Amarkantak

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Author:Laxman Burdak, IFS (Retd.)

Map-of-Achanakmar-Amarkantak-Biosphere-Reserve, courtesy:Ashwini Kumar Dixit
Amarkantak on old Map of Bilaspur district

Amarkantak (अमरकंटक) is a pilgrim town in Anuppur district of Madhya Pradesh, India. Amarkantak region is a unique natural heritage area and is the meeting point of the Vindhya and the Satpura Ranges, with the Maikal Hills being the fulcrum. This is the place where the Narmada River, the Son River and Johilla River emerge.

Variants

Origin of name

Amarkantak is a combination of two Sanskrit words, amara (immortal) and kantaka (obstruction). The poet Kalidas has mentioned it as Amrakuta (आम्रकूट), which later became Amarkantaka.[1]

Location

Amarkantak is located in the state of Madhya Pradesh in India at 22.67°N 81.75°E. It has an average elevation of 1048 metres. Roads running through Rewa, Shahdol, Anuppur, Jabalpur, Katni and Pendra connect it. The nearest railway stations are Anuppur and Pendra Road 43 km via Keonchi and only 28 km via Jwaleshwar. The nearest airport is Dumna Jabalpur (Jabalpur Airport) in the city of Jabalpur, Madhya Pradesh (240 km) which has daily flight service to Delhi and Mumbai.

History

This region was inhabited by the The Mahabharata Tribe Mekala, which took part in Mahabharata War. Mekala (मेकल) fought on the side of the Kauravas (VIII. 17.2, VI. 83-9; 47.13). Mekala is the hill range in Gondwana from where the Narmada flows, and has been identified with Amarkantaka. [2]

The ancient temples of Kalachuri period are in the south of Narmadakund, just behind it. These were built by Kalachuri Maharaja Karnadeva (1041–1073 AD).[3]

Popular Indian Mystic and Poet Kabir is said to have meditated on Kabir Chabutra, also called the platform of Kabir, situated in the town of Amarkantak.[4]

अमरकूट

विजयेन्द्र कुमार माथुर[5] ने लेख किया है... अमरकूट (म.प्र.) (AS, p.30): रीवा से 97 मील दूर एक पहाड़ी है जो अमरकंटक का ही एक भाग है. यह गहन वनों से आच्छादित है. कई विद्वानों का मत है की मेघदूत 1,16 में वर्णित आम्रकूट यही है.

अमरकंटक

विजयेन्द्र कुमार माथुर[6] ने लेख किया है कि....अमरकंटक (मध्य प्रदेश) (AS, p. 29): रीवा से 160 मील और पेंड्रा रेलवे स्टेशन से 15 मील दूर नर्मदा तथा सोन नदी के उद्गम-स्थान के रूप में प्रख्यात है। अमरकंटक पठार समुद्रतट से 2500 फ़ुट से 3500 फ़ुट तक ऊँचा है। नर्मदा का उदगम एक पर्वतकुण्ड में बताया जाता है। अमरकंटक को आम्रकूट भी कहते हैं। यह तीर्थ, श्राद्ध-स्थान और सिद्ध क्षेत्र के रूप में प्रसिद्ध है। अमरकंटक में नर्मदा के उद्गम स्थान के पर्वत को सोम भी कहा गया है। अमरकंटक ऋक्षपर्वत का एक भाग है, जो पुराणों में वर्णित सप्तकुल पर्वतों में से एक है।

मन्दिर और मूर्तियाँ: अमरकंटक में अनेक मन्दिर और प्राचीन मूर्तियाँ हैं, जिनका सम्बन्ध महाभारत के पाण्डवों से बताया जाता है। किन्तु मूर्तियों में से अधिकांश पुरानी नहीं हैं। वास्तव में प्राचीन मन्दिर थोड़े ही हैं- इनमें से एक त्रिपुरी के कलचुरि नरेश कर्णदेव (1041-1073 ई.) का बनवाया हुआ है। इसे कर्णदहरिया का मन्दिर भी कहते हैं। यह तीन विशाल शिखरयुक्त मन्दिरों के समूह से मिलकर बना है। ये तीनों पहले एक महामण्डप से संयुक्त थे, किन्तु अब यह नष्ट हो गया है। इस मन्दिर के बाद का बना हुआ एक अन्य मन्दिर मच्छींद्र का भी है। इसका शिखर भुवनेश्वर के मन्दिर के शिखर की आकृति का है। यह मन्दिर कई विशेषताओं में कर्णदहरिया के मन्दिर का अनुकरण जान पड़ता है।

नर्मदा का उद्गम: नर्मदा का वास्तविक उद्गम उपर्युक्त कुण्ड से थोड़ी दूर पर है। बाण ने


[p.30]: इसे चंद्रपर्वत कहा है। यहीं से आगे चलकर नर्मदा एक छोटे से नाले के रूप में बहती दिखाई पड़ती है। इस स्थान से प्रायः ढाई मील पर अरंडी संगम तथा एक मील और आगे नर्मदा की कपिलधारा स्थित है। कपिलधारा नर्मदा का प्रथम प्रपात है, जहाँ पर नदी 100 फ़ुट की ऊँचाई से नीचे गहराई में गिरती है। इसके थोड़ा और आगे दुग्धधारा है, जहाँ नर्मदा का शुभ्रजल दूध के श्वेत फेन के समान दिखाई देता है। शोण या सोन नदी का उद्गम नर्मदा के उद्गम से एक मील दूर सोन-मूढ़ा नामक स्थान पर से हुआ है। यह भी नर्मदा स्रोत के समान ही पवित्र माना जाता है। महाभारत वनपर्व 85,9 में नर्मदा-शोण के उद्गम के पास ही वंशग़ुल्म नामक तीर्थ का उल्लेख है। यह स्थान प्राचीन काल में विदर्भ देश के अंतर्गत था। वंशग़ुल्म का अभिज्ञान वासिम से किया गया है। अमरकंटक मध्य प्रदेश के अनूपपुर ज़िले में स्थित है।[7]

आम्रकूट

आम्रकूट को अमरकंटक भी कहते हैं। कई विद्वानों का मत है कि मेघदूत (1,6) में वर्णित अमरकूट ही आम्रकूट है।[8]


विजयेन्द्र कुमार माथुर[9] ने लेख किया है कि....आम्रकूट (AS, p.67) 'त्वामासारप्रशमितवनोपप्लवं साधु मूर्ध्ना, वक्ष्यत्यध्वश्रमपरिगतं सानुमानाम्रकूट:' मेघ0, पूर्वमेघ 17 । उपर्युक्त पद्य में कालिदास ने आम्रकूट नामक पर्वत का वर्णन मेघ की रामगिरि से अलका तक की यात्रा के प्रसंग में नर्मदा से पहले ही अर्थात् उससे पूर्व की ओर किया है। जान पड़ता है कि यह वर्तमान पंचमढ़ी अथवा महादेव की पहाड़ियों (सतपुड़ा पर्वत) का कोई भाग है। कई विद्वानों के मत में रीवा से 86 मील दूर स्थित अमरकूट ही आम्रकूट है। किंतु यह स्पष्ट ही है कि इस पहाड़ का वास्तविक नाम अमरकूट न होकर आम्रकूट ही है क्योंकि कालिदास ने अगले (पूर्वमेघ 18) छंद में इस पर्वत को आम्रवृक्षों से आच्छादित बताया है- 'दन्नोपान्त: परिणतफलद्योतिभि: काननाम्रै: त्वययारूढे शिखरमचल: स्निग्धवेणी सवर्णे, नूनं यास्यत्यमर मिथुनप्रेक्षणीयामवस्थां मध्येश्याम: स्तन इव भुवश्शेषविस्तारपांडु:'।

संभव है नर्मदा के उद्गम अमरकंटक, अमरकूट और आम्रकूट नामों में परस्पर संबंध हो और एक ही पर्वत-शिखर के ये नाम हों। निश्चय ही चित्रकूट आम्रकूट से भिन्न है क्योंकि चित्रकूट का वर्णन कालिदास ने पूर्वमेघ, 19 में पृथक् रूप से किया है।

वंशगुल्म

विजयेन्द्र कुमार माथुर[10] ने लेख किया है....वंशगुल्म (AS, p.828): वंशगुल्म विदर्भ का एक प्राचीन तीर्थ स्थान था। इस तीर्थ का उल्लेख महाभारत, वनपर्व 85,9 में इस प्रकार है- 'शोणस्य नर्मदायाश्च प्रभवे कुरुनंदन, वंशगुल्म उपस्पृश्य वाजिमेधफलं लभेत्।' उपरोक्त वर्णन में वंशगुल्म तीर्थ की स्थिति अमरकंटक के निकट सिद्ध होती है। प्राचीन काल में विदर्भ का इस स्थान तक विस्तार था तथा वंशगुल्म में इस देश की राजधानी थी। वंशगुल्म स्थान का अभिज्ञान 'वासिम', मध्य प्रदेश से किया गया है।

चंद्रपर्वत - सोमपर्वत

विजयेन्द्र कुमार माथुर[11] ने लेख किया है ...2. चन्द्र (AS, p.316) = चंद्रपर्वत. हर्षचरित के प्रथमोच्छवास में महाकवि बाणभट्ट ने शोण नदी का उद्गम चंद्र पर्वत से माना है. भौगोलिक तथ्य यह है कि नर्मदा और शोण (या सोन) दोनों ही नदियां विंध्याचल के अमरकंटक पर्वत से निकली हैं. इसी को चंद्र या सोम पर्वत कहते थे क्योंकि नर्मदा का एक नाम सोमोद्भवा भी है.

सोमोद्भवा

विजयेन्द्र कुमार माथुर[12] ने लेख किया है ... सोमोद्भवा (AS, p.994) - नर्मदा नदी का पर्याय (दे. अमरकोश)--’रेवातुनर्मदा सोमोद्भवा मेकलकन्यका’. रघुवंश 5,59. में कालिदास ने नर्मदा के इस नाम का उल्लेख किया है-- 'तथेत्युपस्यृश्य पय: पवित्रं सोमोद्भवाया: सरितो नृसोम:, उदङ्गमुख: सो अस्त्रविदस्त्रं जग्राहतस्मान्निगृहीत शापत्'. पौराणिक अनुश्रुति के अनुसार नर्मदा की एक नहर किसी सोमवंशी राजा ने निकाली थी जिससे उसका नाम सोमोद्भवा भी पड़ गया था। हर्षचरित के प्रथमोच्छ्वास में बाण ने शोण को विंध्यगिरि के चंद्र नामक पर्वत से निस्सृत माना है. शोण और नर्मदा दोनों अमरकंटक से निकलते हैं और चंद्र इसी पर्वत का नाम जान पड़ता है. यह तथ्य नर्मदा के सोमोद्भवा नाम से सिद्ध होता है. (सोम=चंद्र)

In Mahabharata

Vanshagulma (वंशगुल्म) is mentioned in In Mahabharata (III.83.9).[13]....Touching next the waters of the Vanshagulma (वंशगुल्म) (III.83.9) constituting the sources of both the Sona and the Narmada, one obtaineth the merit of the horse-sacrifice.

External links

References

  1. Bhattacharyya, P.K. (1977), Historial Geography of Madhya Pradesh from Earlier Records, Motilal Banarsidass, p. 76
  2. मेकलाः कॊशला मद्रा दशार्णा निषधास तदा, गजयुथ्धेषु कुशलाः कलिङ्गैः सह भारत (VIII. 17.3) चेदिवत्साः करूषाश च भॊजाः सिन्धुपुलिन्थकाः, उत्तमौजा दशार्णाश च मेकलाश चॊत्कलैः सह (VI.10.39)
  3. Bhattacharyya, P.K. (1977), Historial Geography of Madhya Pradesh from Earlier Records, Motilal Banarsidass, p. 76
  4. C.P.R. Environmental Education Centre, Chennai
  5. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.30
  6. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.29-30
  7. भारतकोश-अमरकंटक
  8. भारतकोश-आम्रकूट
  9. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.324-25
  10. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.828
  11. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.315-316
  12. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.994
  13. शॊणस्य नर्मदायाश च परभवे कुरुनन्दन, वंशगुल्म उपस्पृश्य वाजिमेधफलं लभेत (III.83.9)

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