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Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Ganges-Brahmaputra-Meghna basins

Guwahati (गुवाहाटी) is the largest city in the Indian state of Assam and also the largest urban area in Northeast India. Guwahati is situated on the south bank of the Brahmaputra.[1]



Guwahati lies between the banks of the Brahmaputra River and the foothills of the Shillong plateau, with LGB International Airport to the west and the town of Narengi to the east. The North Guwahati area, to the northern bank of the Brahmaputra, is being gradually incorporated into the city limits. The noted Madan Kamdev is situated 30 kms from Guwahati. The Guwahati Municipal Corporation (GMC), the city's local government, administers an area of 328 square kilometres (127 sq mi), while the Guwahati Metropolitan Development Authority (GMDA) is the planning and development body of greater Guwahati Metropolitan Area. Guwahati is the largest city in Northeast India.[2]

Origin of name

Once known as 'Pragjyotishpura' (the Light of the East), Guwahati derives its name from the Assamese words "Guwa"(গুৱা) meaning areca nut and "Haat" (হাট) meaning market.[3]


The ancient cities of Pragjyotishpura and Durjaya (North Guwahati) were the capitals of the ancient state of Kamarupa.[4] Many ancient Hindu temples like the Kamakhya Temple and Umananda Temple are in the city, giving it the name "City of Temples".[5] Dispur, the capital of Assam, is in the circuit city region located within Guwahati and is the seat of the Government of Assam.

Ancient history: It was the capital of the kings Narakasura and Bhagadatta according to the Mahabharata.[6] Located within Guwahati is the ancient Shakti temple of Goddess Kamakhya in Nilachal hill (an important seat of Tantric and Vajrayana Buddhism), the ancient and unique astrological temple Navagraha in Chitrachal Hill, and archaeological remains in Basistha and other archaeological locations of mythological importance.[7]

The Ambari[8] excavations trace the city to the Hindu kingdoms of Shunga-Kushana period of Indian history, between the 2nd century BC and the 1st century AD. During earlier periods of the city's history it was known as Pragjyotishpura, and was the capital of Assam under the Kamarupa kingdom. Descriptions by Xuanzang (Hiuen Tsang) reveal that during the reign of the Varman king Bhaskaravarman (7th century AD), the city stretched for about 30 li (15 km or 9.3 mi).[9] Archaeological evidence by excavations in Ambari, and excavated brick walls and houses discovered during construction of the present Cotton College's auditorium suggest the city was of economic and strategic importance until the 9th–11th century AD.[10]

The Guwahati region hosts diverse wildlife including rare animals such as Asian elephants, pythons, tigers, rhinoceros, gaurs, primate species, and endangered birds.[11][12]

Medieval history: The city was the seat of the Borphukan, the civil-military authority of the Lower Assam region appointed by the Ahom kings. The Borphukan's residence was in the present Fancy Bazar area, and his council-hall, called Dopdar, was about 300 yards (270 m) to the west of the Bharalu stream. The Majindar Baruah, the personal secretary of the Borphukan, had his residence in the present-day deputy commissioner's residence.[13]

Visit by Xuanzang in 639 AD

Alexander Cunningham[14] writes that From Paundra Varddhana, or Pubna, in Middle India, the Chinese pilgrim proceeded for 900 li, or 150 miles, to the east, and crossing a great river, entered Kia-mo-leu-po, or Kamarupa, which is the Sanskrit name of Assam.[15] The territory is estimated at 10,000 li, 1667 miles, in circuit. This large extent shows that it must have comprised the whole valley of the Brahmaputra river, or modern Assam, together with Kusa-Vihara, and Butan. The valley of the Brahmaputra was anciently divided into three tracts, which may be described as the Eastern, Middle, and Western districts, namely, Sadiya, Assam proper, and Kamrup. As the last was the most powerful state, and also the nearest to the rest of India, its name came into general use to denote the whole valley. Kusa-Vihara was the western division of Kamrup proper ; and as it was the richest part of the country, it became for some time the residence of the rajas, whose capital, called Kamatipura, gave its name to the whole province.[16] But the old capital of Kamrup is said to have been Gohati, on the south bank of the Brahmaputra. Now, Kamatipura, the capital oi Kusa-Vihara, is exactly 150 miles, or 900 li, from Pubna,[17] but the direction is due north ; while Gohati is about twice that distance, or say 1900 li, or 317 miles, from Pubna, in a north-east direction. As the position of the former agrees exactly with the distance recorded

[p.501]: by the pilgrim, it is almost certain that it must have been the capital of Kamrup in the seventh century. This would seem to be confirmed by the fact that the language of the people differed but slightly from that of Central India. It was therefore not Assamese, and consequently I infer that the capital visited by Hwen Thsang was not Gohati, in the valley of the Brahmaputra, but Kamatipura, in the Indian district of Kusa-Vihara. The great river crossed by the pilgrim would therefore be the Tista, and not the Brahmaputra.

On the east Kamrup touched the frontiers of the south-western barbarians of the Chinese province of Shu; but the route was difficult, and occupied two months. On the south-east the forests were full of wild elephants, which is still the case at the present day. The king was a Brahman, named Bhaskara Varmma, who claimed descent from the god Narayana, or Vishnu, and his family had occupied the throne for one thousand generations. He was a staunch Buddhist, and accompanied Harsha Varddhana in his religious procession from Pataliputra to Kanoj, in A.D. 643.


विजयेन्द्र कुमार माथुर[18] ने लेख किया है ...गोहाटी (असम) (AS, p.308): इस नगर का प्राचीन नाम शोणितपुर कहा जाता है. महाभारत के अनुसार यहां प्राग्ज्योतिष की राजधानी थी. इसका अन्य नाम प्राग्ज्योतिषपुर भी था.

गुवाहाटी परिचय

गुवाहाटी शहर, भूतपूर्व गौहाटी, पूर्वोत्तर भारत के पश्चिमी असम राज्य में स्थित है। गुवाहाटी ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर बसा एक नैसर्गिक सौंदर्य संपन्न शहर है, जिसके दक्षिण में वनाच्छादित पहाड़ियाँ हैं। गुवाहाटी असम का सबसे बड़ा और ख़ूबसूरत शहर है। गुवाहाटी अपनी अद्वितीय, विविध और रंगीन संस्कृति के लिए जाना जाता है।

इतिहास: 400 ई. में गुवाहाटी कामरूप की राजधानी (प्रागज्योतिषपुर) हुआ करता था। महाभारत काल में पूर्व के प्रकाश के नाम से प्रसिद्ध यह स्थान असुर राजा नरकासुर की राजधानी थी। कहा जाता है कि यहीं पर सौन्दर्य और जीवन के स्रोत हिन्दू देव कामरूप का पुनर्जन्म हुआ था। इसके उल्लेख भारतीय पुराणों में भी हैं। काफ़ी समय तक यह हिन्दू तीर्थस्थल तथा शिक्षा का केन्द्र भी रहा है। सातवीं सदी के महान् यात्री ह्वेनसांग ने इस शहर का वर्णन किया है। ख़ासतौर से गुवाहाटी के वनों, सुंदर पर्वत मालाओं तथा वन्यजीवन का उल्लेख किया गया है। 17 वीं सदी में यह नगर बार-बार मुसलमान तथा अहोम शासकों (चीन के युन्नान प्रांत से यहाँ पहुँची ताई भाषा बोलने वाली जाति) के हाथों में आता-जाता रहा और अंततः 1681 में यह निचले असम के अहोम प्रशासक का मुख्यालय बना तथा 1786 में अहोम राजा ने इसे अपनी राजधानी बना लिया। गुवाहाटी पर 1816 से 1826 तक बर्मियों का क़ब्ज़ा रहा, जब यांदाबू की संधि के द्वारा उन्होंने इसे ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया। 1874 में असम की राजधानी को यहाँ से 108 किलोमीटर दूर शिलांग ले जाया गया। 1973 से गुवाहाटी असम की राजधानी है। दिसपुर के नई राजधानी बन जाने के बाद भी यह शहर न केवल असम बल्कि समूचे पूर्वोत्तर क्षेत्र का व्यापारिक केंद्र बना हुआ है।

उद्योग व व्यवसाय: गुवाहाटी असम का महत्त्वपूर्ण व्यापार केंद्र तथा बंदरगाह है। पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार गुवाहाटी आसपास के क्षेत्र की व्यवसायिक गतिविधियों का केन्द्र है। इसे विश्व का सबसे बड़ा चाय का बाज़ार माना जाता है। यहाँ एक तेलशोधन संयंत्र और सरकारी कृषि क्षेत्र है तथा उद्योगों में चाय तथा कृषि उत्पादों का प्रसंस्करण, अनाज पिसाई तथा साबुन बनाना हैं। यहाँ कोई अन्य बड़े उद्योग नहीं हैं। लगभग 17 प्रतिशत आबादी उद्योग, व्यापार तथा वाणिज्य में लगी हुई है तथा उद्योगों पर राजस्थान से आए मारवाड़ियों का एकाधिकार है।

संस्कृति: गुवाहाटी की आबादी मिलीजुली है, जिसमें बंगाली, पंजाबी, बिहारी, नेपाली, राजस्थानी तथा बांग्लादेशी शामिल हैं। इसके अलावा यहाँ सारे पूर्वोत्तर भारत के आदिवासी समुदायों के लोग भी बसते हैं। यहाँ गुवाहाटी विश्वविद्यालय (स्थापना 1948), अर्ल लॉ कॉलेज, राज्य उच्च न्यायालय अनेक हिन्दू तीर्थस्थलों के अवशेष बिखरे पड़े हैं।

पर्यटन: गुवाहाटी राज्य का पर्यटन विभाग आसपास के स्थलों की यात्राएँ आयोजित करता है। कई स्थानीय मेले तथा उत्सव भी यहाँ मनाए जाते हैं। सर्दियों में असम चाय उत्सव मनाया जाता है। गुवाहाटी में मंदिरों वाली छोटी पहाड़ियाँ हैं। शहर के बीचोंबीच शुक्लेश्वर की पहाड़ी पर जनार्दन मंदिर है। उसमें स्थापित बुद्ध की प्रतिमा में हिन्दू और बौद्ध विशिष्टताओं का अनोखा मिश्रण है। चित्राचल पहाड़ी पर बना नवगढ़ (नवगृह) मंदिर, ज्योतिष और ख़गोल शास्त्र के अध्ययन का प्राचीन केंद्र था। संभवतः गुवाहाटी का प्राचीन नाम प्रागज्योतिषपुर इसी मंदिर के कारण पड़ा होगा। नगर के केन्द्र से 8 किलोमीटर के फ़ासले पर पवित्र नीलाचंल की पहाड़ी पर स्थित कामाख्या मंदिर सबसे महत्त्वपूर्ण है। यह तांत्रिक अनुष्ठानों तथा वैश्विक मातृसत्ता की प्रतीक शक्ति का उपासना स्थल है। वर्तमान मंदिर का निर्माण मूल मंदिर के 10 वीं सदी में ध्वस्त कर दिए जाने पर किया गया था। इस पहाड़ी की चोटी से ब्रह्मपुत्र नदी के मयूर द्वीप में स्थित उमानंद (शिव) मंदिर तथा नगर से 12 किलोमीटर दूर स्थित वसिष्ठ आश्रम हैं।

संदर्भ: भारतकोश-गुवाहाटी


विजयेन्द्र कुमार माथुर [19] ने लेख किया है ...1. शोणितपुर (AS, p.912): प्राचीन किंवदंती के अनुसार महाभारत में ऊषा-अनिरुद्ध उपाख्यान के संबंध में वर्णित ऊषा के पिता बाणासुर की राजधानी। कहा जाता है कि कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध ने ऊषा का हरण इसी स्थान पर किया था और यहीं उनका बाणासुर से युद्ध हुआ था। महाभारत, सभापर्व 38 में बाणासुर को शोणितपुर का राजा कहा गया है- 'तस्माल्लबध्वा वरान् बाणो दुर्लभान् स सुरैरपि, स शोणितपुरे राज्यं चकाराप्रतिमो बली।' इस पुरी का वर्णन उपरोक्त अध्याय में (दाक्षिणात्यपाठ) इस प्रकार है- 'अथासाद्य महाराज तत्पुरीं ददृशुश्च ते, ताम्रप्रकार संवीतां रूप्यद्वारैश्च शोभिताम्, हेमप्रासाद सम्बाधां मुक्तामणिविचित्रिताम उद्यानवनसम्पन्नं नृत्तगीतैश्च शोभिताम्। तोरणैः पक्षिभिः कीर्णा पुष्करिण्या च शोभिताम् तां पुरीं स्वर्गसंकाशां हृष्टपुष्ट जनाकुलाम्।'

विष्णुपुराण 5, 33, 11 में भी बाणासुर की राजधानी शोणितपुर में बताई गई है- 'तं शोणितपुरं नीतं श्रुत्वा विद्याविदग्धया।'

शोणितपुर का अभिज्ञान कुछ विद्वानों ने असम की वर्तमान राजधानी गोहाटी से किया है। इसको प्राग्ज्योतिषपुर [p.913]: भी कहा जाता था।

श्रीमद्भागवत 10, 62, 4 में ऊषा-अनिरुद्ध की कथा के प्रसंग में शोणितपुर को बाणासुर की राजधानी बताया गया है- 'शोणिताख्ये पुरे रम्ये स राज्यमकरोत्पुरा, तस्य शंभोः प्रसादेन किंकरा इव तेऽमराः।' ऊषा की सखी सोते हुए अनिरुद्ध को द्वारिका से योग क्रिया द्वारा उठाकर शोणितपुर ले आई थी- 'तत्र सुप्तं सुपर्यंके प्राद्युम्निं योगमास्थिता गृहीत्वा शोणितपुरं सख्यै प्रियमदर्शयत्।' श्रीमद्भागवत 10, 62, 23

2. शोणितपुर (AS, p.913) = Sojat (सोजत)

3. शोणितपुर (AS, p.913) = इटारसी, म.प्र. से 30 मील दूर सोहागपुर रेल स्टेशन के निकट शोणितपुर स्थित है। स्थानीय जनश्रुति में इस स्थान को बाणासुर की राजधानी बताया जाता है। नर्मदा नदी ग्राम के निकट बहती है।

External links


  1. "Capital of Assam" Assam Online Portal
  2. "Magisterial powers for Guwahati top cop". The Telegraph. Archived from the original on 30 September 2015.
  3. "Kamrup Metro District". Kamrup(M) District Administration. Archived from the original on 11 September 2015.
  4. "History". Government of Assam.
  5. "About Guwahati".
  6. Gait, Sir Edward Albert (1906). A History of Assam. Thacker, Spink & Company. p.13-15
  7. "Guwahati".
  8. "Civilisation existed in Guwahati between 2nd, 1st century BC". The Assam Tribune. 22 January 2016.
  9. "Assam in the eyes of Hiuen Tsang".
  10. "History". Assam Online Portal.
  11. Choudhury, A.U. (2002). Big cats, elephant, rhino and gaur in Guwahati. The Rhino Found. NE India Newsletter 4:16-19.
  12. Choudhury, A.U. (2003). Guwahati: the city of Adjutants and other endangered birds. The Rhino Found. NE India Newsletter 5:14-17.
  13. Baruah, Swarna Lata (1993). Last Days of Ahom Monarchy: A History of Assam from 1769 to 1826. Munshiram Manoharlal Publishers Pvt. Limited. ISBN 978-81-215-0462-1. pp. 200–201.
  14. The Ancient Geography of India/Eastern India, p.500-501
  15. Julien's ' Hiouen Thsang,' iii. 76.
  16. ' Ayin Akbari,' ii. 3. " Kamrup, which is also called Kamtah."
  17. See Map No. I.
  18. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.308
  19. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.912-913