Sujata

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Sujata (सुजात) was a branch of Haihaya Kshatriyas. It is mentioned in Mahabharata (II.48.16), (IX.44.61). Sujata is mentioned in the Rig Veda as a title of people.

सुजात से जाट की उत्पत्ति

ठाकुर देशराज[1] लिखते हैं.... कोई-कोई इतिहासकार और विद्वान् यह भी मानता है कि जाट हैहय क्षत्रियों की उन शाखाओं में से हैं जो सुजात और जात नाम से प्रसिद्ध थीं। देशी इतिहासकारों में भाई परमानन्दजी इसी मत के समर्थक हैं। जाटों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में भाई परमानन्दजी के जो विचार हैं, उन्हें हम ज्यों का त्यों उद्धृत करते हैं। वे लिखते हैं कि -

"ऐसा मालूम पड़ता है यादु नस्ल की एक शाख जाट कहलाने लगी। जाट और यादु लफ्ज एक-दूसरे से बहुत मिलते-जुलते हैं। यादुओं के हैहय कबीले की एक शाख का नाम


[पृ.57]: जात या सुजात था। यह भी कहा जाता है कि कश्यप ऋषि ने अग्नि-कुल राजपूतों की तरह जाटों को भी क्षत्रिय बनाया । नस्ल के लिहाज से जाट बिल्कुल राजपूतों से मिलते हैं। राजपूत लोग उन्हें इसलिये अपने से छोटा समझते हैं कि उनमें करेवा का रिवाज पाया जाता है। लेकिन गौर करने पर यह भी नतीजा निकल सकता है कि जाट हिन्दू-समाज की उस हालत से ज्यादा मिलतें हैं जो कि पुराणों के पहले पाई जाती थी। देवर लफ्ज के माने दूसरे पति के हैं। दूसरी कई बातें से भी यह मालूम होता है कि जाटों पर बनिस्वत दूसरे हिन्दुओं के पुराणों की तालीम का बहुत कम असर हुआ है। मसलन जाट अभी तक ‘कुल’ की हालत में पाये जाते हैं। उनमें जाति-पाति की तकसीम नहीं पाई जाती जो बाकी हिन्दू-समाज में इतने जोर से पाई जाती है। भाषा, करेक्टर और विचारों से भी यही जाहिर होता है कि जाट लोग वैदिक जमाने की सुसाइटी के आम हिन्दुओं की निस्बत बेहतर कायम मुकाम हैं।"

जात या सुजात शब्द से जाट शब्द का बनना संबंध समझकर शायद भाईजी ने सुजात लोगों को ही जाट मान लिया है और इसमें भी सच्चाई है कि जात शब्द से आगे चलकर, परिस्थितियों के कारण, जाट शब्द बन गया। किन्तु यह कथन गलत है कि परशुराम वाले सुजात या जात लोग ही अब के जाट हैं। परशुराम और हैहय लोगों का युद्ध रामायण काल से भी पहले का है। यदि सुजात लोग ही जाट कहलाने लग गये होते तो महाभारत के समय अवश्य इनकी हस्ती होती। हैहय


[पृ.58]: क्षत्रिय एकतन्त्र विचार के थे। परशुराम के बाद अवश्य ही वे लोग कहीं अपना राज्य स्थापित करते। लेकिन लाखों वर्षों के अन्तर (कुछ विदेशी इतिहासकारों ने रामायण-काल से लेकर महाभारत के बीच का समय दस हजार वर्ष तक माना है) में सुजात लोगों को पैतृक गौरव प्राप्त करने की चेष्टा (साम्राज्य स्थापन) करते हम कहीं नहीं पाते। इस परशुराम वाली कहानी का हम पीछे के पृष्ठों में काफी खंडन कर चुके हैं। यहां इतना ही लिख देना उचित समझते हैं कि उनके गौत्र जो कि पांडवों, शैव्यों, गान्धारों, मालवों आदि राजवंश से निकलते हुए हैं वे सुजात के वंशज कैसे कहला सकते हैं? यहां तक कि उनमें नाग वंशी तथा सूर्यवंशी (पूणिया, तक्षक) गोत्र भी पाये जाते हैं। इस सिद्धान्त का खण्डन करने के लिए यही एक बात पर्याप्त है। उनके गोत्र व कुल न तो कुछ भी हैहय क्षत्रियों से मिलते हैं और न हैहयों की आदिभूमि दक्षिण में उनका (जाट) कोई नाम निशान ही पाया जाता है।

In Mahabharata

Shalya Parva, Mahabharata/Book IX Chapter 44 mentions the ceremony for investing Kartikeya with the status of generalissimo (सेनागणाध्यक्ष), the diverse gods, various clans who joined it. Sujata are mentioned in verse (IX.44.61)[2]

External links

References

  1. Jat Itihas (Utpatti Aur Gaurav Khand)/Chaturtha Parichhed,p. 56-58
  2. कषेमवापः सुजातश च सिद्धयात्रश च भारत, गॊव्रजः कनकापीडॊ महापारिषदेश्वरः

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