Altai Mountains

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Altai Mountains (Altay Mountains) are a mountain range in Central Asia.


Altai Mountains are located where Russia, China, Mongolia and Kazakhstan come together, and are where the rivers Irtysh and Ob have their headwaters. The northwest end of the range is at 52° N and between 84° and 90° E (where it merges with the Sayan Mountains to the east), and extends southeast from there to about 45° N and 99° E, where it gradually becomes lower and merges into the high plateau of the Gobi Desert.


The name "Altai" means in Mongolian "Gold Mountain"; "alt (gold) and "tai" (suffix - "with"; the mountain with gold) and also in its Chinese name, derived from the Mongol name (Chinese: 金山; literally: "Gold Mountain"). In Turkic languages al meaning red and tag, mountain.


The Altain mountains have retained a remarkably stable climate changing little since the last ice age.[1] In addition the mix of mammals has remained largely the same - with a few exceptions such as extinct Mammoths - making it one of the few places on earth to retain an ice age fauna.[2]

The Altai mountains were home to the Denisovan branch of hominids who were contemporaries of Neanderthals and of Homo Sapiens (modern humans), descended from Hominids who reached Asia earlier than modern humans.[6] The Denisova hominin, dated to 40,000 years ago, was discovered in the Denisova Cave of the Altai mountains in southern Siberia in 2008. Knowledge of the Denisovan humans derives primarily from DNA evidence and artifacts, as no complete skeletons have yet been recovered. DNA evidence has been unusually well preserved because of the low average temperature in the Denisova caves. The same cave has uncovered Neanderthal bones, and tools made by Homo sapiens, making it the only known locale in the world where all three hominids are known to have lived.[3]

A dog-like canid from 33,000 years ago was found in the Razboinichya Cave.[4][5] DNA analysis published in 2013 affirmed that it was more closely related to modern dogs than to wolves.[6]

The Altai Mountains have been identified as being the point of origin of a cultural enigma termed the Seima-Turbino Phenomenon[7] which arose during the Bronze Age around the start of the 2nd millennium BC and led to a rapid and massive migration of peoples from the region into distant parts of Europe and Asia.

Jat History

Hukum Singh Panwar (Pauria) [8] writes that Having left the Sapta Sindhu in the night of time, the Scythians, (Sakai or Sakas), (or, more precisely, Sacae-Getae or Jats), formed a very important and effective unit among the predatory etnic tribes of central Asia Europe & even Latin America. From the Mesopotamian, Achemenid and Greek records it is quit evident that they established themselves as a powerful force and "controlled the passage of human airs generally from (8000 B.C.) and particularly from 2nd millennium B.C. to the 2nd cent B.C. In course of this long period of history these nomads were always restive, hopped and skirmished, buffeted, scurried and unsettled civilizations, proving a scourge (perhaps out of revenge, firmly seated in the back-recesses of their brain, for their expulsion from their motherland) to all the nations between the borders of China on the east and the ravines of the Danube on the West. Once they were located around the Altai, next in the steppes of Russia, again along the coasts of the Caspian sea and last para-Sugdam, beyond Sogdiana, the vast plains bordering the Jaxartes, the Syr Darya"[9].

Ahlawat : Ahlawat is said to be derived from Illa-vrta or Alawat. Illa-vrta was a province in Jambudvipa, which was situated in Mongolia. Presently it is known as Altai that is degenerated form of Elawrat. The Aryans at that time lived in Central Asia and their land was called "Ailavart" (from which the Ailawat Jat are named). Yayati himself was called an 'Aila'. They had however spread up to the Yamuna river, and it was in the Punjab that the most famous and important "war of ten kings" was fought in the vicinity of Ravi, Chenab and the Yamuna.[10]

Bhim Singh Dahiya[11] writes that It is now generally agreed that the original home of the Aryans was Central Asia. Their original name, perhaps was 'Aila' and their land was called 'Ailavarta'. These people spread in various directions and the people who ultimately reached India, first settled in the Sapta-Sindhu, i.e., the land of seven rivers, viz., the geographical Punjab, Sindh, Kabul valley, Baluchistan, etc. It is significant that in the first book of Aryans, viz., Rig Veda the easternmost river mentioned is the Yamuna. Later on. when these people spread in the Gangetic plains, they gave the name of Madhyadesha to that fertile land and thereafter the golden plains of Ganga-Yamuna river system became the most important area for them. It was after their arrival in India that the name Aryans gained currency.1

Highest mountains of the Altai

The five highest mountains of the Altai are:


This region is studded with large lakes, e.g.

and traversed by various mountain ranges, of which the principal are the Tannu-Ola Mountains, running roughly parallel with the Sayan Mountains as far east as the Kosso-gol, and the Khan Khökhii mountains, also stretching west and east.

निषध पर्वत

विजयेन्द्र कुमार माथुर[12] ने लेख किया है ...2. निषध पर्वत (AS, p.503): महाभारत के वर्णनानुसार हेमकूट पर्वत के उत्तर की ओर सहस्रों योजनों तक निषद पर्वत की श्रेणी पूर्व पश्चिम समुद्र तक फैली हुई है- 'हिमवान् हेमकूटश्च निषधश्च नगोत्तम:' भीष्मपर्व 6,4. श्री चि.वि. वैद्य का अनुमान है कि यह पर्वत वर्तमान अलताई पर्वत श्रेणी का ही प्राचीन भारतीय नाम है। हेमकूट और निषध पर्वत के बीच के भाग का नाम 'हरिवर्ष' कहा गया है। महाभारत के वर्णन में निषद पर नाग जाति का निवास माना गया है- 'सर्पानागाश्च निषधे गोकर्ण च तपोवनम्' भीष्मपर्व 6, 51. विष्णु पुराण 22,10 में भी इस पर्वत का उल्लेख हुआ है- 'हिमवान् हेमकूटश्च निषधश्चास्य दक्षिणे' इसी को विष्णु 22,27 में निषद भी कहा गया है.


दलीप सिंह अहलावत[13] लिखते हैं:ब्रह्मा से आठवीं पीढ़ी में चन्द्रवंशी नहुषपुत्र सम्राट् ययाति हुए। ये जम्बूद्वीप के सम्राट् थे। जम्बूद्वीप आज का एशिया समझो (देखो अध्याय 1, जम्बूद्वीप)। इस जम्बूद्वीप में कई देश (वर्ष) थे जिनमें से एक का नाम इलावृत देश था। जिस देश के बीच में सुमेरु पर्वत है, जिस पर वैवस्वत मनु निवास करते थे और जो जम्बूद्वीप के बीच में है, उसका नाम इलावृत देश था। आज यह देश मंगोलिया में अलताई नाम से कहा जाता है। यह्ह अलताई शब्द इलावृत का ही अपभ्रंश है। (“वैदिक सम्पत्ति”, आर्यों का विदेशगमन, पृ० 423, लेखक पं० रघुनन्दन शर्मा साहित्यभूषण)।

ययातिवंशज क्षत्रिय आर्यों का संघ (दल) भारतवर्ष से जाकर इस इलावृत देश में आबाद हुआ था। चन्द्रवंशज क्षत्रिय आर्यों का वह संघ इलावृत देश में बसने के कारण उस देश के नाम से अहलावत कहलाया*। यह अध्याय 1 में लिख दिया गया है कि वंश (गोत्र) प्रचलन व्यक्ति, देश या स्थान आदि के नाम पर हुए। देश या स्थान के नाम पर प्रचलित वंशों की सूची में अहलावत वंश भी है (देखो प्रथम अध्याय)।

बी० एस० दहिया के लेख अनुसार - “मध्य एशिया में बसे हुए आर्यों का देश एलावर्त था जिसके नाम से वे अहलावत कहलाये जो जाटवंश (गोत्र) है। ययाति स्वयं एला कहलाता था[14]।”

इलावृत देश में अहलावत क्षत्रियों का संघ (गण) प्रजातंत्र था। इनके इस देश का नाम महाभारतकाल में भी इलावृत ही था।इसके कुछ उदाहरण निम्न प्रकार से हैं –

यादवों की दिग्विजय - श्रीकृष्ण जी उत्तर की ओर कई देशों पर विजय पाकर इलावृत

  • भाषाभेद से इलावृत शब्द अहलावत कहलाया।
1. जाट्स दी ऐन्शन्ट रूलर्ज पृ० 10, लेखक बी० एस० दहिया आई० आर० एस०।

जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-201

देश में पहुंचे। यह देवताओं का निवास स्थान है। वहां जम्बूफल है जिसका रस पीने से कोई रोग नहीं होता है। भगवान् श्रीकृष्ण जी ने देवताओं से पूर्ण इलावृत को जीतकर वहां से भेंट ग्रहण की1

महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के अवसर पर पाण्डवों की दिग्विजय - “अर्जुन उत्तर दिशा में बहुत से देशों को जीतकर इलावृत देश में पहुंचे। वहां उन्होंने देवताओं जैसे देवोपम, शक्तिशाली दिव्य पुरुष तथा अप्सराओं के साम स्त्रियां देखीं। अर्जुन ने उस देश को जीतकर उन पर कर लगाया”2

अहलावत क्षत्रिय आर्यों की घटनाओं और उनका अपने देश भारतवर्ष में लौट आने के विषय में कोई प्रमाणित जानकारी नहीं मिलती जो कि खोज का विषय है।

अहलावत जाटों का भारतवर्ष से बाहर विदेशों में रहने का थोड़ा सा ब्यौरा निम्नप्रकार से है -

  1. वृहत् संहिता के लेखक वराहमिहिर ने एक प्रकरण में अहलावतों को [Takshasila|तक्षशिला]] और पुशकलावती के लोगों, पौरवों (पौरव जाट), पंगालकों (पंघल जाट, मद्रा (मद्र जाट), मालवों (मालव/ मल्ल जाट) के साथ लिखा है3। सम्भवतः ये सब लोग भारतवर्ष की उत्तर-पश्चिम सीमा पर थे।
  2. राजतरंगिणी में कल्हण ने लिखा है कि अहलावत और बाना (दोनों जाटगोत्र) द्वारपाल (शत्रु के आने के रास्ते पर रक्षक) थे4। इससे यह बात तो साफ है कि ये लोग शत्रु से पहली टक्कर लेने वाले सबसे आगे थे। सम्भवतः ये भारतवर्ष की सीमा पर रक्षक थे।
  3. भारतीय शक और कुषाणों के वस्त्र तथा शस्त्र, सरमाटियन्ज् यानी एलन्ज की कब्रों से मिले वस्त्र, शस्त्रों के समान थे। असल में यह एलन् शब्द एला शब्द से निकला है जो कि अहलावत जाट हैं। इन सब के पहनने के वस्त्र, लम्बी बूट (जूते), लम्बा कोट, पतलून और टोप एक समान थे। भारतवर्ष के शुरु के गुप्ट सम्राटों, जो धारण जाटगोत्र के थे, के सिक्कों (मुद्रा) पर भी यही पहनावा पाया गया है जो बाद में धोती बांधने लगे थे5। सरमाटियन्ज् या एलन्ज नामक स्थान लघु एशिया में है। इससे साफ है कि अहलावत जाट वहां रहे हैं और वहां राज्य किया है, युद्ध किए हैं। इनकी प्रसिद्धि के कारण ही तो उस स्थान का नाम एलन्ज पड़ा था।

अहलावत जाट अपने देश भारतवर्ष लौट आए। इसका पूर्ण ब्यौरा तो प्राप्त नहीं है परन्तु कुछ बातें इस प्रकार से हैं -

1,2. देखो प्रथम अध्याय इलावृत देश प्रकरण।
3. बृहत् संहिता का हवाला देकर, बी० एस० दहिया आई० आर० एस० ने अपनी पुस्तक “जाट्स दी एन्शन्ट रूलर्ज” के पृ० 171 पर लिखा है।
4. जाट्स दी ऐन्शन्ट रूलर्ज पृ० 224, लेखक बी० एस० दहिया आई० आर० एस०।
5. जाट्स दी ऐन्शन्ट रूलर्ज पृ० 54, लेखक बी० एस० दहिया आई० आर० एस०।

जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-202

  1. इलावृत प्रदेश में निवास करने वाले आर्यों को ऐल नाम से पुकारा गया है और ये लोग चित्तराल के रास्ते से भारतवर्ष में आए[15]
  2. एक समय लगभग पूरे एशिया तथा यूरोप पर जाटवीरों का राज्य था। ईसाई-धर्मी तथा मुस्लिम-धर्मी लोगों की शक्ति बढ़ने के कारण जाटों की हार होती गई जिससे ये लोग समय-समय पर अपने पैतृक देश भारतवर्ष में आते रहे और सदियों तक आये। अधिकतर ये लोग भारतवर्ष की पश्चिमी सीमा की घाटियों से आये (विशेषकर खैबर और बोलान घाटी से)। इसका पूरा वर्णन अगले अध्याय में किया जाएगा। सम्भवतः अहलावत जाट भी इन्हीं रास्तों से अपने देश भारतवर्ष में लौट आये।

यह नहीं कहा जा सकता कि ये अहलावत जाट लोग कितने विदेशों में रह गये और कितने भारतवर्ष में आ गये। यहां आने के बाद पंजाब में और फिर राजस्थान, मालवा, गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में इनका निवास तथा राज्य स्थापित करने का कुछ ब्यौरा मिलता है

External links


  1. Colin Barras (23 January 2014). "Ice-age animals live on in Eurasian mountain range". New Scientist.
  2. Colin Barras (23 January 2014). "Ice-age animals live on in Eurasian mountain range". New Scientist.
  3. Colin Barras (23 January 2014). "Ice-age animals live on in Eurasian mountain range". New Scientist.
  4. Pritchard, Hamish (August 3, 2011). "Ancient dog skull unearthed in Siberia". BBC News
  5. Ovodov, Nikolai D.; Crockford, Susan J.; Kuzmin, Yaroslav V.; Higham, Thomas F. G.; Hodgins, Gregory W. L.; Plicht, Johannes van der (July 28, 2011). "A 33,000-Year-Old Incipient Dog from the Altai Mountains of Siberia: Evidence of the Earliest Domestication Disrupted by the Last Glacial Maximum". PLoS ONE.
  6. Druzhkova, Anna S.; Thalmann, Olaf; Trifonov, Vladimir A. (March 6, 2013). "Ancient DNA Analysis Affirms the Canid from Altai as a Primitive Dog". PLOS ONE.
  7. Keys, David (January 2009). "Scholars crack the code of an ancient enigma". BBC History Magazine 10 (1): 9.
  8. The Jats:Their Origin, Antiquity and Migrations/The identification of the Jats,p.316
  9. Upadhyaya. Bhagwal Saran; Feeders of Ind. Cul., PHP., N. Delhi, 1973, p. 60.
  10. Bhim Singh Dahiya:Jats the Ancient Rulers (A clan study)/The Jats.p.10
  11. Jats the Ancient Rulers (A clan study)/Relationship with the Aryans,p.81
  12. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.503
  13. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ.201-211
  14. जाट्स दी ऐन्शन्ट रूलर्ज पृ० 10, लेखक बी० एस० दहिया आई० आर० एस०
  15. भारत भूमि और उसके निवासी पृ० 251, लेखक सी० वी० वैद्य; जाट इतिहास पृ० 7 लेखक ठा० देशराज।

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