Neem

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भारत की प्रसिद्ध जड़ी बूटी ग्रन्थमाला-२
नीम
लेखक : स्वामी ओमानन्द सरस्वती

प्रकाशक - हरयाणा साहित्य संस्थान, गुरुकुल झज्जर, जिला झज्जर (हरयाणा)
चतुर्थ संस्करण (२००० कापी) : मार्गशीर्ष २०५१ वि० (दिसम्बर १९९४ ई०)
मुद्रक - वेदव्रत शास्त्री - आचार्य ऑफसेट प्रेस, गोहाना रोड, रोहतक

सुमित्रिया नः आप औषधयः सन्तु

हे प्रभु ! तेरी कृपा से प्राण, जल तथा विद्या और औषधि हमारे लिये सदा सुखदायक हों


Digital text of the printed book prepared by - Dayanand Deswal दयानन्द देसवाल


The author - Acharya Bhagwan Dev alias Swami Omanand Saraswati


Vernacular names

Names for this plant in various languages include;[1]

  • Arabic - Neeb, Azad-darakhul-hind, Shajarat Alnnim
  • Assamese - Neem (নীম)
  • Bengali - Nim (নিম)
  • Botanical - Azadirachta indica
  • English - Margosa, Neem Tree
  • French - Azadirac de l'Inde, margosier, margousier
  • German - Indischer zedrach, Grossblaettiger zedrach
  • Gujarati - Dhanujhada (ધનુજઝાડ), Limbda
  • Hausa - Darbejiya, Dogonyaro, Bedi
  • Hindi - Neem (नीम)
  • Kannada - Bevu (ಬೇವು)
  • Kiswahili - Muarubaini
  • Khmer - Sdau (ស្ដៅ)
  • Malay - Mambu (ممبو)
  • Malayalam - Aryaveppu (ആര്യവേപ്പ്)
  • Manipuri - Neem (নীম)
  • Marathi - Kadunimba (कडुनिंब)
  • Myanmar - Burma- Tamar
  • Nepal - Neem
  • Nigerian - Dongoyaro
  • Odiya - Neem (ନିମ)
  • Persian - Azad Darakth e hind, neeb, nib
  • Portuguese - Nimbo, Margosa, Amargoseira
  • Punjabi - Nimmh (ਨਿੰਮ੍ਹ)
  • Sanskrit - Arishta, Pakvakrita, Nimbaka (निंबक)
  • Sinhala - Kohomba (කොහොඹ)
  • Sindhi - Nimm (نم)
  • Somali - Geed Hindi
  • Tamil - Veppai (வேப்பை), Sengumaru
  • Telugu - Vepa (వేప)
  • Thai - Sadao (สะเดา)
  • tulu-besappu
  • Urdu - Neem (نیم)

नम्र निवेदन

नीम - आवरण पृष्ठ

साधारण मनुष्य चाहे ग्राम कस्बे बड़े नगर किसी भी स्थान पर निवास करते हों, प्रायः सभी का एक ही स्वभाव है कि छोटे मोटे रोगों पर वैद्य, हकीम वा डाक्टर के घर का द्वार शीघ्र ही नहीं खटखटाते । अपने घर, खेत, जंगल, आस पास पड़ौस में सुगमता से जो भी घरेलू उपयोगी औषध मिल जाये उसी का झट सेवन करते हैं । किन्तु प्रतिदिन दृष्टि में आने वाले जाने पहचाने पौधे वृक्ष नीम, पीपल, बड़, आक, ढाक आदि का यथार्थ ज्ञान न होने से अनेक रोगों की चिकित्सा इन के द्वारा भलीभांति वे नहीं कर सकते । जो नीम, आक आदि सभी लोगों के आगे पीछे हर घर और बाहर हर समय दिखाई देते हैं और जो पदार्थ अत्यन्त सुलभ हैं उनके द्वारा अनेक रोगों की स्वयं चिकित्सा भी कर सकें इसी कल्याण की भावना से भारत की प्रसिद्ध जड़ी बूटी नामक ग्रन्थ माला का द्वितीय पुष्प निम्ब वा नीम आपको भेंट किया जा रहा है ।


इस में सामान्य रूप से रोगों का निदान वा पहचान, चिकित्सा उपचार पथ्यादि पर भी प्रकाश डाला गया है । आशा है प्रेमी पाठक इस से लाभ उठायेंगे ।


- ओ३मानन्द सरस्वती

दो शब्द

प्रभु की दृष्टि में असंख्य जड़ी-बूटियां हैं, जो परम दयालु पिता ने प्राणिमात्र के कल्याणार्थ उत्पन्न की हैं । जिनके उत्पन्न करने के साथ-साथ अपनी परम पवित्र वेदवाणी द्वारा उनके पवित्र ज्ञान का प्रकाश भी ऋषियों के हृदय में किया । इसी लिए इस युग के प्रवर्तक महर्षि दयानन्द ने यह उदघोषित किया - वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है और वेद का पढ़ना पढ़ाना और सुनना सुनाना मानवमात्र का परम धर्म है । वेदों का एक उपवेद आयुर्वेद है जिसकी प्राणिमात्र के हितार्थ ऋषि मुनियों ने (आयुर्वेद के ग्रन्थों की ) रचना की है । वेद तथा उपवेद आयुर्वेद के पढ़ने तथा उसके अनुसार आचरण करने से हम सच्चे ज्ञान की प्राप्ति कर सकते हैं । अलपज्ञ होने से मनुष्य अनेक त्रुटि करता है, भूलें करता है, फलस्वरूप दुःख भोगता है । रोगी पड़ता है, रोग के कारण बड़ा दुःख भी पाता है । आश्चर्य यह है कि इसके चारों ओर रोग की औषध विद्यमान होते हुए भी अपनी अलपज्ञता के कारण यह रोगग्रस्त होकर दुःख भोगता है । "पानी में मीन प्यासी, मुझे देखत आवे हांसी" वाली लोकोक्ति के अनुसार मानव की दुर्गति हो रही है । इस दुर्दशा और दुःख से बचाने के लिए यह निम्ब वा नीम की छोटी सी पुस्तिका लिख रहा हूं । जिसमें निम्ब (नीम) जो भारत का एक प्रसिद्ध वृक्ष है और जिससे भारत का तो आबाल, वृद्ध, वनिता सभी कोई भली भांति परिचित है, आयुर्वैदिक शास्त्रों में जिसका पर्याप्त वर्णन मिलता है, जिसे छोटे बड़े वैद्य तथा ग्रामीण लोग भी जानते तथा कुछ-कुछ औषध रूप में भी प्रयोग करते हैं । किन्तु नीम स्वयं एक औषधालय है, इसका ज्ञान अच्छे-अच्छे वैद्य डाक्टरों को भी नहीं, फिर सामान्य मनुष्य का क्या कहना । मेरा ध्यान इस ओर क्यों गया, इसके कुछ कारण हैं । इस बार मैं मराठवाड़ा (महाराष्ट्र) में आर्यसमाज के प्रचारार्थ गया तो वहां पर चर्मदल (चम्बल) श्वेतकुष्ट आदि रोगों से पीड़ित बहुत रोगियों को देखा ।

(१) हमारे डाक्टर और सरकार कई वर्षों से यह घोषणा कर रही थी कि मलेरिया (विषमज्वर) समाप्त हो गया है । किन्तु दो वर्षों से मलेरिया ने इतने जोर से जनता पर आक्रमण किया कि सभी दांतों तले अंगुली दबाकर रह गये और मलेरिया को दबाना वा हटाना उनके काबू से बाहर की बात निकली ।

(२) मच्छर जिससे मलेरिया फैलता है ऐसी सभी डाक्टरों की मान्यता है और वे मलेरिया के मच्छर भी बढ़ते ही जा रहे हैं और उनके मारने वाली अमोघ औषध भी कुछ कार्य नहीं कर रही है । सब विफल हो रही हैं ।

उपरोक्त कारणों से तथा अन्य रोगों की भी बहुत अच्छी औषध यह प्रसिद्ध वृक्ष निम्ब (नीम) है यह अनुभव ने सिद्ध कर दिया । मच्छरों को दूर भगाने के लिए निम्ब के पत्तों का धुवां तथा इसकी धूपबत्ती महाराष्ट्र में तो बहुत प्रसिद्धि पा चुकी है । और मलेरिया को दूर करने के लिये नीम के पंचांगों के अनेक योग हमने तथा अनेक वैद्यों ने हजारों रोगियों पर आजमाये, जादू के समान इन्होंने कार्य किया । मलेरिया ही नहीं, चर्मदल, दाद, खुजली और श्वेत कुष्ठ आदि कुष्ठों पर नीम ने रामबाण के समान कार्य किया है । इसका विस्तार से वर्णन पाठकों को आगे पढ़ने को मिलेगा । निम्ब की कितनी अच्छी निरुक्ति वा अच्छा अर्थ किया है - "निम्बति स्वास्थ्यं ददाति इति" जो स्वास्थ्य प्रदान करता है उसे निम्ब कहते हैं ।

पौराणिक भाई जहां पर भारत की तीन नदियां (गंगा, यमुना और सरस्वती) मिलती हैं, उस स्थान को तीर्थराज, त्रिवेणी व प्रयागराज कहते हैं - वहां स्नान करने व उसकी तीर्थ यात्रा करने से सब पापों से छुटकारा मिल जाता है और परमपद मोक्ष की प्राप्ति होती है, यह बात तो सर्वथा मिथ्या है। किन्तु नीम, पीपल और वट (बड़) इन तीनों वृक्षों को एक साथ एक ही स्थान पर लगाने की बहुत ही पुरानी परिपाटी भारतवर्ष में प्रचलित है और इसे भी त्रिवेणी कहते हैं। इन तीन वृक्षों की त्रिवेणी का औषध रूप में यदि यथोचित रूप में सेवन किया जाये तो बहुत से भयंकर शारीरिक रोगों से छुटकारा पाकर मानव सुख का उपभोग कर सकते हैं । ये तीनों ही वृक्ष अपने रूप में तीन औषधालय हैं । इसीलिये भारतवर्ष के लोग इसका न जाने बहुत प्राचीनकाल से नगरों में, ग्रामों में, सड़कों पर, तड़ाग व तालाबों पर सर्वत्र ही इनको आज तक लगाते आ रहे हैं । इसको धर्मकृत्य व पुण्यकार्य समझकर बहुत ही रुचि से इन वृक्षों को लगाते तथा जलसिंचन करते हैं तथा बाड़ लगाकर इनकी सुरक्षा का सुप्रबंध भी करते हैं ।

इन तीन अत्यन्त उपयोगी वृक्ष नीम, पीपल और बड़ की त्रिवेणी पर मैं लिखना चाहता हूं । आज तो पाठकों की सेवा में निम्ब अर्थात् नीम तथा उसके गुणों का वर्णन तथा औषध के रूप में उसके सेवानार्थ आयुर्वेद के ग्रन्थों, अपने तथा अनेक वैद्यों के अनुभव पाठकों की सेवा में उपस्थित कर रहा हूं । आशा है मेरे इस प्रयास से जनता लाभान्वित होगी ।

- ओ३मानन्द सरस्वती

निम्ब: (नीम), Azadirachta indica

नीम का वृक्ष

धन्वन्तरीय निघन्टु में निम्ब अर्थात् नीम के विषय में इस प्रकार लिखा है -

निम्बो नियमनो नेता पिचुमन्दः सुतिक्तकः ।
अरिष्टः सर्वतोभद्रः प्रभद्रः पारिभद्रकः ॥२९॥
-धन्वन्तरीय निघण्टु


अथ निगदितः पिचुमन्दः प्रभद्रः पारिभद्रको निम्बः ।
काकफलः कीरेष्टो नेताऽरिष्टश्च सर्वतोभद्रः ॥४३॥
धमनो विशीर्णपर्णी पवनेष्टः पीतसारकः शीतः ।
वरतिक्तोऽरिष्टफलो ज्येष्ठमालकश्च हिङ्गुनिर्यासः ॥४४॥
छर्दनश्चाग्निघमनो ज्ञेया नाम्नां तु विंशतिः ॥
-(राजनिघन्टु)


धन्वन्तरीय निघण्टु में निम्बः, नियमनः, नेता, पिचुमन्दः, सुतिक्तकः, अरिष्टः, सर्वतोभद्रः, प्रभद्रः और पारिभद्रकः - ये ९ नाम दिये हैं ।

राजनिघन्टु में २० नाम नीम के दिये हैं । सात नाम तो दोनों के परस्पर मिलते हैं । इसके अतिरिक्त १३ नाम निम्ब के (१) काकफलः (२) कीरेष्टः (३) धमनः (४) विशीर्णपर्णीः (५) पवनेष्ठः (६) पीतसारकः (७) शीतः (८) वरतिक्तः (९) अरिष्टफलः (१०) ज्येष्ठमालकः (११) हिङ्गुनिर्यासः (१२) छर्दनः (१३) अग्निघमनः - ये १३ नाम मिलाकर २० नाम नीम के वृक्ष के गिनाये हैं । इसके अतिरिक्त कुछ निघण्टुओं में (१) पिचुमर्दः (२) नतेर (३) रविप्रियः आदि नाम और भी मिलते हैं ।


गुण


धन्वन्तरीय निघण्टु में निम्नलिखित गुण दिये हैं -

निम्बस्तिक्तरसः शीतो लघुश्लेषमास्रपित्तनुत् ॥
कुण्ठकण्डूव्रणान् हन्ति लेपाहारादिशीतलः ॥३०॥
अपक्वं पाचयेच्छोफं व्रणं पक्वं विशोधयेत् ॥


अर्थ - नीम कड़वा व कड़वे रस वाला, शीत (ठंडा), हल्का, कफरोग, कफपित्त आदि रोगों का नाशक है । कोढ, खुजली, फोड़ों, व्रणों का नाशक है । इसका लेप और आहार शीतलता देने वाले हैं । कच्चे फोड़ों को पकाने वाला और सूजे तथा पके हुए फोड़ों का शोधन करने वाला है ।


राजनिघन्टु में इसके गुण निम्न प्रकार से दिये गए हैं -

प्रभद्रकः प्रभवति शीततिक्तकः कफव्रणकृमिवमिशोफशान्तये
बलासभिद् बहुविषपित्तदोषजिद्विषेषतो हृदयविदाहशान्तिकृत् ॥


अर्थ - नीम शीतल, कडुवा, कफ के रोगों को तथा फोड़ों, कृमि, कीड़ों, वमन तथा शोथ रोग को शान्त करने वाला है। बहुत विष और पित्त दोष के बढे हुए प्रकोप व रोगों को जीतने वाला है और हृदय की दाह को विशेष रूप से शान्त करने वाला है। बलास तथा चक्षु संबंधी रोगों को जीतने वाला है।


बलास फेफड़ों और गले के सूजन के रोगों का नाम है। इसको भी निम्ब दूर करता है । बलास में क्षय यक्ष्मा तथा श्वासरोग के समान कष्ट होता है।

सभी निघन्टु यह मानते हैं कि नीम शीतल, हल्का, ग्राही, पाक में चरपरा, हृदय को अप्रिय, गर्मी जलन, वात परिश्रम, थकावट, तृषा, ज्वर, अरुचि, कृमि, व्रण, पित्त, कफ, वमन, कोढ़, हृल्लास और प्रमेह को नष्ट करता है । नेत्रों को हितकर है ।


नीम के पत्ते


पहले लिख चुके हैं कि नीम के पत्ते, पुषप, फल, वल्कल आदि सभी अंग औषध में प्रयुक्त होते हैं । भावप्रकाश निघण्टु में लिखा है : -

निम्बपत्रं स्मृतं नेत्र्यं कृमिपित्तविषप्रणुत् ।
वातलं कटुपाकं च सर्वारोचककुष्ठनुत् ॥९०॥


अर्थ - नीम के पत्ते नेत्रों को हितकारी, वातकारक, पाक में चरपरे, सर्व की अरुचि, कोढ, कृमि, पित्त तथा विषनाशक हैं। नीम की कोमल कोंपलें व कोमल पत्ते संकोचक, वातकारक तथा रक्तपित्त, नेत्ररोग और कुष्ठ को नष्ट करने वाले हैं।


नीम के फल

नैम्बं फलं रसे तिक्तं पाके तु कटुभेदनम् ॥
स्निग्धं लघूष्णं कुण्ठघ्नं गुल्मार्शकृमिमेहनुत्

अर्थ - नीम के फल कड़वे, पाक में चरपरे, मलभेदक, स्निग्ध, हल्के, गर्म और कोढ, गुल्म, बवासीर, कृमि तथा प्रमेह को नष्ट करने वाले हैं । नीम के पके फलों के ये गुण हैं । पकने पर मीठी निम्बोली (फल) रक्त, पित्त, कफ, नेत्र रोग, क्षय और उरःक्षत (फेफड़े के जख्मों) को दूर करती है । नीम की कच्ची निम्बोली (फल) रस में कड़वी, पचने में चरपरी, स्निग्ध, हल्की गर्म तथा कोढ, गुल्म, बवासीर, कृमि और प्रमेह को दूर करने वाली है।


नीम के फूल - नीम के पुष्प वा फूल पित्तनाशक और कड़वे, कृमि तथा कफरोग को दूर करने वाले हैं।

डंठल - नीम के डंठल कास (खांसी), श्वास, बवासीर, गुल्म, प्रमेह-कृमि रोगों को दूर करते हैं।


गिरी - निम्बोली की गिरी कुष्ठ और कृमियों को नष्ट करने वाली हैं ।


तैल - नीम की निम्बोलियों का तेल कड़वा, चर्मरोग, कुष्ठ और कृमिरोगों को नष्ट करता है ।


पंचांग - नीम के पंचांग रुधिरविकार, पित्त, खुजली तथा व्रण (फोड़े), जख्म, दाह (जलन), तृषा और कुष्ठ को दूर करने वाले हैं ।

गुणों का निष्कर्ष

द्रव्य गुण विवेचन - नीम तिक्त (कड़वा) है, शीतवीर्य है और विपाक में कड़वा है । तिक्त रस होने पर भी लोगों को इसके खाने के पीछे अरुचि नहीं होती । अधिकतर जितने तिक्त रस वाले पदार्थ (कड़वे) होते हैं, सभी अरुचिकर होते हैं । परन्तु नीम में यह खास विशेषता है कि वह स्वयं अरुचिकर होता हुआ भी अरुचि का नाशक है । यह खाने में अच्छा नहीं लगता किन्तु अरुचि वालों को तुरन्त लाभ पहुंचाता है । यह अमृत के तुल्य है । नीम की कोमल पत्तियों को घी में भूनकर खाने से भयंकर से भयंकर अरुचि तुरन्त नष्ट हो जाती है ।


नीम पचने में कड़वा है । जो वस्तु कड़वी होती है वह हल्की होती है । विपाक में कटु होने के कारण नीम का वीर्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है । यह वीर्य को घटाने वाला है । मल को बांधने वाला है । यदि नीम का निरन्तर सेवन किया जाए तो मनुष्य की कामशक्ति घटने लगती है और कुछ दिनों के पीछे मनुष्य नपुंसक हो जाता है । इसी कारण बहुत से साधु तथा ब्रह्मचारी प्रबल कामशक्ति को रोकने के लिए नीम का सेवन करते हैं ।


विचित्र वृक्ष

नीम का वृक्ष संसार में बड़ा ही विचित्र है । प्रभु की अनोखी देन है । कुछ निघन्टुओं ने इसे शीतल और तिक्त लिखा है । राज-निघन्टु में इसे कफ, व्रण, कृमि, वमन और शोथ को शान्त करने वाला कहा है । कफ का भेदन करता है । नाना प्रकार के पित्त के दोषों को जीतता है और यह हृदय की जलन को शान्त करता है । सुश्रुत में नीम को गर्म, रूक्ष और कटुविपाकी लिखा है । इससे प्रतीत होता है नीम चाहे शीतल हो या गर्म, किन्तु परिणाम में वह गर्म ही है । इसी कारण नीम को मन्दाग्निनाशक लिखा है । यदि वह शीतल होता तो मन्दाग्नि की चिकित्सा में उसका उल्लेख न होता । मन्दाग्नि की चिकित्सा में गर्म वस्तुओं का ही सेवन किया जाता है, क्योंकि शीतल पदार्थों से वायु की वृद्धि होती है और वायु की वृद्धि से जठराग्नि का ह्रास होकर मन्दाग्नि रोग उत्पन्न होता है । यदि मन्दाग्नि के रोगी को शीतल पदार्थों का सेवन कराया जाये तो रही सही पाचनशक्ति भी समाप्त हो जाती है । कई निघन्टुओं ने इसे शीतवीर्य लिखा है किन्तु सुश्रुतकार ने इसे उष्णवीर्य लिखा है और यह सत्य और उचित ही प्रतीत होता है ।


रासायनिक विश्लेषण

रासायनिक विश्लेषण करने पर इसके बीजों में एक प्रकार का कड़वा और स्थायी तैल पाया जाता है । यह तैल गहरे पीले रंग का होता है, स्वाद में खराब और कषैला होता है । इसके तैल में अनेक क्षार (एसिड) होते हैं । इसमें स्टिआरिक ओलेक और लारिक एसिड रहते हैं ।


राय और चैटर्जी ने विश्लेषण करके निम्नलिखित तत्त्व लिखे हैं । (१) सलफर (गन्धक) ४२७ प्रतिशत (२) एक पीले रंग का कड़वा तत्त्व सम्भवतः यह कोई उपक्षार है । (३) रेजिन्स (४) ग्लुको साइड्स और (५) अम्ल द्रव्य ।


सन् १९३१ में सेन और बैनर्जी ने स्पष्ट किया कि इसके तैल में जो कड़वा तत्त्व है वह सोडियम साल्ट के कारण रहता है ।


राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी के कुछ प्रश्नों के उत्तर में कुनूर के न्यूट्रजिन रिसर्च डायरेक्टर डॉक्टर एकाईड ने नीम की पत्तियों के विषय में निम्न मत प्रकट किया –


हमने अपनी प्रयोगशाला में नीम के पत्तों का विश्लेषण किया । सूखी पत्तियों की अपेक्षा नीम की हरी पत्तियों में पोषक तत्त्व अधिक मात्रा में पाये जाते हैं । पकी हुई पत्तियों और हरी पत्तियों (दोनों ही) में प्रोटीन, कैलशियम (चूना) लोहा और विटामिन 'ए' A पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं और इस दृष्टि से नीम की पत्तियां चौलाई, धनियां, पालक आदि शाक सब्जियों से अधिक श्रेष्ठ हैं ।


कुष्ठ पर नीम


सभी डाक्टर, हकीम और वैद्य इस पर सहमत हैं कि कुष्ठ के लिए निम्ब बहुत अच्छा औषध है । इसका पंचांग ही कुष्ठ के लिए रामबाण है । नीम के नीचे शयन, नीम के पत्तों का शाक खाना, नीम के पत्तों के काढ़े से स्नान करना, नीम के पंचांग का क्वाथ पीना, नीम के झिराब को कुष्ठ पर लगाना तथा पीना, नीम की निम्बोलियों के तैल की मालिश वा कुष्ठ पर लगाना ये सभी प्रयोग कुष्ठ को दूर भगाने के लिए लाभप्रद हैं । निम्ब अत्यन्त रक्तशोधक है । कुष्ठादि रक्तरोगों और चर्मरोगों पर अमोघ औषध के रूप में कार्य करता है । सभी को बार-बार तथा सहस्रों रोगियों पर अनुभूत है । इसके योग यथास्थान लिखे गये हैं ।


ज्वर और नीम

१. शुद्ध गोदन्ती हड़ताल १ पाव को एक मिट्टी की हांडी में रखें । नीचे ऊपर नीम के पत्तों को कूट नुगदी बिछा दें, और बीच में गोदन्ती हड़ताल की गोलियां रख दें । कपरोटी करके गजपुट की आग में फूंक दें । शीतल होने पर भस्म को निकाल लें । इसको और अच्छा बनाना हो तो नीम के पत्तों के रस की भावना देकर टिकिया बनाकर सुखा लेवें । फिर उसी प्रकार नीचे ऊपर नीम के पत्तों को बिछाकर कपरोटी पर गजपुट की आग देवें । बहुत बढ़िया भस्म तैयार होगी ।


मात्रा - १ रत्ती से २ रत्ती तुलसी के पत्तों के रस वा शहद के साथ दिन में चार बार देवें ।

यह आठ प्रकार के ज्वर अर्थात् सन्निपात ज्वर, विषम ज्वर (मलेरिया) मियादी बुखार अन्तरा, तिजारी (तेइया), चौथिया आदि सभी ज्वरों का नाश करने में रामबाण औषध है ।


२. यदि नीम का झिराव मिल जाए तो गोदन्ती हड़ताल को इसमें तीन चार दिन तक खरल करके इसकी टिकिया बना सुखाकर, कपरोटी करके मिट्टी की हांडी में गजपुट की आग में फूंक लें । टिकिया के नीचे ऊपर नीम के पत्ते कूटकर बिछा दें तथा ऊपर भी ढ़क देवें । अग्नि के शीतल होने पर भस्म को पीस छानकर रख लेवें । यह मलेरियादि आठों प्रकार के ज्वरों के लिए अत्युत्तम अचूक औषध है । सर्व प्रकार के ज्वरों को समूल नष्ट करती है ।


मात्रा - १ रत्ती से २ रत्ती तक मधु के साथ दिन रात में तीन चार बार देवें ।


उपर्युक्त योग सभी अनुभवी वैद्यों के अनुभूत है ।


नोट - तीन वा चार घण्टे तक गोमूत्र में पकाने से गोदन्ती हड़ताल शुद्ध हो जाती है ।


३. नीम के पत्ते ५ तोले, गिलोय हरी (नीम पर चढ़ी हुई) १५ तोले, मकोय के पत्ते ५ तोले, अतीस ३ तोले, चिरायता ५ तोले, पित्त पापड़ा ३ तोले, नागर मोथा ३ तोले, कुटकी ३ तोले इन सब को जौकुट (मोटी-मोटी कूट) करके सायंकाल ४ सेर जल में भिगो देवें । प्रातःकाल अग्नि पर चढ़ाकर उबालें । सवा सेर जल शेष रहने पर छानकर रख लें फिर करञ्जवे की गिरी १ तोला, असली सत गिलोय २ तोला, गोदन्ती भस्म (नीम के पत्तों वाली) १ तोला, काली अभ्रक भस्म २ तोला, श्वेत अभ्रक भस्म २ तोला, रेवन्द असारा १ तोला, छोटी इलायची के दाने सवा तोला, असली वंशलोचन १ तोला, फिटकरी की भस्म (गिलोय से भावित) ढ़ाई तोला, काली मिर्च १ तोला, नागर मोथा सवा तोला, कुनेन १ तोला - इन सबको कूट छानकर कपड़छान कर लेवें । पारा शुद्ध १ तोला, गन्धक शुद्ध १ तोला, मीठा तेलिया शुद्ध १ तोला, इनको खूब बारीक रगड़कर ऊपर वाले चूर्ण में मिला दें और फिर क्वाथ में डाल कर घोटकर चने के समान गोलियां बनायें । यह सन्निपात को छोड़कर सभी प्रकार के ज्वरों को दूर करने वाली औषध है । उचित प्रयोग से जीर्ण अस्थिगत ज्वर भी समूल नष्ट हो जाता है ।


मात्रा - १ गोली दिन में तीन बार गर्म पानी से लेवें । यह योग वैद्य बलवन्तसिंह जी पहलवान का है ।


निम्बादिचूर्ण

नीम के पत्ते १० तोले, हरड़ का छिलका १ तोला, आमले का छिलका १ तोला, बहेड़े का छिलका १ तोला, सोंठ १ तोला, काली मिर्च १ भाग, पीपल १ तोला, अजवायन १ तोला, सैंधा लवण १ तोला, विरिया संचर लवण १ तोला, काला लवण १ तोला, यवक्षार १ तोले - इन सब को कूट छान कर रख लें। इसको प्रातःकाल खाना चाहिये । मात्रा ३ माशे से ६ माशे तक है। यह विषम ज्वरों को दूर करने के लिए सुदर्शन चूर्ण के समान ही लाभप्रद सिद्ध हुआ है ।

इसके सेवन से प्रतिदिन आने वाला, दूसरे दिन आने वाला, तीसरे दिन आने वला, चौथे दिन आने वाला, दो बार आने वाला, सात दिन, दस दिन और बारह दिन तक एक समान बना रहने वाला धातुगत ज्वर और तीनों रोगों से उत्पन्न हुआ ज्वर - इन सभी ज्वरों में इसके निरंतर सेवन से अवश्य लाभ होता है ।


डॉक्टर वेरिंग का मत है - सभी प्रकार के ज्वर में नीम बहुत ही उपयोगी है । यह शीत को रोकता है और ज्वर तथा अन्य कारणों से उत्पन्न हुई निर्बलता को दूर करता है ।


विषम ज्वर पर नीम का तैल - विषम ज्वर के पुराने रोगियों को नीम के तेल की ५ से १० बूंद की मात्रा में दिन में दो बार देने से अच्छा लाभ होता है । अनेक वैद्य निम्ब तैल का मलेरिया में खूब प्रयोग करते हैं । सभी का यह अनुभव है कि नीम का तैल मलेरिया ज्वर के लिए एक उत्तम औषध है ।

डॉक्टरी मत - कोमान के मतानुसार नीम की छाल का रिंचर (आसव) मलेरिया ज्वर में, तेइया आदि में बहुत ही लाभप्रद हुआ है । नीम की ऊपरी छाल के छिलके का काढ़ा मलेरिया ज्वर के लिए अच्छा सिद्ध हुआ है । डॉक्टर कारनिस का मत है कि सिनकोन और संखिया की अपेक्षा नीम की छाल का काढ़ा अधिक लाभदायक सिद्ध हुआ है ।


नीम की छाल और ज्वर

मलेरिया और नीम - नीम की अन्तर छाल तेइयादि पार्यायिक ज्वरों को रोकने वाली, ग्राही, कटु, पौष्टिक और रसायन होती है । मलेरिया के ज्वर को रोकने के लिए नीम की छाल का गुण सिनकोना की छाल के समान है । इसमें पाया जाने वाला कड़वा रवेदार अम्ल स्वभावी द्रव्य त्वचा के मार्ग से बाहर निकलता है जिससे त्वचा में उत्तेजना उत्पन्न होती है और त्वचा की जलन शान्त हो जाती है । इसकी ऊपर की छाल में ज्वरनाशक गुण कम होते हैं । इसका संकोचक धर्म विशेष प्रधान है । नीम की छाल का उपयोग सिनकोना और संखिया के समान होता है । इसके अर्क का काढ़ा बनाकर देने की अपेक्षा चूर्ण बनाकर देना अधिक लाभदायक है । इसका संकोच वाला गुण दूर करने के लिए इसके साथ कटुकी, सोंठ, मिर्च आदि औषधियां मिलाकर दी जाती हैं । पुराने विषम ज्वर में नीम का तैल बहुत ही गुणकारी सिद्ध हुआ है । छाल की अपेक्षा तैल का प्रभाव शीघ्र और अधिक लाभप्रद होता है । इसके पत्तों का रस भी ज्वर को दूर करने के लिए दिया जाता है । ये सब औषध भोजन से पूर्व दी जाती हैं ।


मेजर डॉ. डी० वी० स्पेन्सर लिखते हैं -


१. मुट्ठी भर नीम के पत्ते लेकर पीसकर इनकी टिकड़ी बना लें और पुल्टिश के समान बालतोड़ और फोड़े फुन्सियों पर लगाने से उत्तेजक और कृमिनाशक प्रभाव होकर शीघ्र लाभ होता है ।


ज्वरनाशक क्वाथ


२. नीम की जड़ की अन्तरछाल १ छटांक लेकर जौकुट ६० तोले पानी १८ मिनट उबालकर छान लेवें । मलेरिया ज्वर में जब कोई औषधि लाभ नहीं करती हो तब इस काढ़े की ४ से सवा चार तोले तक की मात्रा ज्वर चढ़ने से पहले २-३ बार पिलाने से ज्वर रुक जाता है । जिन लोगों को कुनैन अनुकूल नहीं पड़ती उन लोगों को इस औषध से बहुत ही लाभ होता है ।


निम्बारिष्ट


३. नीम की अन्तरछाल अढ़ाई सेर को १ मन जल में चढ़ाकर औटावें । जब १६ सेर जल शेष रह जाये तो उसको छान लें । फिर इस क्वाथ में ५ सेर पुराना गुड़, ३२ तोले धाय के फूल, काला जीरा, काली मिर्च, चिरायते के फूल और पीपल - प्रत्येक दो तोला कूट पीसकर अच्छी प्रकार मिला देना चाहिए । फिर एक सुदृढ़ घड़े में घी चुपड़कर उस बर्तन में इस क्वाथ को रखकर उसका मुख दृढता से बन्द कर दें और एक मास तक पड़े रहने देवें । फिर निथर जाने पर पांच-पांच दिन के अन्तर से इसे तीन बार छान लेवें । इससे लाल रंग का सुन्दर निम्बारिष्ट तैयार हो जायेगा । इसके सेवन से सब प्रकार के चर्मरोग, कुष्ट, दाद, चम्बल, खुजली आदि सब प्रकार के मलेरिया ज्वर, इससे होने वाली निर्बलता दूर होती है ।


मात्रा - २ तोले समान जल मिलाकर शीशे के गिलास में भोजन के समय एक घंटा पीछे दोनों समय सेवन करायें । उत्तम औषध है । इसको पारिभद्रारिष्ट भी कहते हैं ।

४. नीम की अन्तरछाल को छाया में सुखाकर इसका चूर्ण सेवन करने से बारीक ज्वर घट जाता है । भारत में कुनैन से पूर्व ज्वर दूर करने के लिए यही औषधि कार्य में लाई जाती थी । कुनैन के सेवन से अनेक रोग मस्तिष्क तथा कान आंखों के रोग नये उत्पन्न हो जाते हैं । किन्तु नीम के सेवन से सभी रोग दूर होते हैं ।


५. मलेरिया ज्वर में नीम की छाल का काढ़ा दिन में तीन चार बार पिलाने से बड़ा लाभ होता है । इससे ज्वर के पीछे की निर्बलता भी दूर होती है ।


जीर्ण ज्वर जो सदा शरीर में बना रहे और दूसरी किसी औषधि से लाभ न हो तो नीम की अन्तरछाल को १ तोले की मात्रा में लेकर १० छटांक जल में उबालकर जब १ छटांक जल शेष रहे तो उसको मलछानकर प्रातःकाल के समय रोगी को पिला देना चाहिए । इस प्रकार कुछ दिन पिलाने से रोगी का ज्वरांश निकल जाएगा और रोगी ठीक हो जाएगा ।


इस प्रकार तुलना करने से ज्ञात होता है कि नीम के विषय में आयुर्वेद तथा यूनानी तिबकी मत मिलता ही है क्योंकि आयुर्वेद से ही यूनानी चिकित्सा पद्धति निकली है । ज्वर के अतिरिक्त ज्वर से होने वाली निर्बलता को भी दूर करके यह शरीर में शक्ति प्रदान करता है । अतः डाक्टरी मत में भी मलेरिया के लिए नीम अन्य औषधियों से अच्छी औषध है ।


पेट के कृमियों की औषध


१. योग - नीम की निम्बोली की गिरी १ तोला, नीम के पत्ते १ तोला, यवक्षार ६ माशे, पलाश पापड़ा ६ माशे, सैंधा लवण १ तोला, छोटी हरड़ ६ माशे, अजवायन ६ माशे, वायविडंग एक तोला - सबको बारीक पीसकर कपड़छान कर लें ।


मात्रा - ६ माशे प्रातः सायं गर्म जल के साथ लेवें । इससे पेट और मलद्वार के कृमि (चुरणे) मरकर निकल जाते हैं । इसका सेवन एक वा दो सप्ताह तक करना चाहिये ।

२. महानिम्ब (बकायन) के बीज ५ तोले, पलाश पापड़ा ६ तोले, वायविडंग ४ तोला, अजमोद - इन सबको कूट-छान कर लेवें । शुद्ध पारा १ तोला, शुद्ध गन्धक दो तोले, दोनों की कजली करके सभी वस्तुओं का बारीक चूर्ण इस कजली के साथ घोटकर एकजी कर लें ।


मात्रा - ४ रत्ती से १ माशा तक शहद में चटायें । ऊपर से नागरमोथा का काढ़ा साथ देवें । इससे पेट के चुरणे, मलके सभी प्रकार के कीड़े मरकर निकल जाते हैं ।


पेट के कृमि (कीड़े) - किसी भी शाक वा सब्जी के साथ नीम की पत्तियों को छोंककर खाने से पेट के कीड़े मर जाते हैं ।


पथरी - नीम की पत्तियों की राख दो माशे की मात्रा में निरन्तर कुछ दिन जल के साथ लेने से पथरी गलकर निकल जाती है ।


प्रमेह - नीम की छाल का काढ़ा बनाकर प्रातःकाल कई दिनों तक पिलाने से इक्षु प्रमेह और सिकता नष्ट होते हैं ।


मन्दाग्नि - नीम की पकी हुई निम्बोलियों को नित्य प्रति नियमपूर्वक खाने से मन्दाग्नि में लाभ होता है ।


कान से पीप - नीम के तैल में मधु मिलाकर उसमें बत्ती भिगोकर कान में रखने से पीप निकलना बन्द हो जाता है ।


यकृत् पर नीम - आधी छटांक नीम के ताजा पत्तों को लेकर आधा सेर उबलते हुए जल में डालकर उसको आधी छटांक की मात्रा में पिलाने से एक उपयोगी कटु पौष्टिक औषध का कार्य करता है । इसका मुख्य प्रभाव यकृत् पर होता है जिसके परिणामस्वरूप दस्त (मल) का रंग गहरा पीला हो जाता है । इसका यह क्वाथ जहां यकृत् को ठीक करता है वहाँ मलेरिया ज्वर में भी बहुत ही लाभप्रद सिद्ध हुआ है । और नीम का तैल इस क्वाथ से भी अधिक प्रभावशाली है ।


गलित कुष्ट पर - उपदंश के पुराने रोगियों के लिए यह बहुत शक्तिप्रद धातु परिवर्त्तक वस्तु है । गलित कुष्ट के रोगियों पर यह लाभदायक सिद्ध हुआ है ।


कुष्ट रोग पर नीम

१. कुष्ट रोगियों की चिकित्सार्थ परमपिता परमात्मा ने विशेष रूप से नीम को ही उत्पन्न किया है ।


प्राचीन आर्ष ग्रन्थों में लिखा है कि कुष्ठ के रोगी को बारह मास अर्थात् वर्ष भर नीम के पेड़ के नीचे सोना चाहिये । नीम की लकड़ी की ही दातुन करनी चाहिये । प्रातःकाल नीम की १ छटांक पत्तियों का स्वरस और नीम के तैल की मालिश करना तथा भोजन के पश्चात् दोनों समय पांच-पांच तोले नीम का मद (झिराव) पीना चाहिये । इससे कुष्ठ रोगी को बहुत लाभ होता है । कुष्ठ के रोगियों की शैया पर नित्य नीम की ताजी पत्तियां बिछानी चाहिएं । नीम की पत्तियों का रस निकालकर उस रस को जल में मिलाकर उस जल से कुष्ठ के रोगी को नित्य-प्रति स्नान कराना चाहिये । नीम के तैल को नीम के पत्तों की राख मिलाकर कुष्ठ के व्रणों पर लगाना चाहिये ।


२. नीम के फूल, फल और पत्तियों को समान भाग लेकर पत्थर पर खूब महीन पीस लेवें और शर्बत के समान जल में घोल कर पीना आरंभ कर दें । प्रारभ में दो माशे लेना आरंभ करें और बढ़ाते-बढ़ाते छः माशे तक बढ़ायें । इस प्रकार चालीस दिन सेवन करने से श्वेत कुष्ट में बहुत लाभ होता है ।


नीम का निर्यास गूंद कुष्ठ और उपदंश के पुराने रोगियों के लिये एक शक्तिशाली धातु परिवर्त्तक वस्तु है । इसे गलित कुष्ठ के रोगियों को सेवन कराने से भी बहुत लाभ होता है । इसका गूंद मलेरिया ज्वर को भी दूर करता है ।


श्वेत कुष्ठ


१. इसके फूल और पत्ते समभाग लेकर दो माशे की मात्रा में आरम्भ करें और यह मात्रा ६ माशे तक बढ़ाकर देवें । इस प्रकार ४० दिन सेवन करने से श्वेत कुष्ट मिट जाता है ।

२. वातरक्त और दूसरे कुष्ट आदि रोगों पर लगातार ६ मास वा एक वर्ष पीने से बहुत अधिक लाभ होता है । क्षय के ज्वर का दाह और अजीर्ण रोग में भी यह उपयोगी है । इसकी मात्रा के विषय में मतभेद है । किन्तु प्रौढ़ों के लिये इसकी मात्रा सामान्य रूप से १ से ४ तोले तक मानी जाती है ।


डॉक्टरी मत


डा. मुडीन शरीफ अपनी "मलेरिया मेडिया आफ मद्रास" नामक पुस्तक में इस रस का वर्णन इस प्रकार करते हैं –

"The Toddy of the margos tree appears to be of great service to some chronic and long standing cases of leprosy and other skin diseases, consumption reatonic dispepia and general delcility and although I have not prescribed it myself, I am acquainted with several persons who praise the drug very highly from personal use and adopted it into general practice”


अर्थात् नीम का यह मद व ताड़ी पुराने और अधिक काल तक टिकने वाले गलित कुष्ठ और दूसरे चर्म रोग, क्षय, अजीर्ण और साधारण दुर्बलता के रोगियों पर अच्छा कार्य करती है । यद्यपि मैंने इसका उपयोग नहीं किया किन्तु कई ऐसे लोगों ने जिन्होंने इसका व्यक्तिगत उपयोग किया है, उनके द्वारा मैंने इसकी प्रशंसा सुनी है ।


देहरादून के फारेस्ट कालेज के रसायन शास्त्रियों ने इस रस की ऐतिहासिक परीक्षा करके बताया कि इसमें निम्नलिखित पदार्थ पाये जाते हैं ।


१) माइस्चर (Moisture) ८६.५६ प्रतिशत । २) प्रोटेइड्ज (proteids) ३६ प्रतिशत । ३) गोंद और रंगीन पदार्थ ६.२७ प्रतिशत । ४) द्राक्षशर्करा (जी० ग्लूकोज) २.९९ प्रतिशत । ५) इक्षुशर्करा (शकोझ) ३.५१ प्रतिशत ६) भस्म ४१ प्रतिशत ।


इसकी भस्म की परीक्षा करने पर उसमें पोटेशियम लोह-एल्यूमिनियम, केलशियम और कार्बन डायोक्साइड नमक पदार्थ पाये जाते हैं ।


नीम का यह मद यूनानी मत में रक्त को शुद्ध करने वाला, कुष्ठ और उपदंश को नष्ट करने वाला है । इसको व्रण (फोड़े) पर डालने से व्रण के कीड़े मर जाते हैं । ऐसा उपदंश जो किसी औषध से दूर न होता हो, नीम के मद से दूर होता है ।


चर्म रोग और नीम

वैसे तो नीम मनुष्य के शरीर में होने वाले अनेक रोगों की औषध है किन्तु चर्म रोगों, रक्त रोगों और कुष्ठ रोगों की विशेष मानी हुई औषध है । यह सर्वत्र प्रसिद्ध है कि चर्म रोगों को दूर करने के लिए निम्ब के समान संसार में कोई अन्य औषध नहीं है ।


अन्य चर्म रोगों में नीम के पत्तों का रस पिलाने से और उसका लेप करने से अच्छा लाभ होता है । दाद, सड़ने वाले व्रण (फोड़े जख्म), माता की फुन्सियों आदि पर यह नीम की औषध बहुत लाभदायक है । रोग के पुराने पड़ने पर यह अधिक लाभ करता है ।


आतशिक उपदंश और रक्तपित्त में इसके पत्तों का रस अथवा बीजों का तैल पिलाने से और शरीर पर मालिश करने से आश्चर्यजनक लाभ होता है । बदगांठ और दूसरे व्रणों की सूजन को दूर करने के लिए इसके पत्तों को कुचल कर गर्म करके बांधना चाहिये । नीम का तैल एक अच्छी कृमिनाशक और पीपनाशक औषध है । इसके पिलाने से अथवा बाहर लगाने से अन्दर, बाहर के कृमि (कीड़े) नष्ट हो जाते हैं । कण्ठमाला आदि पककर उसमें घाव पड़ गया हो अथवा उसमें नासूर पड़ गया हो तो उसमें नीम के तैल की बत्ती बनाकर रखने से वह भर जाता है । जीर्ण ज्वर, जीर्ण विषम ज्वर, भिन्न-भिन्न प्रकार के चर्म रोग, कुष्ठ, फिरंग, उपदंश आदि रोगों में इसके तैल को ५ से लेकर १० बूंदें दिन में दो बार देना चाहिये । सन्धिवात, आमवात, जोड़ों के दर्द इत्यादि में नीम के तैल की मालिश करने से लाभ होता है । नीम के तैल में यह गुण इसके अन्दर पाये जाने वाले गन्धक के कारण रहता है । आमवात (गठिया) में इस तैल के खिलाने से भी बड़ा लाभ होता है ।

वसन्त ऋतु में इसकी कच्ची कोपलों को ७ वा ८ माशे की मात्रा में ७ वा ८ काली मिर्चों के साथ पीसकर ७ दिन तक पीने से और पथ्य में केवल बेसन की रोटी घी खाने से वर्ष भर तक किसी प्रकार का चर्म रोग तथा रक्त दोष नहीं होता ।


चर्मदल (एक्झिमा) पर नीम


चम्बल वा चर्मदल जिसे आजकल के शिक्षित लोग एक्झिमा कहते हैं, यह आजकल के चर्म रोगों में प्रधान रोग माना जाता है । यह रोग आजकल भारतवर्ष में बड़े वेग से फल रहा है, विशेषरूप से पठित वर्ग पर इसकी विशेष कृपा है क्योंकि इनका आहार-विहार अधिक दूषित है । इसकी यथोचित चिकित्सा डाक्टरों वैद्यों को अभी तक नहीं मिली नहीं । अधिक चिकित्सक इसकी चिकित्सा में विफल ही देखे जाते हैं । डाक्टर प्रायः यही कहते रहते हैं कि शरीर में उपयुक्त विटामिन की न्यूनता है । इसी कारण यह उत्पन्न हुआ है । अनेक प्रकार की विटामिन गोलियां वर्षों तक डाक्टर रोगियों को खिलाते रहते हैं । ऐलोपैथिक में इस रोग को दूर करने के लिए कई प्रकार की औषध और इंजैक्शन निकले हैं । मगर अभी तक यह विश्वास नहीं हो सका है कि उनकी चिकित्सा से यह रोग समूल नष्ट हो जाता है ।


यह चर्मदल प्रायः हाथों और पैरों पर अधिक होता है । आरम्भ में एक हाथ वा पैर पर होता है, फिर दोनों हाथों अथवा दोनों पैरों पर हो जाता है । आरम्भ में थोड़ा सा होता है, फिर हाथ पैरों को घेर लेता है । किसी रोगी के केवल एक पैर वा एक हाथ पर ही होता है । किसी के पहले हाथ वा पैर पर होकर फिर सारे शरीर को घेर लेता है । कभी-कभी ऐसे रोगी देखने में आते हैं जिनके पैर के पंजे पर प्रारम्भ में होता है, फिर सारे पंजे पिंडली और घुटने तक पहुंच जाता है । इससे सारा पैर पककर बुरी तरह सड़ जाता है । स्थान-स्थान पर फुन्सी होकर पककर पीप बहने लगती है । कई बार डाक्टर चिकित्सा में सर्वथा विफल होकर रोगी का हाथ वा पैर ही काट डालते हैं । ये बेचारे इस रोग को नहीं जानते, फिर इसकी चिकित्सा क्या करें ?


अनुभवी वैद्य लोग इस प्रकार के रोगी को नीम का क्वाथ मंजिष्ठ आदि क्वाथ पिलाकर भला चंगा कर देते हैं । अनेक वैद्यों का एक अनुभूत योग लिखता हूं -


१- नीम की छाल १ तोला, मंजिष्ठादि क्वाथ १ तोला, पीपल की छाल १ तोला, नीम की गिलोय १ तोला का क्वाथ प्रतिदिन प्रातः सायं देवें । केवल एक मास व ४० दिन इस प्रकार का क्वाथ रोगी को पिलाने से रोग समूल नष्ट हो जाता है । अनेक रोगियों पर और अनेक वैद्यों के ये अनुभूत योग है । इससे चर्मदल (चम्बल) तथा कुष्ठादि अन्य चर्म रोग नष्ट होते हैं ।


जिन रोगियों को डाक्टर असाध्य कहकर चिकित्सा करनी छोड़ देते हैं वे रोगी निम्बादि क्वाथों के सेवन से ठीक हो जाते हैं ।


निम्ब के पत्तों का तैल


२- एक पाव सरसों का तैल लेकर लोहे की कढ़ाई (साफ की हुई) में चढ़ाकर अग्नि जलायें । जब तैल खूब उबलने लगे तो उसमें १ छटाँक नीम की कोमल कोपलें डाल दें । जब वे कोंपलें जलकर काली हो जायें, तुरन्त ही कढ़ाई को नीचे उतार लें और कुछ शीतल होने पर इसे छानकर बोतल में रखें । दिन में तीन बार चर्मदल (एक्झिमा) पर लगायें । कुछ ही दिन में भयंकर से भयंकर रोग समूल नष्ट हो जायेगा किन्तु लगातार एक वर्ष तक इसे लगाते रहें तो यह पुनः आने का नाम न लेगा अर्थात् रोग बिल्कुल नष्ट हो जायेगा । स्वामी हीरानन्द जी सरस्वती आर्य सन्यासी को यह एक्झिमा भयंकर रूप धारण किये हुये था तथा दोनों पैरों पर था । इसी के सेवन से यह समूल नष्ट हो गया । इससे सस्ती और बढ़िया औषध इस भयंकर रोग की और क्या होगी ? लगाने से शांति ही मिलती है, कोई कष्ट नहीं होता । पहली बार लगाने पर रोगी सुख की अनुभूति करता है । खुजली, जलन, दाह, पीड़ा सब दूर भागते हैं । चर्म (चमड़ा) कोमल होता है । इतनी अच्छी औषध है कि जो रोगी इसका सेवन करेगा, रोग से मुक्ति पायेगा और ऋषियों के गुण गायेगा । तैल बनाते समय यह ध्यान रखें कि नीम की कोपलें थोड़ी काली होते ही तैल को नीचे उतारें, नहीं तो तैल में आग लगकर तैल जल जायेगा । यदि इस तैल को लगाते समय उन्हीं दिनों नीम के क्वाथादि साथ-साथ सेवन करेंगे तो सोने पर सुहागे का कार्य करेगा । बहुत शीघ्र लाभ होगा । रोग से मुक्ति होगी ।

३- पारिभद्रासव के सेवन से भी चर्मदलादि कुष्ठ शीघ्र दूर होते हैं ।

४- नीम का मद वा झिराव पीने से भी चर्मदलादि चर्मरोग शीघ्र तथा समूल नष्ट हो जाते हैं ।


निम्बोली का तैल


दाद, खुजली, चर्मदल (एक्झिमा), कुष्ठ, पुराना आतशिक (उपदंश), इसके कारण हुए फोड़े, व्रण, बदगांठ और पुष्ट व्रण के ऊपर यह एक बहुत उपयोगी औषध है । इस तैल के प्रयोग से दुष्ट, न भरने वाले घाव भी भर जाते हैं । यदि नीम का तैल अधिक उत्तेजक हो, अधिक लगे तो इसमें नीम की कोपलों का रस बराबर का मिलाकर किसी वस्तु से इसे खूब मथें कि यह एकरस हो जाये । इसमें देशी मोम मिलाने से और भी कोमलता आ जायेगी । इसके लगाने से परोपजीवी कीटाणुओं से होने वाले दाद, खुजली, चर्मदल आदि चर्मरोगों के लिए यह निम्ब तैल अमृत तुल्य सिद्ध हुआ है । जहां पर कीटाणुओं के होने का सन्देह हो वहां इस निम्ब के तैल के लगाने से सभी कीटाणु नष्ट होकर त्वचा स्वस्थ हो जाती है । यदि कीटाणु चर्म के अन्दर अधिक गहरे घुस गये हों तो उन स्थानों पर इस तैल को कम से कम १० मिनट अथवा इससे अधिक समय मालिश करनी चाहिये । इससे कीटाणुप्रजनित रोग समूल नष्ट होंगे ।


निम्ब का हरिद्राखण्ड


नीम का रस ६० तोले, खांड ३२ तोले दोनों को मिलाकर हल्की आंच पर पकाना चाहिये । जब वह रस ऐसा गाढ़ा हो जाये कि चम्मच से चिपकने लगे तब उसमें चित्रक हल्दी, हरड़, बहेड़ा, आंवला, नागरमोथा, काली जीरी, अजवायन, अजमोद, निर्गुण्डी के बीज, सोंठ, मिर्च, पीपल, निसोथ, दन्ती की जड़, नीम के बीज और बावची के बीज दो-दो तोले, बायबिडंग और अनन्तमूल चार-चार तोला लेकर इन सब औषधियों का कपड़छान चूर्ण इसमें मिलाकर किसी कांच के पात्र में भर देवें । इसकी मात्रा - १ तोला प्रातः सायं शीतल जल के साथ सेवन करें । इसे खाकर ऊपर से शीतल जल पी लेवें । इसके सेवन से कुष्ठ, दाद, खुजली, चर्मरोग, भगन्दर, नासूर, विद्रधि, नहीं भरने वाले जख्म, कृमि रोग नष्ट होते हैं । अजीर्ण, कामला, वायुगोला और सूजन की व्याधि में भी यह लाभ पहुँचाता है ।


बृहत्यच निम्ब चूर्ण


नीम के फूल, फल, छाल, जड़ और पत्र सब दो-दो तोला, हरड़, बहेड़ा, आंवला, सोंठ, मिर्च, पीपल, ब्राह्मी, गोखरू, चित्रक की जड़, बायविडंग, अनन्तमूल, बराही कन्द, लोहभस्म, दारुहल्दी, अमलतास, शक्कर कुठ, इन्द्र जौ, काली पहाड़ की जड़, शुद्ध भिलावे (गाय के गोबर के साथ ओटाये हुए) प्रत्येक एक-एक तोला लेकर इन सबको कूट पीसकर खैर (खदिर) की अन्तरछाल के काढ़े से ५ भावनायें देवें । फिर नीम की अन्तरछाल को सात भावनायें देकर इस चूर्ण को सुखा लेवें । इसे कपड़छान करके बोतल में भर देवें । विरेचनादि से शरीर शुद्धि करके मात्रा ३ माशे से ६ माशे तक गोघृत ६ माशे, शहद एक तोला मिलाकर प्रातः सायं दोनों समय चटायें । इसके सेवन से सर्व प्रकार के चर्म रोग, दाद, खुजली, चर्मदल, चम्बल, हर प्रकार का कुष्ठ, रतवा, भगन्दर, वातरक्त, व्रण नासूर, विष विकारादि रोग दूर होते हैं । प्लेग, हैजा, शीतला, मलेरिया इत्यादि उपद्रव वाली ऋतुओं में इसका सेवन करने से इन रोगों के आक्रमण का भय नहीं रहता ।


निम्ब वारुणी


नीम की ताड़ी ८ सेर, गुड़ सवा सेर, अदरक १ छटांक, नीम की अन्तरछाल आधा सेर एक मिट्टी के घड़े में नीम की ताड़ी डाल देवें । फिर उसमें छाल, गुड़ तथा अदरक कूटकर डाल देवें और घड़े का मुख कपरोटी करके बंद करके २४ दिन तक मिट्टी में गाड़ देवें । पच्चीसवें दिन उस घड़े को निकाल करके भबके से अर्क खींच लें । इस अर्क को भोजन के पीछे मात्रा ४ तोले में लेने से कुष्ठ, बवासीर, पुराना ज्वर, वातरक्त, गठिया, मन्दाग्नि और पीलिया रोग नष्ट होते हैं ।


कुष्ठ और नीम


नीम सर्वप्रकार के कुष्ठों के लिए अमृत के समान औषध है । नीम के पंचांग सभी कुष्ठों को विधिपूर्वक सेवन करने से दूर करते हैं ।


१- पंचनिम्ब चूर्ण - नीम के पत्ते फूल, फल, जड़ और छाल इन सबको समान भाग लेकर कूट-पीस कपड़-छान कर लें । मात्रा ३ माशे से ६ माशे तक दूध वा गोमूत्र के साथ प्रातः सायं सेवन करने से कोढ़, विसर्प, वबासीरादि रोग दूर होते हैं ।


मंजिष्ठादि क्वाथ


इस क्वाथ में भी नीम की छाल डाली जाती है । इस क्वाथ वा काढ़े के पीने से कोढ़, खुजली, चर्मदल, श्वेतकुष्ठादि सब दूर होते हैं ।


मंजिष्ठ, नीम की छाल, बाबची, चकबड़ के बीज, हरड़ छिलका, आंवला छिलका, हल्दी, अडूसे के पत्ते, शतावर, बटियारा, गुलसकरी, मुलेठी, गोखरू, परवल के पत्ते, खस की जड़, गिलोय और लाल चन्दन - इन सब औषधियों को दो-दो माशे लेवें तथा यथाविधि क्वाथ बनाकर प्रातः सायं रोगी को पिलायें तो कुष्ठादि सब रोग दूर होंगे । इसका सेवन दीर्घकाल तक करना चाहिये ।


पंचनिम्ब का अवलेह


नीम के फल, फूल, पत्ते, छाल और जड़ सब दो-दो तोले कपड़छान कर लें । फिर इस चूर्ण में जलभांगरे के रस की सात भावनायें देवें ।


हरड़, बहेड़ा, आंवला, सोंठ, काली मिर्च, पीपल, ब्राह्मी, गोखरू, शुद्ध भिलावे, चीता, बायविडंग का क्षार, बाराही कन्द, लोहे का चूर्ण, हल्दी, दारूहल्दी, बाबची, अमलताश, मिश्री, कूठ, इन्द्र जौ और पाढ़ - इन इक्कीस औषधियों को समभाग लेकर कपड़छान कर लें, फिर इस चूर्ण में कत्था, विजयसार और नीम के काढे की भावना देकर छाया में सुखायें । फिर जलभांगरे की सात भावना देवें और फिर हरड़ादि चूर्ण का एक भाग और पंचनिम्ब चूर्ण के दो-दो भाग लेकर मिलाकर छानकर रख लें । पहले कोढ़ी का वमन विरेचन करायें तथा फिर इस चूर्ण की मात्रा ६ माशे शहद, पंचतिक्त घृत, खैरसार के काढ़े के साथ अथवा गर्म जल के साथ देवें । इसके कुछ मास तक सेवन करने से श्वित्र (श्वेत कुष्ठ), चर्मदल (चम्बल), गलित कुष्ठ, बवासीर, भगन्दर, नासूर सभी प्रकार के चर्म तथा रक्त के दोष दूर होते हैं । साधारण कुष्ठ तो इसके एक मास के सेवन से ही दूर हो जाता है । नीम की छाया में सोने तथा इसके दो तीन वर्ष तक सेवन करने से तो सर्व प्रकार के कुष्ठ दूर होते हैं । मधु में मिलाकर चाटने से बड़े-बड़े भारी पेट वाले रोगी ठीक होकर पतले पेट हो जाते हैं । मोटापे की उत्तम औषध है । इसका सेवन करने वाले को यदि सर्प भी काटे तो सर्प ही मर जाता है । इसकी मात्रा ६ माशे से लेकर धीरे धीरे ४ तोले तक बढ़ाई जा सकती है । इसका अवलेह मधु डालकर अथवा खांड की चाशनी डालकर बनाकर सेवन करायें ।

पथ्य - इसके सेवन समय अवलेह के पचने पर चिकना, हल्का और हितकारी भोजन देवें । मिर्च, खटाई, तैल, कच्चामीठा, मांस, शराब, अचारादि न खायें । यदि लवण और मीठे का त्याग करके केवल बेसनी रोटी और गोघृत का ही सेवन करायें तो सोने पर सुहागा का कार्य होगा ।


नीम का मद मलने से कोढ़ दूर होता है ।


पंचतिक्त घृत - गुग्गुल का योग सर्वत्र आयुर्वेद की पुस्तकों में लिखा है, उसका सेवन भी बहुत लाभदायक है । इसमें भी नीम की छाल पड़ती है ।


कन्दर्प सार तैल - इस में भी नीम की छाल पड़ती है । इस तैल के लगाने से सर्व प्रकार के कोढ़, श्वित्र कुष्ठ और गण्डमालादि रोग भी नष्ट होते हैं ।


दाद - नीम की पत्तियां दही में पीसकर लगाने से दाद नष्ट हो जाता है ।


खुजली - नीम की कोपलें दो तोले जल में पीसकर छानकर पीने से खुजली नष्ट हो जाती है । दो सप्ताह न्यून से न्यून पीवें । नीम की पत्तियों का क्षार सेवन करने से कोढ़, दाद और खुजली नष्ट होते हैं ।


दर्पनाशक

नीम के सेवन से यदि कुछ विकार आ जाये तो उसको घी, गाय का दूध और सैंधे लवण के सेवन से दूर करना चाहिए । जिनकी कामशक्ति दुर्बल है उनको निम्ब का अधिक सेवन नहीं करना चाहिये । प्रातःकाल उषःपान करने वालों को नीम नहीं खाना चाहिए । प्रतिनिधि नीम के न मिलने की अवस्था में बकायन की छाल और उसके पत्तों का व्यवहार करना चाहिये । बकायन भी नीम के समान गुणवाला है । इसका नाम इसीलिए महानिम्ब है । किन्तु बकायन में विष का अंश अधिक होता है । इसीलिए इसे थोड़ी मात्रा में सेवन करना चाहिये ।


यूनानी मत - यूनानी हकीमों के मत में नीम पहले दर्जे में गर्म और खुश्क है । किसी के मत में पहले दर्जे में सर्द और खुश्क है ।


रक्त शोधक - रक्त शुद्ध करने वाली जितनी औषधियां हैं, उस सब में नीम की जड़ की छाल सबसे श्रेष्ठ है । कुष्ठ, खुजली, दाद और फोड़े फुन्सी में यह बहुत लाभ पहुंचाती है । यह त्रिदोषनाशक, पाचक, वित्त ज्वर को दूर करने वाला और प्यास को मिटाने वाला है ।


फोड़े जख्म - नीम के पत्तों को पीसकर उन पर गीला कपड़ा लपेट आग में भुरता (भुड़ता) बनायें तथा फोड़ों वा सड़े हुए व्रणों (जख्मों) पर बांधें । इससे न भरने वाले फोड़े वा जख्म ठीक होकर शीघ्र ही मर जाते हैं ।


आग के जले पर - आग के जले हुए स्थान पर इसका तैल वा मरहम बनाकर लगाने से बड़ी शान्ति मिलती है ।


नासूर - नीम के सूखे पत्ते और बुझे हुए चूने को नीम के हरे पत्तों के रस में घोटकर नासूर में भर देने से नासूर ठीक हो जाता है


अर्श (बवासीर) पर नीम

१- नीम के पत्ते २ तोले, पीपल के पत्ते २ तोले दोनों को खूब रगड़कर जल वा सरसों के तैल के साथ कई दिन तक लेप करने से अर्श के मस्से नष्ट हो जाते हैं ।


२- निम्बोली की गिरी, भिलावा और हाथी की हड्डी समभाग लेकर मस्सों पर लेप करने से अर्श के मस्से नष्ट हो जाते हैं । औषध तेज है, सावधानी से मस्सों पर ही लगायें ।


३- निम्बौली का तैल, मुर्दासंग, राल और सुपारी का चूर्ण समभाग लेवें और सरसों के तैल में घोटकर लगाने से मस्सों का सूजन दूर होकर अर्श में लाभ होता है ।


विशेष बात


जब अर्श के मस्सों पर लेप करना हो तो उससे पूर्व रोगी को तीन दिन तक अपथ्य वस्तुओं को खूब खिलायें । इससे भीतर के मस्सें भी अच्छी प्रकार फूलकर बाहर निकल आयेंगे । फिर लेप करना आरम्भ करें । प्रयोग आरम्भ करने के पश्चात् पथ्य भोजन देवें । प्रतिदिन पेट की शुद्धि करें ।


अर्शनाशक जादूभरी गोलियां

४- योग - नीम की निम्बोली की गिरी १० तोले, बायविडंग ५ तोले, बकायन फल (महानिम्ब) की गिरी ५ तोले, खूनखराबा ५ तोले, तृणकान्त ५ तोले, सनाय के पत्ते ४ तोले, सब को कूटकर कपड़छान कर लें ।


इसमें त्रिफला १५ तोला जिसको निम्न बूटियों के रस की भावना दी हो । अर्थात् त्रिफला १५ तोले कपड़छान किया हुआ हो । इसको कुकरौंदे के रस में अच्छी प्रकार भिगोकर धूप में सुखा दें, सूखने पर पित्त पापड़े (शाहतरे) के रस में भिगोकर सुखा देवें । सत्यानाशी के रस में भिगोकर सुखायें, अतिबला के रस में भिगोकर सुखा देवें । त्रिफले को निरन्तर १५ दिन तक उपरिलिखित औषधियों के रस में बार-बार भिगोकर सुखाते रहें अर्थात् १५ भावनायें अवश्य देवें । रस सूख जाने पर चूर्ण को सूखा पीस कर ऊपर वाली औषधियों के चूर्ण में मिला देवें और इस सारी औषधियों के चूर्ण को १० तोले गोघृत वा बादाम रोगन में भिगोवें और इस सारे चूर्ण के समभाग शुद्ध रसौंत मिलावें और फिर सारे चूर्ण को मूली के स्वरस में २१ दिन तक खरल करें । चने के समान गोलियां बनावें ।


मात्रा - ४ गोली से ८ गोली तक गाय के दूध के साथ प्रातः सायं लेवें । चालीस दिन तक सेवन करने से सब प्रकार के अर्श (बवासीर) सदा के लिए समूल नष्ट हो जाते हैं । यदि कब्ज (कोष्ठबद्धता) हो तो ईसबगोल १ तोला दूध के साथ ही औषध लेते समय सेवन करें । ईसबगोल के भुस्सी का सेवन भी लाभकारी है ।


उपरोक्त प्रकार की औषध को हमने सैंकड़ों रोगियों पर प्रयोग किया है । लाभ सभी को हुआ है । अस्सी प्रतिशत रोगियों का तो समूल नष्ट हो गया ।


५- प्रतिदिन नीम के २१ पत्तों को लेकर मूंग की भिगोई हुई और धोई हुई दाल के साथ पीसकर बिना किसी प्रकार का मसाला डाले, उसकी पकोड़ियां पकाकर घी में तलकर खानी चाहियें । इस प्रकार २१ दिन खाने से बवासीर के मस्से निर्बल होकर गिर जाते हैं । इस औषध के सेवन करने वालों को पथ्य में केवल गाय का ताजा मट्ठा पीकर रहना चाहिये, अन्य कोई वस्तु नहीं खानी चाहिये । यदि न रह सकें तो भात और मट्ठा इन दो वस्तुओं पर रहना चाहिये । यदि लवण के बिना न रह सकें तो बहुत थोड़ा सैंधा लवण ही लें । न लें तो अधिक लाभ होगा ।


६- निम्बोली की गिरी १ तोला, रसौंत आधा तोला, हीरा दखन आधा तोला, गोलिका एसिड आधा तोला, अफीम आधा तोला, बोदरसग आधा तोला (६ माशे), संगजराहत आधा तोला, कपूर आधा तोला - इन सब वस्तुओं को बारीक पीसकर गाय के मक्खन में मिलाकर मलहम बना लेवें । इस मलहम को शौच जाने के पीछे प्रातः सायं बवासीर पर लगाने से कष्ट दूर होता है । उपरिलिखित दोनों औषध खाने तथा लगाने की एक साथ प्रयोग करने से बवासीर के इस भयंकर रोग से भी छुटकारा मिल जाता है ।


७- नीम की निम्बोली का तैल निकालकर बवासीर के मस्सों पर मलने से लाभ होता है ।


मात्रा - तीन माशे से ६ माशे तक जितनी अनुकूल पड़े उतनी औषध का सेवन करें ।


अर्श (बवासीर)


१- नीम की निम्बोली का तैल निकालकर बवासीर के मस्सों पर मलने से लाभ होता है ।

२- नीम की निम्बोली, कलमी शोरा, रसौंत, एलुआ और हरड़ - इनको एक-एक तोला लेकर, मूली के रस में घोटकर जंगली बेर के समान गोलियां बनायें । इन गोलियों का प्रातः सायं जल वा गोदुग्ध के साथ सेवन करें । यह एक ही दिन में खून को बंद कर देती है । इससे कब्ज दूर होता है तथा बादी बवासीर इसके एक मास के निरन्तर सेवन से समूल नष्ट हो जाती है । अनुभूत है ।

३- नीम की निम्बोली, बकायन के फल, रसौंत, शुद्ध गूगल, बड़ी हरड़ का छिलका - सबको दो-दो तोले लेवें । पीपल बड़ा १ तोला, गुलाब के फूल छः माशे, सनाय के पत्ते छः माशे - सबको कूटकर कपड़छान कर लें । खरल में डालकर शुद्ध गूगल भी इसमें डाल लें तथा त्रिफले के काढ़े में घोटकर एक-एक माशे की गोलियां बनायें और रात्रि को सोते समय दो गोलियां खाकर ऊपर से थोड़ा उष्ण गाय का दूध पीवें । बवासीर सर्वप्रकार की समूल नष्ट हो जाती है । अनुभूत है ।

४- छोटी हरड़ ४ तोले, नीम की निम्बोली की गिरी २ तोले, बकायन की बीजों की गिरी २ तोले, रसौंत २ तोले, भांग के पत्ते १ तोला, काली मिर्च १ तोला - इन सबको कपड़छान कर लें तथा सबको कुकरौंधे के रस की तीन भावना देवें । तीन बार मूली के रस की भावना देवें, तीन बार हुलहुल के रस की भावना देवें और इसी प्रकार जलभंगरे की तीन भावना देकर जंगली बेर के समान गोलियां बनायें तथा प्रातः सायं एक-एक गोली ताजा जल के साथ सेवन करायें । इसके सेवन से सर्वप्रकार का अर्श नष्ट हो जाता है ।

५- नीम के फलों का गूद्दा ४ माशे शिला पर पीसकर जल में छान लें तथा सेवन करें । लाभ होगा ।


नीम का मलहम


नीम का तैल 1 पाव, मोम आधा पाव, नीम की हरी पत्तियों का रस 1 सेर, नीम की जड़ की छाल का चूर्ण 1 छटांक, नीम की पत्तियों की राख आधा छटांक । एक लोहे की कढाई में नीम का तैल, नीम की पत्तियों का रस डालकर हल्की आंच पर पकायें । जब जलते-जलते छटांक, आधी छटांक रह जाये तब उसमें मोम डाल दें । जब मोम गलकर तैल में मिल जाये तब कढाई को चूल्हे से नीचे उतार लेवें । फिर नीम की छाल का चूर्ण और नीम की पत्तियों की राख उसमें मिला देवें । यह नीम का मलहम बवासीर के मस्सों, पुराने घाव, नासूर जहरीले घावों पर लगाने से बहुत लाभ करता है । यह घावों का शोधन और रोपण दोनों काम एक साथ करता है। सड़े हुए घाव, दाद, खुजली, एक्झिमा को भी दूर करता है । पशुओं के घावों को भी ठीक करता है ।


नीम और चेचक

चेचक का रोग बड़ा भयंकर है । आजकल तो सर्वत्र दीवारों पर यह लिखा मिलता है कि चेचक का रोगी बताओ और एक हजार रुपया इनाम पाओ । कोई विदेश यात्रा करना चाहे तो उसे चेचक का टीका अवश्य लगवाना पड़ता है । इसके बिना कोई विदेश यात्रा कर ही नहीं कर सकता । जितनी बार मैं विदेश गया, उतनी ही बार न चाहते हुए भी चेचक का टीका लगवाने के लिए विवश किया गया । इसके प्रमाणपत्र के बिना कोई विदेश यात्रा विमान व समुद्रयान द्वारा कर ही नहीं सकता । अतः चेचक के रोग को भारत में ही नहीं, किन्तु सभी देशों में भयंकर माना जाता है । जब चेचक का रोग उग्ररूप धारण करता है तो चिकित्सा विज्ञान के सारे प्रयोग विफल हो जाते हैं । इसीलिये अधिकतर भारतीय जनता तो इसे दैवी प्रकोप मानकर भगवान के भरोसे छोड़कर कोई चिकित्सा नहीं करती । कुछ देवी-देवताओं की पूजा करके इसे दूर भगाने की मूर्खता करते हैं ।


आयुर्वेद शास्त्र में चेचक की चिकित्सा लिखी है । उसमें सबसे अधिक प्रयोग नीम का ही किया जाता है । यथार्थ में नीम चेचक रोग की एक विशेष और सुलभ औषध है । जो लोग चेचक के दिनों में नीम का सेवन करते हैं उन्हें या तो निकलता ही नहीं,यदि निकल भी आये तो बहुत उग्ररूप धारण नहीं करता ।


१- यदि कहीं चेचक फैली हुई हो तो नीम की लाल रंग की कोमल पत्तियां सात-सात और काली मिर्च सात-सात नियमपूर्वक एक मास तक खाने से एक वर्ष तक चेचक निकलने का भय नहीं रहता ।


२- नीम के बीज (गिरी), बहेड़े के बीज और हल्दी - इन तीनों को समभाग लेकर शीतल जल में पीस छानकर कुछ दिनों तक पीने से चेचक के निकलने का भय नहीं रहता । सब वस्तुओं को छः छः माशे लेना चाहिये ।


३- तीन माशे नीम की कोंपलों को १५ दिन तक लगातार खाने से ६ मास तक चेचक नहीं निकलती । यदि निकल भी आये तो अधिक कष्ट नहीं होता, आंखें नहीं बिगड़तीं ।


४- यदि चेचक के दाने (फुन्सियां) शरीर में निकल आयें तो बड़ी सावधानी, पवित्रता तथा धैर्य और श्रद्धापूर्वक रोगी की सेवा करनी चाहिये । यदि चेचक निकलने पर किसी प्रकार का उपद्रव नहीं हो तो भूलकर भी औषधि का प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि बिना उपद्रव का चेचक का रोग समय पर स्वयं शान्त हो जाता है । यदि चेचक में उपद्रव हों तो उस समय रोगी का उपचार केवल नीम क द्वारा ही करें तो सर्वोत्तम होगा ।


५- रोगी के निवास स्थान में नित्यप्रति नीम की ताजा पत्तियां टांगनी चाहियें । कमरे के द्वार पर तथा खिड़कियों में नीम की पत्तियों का वन्दनवार बांधना चाहिए ।


६- यदि रोगी को अधिक दाह वा जलन प्रतीत होती हो जिसे वह सहन भी न कर सके तो नीम की पत्तियों को पानी में पीसकर घोलकर वस्त्र से छान लेना चाहिए और मथानी (रई) से उसे मथ (बिलोकर) उसका झाग (फेन) रोगी के शरीर पर लगाना चाहिये । इससे जलन दूर होकर रोगी को शांति मिलेगी ।


७- यदि रोगी को अधिक दाह वा जलन हो तो उसके बिस्तर पर नीम की कोमल पत्तियां बिछानी चाहियें । जब बिस्तरे की पत्तियां मुरझा जायें तो उनको बदल देवें । चेचक की फुन्सियों, व्रणों (जख्मों) पर मक्खियां न बैठने देवें । इसका ध्यान अधिक रखना चाहिए । रोगी सेवक को आवश्यक है कि वह नीम की पत्तियों का चंवर बनाकर उसी से चेचक के रोगी के शरीर पर वायु करता रहे और मक्खियां न बैठने देवे ।


८- चेचक के दानों में इतनी अधिक उष्णता होती है कि रोगी उसे सहन नहीं कर सकता । उसकी गर्मी और जलन से रोगी को यदि चैन न पड़े तो ऐसी दशा में नीम की कोमल पत्तियों को पीसकर चेचक के दानों पर लेप करना चाहिए । नीम के बीजों की गिरी को पानी में पीसकर लेप करने से भी जलन शान्त होती है । बीजों अथवा पत्तियों को जल के साथ पीसकर खूब पतला लेप करना चाहिए । चेचक की फुन्सियों पर कभी भूलकर भी मोटा लेप नहीं करना चाहिए ।


९- चेचक के रोगी को यदि अधिक प्यास लगती हो तो नीम की छाल जलाकर उन अंगारों को जल में डालकर बुझावें और उसी जल को छानकर रोगी को पिलावें । इससे प्यास शान्त हो जायेगी । यदि इस प्रयोग से भी प्यास न मिटे तो एक सेर जल में एक तोला नीम की कोमल पत्तियां औटाकर जब आधा जल शेष रह जाये तो उतार छानकर रोगी को पिलायें । इससे प्यास अवश्य मिट जायेगी । प्यास के अतिरिक्त यह जलप्रयोग चेचक के विष और ज्वर के वेग को भी हल्का करेगा । इसके प्रयोग से चेचक के पके हुए दाने शीघ्र सूख जाते हैं ।


१०- कभी-कभी चेचक के दाने ठीक से नहीं निकलते अथवा बहुत न्यून निकलते हैं और चेचक का विष और गर्मी अन्दर ही रह जाती है । परिणामस्वरूप रोगी के शरीर में उष्णता बहुत अधिक होने से रोगी इसे सहने में असमर्थ हो तड़फने लगता है और प्रलाप भी करने लगता है । ऐसी अवस्था में नीम की हरी कोमल पत्तियों का रस प्रातः, दोपहर और सायं को एक-एक तोले की मात्रा में पिलाना चाहिए । इससे दाने खुलकर निकल आते हैं । रोगी को शांति मिलती है ।


११. जब चेचक के रोगी की फुन्सियाँ सूख जायें तब नीम की पत्तियों को जल में उबालकर उसे ठंडा करके रोगी को स्नान करायें । स्नान के पश्चात् निम्बोलियों के तैल की मालिश सारे शरीर पर करायें ।


१२- जब चेचक के दाने अच्छे हो जाते हैं तब उनके स्थान पर छोटे-छोटे गड्ढ़े दिखाई देते हैं और मुखादि की आकृति बिगड़ जाती है । उन स्थानों पर कुछ दिन नीम का तैल अथवा निम्बोलियों की गिरी को जल में पीसकर लगाया जाये तो वे दाग मिट जाते हैं । इसके दागों को मिटाने के लिए गुरुकुल झज्जर का सञ्जीवनी तैल अमृत तुल्य कार्य करता है ।


१३- चेचक रोग के पश्चात् रोगी के शरीर के बाल प्रायः झड़ जाते हैं । कुछ दिन नीम के तैल की लगातार मालिश करने से सिर के बाल शीघ्र ही जम जाते हैं ।


नीम की छाल


१- नीम की छाल का क्वाथ अथवा इसका निर्यास वा सत्त्व बना कर सेवन करने से कुष्ठ और उपदंश के रोग दूर होते हैं तथा मलेरिया ज्वर को भी ठीक करता है ।

२- कुष्ठ में नीम की छाल का क्वाथ पीने से और नीम की निम्बोली के तैल की मालिश करने से चमड़े के सभी रोग, कुष्ठ, दाद, खुजली, चर्मदल, चम्बल आदि समूल नष्ट होते हैं ।

३- जो बिगड़े हुए व्रण (फोड़े) दूसरी औषधियों से शान्त न होते हों उन पर नीम पत्तियों की पुल्टिश को बांधने से बहुत लाभ होता है ।


४- विषैले घाव - नीम की पत्तियों का रस, सरसों का तैल, पानी इन सबको पकाकर लगाने से घाव अच्छे हो जाते हैं ।

५- नीम की छाल की भस्म (राख) लगने से हमेशा बहने वाले फोड़े अच्छे हो जाते हैं ।


६- नासूर - जिस घाव में नासूर पड़ गया हो और उसमें हर समय बहकर पीप निकलता हो उस पर नीम की पत्तियों की पुल्टिश बांधने से बड़ा लाभ होता है ।

७- नीम के पत्तों को दही में पीसकर लगाने से दाद समूल नष्ट हो जाता है ।

८- नीम की ताजा लकड़ी को पानी में घिसकर १ इंच मोटा लेप करने से रक्तार्बुद (रसौली) की गांठ मिट जाती है ।

९- पावभर नीम की छाल को जौकुट करके १ सेर खोलते हुए जल में डालकर रात भर पड़ा रहने देवें । प्रातःकाल उसे कपड़े से छानकर उसमें से ५ तोला काढ़ा रोगी को पिलायें और शेष काढ़े से उपदंश के जख्मों को धोयें । कई मास के प्रयोग से उपदंश के रोगी को पूर्ण लाभ होगा ।


नीम का मद वा झिराव


१- नीम के पुराने वृक्ष जब उत्तेजना पर आते हैं तो उनमें से एक प्रकार का मद झिरने लगता है । इसको नीम की ताड़ी भी कहा जा सकता है । कई वृक्षों में यह मद वर्ष-वर्ष भर तक झरता रहता है । यह रस स्वाद में मीठा, गन्ध में कड़वा, अप्रिय और बहुत गाढ़ा होता है । जिस समय यह मद झरता है उस समय वृक्ष में एक प्रकार का मधुर शब्द निकलता रहता है । इस मद को अंग्रेजी में ताड़ी (Nim today of margasa tree) कहते हैं । यह रस एक बहुत दुर्लभ औषध है । चर्मरोगों, खुजली, फोड़े, फुन्सी, दाद, विस्फोटक में यह बहुत उपयोगी है । यह रक्त को शुद्ध वा स्वच्छ करता है । रक्तविकार में इसको पीने से बहुत लाभ होता है ।

२- नीम की छाल का अर्क २ तोले से ४ तोले की मात्रा में पीने से और २ घण्टे के पीछे तत्काल बनी हुई रोटी घी के साथ खाने से लकवा, अर्द्धांग, गठिया, जलोदर, कोढ़, गले सड़े व्रण, फोड़े, तर खुजली और दाद चम्बलादि रोग दूर होते हैं ।


नेत्ररोग

१- नीम के कोमल पत्तों का स्वरस निकालकर गर्म-गर्म जिस ओर आँख दुखती हो, उसकी दूसरी ओर के कान में डालना चाहिये । यदि दोनों आँखें दुखती हों तो दोनों कानों में डालना चाहिए ।

२- नीम के फूलों को छाया में सुखाकर समान भाग कल्मी शोरे के साथ पीस लेना चाहिए । इसको कपड़े में छानकर आंख में डालने से आँख का फूला, धुन्ध, माड़ा इत्यादि रोगों को लाभ होता है और आँखों की ज्योति बढ़ती है ।


३- रतौंधी - नीम के तैल को आँखों में आंजने से और नीम के ६ तोले स्वरस को दो दिन तक प्रातःकाल पीने से रतौंधी दूर होती है । किन्तु पीने का प्रयोग २ दिन से अधिक नहीं करना चाहिए ।

४- नीम की पत्तियों का रस निकालकर आंखों में टपकाने से बेफनी लगना और जलन इत्यादि नेत्र सम्बन्धी विकार नष्ट हो जाते हैं ।


५- नीम का काजल - नीम की पत्तियां नग ७, नीम के सूखे फूलों का चूर्ण १ माशा, नीम का तैल १ तोला, साफ महीन कपड़ा ४ इंच - कपड़े को लेकर उस पर नीम की सूखी पत्तियां और नीम के सूखे फूलों का चूर्ण बिछा दें । फिर उस कपड़े को हाथ से मसलकर बत्ती बनावें । एक मिट्टी के दीपक में नीम का तैल डाल कर उसमें उस बत्ती को डुबोकर जलावें । जब बत्ती अच्छी प्रकार जलने लगे तब उस पर एक ढकनी लगाकर काजल तैयार करें । इस को आंख में आंजने से सब प्रकार के नेत्र रोग दूर होकर ज्योति बढ़ती है ।

६- गाय के घी में नीम के पत्तों का रस डाल देवें तथा रूई की बत्ती को रस में भिगो देवें । फिर बत्ती को जलाकर मिट्टी के पात्र पर काजल लेवें तथा इस काजल का प्रयोग करने से जाला कट जाता है । आंख के सभी रोगों में लाभदायक है ।

७- नीम के तैल में रूई की बत्ती भिगोकर दीपक में जला कर काजल तैयार करें तथा इसको सायंकाल सोते समय आंखों में डालें तो नेत्र सम्बन्धी सभी विकार दूर होते हैं ।


अन्य गुण


१- नीम के हरे पत्तों का रस नाक में टपकाने से सिर का दर्द वा पीड़ा, तथा कान में टपकाने से कान का शूल मिटता है । इसकी लकड़ी की ताजी दातुन करने से और नीम के काढ़े से कुल्ले करने से दांत और मसूढ़े सुदृढ़ होते हैं । इसके पत्तों को पीसकर इसकी टिकिया बनाकर तवे पर सेककर जल के साथ पीने से लिंगेन्द्रिय के अन्दर का क्षत (जख्म) भर जाता है ।


२- कुरूपता नाशक योग - नीम के पत्ते, हरड़ की छाल, लोध, अनार का बक्कल, आम का बक्कल - सबको समभाग लेवें, जल में पीसकर स्त्री वा पुरुष शरीर पर उबटन लगावें । कुछ ही दिनों में कुरूपता नष्ट होकर शरीर का सुन्दर वर्ण होकर शरीर चमकने लगेगा ।


३- प्रदर रोग पर - उत्तम सेलखड़ी (घीया भाठा) १ पाव लेकर खरल में बारीक पीस लेवें । नीम के हरे पत्तों वा कोंपलों का रस निकाल कर तीन पुट वा भावना देवें । छाया में सुखाकर गजपुट में फूंक लेवें । नीचे ऊपर नीम के पत्तों की नुगदी बिछा तथा ढ़क देवें और आग देने पर भस्म सफेद रंग की न बने तो पुनः वही क्रिया करें । यदि इसी प्रकार तीन बार अग्नि में पुट देवें तो उत्तम भस्म तैयार होगी । मात्रा एक-एक रत्ती प्रातः सायं धारोष्ण गाय के दूध के साथ अथवा ताजा जल के साथ देवें । अथवा दही की मलाई में छोटी इलायची के बीज का चूर्ण मिश्री मिलाकर प्रत्येक का सम्पुट देकर प्रयोग करें । सप्ताह भर सेवन करने से प्रदर रोग समूल नष्ट हो जाता है ।


हैजे पर - हैजे के अन्दर दस्त और वमन होते हों और बहुत प्यास लगती हो तो नीम के पत्तों को पीसकर उनका गोला बनाकर उस पर कपड़मिट्टी करके भूबल में दबायें । जब लाल हो जाये तो उसको निकाल मिट्टी दूर करें और निचोड़ कर रस निकालें ।

मात्रा - एक तोला थोडी-थोड़ी देर में अर्क गुलाब के साथ मिलाकर देने से अच्छा लाभ होगा ।


यूनानी मत में नीम के फूल - नीम के फूलों का काढ़ा बनाकर उसके कुल्ले करने से दांत और मसूड़े सुदृढ़ होते हैं । इनका अर्वा रक्त विकार और कुष्ठ को दूर करता है । इमली और खांड के साथ इसके फूलों को देने से कफ और पित्त के विकार दूर होते हैं ।


नीम का गोंद - यूनानी मत में रक्त की गति को बढ़ाने वाला और शक्तिप्रद होता है । नीम के बीज दस्तावर और कृमिनाशक होते हैं । इन बीजों में तैल और गन्धक का कुछ अंश पाया जाता है । यह अर्श पुराना गठिया, पुराने जहरबाद और खुजली तथा चर्म रोगों पर मालिश करने तथा लेप करने से लाभ होता है ।

नीम की सींक - नीम की सींकें जिन पर पत्ते होते हैं, दमा खांसी, पेट के कृमि (कीड़े), पित्तज्वर और प्लेग के लिए लाभदायक औषध है । ११ नीम की सींकें और ७ काली मिर्चों को छटांक भर अर्क गुलाब में पीसकर दो-दो घण्टे के अन्तर से पिलाने से प्लेग के फोड़े (गिल्टी) पर बारूद और मिट्टी के तैल को मिलाकर लेप करने से प्लेग के रोगी को बहुत ही लाभ होता है ।


रक्त दोष - नीम की छाल का काढ़ा वा शीत निर्यास बनाकर पिलाने से रक्त पित्तादि के सभी रोग दूर होते हैं । रक्त शुद्ध हो जाता है ।


शीतपित्त - शरीर में पित्ती निकलने पर नीम के तैल में कपूर मिलाकर मालिश करने से पित्ती में बहुत लाभ होता है ।


मासिक धर्म


१- नीम के पत्तों को गर्म करके स्त्री की नाभि के नीचे बांधने से मासिक धर्म के समय होने वाला कष्ट वा योनि सम्बन्धी अन्य कष्ट मिट जाते हैं ।

२- नीम की छाल दो तोले, सोंठ ४ माशे, गुड़ ४ माशे - इनका काढ़ा बनाकर पीने से रुका हुआ मासिक धर्म पुनः होने लगता है ।

३- नीम की छाल ४ माशे, पुराना गुड़ दो तोले, जल डेढ़ पाव - इन्हें उबालें । आधा पाव जल रहने पर छानकर पिलाने से मासिक धर्म रुका हुआ खुल जाता है ।


श्वास रोग - नीम के बीजों का शुद्ध तैल ३० से ६० बूंद की मात्रा में पान में रखकर खाने से श्वास (दमे) के रोगी को बहुत लाभ होता है ।


वात रोग - नीम का तैल पान में रखकर खिलाने से अथवा इसकी २० वा ३० बूंदें रास्नादि क्वाथ में मिलाकर खिलाने से शरीर की ऐंठन तथा अनेक प्रकार के वायु रोग दूर होते हैं ।


पक्षाघात - नीम के बीजों का तैल निकालकर रोगी के पक्षाघात के अंगों पर मालिश करने से धीरे-धीरे इस रोग में लाभ होता है ।


जोड़ों के दर्द में - नीम के पेड़ की अन्तरछाल को चन्दन के समान पीसकर पीड़ा के स्थान पर गाढ़ा लेप करने से लाभ होता है । लेप के सूखने पर उतार देना चाहिये । तीन चार बार लेप करने से लाभ होता है ।


उरुस्तम्भ - नीम की जड़ को पानी में घिसकर गर्म-गर्म लेप करने से उरुस्तम्भ में लाभ होता है ।


मोच और गिल्टियों की सूजन - चोट लगने के कारण आई हुई मोच और गिल्टियों के सूजन पर नीम की पत्तियों का बफारा देने से लाभ होता है ।


फोड़े पर


१- नीम की अन्तरछाल जल के साथ पत्थर पर घिसकर लगायें । इससे सभी प्रकार के फोड़े-फुन्सियां दूर होते हैं । अनुभव यह है जो फोड़े यहां तक कि गम्भीर फोड़ा भी इसके प्रयोग से नष्ट हो जाता है । जिन फोड़े फुन्सियों के जख्म किसी औषध से ठीक न होते हों, उनको नीम के पत्तों वा वल्कल के गर्म किये हुये क्वाथ के जल से धोयें और सिकाई और सफाई के पश्चात् नीम की अन्तरछाल को जल के साथ साफ पत्थर पर घिसकर कई बार लगायें । जब तक फोड़े फुन्सियां अच्छे न हों, लगाते ही रहें । इसके प्रयोग से ऐसे फोड़े तक अच्छे हो जाते हैं कि जिनके लिये डाक्टर वैद्य उत्तर दे देते हैं और जिनके कई बार आपरेशन (शल्यक्रिया) हो चुके होते हैं । यहां तक डाक्टर कह देते हैं कि फोड़ा हाथ वा पैर पर हो तो वे हाथ पैर कटाने का परामर्श दे देते हैं । नीम फोड़े फुन्सियों और सड़े-गले पुराने जख्मों, नासूर, नाड़ीव्रण आदि को दूर करने की अद्भुत औषध है । आजमयें और ऋषियों के गुण गायें ।


२- नीम के तैल के लगाने से भी फोड़े-फुन्सियां, दाद, खुजली, कोढ़ सभी चर्म रोग दूर होते हैं ।


३- नीम के पंचांग के क्वाथ को प्रतिदिन पीने से रक्त शुद्ध होकर फोड़े-फुन्सियां दूर होते हैं ।


४- नीम का मद (झिराव) प्रतिदिन पीने से फोड़े-फुन्सियां, दाद, खुजली, कोढ़ तक सभी दूर होते हैं । यह चर्म रोगों की बहुत ही उत्तम औषध है । इसे लगाने से भी लाभ होता है ।


५- श्वेत कुष्ठ भी नीम के मद के पीने तथा लगाने से दूर होता है । अनुभूत है । नीम के मद की मात्रा ६ माशे से दो तोले तक है ।


विष पर नीम के प्रयोग

सांप के विष की परीक्षा - सांप के काटे हुए मनुष्य को नीम की पत्तियां खिलायें, यदि वे कड़वी नहीं लगें तो समझ लो कि सर्प विष का प्रभाव हो गया है और सांप ने ही काटा है । यदि खाने में कड़वी लगें तो सांप ने नहीं काटा अथवा सर्पविष का कोई प्रभाव नहीं हुआ । अनेक बार का अनुभूत है । जब सर्प का विष दूर हो जाता है तो नीम के पत्ते कड़वे लगने लगते हैं । कुछ लोगों का ऐसा मत है कि नीम के पत्ते खिलाने से सर्प का विष दूर हो जाता है । किन्तु इस विषय में हमारा अपना अनुभव नहीं है । सर्पदंश की चिकित्सा बहुत वर्षों से गुरुकुल झज्जर में होती है । आस-पास के सर्पदंश के रोगी पर्याप्त संख्या में गुरुकुल झज्जर, जिला रोहतक में ही आते हैं । हमने अनेक सर्प विष नाशक औषधियों का प्रयोग करके सेवा करके पर्याप्त अनुभव प्राप्त किया है । हम गुरुकुल में सर्पदंश की चिकित्सा निःशुल्क करते हैं । इसी कारण गुरुकुल झज्जर की सर्पदंशामृत औषध दूर-दूर तक जाती है जिससे गुरुकुल झज्जर की सर्पचिकित्सा में अच्छी प्रसिद्धि है । ९९ प्रतिशत इस औषध के प्रयोग से हमें सफलता मिली है ।

नीम का प्रयोग - केवल सर्प ने ही काटा है तथा सर्पदंश का प्रभाव हो गया है इसकी परीक्षार्थ ही नीम के पत्तों का प्रयोग हम सदैव करते हैं, चिकित्सा में प्रयोग नहीं करते क्योंकि सर्पदंश में नया परीक्षण रोगी के प्राणों पर संकट ला सकता है ।


संखिया का विष - नीम की पत्तियों का रस पिलाने से संखिया का विष उतर जाता है ।


अफीम का विष - नीम के पत्तों का अत्यन्त तेज अर्क निकाल कर पिलाने से विष में लाभ होता है ।


भिरड़ और बिच्छू विष - नीम के पत्तों को मसलकर भिरड़, ततैये और बिच्छू के काटे हुए स्थान पर मलने से शान्ति मिलती है ।


नीम और सुजाक - सुजाक के अन्दर जब मूत्रेन्द्रिय सूजकर रोगी का मूत्र बन्द हो जाता है तब नीम के पत्तों के काढ़े में रोगी को बैठाने से मूत्र बहुत शीघ्र होने लगता है ।


नीम और प्लेग


१- नीम की अन्तरछाल २ तोले के लगभग जल के साथ पीसकर उसको ५ तोले जल में छानकर प्रातः-सायं पीने से और केवल दूध पिलाने से तथा कन्धों के जोड़ में होने वाली गांठों पर नीम को बारीक पीसकर पुल्टिश बांधने से बड़ा लाभ होता है । इससे गांठें फूलकर ज्वर शान्त हो जाता है । प्लेग के समय जिस कुटुम्ब में नीम के पत्तों का जल पीने लगते हैं, उस परिवार में प्लेग प्रवेश नहीं पाता । नीम का उपयोग प्लेग के लिए बहुत ही उपयोगी होता है । यह योगवाही औषध है जो शरीर के छोटे छिद्रों में पहुंचकर वहां के जन्तुओं को नष्ट करता है ।

२- नीम के पंचांग को लेकर कूटकर जल मेम छानकर, इस को दस-दस तोले की मात्रा में पन्द्रह-पन्द्रह मिनट के अन्तर से पिलाने से और गांठों पर इसके पत्तों का पुल्टिश बांधने से और रोगी के आस-पास इसकी धूनी करते रहने से प्लेग के रोग में बड़ा लाभ होता है ।

नीम के अन्दर वनस्पति गन्धक (Deganic Sulpher) पर्याप्त मात्रा में होता है । इसीलिए प्लेग की गांठों और दूसरे चर्म रोगों पर इसका उपयोग बड़ा ही लाभदायक है ।

वमन - नीम की पत्तियों का स्वरस पिलाने से वमन (कै) बंद हो जाता है ।

पतले दस्त - नीम की अन्तरछाल ५ तोले जौकुट करके २ पाव जल में औटाकर छान लें । फिर उस छनी हुई छाल को उतने ही दूसरे जल में औटावें । जब एक पाव जल रहे, छान लें । छने हुए दोनों काढ़ों को मिलाकर शीशी में रख छोड़ें । जिस रोगी को अतिसार (पतले दस्त) हों, उसको पांच-पांच तोले काढ़ा तीन बार पिलावें, बहुत लाभ होगा ।

हैजे की ऐंठन - हैजे में हाथ-पांव में जो ऐंठन होती है उसमें नीम के तैल की मालिश करने से बहुत लाभ होता है ।

नकसीर - नीम की पत्तियों और अजवायन दोनों को जल में पीसकर कनपटियों पर लेप करने से नकसीर बन्द हो जाती है ।

लू लगना - नीम के पंचांग और मिसरी दोनों को एक-एक तोला लेकर जल के साथ पीस घोटकर ठण्डाई के समान छान लेवें । इससे लू लगने के उपद्रव दूर हो जाते हैं ।

प्रसूति कष्ट - नीम की जड़ को गर्भवती स्त्री की कमर में बांधने से बालक का जन्म सुखपूर्वक हो जाता है ।

सन्तति निरोध - नीम के गोंद तथा नीम के तैल का प्रयोग अनेक वैद्य सन्तति निरोध के लिए भी करते हैं ।


नीम का प्रसूति रोगों में उपयोग

नीम को मराठी में बालन्त निम्ब कहते हैं । इसका नाम प्रसूति समय में इसकी उपयोगिता को प्रकट करता है । प्रसूति के पहले ही प्रसूता को इसके पत्तों का स्वरस देने से गर्भाष्य का संकोच होता है । रजःस्राव साफ होता है । गर्भाष्य और उसके पास के भागों का शोध मिट जाता है । भूख लगती है, दस्त साफ होता है । ज्वर नहीं होता और यदि कुछ हो तो उसका वेग अधिक नहीं होता ।


प्रसव के पश्चात् ६ दिनों तक प्यास लगने पर प्रसूता स्त्री को नीम की छाल का उबाला हुआ जल देने से उसका स्वास्थ्य अच्छा रहता है ।


नीम के कुछ उष्ण जल से स्त्री की योनि को धोने से प्रसव के कारण होने वाला योनिशूल और शोथ नष्ट हो जाता है । व्रण (जख्म) जल्दी सूख जाता है और योनि शुद्ध तथा संकुचित हो जाती है ।


प्रसूता को बफारा


नीम के पुराने वृक्ष की अन्तरछाल ३ सेर लेकर उसके छोटे-छोटे भाग करके कूटकर तीन भागों में बांट लें । फिर मिट्टी की तीन बड़ी हांडियों में २० सेर जल डाल देवें तथा एक-एक सेर प्रत्येक में नीम की छाल डाल देवें । उनमें ढ़क्कन रखकर गेहूं के गुंदे हुए आटे से इनकी सन्धि बन्द कर देवें जिससे उसकी भांप बाहर न निकले । फिर इन बर्तनों को चूल्हे पर चढ़ाकर नीचे आग जला देनी चाहिए । जब पानी खूब उबलने लगे तब प्रसूति रोगग्रस्त स्त्री को बिना बिस्तर की खाट पर सुलाकर ऊपर से एक कम्बल ऐसा ओढ़ा देना चाहिये जिससे स्त्री का शरीर भी ढक जाये तथा खाट से लेकर भूमि तक झूलता रहे । उसके पश्चात् एक उबलते हुए जल की हांडी लेकर उस खाट के नीचे जिस ओर स्त्री का सिर हो, रखकर हांडी का मुख खोल देना चाहिये । जब उस बर्तन की भांप का वेग कुछ न्यून हो जाये तो उस हांडी को रोगी स्त्री के सिर के नीचे से कमर के नीचे सरका दें और दूसरा घड़ा लाकर उसके सिर के नीचे रखकर खोलता हुआ उसका मुख खोल दें । जब दूसरे घड़े का वेग भी कुछ न्यून हो जाये तो कमर के नीचे कर देवें । तीसरा खोलता हुआ घड़ा सिर के नीचे रख देवें और उसे भी खोल देवें । इस प्रकार तीन दिन से लेकर सात दिन तक करना चाहिये । पथ्य में दूध, भात और घी खाने को देवें तथा गर्म करके ठंडा किया हुआ जल पीने को देवें । इस प्रयोग से प्रसूतिका रोग का पसीने के द्वारा विष निकल जाता है और रोगिणी का सुआ रोग में लाभ हो जाता है ।


दांतों पर नीम का मंजन

पायोरिया रोग जिसमें दांतों के मसूड़ों में रक्त और पीप दोनों निकलते हैं तथा दांतों की जड़ें कटकर दांत युवावस्था में ही निकल जाते हैं, उसको दूर करने के लिए मंजन लिखता हूँ ।


योग- कड़वे नीम के पत्ते छाया में सुखायें और उनको किसी मिट्टी के पात्र में डालकर इस प्रकार जलायें कि इनकी राख भस्म न हो, काले रंग के कोयले बनें अर्थात् जब वे जल जायें तो उनको किसी पात्र से ढक देवें अथवा कपरोटी करके गजपुट की आग में फूंक देवें । शीतल होने पर पीस लें । १० तोले राख में २ तोला सैंधा नमक बारीक पीसकर मिला लें । इसका प्रतिदिन मंजन करें । यह दांतों के रोगों के लिए सर्वोत्तम औषध है । मांस मदिरा न खायें पीवें । रात्रि को सोते समय भी करें तो बहुत लाभ होगा । मंजन करने के पीछे गर्म जल से कुल्ला करके सोयें । प्रातःकाल भी मंजन अवश्य करें । प्रयोग करके लाभ उठायें, अनुभूत है ।


ज्वर की दाह पर नीम

पित्त ज्वर में दाह जलन और प्यास बहुत त्म्ग करती है । इसको दूर करने के लिए नीम बहुत उपयोगी है ।


१- दाह वाले को यदि बहुत कष्ट हो तो नीम के पत्तों का रस पिलाकर वमन करायें तो इससे बहुत ही शीघ्र लाभ होता है । जलन दाह दूर हो जाती है । यदि रोगी शक्तिशाली हो और वमन को सह सकता हो तो उसे अवश्य वमन करायें । वमन कराने की विधि यह है । कड़वे नीम के पत्ते एक वा दो तोले लेकर बारीक पीस लो और १ पाव शीतल जल में ठंडाई के समान छान लें और रोगी को पिलायें ।


यदि आवश्यकता समझें तो छः माशे मधु तथा २ तोले खांड इसमें मिलाकर पिलायें । मुख में अंगुली डालकर पिलावें । रोगी को वमन होते ही लाभ होगा । यदि रोगी बहुत निर्बल हो तो वमन न करायें । अन्य उपाय करें ।


२- नीम के पत्तों का रस निकालकर और उसमें झाग उठा कर दाह वाले रोगी के शरीर पर इन झागों का मर्दन करें । दाह जलन दूर होगी । नीम के पत्ते यदि कोमल (कोंपलें) हों तो अधिक लाभ होगा ।


३- नीम के पत्तों को निम्बू के रस में पीसकर शरीर पर लगाने से भी लाभ होता है ।


४- नीम के पत्तों को जामुन के असली सिरके में पीसकर लगाने से बहुत लाभ होता है ।


पित्तज्वर

१- नीम की छाल, हल्दी, गिलोय, धनिया और सोंठ - इन पांचों को सम तोलकर काढ़ा बना लें । उसमें थोड़ा गुड़ डालकर पिलाने से पित्त ज्वर दूर होता है ।

२- नीम की छाल, गिलोय, धनिया, लाल चन्दन और कुटकी - इन पांचों को समभाग लेकर जौकुट कर लें और उसमें से २ तोला औषध लेकर क्वाथ बनायें । इसे गडूच्यादि क्वाथ कहते हैं । इसके सेवन से पित्त ज्वर, दाह, वमन, अरुचि प्यास आदि दूर होते हैं ।

३- नीम की छाल, गिलोय, कुटकी, नागरमोथा, इन्द्रजौ, सोंठ, पटोलपत्र और लाल चन्दन - इन आठ औषधियों का काढ़ा करके थोड़ा सी पीपल मिलाकर पिलाने से पित्तज्वर, कफज्वर, वमन, अरुचि, प्यास सब शान्त होते हैं । नीम के फूलों का अर्क पीने से दाद, खुजली और कोढ़ दूर होते हैं ।

४- पुराने नीम के फूल, पत्ते, छाल, फल और जड़ सब आध-आध सेर, काली मिर्च, पीली हरड़ की छाल, बहेड़े की छाल, आंवले और बाबची - पाव-पाव भर इनको कूट पीसकर छान लेवें । इस चूर्ण की मात्रा ३ माशे से ६ माशे तक है । इसको मंजिष्ठादि क्वाथ के साथ चार मास तक सेवन करना और नीम के नीचे सोने से दाद, खुजली और भयंकर कुष्ठादि रोग समूल नष्ट होते हैं । लवण, मांस, मदिरा और गर्म पदार्थों के सेवन से बचें ।

५- नीम की पत्ती १ तोला, काले तिल ५ माशे, लाहौरी नमक ६ माशे और पुराना गुड़ दो तोले मिलाकर रख लें । इसके सेवन से दाद, कोढ़ और श्वेत कुष्ठ (सफेद दाग) सभी नष्ट होते हैं । मात्रा ६ माशे से डेढ़ तोले तक शक्ति देखकर देवें ।

६- कड़वे नीम के पत्तों को जल में पीसकर पीने से सभी चर्मरोग, कोढ़, वमनादि नष्ट होते हैं ।

७- नीम के पत्ते, छाल, बीज, फूल पीसकर लगाने, पिलाने वा खाने से खुजली, शीतपित्त, रक्तपित्त और कुष्ठ नष्ट होते हैं ।


महानिम्ब (बकायण)

महानिम्ब बकायण के विषय में धनवन्तरीय निघण्टु में इस प्रकार लिखा है :

महानिम्ब: स्मृतोद्रेको विषमुष्टिका ।

केशमुष्टिर्निम्बर्को रम्यक: क्षीर एव च ॥

बकायण को संस्कृत में महानिम्ब:, उद्रेक:, विषमुष्टिक:, केश-मुष्टि, निम्बरक, रम्यक और क्षीर नाम वाला कहा गया है।


राजनिघन्टु में इनके अतिरिक्त मदोद्रेकः, कार्मुकः, काकण्डः, महातिक्त और हिमद्रुम अधिक दिये हैं ।

महानिम्बो रसे तिक्तः शीतपित्तकफापहः ।

कुष्ठरक्तविनाशी च विसूचीं हन्ति शीतलः ॥३२॥


गुणों में महानिम्ब (बकायण) रस में कड़वा, शीतल, शीतपित्त (पित्ती) और कफ रोगों को दूर करने वाला है । कुष्ठ (कोढ़), रक्त दोषों तथा हैजे को दूर करने वाला है । इसे कुछ विद्वान रूक्ष, कषैला, मलरोधक, दाह, व्रण, पित्त, कृमि, विषमज्वर, हृदय रोग, वमन, प्रमेह, चूहे का विष, गुल्म, अर्श और श्वास रोग को दूर करने वाला मानते हैं ।


बकायण के वृक्षों में फाल्गुन और चैत्र के मास में एक दूधिया रस निकलता है । यह रस मादक और विषैला होता है । इसीलिये फाल्गुन और चैत्र के मास में इस वनस्पति का प्रयोग नहीं करना चाहिये ।


बकायण का वृक्ष सारे ही भारत में पाया जाता है। इसके वृक्ष ३२ से ४० फुट तक ऊंचे होते हैं । इसका वृक्ष बहुत सीधा होता है । इसके पत्ते नीम के पत्तों से कुछ बड़े होते हैं इसके फल गुच्छों के अंदर लगते हैं। वे नीम के फलों से बड़े तथा गोल होते हैं । फल पकने पर पीले रंग के होते हैं । इसके बीजों में से एक स्थिर तैल निकलता है जो नीम के तैल के समान ही होता है । इसका पंचांग अधिक मात्रा में विषैला होता है।


इसके नाम अन्य भाषाओं में निम्न प्रकार से हैं - संस्कृत में महानिम्ब, केशमुष्टि, क्षीर, महाद्राक्षादि । हिन्दी में बकायण निम्ब, महानिम्ब, द्रेकादि । गुजराती - बकाण, लींबड़ो । बंगाली में घोड़ा नीम । फारसी- अजेदेदेरचता, बकेन । पंजाबी बकेन चेन, तमिल मलः अबेबू, सिगारी निम्ब, उर्दू - बकायन । लेटिन melia a zedaracha ।


यूनानी मत


यूनानी मत में इसके बीज कड़वे और कफनिस्सारक होते हैं । बढ़ी हुई तिल्ली में इनका प्रयोग होता है । हृदय के दोषों में भी यह लाभदायक है । ये दमनकारक, नकसीर को रोकने वाले, रक्तस्रावरोधक, दांतों को सुदृढ़ करने वाले, गीली तथा सूखी खुजली को दूर करने वाले, सूजन को नष्ट करने वाले होते हैं । इसके बीजों का तैल मस्तिष्क को शक्ति देने वाला, मृदुविरेचक, कर्णशूल को दूर करने वाला, रक्तशोधक, बवासीर, तिल्ली और यकृत के विकारों को दूर करने वाला तथा तथा सूजन को दूर करता है । इसके फूल और पत्ते मूत्रल, ऋतुस्राव नियामक और स्नायविक मस्तकशूल और सर्दी के शोथ को दूर करने वाले होते हैं ।


मुस्लिम देशों में इस वनस्पति का उपयोग बहुत बड़ी मात्रा में किया जाता है । फारस के हकीम इसकी जानकारी भारत से ले गए थे । उन लोगों के मत से इस वृक्ष की छाल, फूल, फल और पत्ते गर्म, और रूक्ष होते हैं । इसके पत्तों का रस अन्तःप्रयोगों में लेप से मूत्रल, ऋतुस्राव नियामक और सर्दी के शोथ को मिटाने वाला होता है ।


पंजाब में इसके बीज संधिवात की पीड़ा दूर करने के लिए दिये जाते हैं । कांगड़ा में इसके बीजों का चूर्ण अन्य औषधियों के साथ मिलाकर पुल्टिश के रूप में वा लेप के रूप में गठिया और संधिवात की पीड़ा में लगाया जाता है ।


अमेरिका में इसके पत्तों का काढा हिस्टेरिया रोग को दूर करने वाला, संकोचक और अग्निवर्धक माना जाता है । इसके पत्ते और छाल गलितकुष्ठ और कण्ठमाला को दूर करने के लिए खाने और लगाने के कार्य में प्रयुक्त किए जाते हैं । ऐसा विश्वास वहां पर है कि इसके फलों से पुलिटश के कृमियों का नाश हो जाता है । इसीलिये चर्मरोगों के नाशार्थ यह उत्तम औषधि मानी जाती है । इसके फल में विषैले तत्त्व रहते हैं फिर भी यह गलितकुष्ठ और कण्ठमाला में प्रयुक्त किया जाता है ।


इंडोचाइना में इसके फूल और फल अग्निवर्धक, संकोचक और कृमिनाशक माने जाते हैं । कुछ विशेष प्रकार के ज्वर और मूत्र संबन्धी रोगों में इसके फलों का प्रयोग होता है । इसके बीज टायफायड बुखार, मूत्र का अवरोध और उदरशूल को दूर करने के लिए दिए जाते हैं ।


कोमान के अनुसार इसकी छाल का काढ़ा कटु, पौष्टिक, तृतीयकादि ज्वरों को नष्ट करने वाला तथा मन्दाग्निनाशक समझा जाता है । यथार्थ में यह एक प्रभावशाली, कटु पौष्टिक औषधि है किन्तु इसमें मलेरियानाशक तत्त्व नहीं पाये जाते ।


डॉक्टर देसाई के मतानुसार बकायन निम्ब के गुण नीम के समान ही होते हैं । यह कृमिनाशक, चर्मरोगों को दूर करने वाला, गर्भाशय के लिए संकोचक, वेदनानशक और शोधक होता है । इसके प्रयोग से कृमि मर जाते हैं । इसके अधिक मात्रा में सेवन करने से वमन और दस्त होकर नशा चढ़ जाता है ।


कृमिरोग में अथवा कृमियों के कारण उत्पन्न होने वाले ज्वर में यह उत्तम गुणकारी है ।


प्रसूतिकाल में होने वाले मस्तिष्कशूल और गर्भाशय के शूल पर इसके पत्तों और फलों को कुचलकर सिर और पेडू पर बांधने से लाभ होता है । रक्तपित्त, कण्ठमाला और रक्तदोष से उत्पन्न हुए रोगों में इसके पत्तों और फलों का रस दिया जाता है ।


प्रतिनिधि के रूप में मंजीठ का उपयोग करते हैं । इसका दर्पनाशक सौंफ है । इसका क्वाथ स्त्रियों के आवेश रोग में पिलाया जाता है ।


मात्रा - इसकी छाल की मात्रा ३ से ६ माशे तक और बीजों की मात्रा १ रत्ती से ४ रत्ती तक है ।


उपयोग - कृमि रोग में बकायन के पत्तों का रस पिलाने से पेट के कृमि मर जाते हैं ।

पथरी - बकायन के पत्तों का रस निकालकर उसमें यवक्षार मिलाकर पीने से शर्कराश्मरी (पथरी) मिटती है । उदरशूल में इसके क्वाथ में सोंठ का चूर्ण मिलाकर पीने से लाभ होता है ।


कण्ठमाला तथा कुष्ठ


इसके पत्तों और छाल का क्वाथ पीने से नष्ट हो जाते हैं । यदि इसका लेप किया जाये तो अधिक लाभ होता है । फोड़े फुन्सी और दूसरे चर्मरोग खुजली आदि इसके फूलों को पीसकर लेप करने से दूर होते हैं ।


गठिया का रोग


इसके बीजों की फक्की लेने से और इसके बीजों का खुर्बानी के साथ पीसकर लेप करने से गठिया में बड़ा लाभ होता है ।


कृमि चुन्ने जो अधिकतर बच्चों के पेट में होते हैं, इसके फलों को सिरके में पीसकर सूक्ष्म मात्रा में पिलाने से सब कीड़े बाहर निकल जाते हैं ।

सिर के गंज - इसके बीजों को कड़वे तैल में जलाकर लेप करने से सिर की गंज में लाभ होता है ।


बवासीर


१- बवासीर में बकायन की मींगी और सौंफ को पीसकर उसमें समान भाग मिसरी मिलाकर और दो माशे की मात्रा में देने से अर्श (बवासीर) को लाभ होता है ।

२- बकायन के पत्तों को पावभर लेवें और दो तोले लवण पीसकर झाड़ी के बेर के समान गोलियां बनाकर रोगी को खिलाने से अर्श रोग दूर होता है ।


प्रमेह - इसके बीजों को चावलों के पानी में पीसकर घी मिलकर खाने से प्रमेह मिट जाता है ।

गृध्रसी - बकायन के सार को जल के साथ पीसकर पिलाने से और इसकी जड़ की छाल का लेप करने से वायु गृध्रसी में लाभ होता है ।

मीठा नीम

धन्वन्तरीय निघन्टु में लिखा है –


कैडर्योऽन्यो महानिम्बो रामणो रमणस्तथा ।

गिरिनिम्बो माहारिष्टः शुक्लशालः कफाह्वयः ॥४८॥


मीठे नीम के कैडर्य, महानिम्बः, रामणः, रमणः, महारिष्ट, शुक्लसार, शुक्लशालः, कफाह्वयः, प्रियसार और वरतिक्तादि संस्कृत में नाम हैं । हिन्दी में मीठा नीम । बंगाली में घोड़ा नीम । मराठी कलयनिम्ब, पंजाबी गंधनिम्ब, गुजराती - मीठो लीमड़ो, तमिल करुणपिल्ले, तेलगू करिवेपमू, फारसी सजदे करखी कुनाह, लेटिन murraya koenigie नाम भिन्न-भिन्न भाषाओं में मीठे नीम के हैं ।


मीठे नीम के गुण

कैडर्यः कटुकस्तिक्तः कपायः शीतलो मधुः ।

संतापशोष कुष्ठास्रकृमि भूतविषापहः ॥४९॥

धन्वन्तरीय निघन्टु में मीठा नीम कड़वा, तिक्त, कषैला, शीतल, हल्का और संताप, शोथ, कुष्ट, रुधिरविकार, कृमि भूत-बाधा और विष को नष्ट करता है ।


वर्णन


मीठे नीम के पेड़ प्रायः भारतवर्ष के सभी भागों में पाये जाते हैं । इसके पेड़ की ऊंचाई १२ से लेकर १५ फुट तक की होती है । इसके पत्ते देखने में नीम के पत्तों के समान ही होते हैं किन्तु ये कटे किनारों के नहीं होते। चैत्र और वैशाख में इसके पेड़ पर सफेद रंग के फूल आते हैं । इसके फल झूमदार होते हैं । पकने पर इस के पत्तों का रंग लाल हो जाता है । इसके पत्तों में से भी एक प्रकार का सुगंधित तैल निकलता है । यूनानी मत में यह पाचक, क्षुधाकारक, धातु उत्पन्न करने वाला, कृमिनाशक, कफ को छांटने वाला और मुख की दुर्गन्ध को मिटाने वाला होता है । यह दूसरे दर्जे में गर्म और खुश्क होता है । इसकी जड़ को घिसकर विषैले कीड़ों के काटने के स्थान पर लगाने से लाभ होता है ।


दस्त और वमन


जिन दस्तों में आंव आता है उनकी चिकित्सार्थ मीठे नीम के कच्चे फल खिलाते हैं । इसके पत्तों को पीसकर पानी में मिलाकर शर्बत के समान पिलाने से वमन दूर होता है ।


सर्पदंश


राबर्ट के मतानुसार लंका में इसके पत्तों का काढ़ा सर्पदंश में विष दूर करने के लिए पिलाया जाता है और इसकी जड़ सांप के काटे हुए स्थान पर लगाने से लाभ करती है ।

कर्नल चोपड़ा के अनुसार यह सर्पदंश में उपयोगी है तथा यह पौष्टिक और अग्निवर्धक है । इसमें इन्सेशियल, ग्लूकोसाइड और कोइनिगिन नामक तत्त्व पाये जाते हैं ।

ज्वर को दूर करने के लिए पत्तों को दूसरी कड़वी औषध के साथ पिलाने से लाभ होता है ।

छोटी-छोटी फुन्सियां इसके पत्तों के चूर्ण के लेप से मिट जाती हैं । खुजली में भी लाभ होता है । इसकी जड़ के चूर्ण को शहद और जल के साथ चढ़ाने से पित्तज गर्मी के सब उपद्रव मिट जाते हैं

इसकी जड़ के काढ़े पर सोंठ का चूर्ण भुरभुराकर पिलाने से उदरशूल दूर होता है ।


भोजन के रूप में


इसके सूखे पत्ते कढी में छोंक लगाने तथा दाल को स्वादिष्ट बनाने के कार्य में आते हैं । इनको चने के बेसन में मिलाकर पकौड़ी भी बनाई जाती है । मूत्राशय के रोगों में इसकी जड़ों का रस सेवन लखीमपुर आसाम में अच्छा उपयोगी माना जाता है।

इंडोचाइना में इसका फल संकोचक माना जाता है और इसके पत्ते रक्तातिसार और आमातिसार को दूर करने के लिए अच्छे माने जाते हैं ।

सारांश यह है कि मीठे नीम के वही गुण हैं जो प्राय: करके कड़वे नीम में हैं तथा जो धनवन्तरीय निघन्टु में लिखे हैं वही प्रयोग करने पर यथार्थ रूप में पाये गए हैं ।


विशेष वार्ता - नीम के काढे की मात्रा ४ तोले से ८ तोले तक है । पत्तों के चूर्ण की मात्रा १ माशे से ४ माशे तक है । पंचांग के चूर्ण की मात्रा १ माशे से ४ माशे तक है । पत्तों के स्वरस की मात्रा १ तोला से १॥ तोले तक है । नीम की छाल के चूर्ण की मात्रा १ माशे से ३ माशे तक है ।


कड़वे निम्ब, मीठे निम्ब तथा बकायण के गुण मिलते हैं । इस प्रकार नीम व नीमवृक्ष में इतने गुण हैं कि उसकी प्रशंसा जितनी की जाये उतनी थोड़ी है । सचमुच त्रिवेणी में स्नान करना तो मूर्खता है किन्तु नीम, पीपल और बड़ की त्रिवेणी का सेवन सब दुखों को दूर करके प्राणिमात्र के कष्ट दूर करके सुखी बनाता है । उस त्रिवेणी के एक अंग नीम पर ही कुछ प्रकाश डाला है । इसी प्रकार समय मिला तो पीपल और वट (बड़) इन दोनों पर लिखकर सच्ची त्रिवेणी में पाठकों को स्नान कराना है । आशा है पाठक इस पुस्तिका को ध्यानपूर्वक पढ़कर लाभ उठायेंगे तथा ऋषियों के गुण गायेंगे जिनकी महती कृपा से मैंने यह छोटी पुस्तिका निम्ब (नीम) के गुणों पर लिखी है ।


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Digital text of the printed book prepared by - Dayanand Deswal दयानन्द देसवाल



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