुगलक : विद्वान-मूर्ख सुल्तान

मुहम्मद बिन तुगलक दिल्ली सल्तनत का ऐसा सुल्तान हुआ है जिसने योजनाएँ तो कई बनाईं पर उसकी योजनाएँ असफल रहीं। उसकी योजनाओं से चिढ़कर ही उसे मूर्ख कहा जाता है। वहीं कुछ का मानना है कि उसकी योजनाएँ बहुत अच्छी थीं और इसलिए तुगलक विद्वान् था।

इतिहास में यह अकेला सुल्तान है जिसे एक ही समय पर 'विद्वान-मूर्ख' कहकर बुलाते हैं। कुछ भी हो, सुल्तान था बड़ा दिलचस्प। उसकी कई बातों में कुछ के बारे में जानकर तुम्हें भी हँसी आ जाएगी। इसी सुल्तान के जीवन पर गिरीश कर्नाड नाम के उपन्यासकार ने तुगलक नाटक भी लिखा। तुगलक का चरित्र था ही ऐसा कि उसमें दिलचस्पी पैदा हो जाती है।

शहजादा जूना खाँ ही मुहम्मद तुगलक था। मुहम्मद तुगलक ने दिल्ली पर 1325 से 1351 तक शासन किया। दिल्ली के तख्त पर बैठने वाला वह ऐसा सुल्तान था जो बहुत पढ़ा-लिखा था। वह कई भाषाओं का जानकार था। उसे गणित, दर्शन, साहित्य, चिकित्साशास्त्र का ज्ञान था। उसकी लिखावट भी बहुत सुन्दर थी। सुल्तान में अक्सर ये गुण देखने को नहीं मिलते हैं पर तुगलक इन बातों में उस्ताद था। उसकी कुछ योजनाओं के बारे में आओ जानते हैं।

दोआब में कर-वृद्धि की योजना

मुहम्मद ने दोआब इलाके में कर में वृद्धि इसलिए की क्यों‍कि राजकोष में धन की जरूरत थी। वह जानता था कि दोआब क्षेत्र के किसानों की स्थिति अच्छी है पर जब कर में वृद्धि की, उसी साल इलाके में अकाल पड़ गया और कर-वसूली में सख्‍ती से जनता की हालत खराब हो गई। तब तुगलक को मालूम हुआ तो उसने कर-वृद्धि रोक दी और जनता को राहत भेजी पर तब तक जनता को बहुत कोड़े पड़ चुके थे।

राजधानी बदलने की योजना

मुहम्मद तुगलक की राजधानी परिवर्तन की योजना का जिक्र बहुत होता है। यह कुछ ऐसे थी कि मुहम्मद तुगलक ने दक्षिण के राज्यों पर नियंत्रण रखने के लिए राजधानी को दिल्ली से बदलकर देवगिरी (महाराष्ट्र) नाम की जगह पर ले जाने का फरमान दिया।
अब दिल्ली की जनता को आदेश दिया गया कि वह देवगिरी (दौलताबाद) जाए। लोग रास्ते की तकलीफें उठाकर दौलताबाद के लिए निकले। यात्रा में बहुत से लोग बीमार पड़ गए और मारे गए। यात्रा की कठिनाई देखकर तुगलक ने लोगों को वापस दिल्ली लौटने का आदेश दे दिया। लोग लौटे तो, पर उनमें से कई रास्ते में दम तोड़ गए। इस योजना से जनता में सुल्तान की छवि खराब हुई।

सांकेतिक मुद्रा का चलाने की योजना

मुहम्मद तुगलक ने अपने समय में सोने की 'दीनार' और चाँदी की 'अदली' चलाई थी। फिर सोने-चाँदी की कमी हो गई। तुगलक को मालूम था कि चीन में कागज और फारस में चमड़े का सिक्का चला है तो उसने राज्य में तांबे का सस्ता सिक्का चलाया था। तांबे के सिक्के बनाने के लिए राजकीय टकसाल नहीं थी। तांबे के सिक्के की खबर आई तो लोगों ने घर पर ही सिक्के ढाल दिए और बाजार में इतने सिक्के हो गए कि तांबे का सिक्का बंद करना पड़ा। जनता को तांबे के सिक्के की जगह सोने के सिक्के दिए गए और खजाना खाली हो गया।

सिरफिरा सुल्तान

इतिहासकार इन योजनाओं के कारण ही उसे सिरफिरा कहते हैं। इन योजनाओं के अलावा भी मुहम्मद तुगलक में कई खासियत थी। काम को टालना उसे पसंद नहीं था। वह तुरंत किसी भी काम को पूरा करने में विश्वास रखता था। उसके समय में इब्नबतूता भारत आया था जिसने उसके समय का वर्णन किया है।

तुगलक ने योजनाएँ तो बहुत अच्छी बनाईं। बस, समय तुगलक के साथ नहीं था। उसके सारे आदेश वाली बात मोहम्मद तुगलक से ही निकलकर आई है।[7]

External links


  1. Tughlaq Shahi Kings of Delhi: Chart The Imperial Gazetteer of India, 1909, v. 2, p. 369.
  2. Douie, James M. (1916) The Panjab North-West Frontier Province and Kashmir Cambridge University Press, Cambridge, England, page 171, OCLC 222226951
  3. Jerry Bently, Old World Encounters: Cross-Cultural Contacts and Exchanges in Pre-Modern Times (New York: Oxford University Press, 1993),121.
  5. Verma, D. C. History of Bijapur (New Delhi: Kumar Brothers, 1974) p. 1
  6. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter VII (Page 577)