Hoshiar Singh

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Maj Hoshiar Singh

Colonel (retd) Hoshiar Singh Dahiya PVC (5 May 1936 - 6 December 1998), son of Chaudhary Hira Singh Dahiya, was born on 05 May 1936 in village Sisana, District Sonipat, Haryana.

Early life

Sisana, his birth place, is a big village on Rohtak - Sonipat road, about 25 km from Sonipat. This Jat dominated village has produced more than 250 soldiers for the Indian Army. His father was a respectable farmer and his mother Smt. Mathuri Devi, a kind-hearted housewife. Col Hoshiar Singh got married to Smt Dhanno when he was still studying in the 7th class. This illustrious couple has three sons.

Joined Indian Army

Maj Hoshiar Singh

After his schooling and one year's study at the Jat College, Rohtak, he joined the Indian Army as a soldier.

He was commissioned as an officer in the Grenadiers Regiment on 30 June 1963. His first assignment as an officer was in NEFA. In the 1965 Indo-Pak war, he saw some action in the Rajasthan sector. In the Indo-Pak war of 1971 (then a Major), he was awarded the Param Vir Chakra on 17 December, 1971.

Colonel Hoshiar Singh was a man of simple habits. The great secret of his remarkable success had been a close rapport with his men. He grew with his company and being in the same battalion for a long period helped him establish close ties with the men under his command.

Indo-Pak war 1971

Indo-Pak war 1971: The 3rd Battalion of the Grenadiers Regiment was in the forefront of the advance of 54 Inf. Div. in Shakargarh sector on the western front on the night of December 5th. The 3 Grenadiers, under the dynamic command of Lt Col V P Airy, made quick gains in the first ten days of the war. On December 15th, it was assigned the task of establishing a bridge-head across the Basantar river. The river was covered with deep minefields on both sides and protected by well fortified defense by the enemy. Major Hoshiar Singh, Commander of 'C' (left forward) Company, launched an attack across the enemy minefield on Jarpal. As it was a well fortified enemy position, the company came under intense shelling and crossfire from medium machine guns and suffered heavy casualties.

The 3 Grenadiers bravely continued the assault and achieved the set objective. The enemy bunkers were cleared only after fierce hand-to-hand fighting. Pakistanis reacted to the loss of Jarpal by launching counter attacks, two of them supported by armour, to dislodge the 3 Grenadiers on December 16th. Major Singh, unmindful of the enemy shelling and tank fire, went from trench to trench, encouraging his men to remain steadfast and continue fight. Inspired by his courage and leadership, his company repulsed all attacks, inflicting heavy casualties on the enemy. On December 17th, the enemy mounted yet another attack in battalion strength with heavy artillery in support. Though wounded seriously in enemy shelling, Major Singh again went alone from trench to trench, at times moving in the open too. When an enemy shell landed near his medium machine gun post, injuring the crew, Major Hoshiar Singh rushed to the enemy machine gun pit and operated the gun inflicting heavy casualties on the enemy.

Param Vir Chakra

PVC Medal.jpg

Pakistanis beat a hasty retreat leaving behind 85 dead, including their Commanding Officer - Lt Colonel Mohammed Akram Raja and three other officers. Throughout this operation, Major Singh displayed the most conspicuous gallantry, grim determination and indomitable spirit. With grit, courage and complete disregard to his personal safety he inspired his command to perform outstanding acts of gallantry and defeated repeated enemy attempts to recapture the locality. The steadfastness and dauntless courage displayed by Major Hoshiar Singh were in keeping with the highest traditions of the Indian Army, and his refusal to be evacuated despite his serious wounds was an act beyond the call of duty. He was honoured with the highest wartime gallantry medal of India, the Param Vir Chakra.

Dalip Singh Ahlawat writes -

कर्नल होशियारसिंह का जन्म 5 मई सन् 1936 ई० को चौ० हीरासिंह दहिया जाट के घर जिला सोनीपत के गांव सिसाना में हुआ था। आप भारतीय थलसेना में एक साधारण सिपाही भर्ती हुए और उन्नति करके 30 जून सन् 1963 ई० को लेफ्टिनेन्ट का पद प्राप्त कर लिया। अफसर बनकर आप नं० 3 ग्रेनेडियर पलटन में आ गये। आपने सन् 1971 ई० के भारत-पाक युद्ध के समय मेजर के रूप में पाकिस्तानी सेना के पुरजोर आक्रमण को बड़ी बहादुरी और साहस से निष्फल कर दिया और उसके मोर्चों पर अधिकार कर लिया था। इस महान् शूरता के लिए आपको 17 दिसम्बर 1971 को परमवीर चक्र (जीवित) से विभूषित किया जो कि भारतवर्ष का सर्वोच्च शूरता पारितोषिक (तमग़ा) माना जाता है। इस सन्दर्भ में संक्षिप्त सा वर्णन उल्लेखनीय है -

15 दिसम्बर 1971 को मेजर होशियारसिंह शकरगढ़ के क्षेत्र में नसन्ता नदी के पार 3 ग्रेनेडियरज़ पलटन की एक कम्पनी की अगुवाई कर रहे थे। आपको जरपाल नामक स्थान पर स्थित शत्रु के मोर्चे पर अधिकार करने का आदेश मिला। आपने अपनी कम्पनी के साथ शत्रु की धुआंधार गोलाबारी तथा मशीनगनों के भारी कारगर फायर के नीचे आक्रमण कर दिया तथा हाथों-हाथ के युद्ध के पश्चात् शत्रु के मोर्चों पर अधिकार कर लिया। अगले दिन शत्रु ने टैंकों के साथ तीन भयंकर प्रत्याक्रमण किये। आपने उनकी तनिक भी परवाह न करते हुए अपने जवानों को मोर्चों में डटे रहने के लिए अत्युत्साहित किया। इस प्रकार शत्रु का हमला विफल कर दिया तथा शत्रु 85 मरे हुए सैनिकों को छोड़कर जिनमें एक कमांडिंग अफसर तथा तीन अन्य अफसर भी सम्मिलित थे, भाग खड़ा हुआ। यद्यपि मेजर होशियारसिंह गम्भीर रूप से घायल हो गए थे फिर भी युद्ध बन्द होने तक मोर्चे से लौटने के लिए इन्कार कर दिया। इस युद्ध के दौरान आपने भारतीय सेना की सर्वोच्च प्रथाओं के अनुसार सर्वोच्च वीरता, अदम्य युद्ध-साहस तथा नेतृत्व प्रदर्शित किया।[1]

External links

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Colonel (Retd) Hoshiar Singh, PVC passed away on 6th December, 1998. He died of natural cause.


  • A museum at Indian Military Academy Dehradun has been named after major Hoshiar Singh in 2009. At this function his wife Dhano Devi and two sons, who are now in Indian Army, were also present. [2]
कर्नल होशियारसिंह स्टेचू आर्मी चिंकारा कैंटीन जयपुर
  • भारत के प्रथम जीवित परमवीर चक्र लेने वाले योद्धा कर्नल होशियार सिंह दहिया जाट की स्टेचू आर्मी चिंकारा कैंटीन जयपुर के पास स्थित है. [3]

कर्नल होशियार सिंह

कर्नल होशियार सिंह दहिया, पीवीसी (5 मई 1937 - 6 दिसंबर 1998) का जन्म चौधरी हिरा सिंह के यहाँ हरियाणा के सोनापत जिले के सिसान गांव में हिंदू जाट परिवार में हुआ था। उन्होंने समर्पण के साथ भारतीय सेना में सेवा की, ब्रिगेडियर के रूप में काम पर रखा। उन्हें भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान से सम्मानित किया गया

मेजर होशियारसिंह उन वीर सैनिकों में शामिल थे, जिन्हें अपने जीवनकाल में परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। 5 मई 1937 को हरियाणा के सोनीपत में जन्मे मेजर होशियारसिंह ने 1971 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध में अद्‍भुत वीरता का प्रदर्शन किया था। होशियार वॉलीवॉल के खिलाड़ी और अपनी राष्ट्रीय स्तर की टीम के कप्तान थे। इस टीम का मैच जाट रेजीमेंटल सेंटर के एक उच्च अधिकारी ने देखा तो होशियार सिंह से वे प्रभावित हुए। इसके बाद 1957 में होशियार सिंह ने सेना की जाट रेजीमेंट में प्रवेश किया और 3 ग्रेनेडियर्स में कमीशन लेने के बाद वे ऑफिसर बन गए।

कर्नल होशियार सिंह दहिया

1965 में पाकिस्तान के खिलाफ जीत को आसान बनाने में होशियार सिंह की दी गई महत्वपूर्ण सूचना का खास योगदान था। 1971 में हुए भारत-पाक युद्ध के अंतिम 2 घंटे पूर्व तक, जब युद्ध विराम की घोषणा की गई और दोनों सेनाएं एक-दूसरे के सैनिकों को खत्म करने का भरसर प्रयास कर रही थीं, तब भी होशियारसिंह घायल अवस्था में भी डटे रहे और लगातार दुश्मन सिपाहियों को एक के बाद एक रास्ते से हटाते रहे। वे लगातार अपने साथियों का हौसला बढ़ाते रहे। मेजर होशियारसिंह की बटालियन जीत दर्ज करा चुकी थी। इसके लिए मेजर सिंह को परमवीर चक्र प्रदान किया गया।

भारत-पाकिस्तान युद्ध

स्वतन्त्र भारत ने अब तक पाँच युद्ध लड़े जिनमें से चार में उसका सामना पाकिस्तान से हुआ। यह युद्ध शुरू भले ही पाकिस्तान ने किया हो, उनका समापन भारत ने किया और विजय का सेहरा उसी के सिर बँधा। इन चार युद्धों में एक युद्ध जो 1971 में लड़ा गया वह महत्त्वपूर्ण कहा जा सकता है क्योंकि इस लड़ाई ने पाकिस्तान को पराजित करके एक ऐसे नए राष्ट्र का उदय किया, जो पाकिस्तान का हिस्सा था और वर्षों से पश्चिम पाकिस्तान की फौजी सत्ता का अन्याय सह रहा था। वही हिस्सा, पूर्वी पाकिस्तान, 1971 के युद्ध के बाद बांग्लादेश बना। जब से पाकिस्तान बना, तब से पश्चिम पाकिस्तान सत्ता का केंद्र बना रहा। वह मुस्लिम बहुल इलाका था। दूसरी ओर पूर्वी पाकिस्तान, पूर्वी बंगाल था जो विभाजन के बाद पाकिस्तान में आ गया था। यह हिस्सा बांग्ला भाषियों से भरा था। इस तरह पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान दो अलग-अलग भाषायों और संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करते थे। इसका नतीजा यह था कि पश्चिम पाकिस्तान की मुस्लिम बहुल सत्ता का व्यवहार, अपने ही देश के एक हिस्से से बेहद अन्यायपूर्णक तथा सौतेला होता था, भले ही देश का हिस्सा ख़ासा वैभव और सम्पदा सरकार को देता था। 7 अगस्त 1970 को हुए पाकिस्तान के चुनाव में जनमत का एक नया चेहरा से सामने आया, जिसमें शेख मुजीबुर्रहमान की पार्टी अवामी लीग ने बेहद भारी बहुमत से जीत हासिल की। स्थिति यह बनी कि आवामी लीग की सरकार सत्ता में आ जाए। इस बात के लिए पश्चिम पाकिस्तान का शासन कतई तैयार नहीं थ। उस समय जुल्फिकार अली भट्टो प्रधानमंत्री थे, तथा याहना खान राष्ट्रपति पद पर बैठे थे। बांग्ला बहुल अवामी लीग की सरकार बनने से रोकने के लिए इन दोनों ने नई विजेता असेंबली के गठन पर बंदिश लगा कर रोक दिया।

मेजर होशियार सिंह एवं उनके साथी

मेजर होशियार सिंह : इसी बटालियन में थे l उन्हें आदेश मिला कि वे अपने साथियों के साथ पाकिस्तान के जरपाल वाली चौकी पर कब्जा करें l जरपाल का यह पाकिस्तानी चौकी बहुत सुरक्षित स्थान पर था और इस चौकी पर पाकिस्तानी सैनिकों की संख्या अधिक थी l होशियार सिंह और उनके साथियों पर लगातार पाकिस्तानी मीडियम मशीनगन से गोलियों की बौछार सहनी पड़ी l स्वयं को बचाते आगे बढ़ रहे थे, सहसा उन्होने अपने चारों तरफ देखा और स्तब्ध रह गए. उनके चारों ओर उनके साथियों के शव ही शव दिखाई पड़ रहा थाl एक क्षण के लिए मेजर होशियार सिंह क्रोध, दुख और भय की स्थिति में थे l परन्तु उन्होनें अपने ऊपर इन सभी का असर पड़ने नहीं दिया l चिन्ता की स्थिति से निपटने की और भय रहित होकर आक्रमण करने के लिए स्वयं को तैयार कर लिया l इतना ही नहीं बल्कि उन्होनें अपने बचे साथियों से भी ज़ोरदर शब्दों में कहा कि वे बहादुरी से लड़ते रहें l मेजर होशियार सिंह ने कहा कि "बहादुर लोग केवल एक बार मरते हैं l तुम्हें युद्ध करना ही है l तुम्हें विजय प्राप्त करनी है l" उनके सैनिकों को उनकी बातों ने प्रेरित किया l इसके बाद तो फिर घमासान युद्ध होने लगा और Dec. 15, 1971 को वे अपने लक्ष्य में सफल हो गए l

परम वीर चक्र सम्मानित

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान, तीसरे ग्रेनेडीर्स को 15 मार्च, 17, 1 9 71 को शाकगढ़ सेक्टर में बसंतार नदी के किनारे एक पुल का निर्माण करने का कार्य दिया गया था। यह नदी दोनों तरफ गहरी खानों से ढकी हुई थी और अच्छी तरह से संरक्षित थी पाकिस्तानी सेना द्वारा रक्षात्मक रक्षा कमांडर 'सी' कंपनी मेजर होशियार सिंह को जारपाल की पाकिस्तानी इलाके पर कब्जा करने का आदेश दिया गया था। पाकिस्तानी सेना ने प्रतिक्रिया व्यक्त की और तेज मुठभेड़ों में डाल दिया। मेजर होशियार सिंह खाई से चोटी से चले गए, अपनी कमान को प्रेरित करते हुए और अपने लोगों को तेजी से खड़े होने और लड़ने को प्रोत्साहित करते हुए परिणामस्वरूप उनकी कंपनी ने पाकिस्तानी सेना पर भारी हताहत करने वाले सभी हमलों को खारिज कर दिया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद, मेजर होशियार सिंह ने युद्ध विराम तक खाली करने से इनकार कर दिया। इस ऑपरेशन के दौरान, मेजर होशियार सिंह ने सेना की सर्वोच्च परंपराओं में सबसे विशिष्ट वीरता, अदम्य लड़ भावना और नेतृत्व का प्रदर्शन किया। उनकी बहादुरी और नेतृत्व के लिए उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

लेखक - दोलाराम गोदरा


  1. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter III (Page 216)
  2. Jat Samaj, March 2009, p.30
  3. पत्रकार चौधरी चंद्रप्रकाश डूडी,जयपुर

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