Surendra Badhasra

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Major Surendra Badhasra

Major Surendra Badsara Sena Medal (शहीद मेजर सुरेन्द्र बढ़ासरा) (13 April 1980- 21 June 2012) from village Kudan district Sikar, Rajasthan, became Martyr of militancy on 21 June 2012.

Martyr of militancy

He was injured on 3 May 2012 in a terrorist encounter in Kupwada sector of Jammu & Kashmir in which he killed six terrorists. He was under treatment at Delhi but could not be saved and breathed his last on 21 June 2012. He is triple decorated army officer. He has been awarded Sena Medal for secret mission in Jammu & Kashmir and 2 times commendation cards. He was brought up in defence background.

His father Keshar Dev Badsara,a brave man served 17 Poona horse armed regiment of Indian army. Presently he is staying in village Kudan. He is very humble and down to earth.

Major Surendra Badsara did his initial schooling from Kendriya Viddyalaya Ahmadnagar, BABINA (UP). He has lot of friends from childhood. After graduating from Dayananad College Hisar, he joined Indian army and took Commission in 46 ARMED REGT. He was very keen to join special forces. After 3 year he voluntarily took posting in NSG (Black Cat Commando). Served 52 special action group as anti hijacking group. He was kind of person who lead his men by own example. After NSG, his passion for working in special forces did not end here. He again volunteered for parachute regiment in Indian Army. He joined 4 PARA and became OC of intelligence squad in Kupwada. He gathered meaningful intelligence about Pakistan and militancy in Kupwada. He went inside enemy territory many times for secret operations. He developed a wide network of intelligence in very short time. He did many successful militant operations in his life. He got gunshot of AK-47 on 03 may 2012 during militant operation in Kupwada. After that, he was sent to hospital. He survived 50 days in hospital, had 8 surgery operations in 50 days. He finally passed away due to multiple organ failure.

आतंककारियों से मुठभेड़

सैनिक कल्याण अधिकारी मेजर जीसुखराम ने बताया कि मेजर सुरेन्द्र बढ़ासरा चार पैरा स्पेशल फोर्स में जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा सैक्टर में तैनात थे। 3 मई 2012 को आतंककारियों से मुठभेड़ के समय मेजर सुरेन्द्र ने छह आतंककारियों को ढेर कर दिया। इसी दौरान एक गोली उनके पेट में लगी।

आंतककारियों से मुठभेड़ में गोली लगने के बाद करीब डेढ़ माह से मौत से जूझ रहे कूदन निवासी 32 वर्षीय मेजर सुरेन्द्र बढ़ासरा ने गुरूवार शाम दिल्ली के अस्पताल में दम तोड़ दिया। शहीद सुरेन्द्र की पार्थिव देह शनिवार को उनके पैतृक गांव लाई गयी , जहां सैनिक सम्मान से उनकी अंत्येष्टि की गयी ।

गंभीर रूप से घायल सुरेन्द्र को श्रीनगर के सेना अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां से उन्हें दिल्ली के आरआर अस्पताल रैफर कर दिया गया। यहां इलाज के दौरान उनकी सात मल्टीपल सर्जरी हुई। सर्जरी के दौरान उसे ब्रेन स्ट्राक होने से उसकी हालत गंभीर हो गई। गुरूवार को सुरेन्द्र की हालत ज्यादा बिगड़ गई और शाम को उनहोंने अंतिम सांस ली। अस्पताल में शुक्रवार शाम को शहीद को सेना के जवानों व अधिकारियों की ओर से गार्ड आफ ऑनर दिया गया।

शहीद मेजर सुरेन्द्र बढ़ासरा शहादत को नमन

रविवार २४ जून २०१२: कूदन गांव के अमर सपूत मेजर सुरेन्द्र बढ़ासरा की पार्थिव देह को तिरंगे में लिपटा देख हर शख्स नतमस्तक हो गया। देश की आन-बान और शान के लिए जान की बाजी लगाने वाले सुरेन्द्र की शहादत व वीरगाथाएं युवाओं में जोश भर रही थीं। हालांकि हर शख्स की आंखें नम थी, लेकिन उसकी शहादत पर लोगों को फख्र था। शहीद की पार्थिव देह जैसे ही घर पहुंची वातावरण गमगीन हो गया। मां, बहिन, भाई और पत्नी के आंसु भले ही थम नहीं रहे थे, लेकिन फौजी पिता का हौसला चट्टान की तरह अडिग था। कूदन की माटी भी लाडले सपूत की शहादत पर आज धन्य हो उठी थी।कूदन में शनिवार का दिन खास था। खामोशी और इंतजार में डूबा ग्रामीण शहीद मेजर सुरेन्द्र (32) के साथ बिताये पलों को यादकर सुबक-सुबक कर रो रहा था। हालांकि गांव के पहले शहीद की शहादत पर उनका सीना चौड़ा था, लेकिन लाडले सपूत को खोने का गम भी था। सुरेन्द्र को सैन्य अधिकारी होने का तनिक भी घमण्ड नहीं था। गांव में जब भी आते सबसे घुल-मिलकर ऎसे मिलते जैसे परिवार का ही सदस्य हो। सुरेन्द्र की मिलनसारिता को लेकर ग्रामीण कायल थे।

मेजर सुरेन्द्र कूदन गांव के पहले शहीद है और गांव के सैकड़ो जवान सेना में कार्यरत हैं। सुरेन्द्र के छोटे भाई नरेन्द्र बढ़ासरा ने बताया कि सुरेन्द्र का मुठभेड़ से पहले फोन आया था और उन्होंने कहा था कि भाई मुझे कई काम करने है जल्द ही में कुछ दिन बाद घर आवूगां। लेकिन उनकी यह तमन्ना पूरी नहीं हुई और शनिवार को उनके बड़े भाई का पार्थिव शव तिरंगे में लिपटा हुआ ही घर पहुंचा। फौजी पिता केशर का जज्बा देखते ही बना। हालांकि लोग उन्हें सीने से लगाकर सांत्वना देते रहे। इस दौरान पिता ने कहा कि मेरे बेटे ने देश के लिए कुर्बानी दी है। इस बात को एक फौजी ही समझ सकता है। मुझे बेटे की शहादत पर गर्व है।

शहीद तेरी शहादत को करने चला में नमन... कूदन गांव में गोधूलि वेला में शहीद मेजर सुरेन्द्र बढ़ासरा को राजकीय व सैन्य सम्मान के साथ जब अंतिम विदाई दी गई तो सूरज भी कुछ पिघलता सा मायूस नजर आया। अस्तांचल को जाता सूरज भी क्षितिज पर आकर कुछ क्षण के लिए ठहर गया। मानो अपने लाडले को सलामी दे रहा हो।

सेना मेडल से हुए थे सम्मानित

मेजर सुरेन्द्र की पत्नी निशा भी सेना में मेजर है तथा पिता केशरसिंह भी सेना में सूबेदार के पद पर रहे हैं। मेजर सुरेन्द्र को 26 जनवरी को सेना मेडल से सम्मानित किया गया था।

2002 में भर्ती हुए थे

सुरेन्द्र की आठवीं तक की शिक्षा कूदन गांव के सरकारी स्कूल में हुई। बाद में पिता सूबेदार केशर सिंह के साथ वे अहमद नगर में चले गए। अहमद नगर के केन्द्रीय विद्यालय में चयन होने के बाद आगे की पढ़ाई वहीं से की। सुरेन्द्र का कमाइंड डिफेंस सर्विस परीक्षा पास करने के बाद वर्ष 2002 में सेना में चयन हुआ था। इसके बाद उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड में भेज दिया गया। एनएसजी में सुरेन्द्र एंटी हाइजेकिंग ऑपरेशन में मास्टर थे। वे यहां ब्लैक केट कमांडो रहे। एनएसजी में रहने के कारण ही स्पेशल फोर्सेस में स्पेशल ऑपरेशन की कमान मेजर सुरेन्द्र को सौंपी गई। सेना में चयन होने के करीब पांच वर्ष बाद सुरेन्द्र ने मेजर निशा से वर्ष 2007 में शादी की।

मुख्यमंत्री ने मेजर बढासरा की शहादत पर शोक जताया

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आतंकवादियों से मुठभेड़ के दौरान शहीद होने पर गहरा शोक जताया. गहलोत ने जम्मू कश्मीर में आंतककारियों से मुकाबला करते शहीद हुए सीकर जिले के कूदन गांव निवासी मेजर सुरेन्द्र बढासरा की शहादत पर गहरा शोक व्यक्त किया है. गहलोत ने अपने संवदेना सन्देश में कहा कि देश के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर करने वाले इस जांबाज की शहादत सदैव अमर रहेगी तथा इससे नयी पीढ़ी को राष्ट्र की रक्षा के लिए समर्पित होकर सेवा करने की प्रेरणा मिलेगी.

उन्होंने शहीद की आत्मा को शांति तथा शोक संतप्त परिजनों को यह आघात सहन करने की शक्ति देने की ईर से कामना की है. गौरतलब है मेजर सुरेन्द्र बढासरा तीन मई की रात कुपवाडा में आंतकवादियों से मुठभेड के दौरान घायल हो गये थे. उनका दिल्ली के सैनिक अस्पताल में उपचार चल रहा था, जहां कल रात अन्तिम सांस ली.[1]

Foot notes

सन्दर्भ


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