Mysore
Author:Laxman Burdak, IFS (R) |

Mysore (मैसूर) is a city and district in the southern part of the state of Karnataka, India.
Variants
- Mysuru ( officially name)
- Mysore (मैसूर) (AS, p.762)
- Mahishasura महिषासुर, दे. मैसूर, (AS, p.727)
- Mahishoora/Mahishura महीशूर दे. मैसूर, (AS, p.728)
Location
Mysore city is geographically located between 12° 18′ 26″ north latitude and 76° 38′ 59″ east longitude. It is located at an altitude of 739.75 m. Mysore is located in the foothills of the Chamundi Hills about 145.2 km towards the southwest of Bangalore.
The district is bounded by Mandya district to the east and northeast, Chamrajanagar district to the southeast, Kerala state to the south, Kodagu district to the west, and Hassan district to the north.
History
Mysore served as the capital city of the Kingdom of Mysore for nearly six centuries from 1399 until 1956. The Kingdom was ruled by the Wadiyar dynasty, with a brief period of interregnum in the 1760s and 70s when Hyder Ali and Tipu Sultan were in power. The Wadiyars were patrons of art and culture and contributed significantly to the cultural and economic growth of the city and the state. The cultural ambiance and achievements of Mysore earned it the sobriquet Cultural Capital of Karnataka.
Mysore is noted for its heritage structures and palaces, including the Mysore Palace, and for the festivities that take place during the Dasara festival when the city receives a large number of tourists from around the world.
In Mahabharata
Mahisha (महिष) in Mahabharata (IX.44.77),
Mahishaka (माहिषक) in Mahabharata (VI.10.45), (VI.10.57),(VIII.30.45),
मंगलपुर
विजयेन्द्र कुमार माथुर[1] ने लेख किया है ...मंगलपुर (AS, p.683) = 2. मैसूर वर्तमान मंगलोर. यह प्राचीन तीर्थ है. नगर के पूर्व में मंगलादेवी का प्राचीन मंदिर है.
मैसूर
विजयेन्द्र कुमार माथुर[2] ने लेख किया है ... मैसूर (AS, p.762) का नाम महिषासुर दैत्य के नाम पर प्रसिद्ध है. किवदंती है कि देवी चंडी ने महिषासुर का वध इसी स्थान पर किया था. मैसूर के प्रांत का महत्व अति प्राचीन काल से चला आ रहा है क्योंकि मौर्य सम्राट अशोक (तीसरी सदीई.पू.) के दो शिलालेख मैसूर राज्य में प्राप्त हुए हैं (देखें ब्रह्मगिरि, मासकी). मैसूर नगर इस प्रांत की पुरानी राजधानी है. नगर के पास चामुंडी की पहाड़ी पर चामुंडेश्वरी देवी का मंदिर उसी स्थान पर है जहां देवी ने महिषासुर का वध किया था. 12 वीं सदी में होयसल नरेश के समय मैसूर राज्य में वास्तुकला उन्नति के शिखर पर पहुंच गई थी जिसका उदाहरण बेलूर का प्रसिद्ध मंदिर है. मैसूर का प्राचीन नाम महीशूर भी कहा जाता है. महाभारत में संभवत मैसूर के जनपद का नाम माहिष या माहिषक है (देखें माहिष).
मैसूर परिचय
मैसूर शहर, दक्षिण-मध्य कर्नाटक, भूतपूर्व मैसूर राज्य, दक्षिणी भारत में स्थित है। यह चामुंडी पहाड़ी के पश्चिमोत्तर में 770 मीटर की ऊँचाई पर लहरदार दक्कन पठार पर कावेरी नदी व कब्बानी नदी के बीच स्थित है। 1799 ई. से 1831 ई. तक यह मैसूर रियासत की प्रशासनिक राजधानी था और अब बंगलोर के बाद कर्नाटक राज्य का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। मैसूर भारतीय गणतंत्र में सम्मिलित एक राज्य तथा नगर है। इसकी सीमा उत्तर-पश्चिम मुंबई, पूर्व में आन्ध्र प्रदेश, दक्षिण-पूर्व में तमिलनाडु और दक्षिण-पश्चिम में केरल राज्यों से घिरी हुई है। अपनी क्रेप सिल्क की साड़ियों, चंदन के तेल और चंदन की लकड़ी से बने सामान के लिए मशहूर यह स्थान वुडयार वंश के शासन काल में उनकी राजधानी हुआ करता था। वुडयार राजा कला और संस्कृति प्रेमी थे। अपने 150 वर्ष के शासन काल में उन्होंने इसे बहुत बढ़ावा दिया। उस दौरान मैसूर दक्षिण की सांस्कृतिक राजधानी बन गया। मैसूर महलों, बगीचों और मंदिरों का नगर है। आज भी इसकी ख़ूबसूरती क़ायम है। कर्नाटक संगीत व नृत्य का यह प्रमुख केंद्र है।
पौराणिक उल्लेख: मैसूर शहर के आस-पास की भूमि पर वर्षा के जल से भरे उथले जलाशय हैं। इस स्थान का उल्लेख महाकाव्य महाभारत में 'महिष्मति' के रूप में हुआ है। मौर्य काल, तीसरी शताब्दी ई. पू. में यह 'पूरिगेरे' के नाम से विख्यात था। महिष्मंडल महिषक लोग महिष्मति, नर्मदा घाटी से प्रवास कर यहाँ पर बस गए थे। बाद में यह महिषासुर कहलाया था।
इतिहास: मैसूर शहर का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। इसके प्राचीनतम शासक कदम्ब वंश के थे, जिनका उल्लेख टॉल्मी ने किया है। कदम्बों को चेरों, पल्लवों और चालुक्यों से युद्ध करना पड़ा था। 12वीं शताब्दी में जाकर मैसूर का शासन कदम्बों के हाथों से होयसलों के हाथों में आया, जिन्होंने द्वारसमुद्र अथवा आधुनिक हलेबिड को अपनी राजधानी बनाया था। होयसल राजा रायचन्द्र से ही [Ala-ud-din Khalji|अलाउद्दीन ख़िलज़ी]] ने मैसूर जीतकर अपने राज्य में सम्मिलित किया था। इसके उपरान्त मैसूर विजयनगर राज्य में सम्मिलित कर लिया गया और उसके विघटन के उपरान्त 1610 ई. में वह पुन: स्थानीय हिन्दू राजा के अधिकार में आ गया था।
इस राजवंश के चौथे उत्तराधिकारी चिक्क देवराज ने मैसूर की शक्ति और सत्ता में उल्लेखनीय वृद्धि की। किन्तु 18वीं शताब्दी के मध्य में उसका राजवंश हैदरअली द्वारा अपदस्थ कर दिया गया था और उसके पुत्र टीपू सुल्तान ने 1799 ई. तक उस पर राज्य किया। टीपू की पराजय और मृत्यु के उपरान्त विजयी अंग्रेज़ों ने मैसूर को संरक्षित राज्य बनाकर वहाँ एक पाँच वर्षीय बालक कृष्णराज वाडियर को सिंहासन पर बैठाया था। कृष्णराज अत्यंत अयोग्य शासक सिद्ध हुआ, 1821 ई. में ब्रिटिश सरकार ने शासन प्रबंध अपने हाथों में ले लिया, परंतु 1867 ई. में कृष्ण के उत्तराधिकारी चाम राजेन्द्र को पुन: शासन सौंप दिया। उस समय से इस सुशासित राज्य का 1947 ई. में भारतीय संघ में विलय कर दिया गया।
मैसूर-युद्ध: 1761 ई. में हैदर अली ने मैसूर में हिन्दू शासक के ऊपर नियंत्रण स्थापित कर लिया। निरक्षर होने के बाद भी हैदर की सैनिक एवं राजनीतिक योग्यता अद्वितीय थी। उसके फ़्राँसीसियों से अच्छे सम्बन्ध थे। हैदर अली की योग्यता, कूटनीतिक सूझबूझ एवं सैनिक कुशलता से मराठे, निज़ाम एवं अंग्रेज़ ईर्ष्या करते थे। हैदर अली ने अंग्रेज़ों से भी सहयोग माँगा था, परन्तु अंग्रेज़ इसके लिए तैयार नहीं हुए, क्योंकि इससे उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी न हो पाती। भारत में अंग्रेज़ों और मैसूर के शासकों के बीच चार सैन्य मुठभेड़ हुई थीं। अंग्रेज़ों और हैदर अली तथा उसके पुत्र टीपू सुल्तान के बीच समय-समय पर युद्ध हुए। 32 वर्षों (1767 से 1799 ई.) के मध्य में ये युद्ध छेड़े गए थे।
भारत के इतिहास में चार मैसूर युद्ध लड़े गये हैं, जो इस प्रकार से हैं- प्रथम युद्ध (1767 - 1769 ई.), द्वितीय युद्ध (1780 - 1784 ई.), तृतीय युद्ध (1790 - 1792 ई.), चतुर्थ युद्ध (1799 ई.)
भौगोलिक संरचना: यह दक्षिणी भारत का एक राज्य था, जिसका पुनर्गठन सन् 1956 में भाषा के आधार पर किया गया था। इसके परिणामस्वरूप कन्नड़ भाषी क्षेत्रों को इसमें मिला दिया गया है। इसका क्षेत्रफल 74,210 वर्ग मील है। इसके उत्तर में महाराष्ट्र, पूर्व में आंध्र प्रदेश, दक्षिण में केरल और मद्रास एवं पश्चिम में गोआ एवं अरब सागर हैं। मैसूर का धरातल ऊँचा नीचा एवं पठारी है। समुद्र तल से ऊँचाई लगभग 2,000 फुट है। प्राकृतिक बनावट के आधार पर इस दो भागों में विभक्त किया जा सकता है: 1. पश्चिम का तटीय मैदान, 2. दक्षिणी दक्कन प्रदेश।
तटीय मैदान मालाबार तट का उत्तरी भाग है, जिसकी चौड़ाई बहुत कम है। इसके पश्चिम में पश्चिमी घाट की पहाड़ियाँ हैं, जिनसे छोट छोटी द्रुतगामिनी नदियाँ निकलकर अरब सागर में विलीन हो जाती हैं। पूर्वी भाग उच्च महाड़ी एवं पठारी प्रदेश है। मैसूर के मध्य में, उत्तर से दक्षिण, पश्चिमी घाट की पहाड़ियाँ है। इसके पूर्व में प्राचीन चट्टानों से निर्मित दकन का भाग है। उत्तर-पूर्व में कृष्णा, तुंगभद्रा एवं भीमा नदियों का समतल उच्च मैदान है।
सांस्कृतिक राजधानी: कर्नाटक की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले मैसूर के नाम से कई ख़ास चीजें जुड़ी हुई हैं- मैसूर मल्लिगे (विशेष पुष्प), मैसूर के रेशमी वस्त्र, राजमहल, मैसूर पाक (मिष्टान्न), मैसूर पेटा (पगड़ी), मैसूर विल्यदले (पान) तथा और भी बहुत-सारी चीज़ें। ये सब कुछ मैसूर और इसके जीवन की पहचान हैं लेकिन ये पहचान तब तक अधूरी रहती हैं जब तक इस शहर में पिछले 400 वर्षों से लगातार मनाए जा रहे दशहरा उत्सव की बात न की जाए। यह मैसूर को राज्य के अन्य ज़िलों और शहरों से अलग करता है। पूर्व में इसे 'नवरात्रि' के नाम से ही जाना जाता था लेकिन वाडेयार राजवंश के लोकप्रिय शासक कृष्णराज वाडेयार के समय में इसे दशहरा कहने का चलन शुरू हुआ। भारत ही नहीं, कई बाहरी देशों में भी इस उत्सव की बढ़ती लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए इस वर्ष राज्य सरकार ने इसे राज्योत्सव (नाद हब्बा) का दर्जा दिया है।
मैसूर का दशहरा: पारंपरिक उत्साह और धूम-धाम के साथ मनाया जाने वाला यह आसुरी शक्तियों पर देवत्व के विजय का दस दिवसीय उत्सव हर वर्ष अक्टूबर महीने में मनाया जाता है। दशहरे की परंपरा का इतिहास मध्यकालीन दक्षिण भारत के अद्वितीय विजयनगर साम्राज्य के समय से शुरू होता है। हरिहर और बुक्का नाम के दो भाइयों द्वारा 12-13 वीं शताब्दी में स्थापित इस साम्राज्य में दशहरा उत्सव मनाया जाता था। इसकी राजधानी हम्पी के दौरे पर पहुंचे कई विदेशी पर्यटकों ने अपने संस्मरणों तथा यात्रा वृत्तान्तों में इस विषय में लिखा है। इनमें डोमिंगोज पेज, फर्नाओ नूनिज और रॉबर्ट सीवेल जैसे पर्यटक भी शामिल हैं। इन लेखकों ने हम्पी में मनाए जाने वाले दशहरा उत्सव के बारे में काफ़ी विस्तार से लिखा है। विजयनगर शासकों की यही परंपरा वर्ष 1399 में मैसूर पहुंची जब गुजरात के द्वारका से पुरगेरे (मैसूर का प्राचीन नाम) पहुंचे दो भाइयों यदुराय और कृष्णराय ने वाडेयार राजघराने की नींव डाली। यदुराय इस राजघराने के पहले शासक बने। उनके पुत्र चामराज वाडेयार प्रथम ने पुरगेरे का नाम 'मैसूर' रखा। उन्होंने विजयनगर साम्राज्य की अधीनता भी स्वीकार की। वाडेयार राजाओं के दशहरा उत्सवों से आज के उत्सवों का चेहरा काफ़ी अलग हो चुका है। अब यह एक अन्तरराष्ट्रीय उत्सव बन गया है। इस उत्सव में शामिल होने के लिए देश और दुनिया के विभिन्न हिस्सों से मैसूर पहुंचने वाले पर्यटक दशहरा गतिविधियों की विविधताओं को देख दंग रह जाते हैं। तेज रोशनी में नहाया मैसूर महल, फूलों और पत्तियों से सजे चढ़ावे, सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेल-कूद, गोम्बे हब्बा और विदेशी मेहमानों से लेकर जम्बो सवारी तक हर बात उन्हें ख़ास तौर पर आकर्षित करती है। हालांकि बदलते समय के साथ भारत के धार्मिक अनुष्ठानों से प्रमुख कारक के रूप में धर्म की बातें दूर होती जा रही हैं लेकिन सजग पर्यटक चाहे तो दशहरा उत्सव में धर्म का अंश घरेलू आयोजनों में आज भी देख सकता है।
संग्रहालयों का शहर:
महलों के शहर के नाम से मशहूर मैसूर में बीसियों संग्रहालय इस शहर की धरोहरों को संजोने का काम कर रहे हैं। इन संग्रहालयों में विशेष हैं-
- जयचामराजेन्द्र संग्रहालय तथा कला दीर्घा
- प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय
- लोककथा संग्रहालय
- ओरियेंटल रिसर्च इंस्टीटयूट (ओआरआई)
- रेल संग्रहालय
- मैसूर महल
- वाडेयार राजघराने के वर्तमान उत्तराधिकारी श्रीकांतदत्त नरसिंहराज वाडेयार का निजी संग्रहालय।
पर्यटन: मैसूर अति सुन्दर परिष्कृत नगर है। यह एक पर्यटन स्थल भी है। मैसूर में कई ऐतिहासिक इमारतें हैं। मैसूर में क़िले, पहाड़ियाँ एवं झीलें भी हैं। मैसूर महलों, बगीचों और मंदिरों का नगर है। आज भी इसकी ख़ूबसूरती क़ायम है। मैसूर महलों, बग़ीचों और मंदिरों का नगर है। आज भी इसकी ख़ूबसूरती क़ायम है। कर्नाटक संगीत व नृत्य का यह प्रमुख केंद्र है। पूर्व में स्थित सोमनाथपुर में होयसल वंश द्वारा र्निर्मित (1268 ई.) एक मंदिर है।
पुराना क़िला: 18वीं शताब्दी में यूरोपीय शैली में पुन:निर्मित एक पुराना क़िला, मैसूर के मध्य में स्थित है। क़िले के दायरे में महाराजा महल (1897 ई.) है, जिसमें हाथीदांत व सोने से निर्मित सिंहासन है।
पार्क एवं इमारतें: मैसूर में कर्ज़न पार्क, सिल्वर जुबली क्लॉक टावर (1927 ई.), गाँधी चौक और महाराजा की दो मूर्तियाँ पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं। पश्चिम में गोर्डोन पार्क के निकट भूतपूर्व ब्रिटिश रेज़िडेंसी (1805), प्रख्यात ओरिएंटल लाइब्रेरी, विश्वविद्यालय भवन, सार्वजनिक कार्यालय, जगमोहन महल और ललिता महल आदि अन्य प्रसिद्ध इमारतें हैं।
पहाड़ियाँ एवं झील: तीर्थयात्री बड़ी संख्या में चामुंडी पहाड़ी पर लगभग 1,064 मीटर दूर जाते हैं, जहाँ शिव के पवित्र बैल, नन्दी की अखंडित मूर्ति है। इस शिखर से दक्षिण की ओर स्थित नीलगिरि पहाड़ियों का सुंदर नज़ारा देखा जा सकता है। कावेरी नदी पर मैसूर के पश्चिमोत्तर में 19 किलोमीटर की दूरी पर स्थित विशाल कृष्णराव झील है, जिसमें बाँध भी बना है। इस बाँध के नीचे फ़व्वारे व झरनेयुक्त सीढ़ीदार वृन्दावन उद्यान हैं, जिन पर रात में रोशनी की जाती है।
अभयारण्य: पूर्व में स्थित सोमनाथपुर में होयसल वंश द्वारा निर्मित (1268 ई.) एक मंदिर है। वेणुगोपाल वन्य जीव उद्यान के एक भाग बांदीपुर अभयारण्य तक मैसूर से पहुँचा जा सकता है। यह गौर, भारतीय बाइसन और चीतल के झुंडों के लिए विख्यात है। यहाँ घूमने के लिए सड़कों का संजाल है। इससे लगकर ही तमिलनाडु राज्य का मुदुमलाई वन्यजीव अभयारण्य स्थित है। यह कावेरी व उसकी नदियों का अपवाह क्षेत्र है।
संदर्भ: भारताकोश-मैसूर