Tara Chand

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Author of this article is Laxman Burdak लक्ष्मण बुरड़क
Tara Chand Saharan IPS

Chaudhary Tara Chand Saharan (चौधरी ताराचन्द सहारण) (born 6 June, 1913 -- death 12 March, 1958) was an Indian Police Service officer from Makkasar in Hanumangarh district in Rajasthan. He sacrificed his life fighting with dacoits on 12 March 1958.

Birth and childhood

He was born in a poor family in village Makkasar in Hanumangarh district. His father Ch. Kesho Ram Saran had died prior to his birth. His mother was Jaitabai. When child Tara Chand became of 5 years, one famous social worker of the area named Saint Swami Mansanath took him away from his mother and got him admitted in a newly started school in Sangaria.


He could complete his fourth class with great difficulty but there was no money for studying further. His bhabhi (brother’s wife) was kind enough to help him in fifth class by offering two and half rupees for purchase of books. Next year he worked digging soil on a canal and got money for his school expenditure. Third year fortunately he got a scholarship from Birla-house and completed his middle school. His further regular studies were not possible due to poor financial conditions. So he completed high school as a private student from Punjab Education Board.


In 1930 he joined service in Jodhpur state as a sepoy in Sardar Infantry, but left this job due to unfavourable conditions. Later in 1935 he joined Bikaner state police. He was directly appointed as a sub-Inspector due to his talents. In 1944 he was promoted to rank of Inspector and further promoted as Dy.S.P. on 13-2-1948. He became S.P. in 1951. He was awarded IPS in 1957. He was a dead-honest officer. When he died there was a saving of only Rs. 139 in his account. He spent most of his savings in helping poor and needy students.


After Tara Chand got job, there were a number of offers of marriage. There were proposals of dowry as well. Meanwhile a social worker and educationist from the area named Chaudhary Harish Chandra Nain (Vakil) sent a proposal of marriage with his elder brother’s daughter as per strict Arya Samaj system. Tara Chand readily accepted this offer and married without taking any dowry.


After independence, there were Hindi-Muslim tensions. It so happened that The Maharaja of Bikaner wanted to bring two Hindu Sindhi lady doctors from Bahawalpur in Pakistan, so he asked for a brave police officer. It was a very tough and risky job. Tara Chand opted to go there with his team. The Muslim crowd when saw the Indian Police in Bahawalpur, they first attacked the police but when came to know that it was led by Tara Chand they became soft and courteous. They had so much of faith in the honesty and sincerity of Tara Chand that they not only sent the two lady doctors with him but also offered them a great welcome dinner. They all came to boarder to see them off. This was the result of his good reputation.

He was generally posted in dacoit affected areas. In 1953 he shooted a dacoit Shivnath for which he was awarded “Indian Police Gallantry award” in 1954. Pali district was badly affected by dacoit menace during those days. In 1954 he traveled 400 miles on foot in the remote areas in search of dacoits and spent 200 days continuously out of his house. The state Home Minister on 23 January 1958 called meeting of police officers regarding eradication of gang of dacoit Kalyan Singh. Tara Chand assured the minister that either he will catch the dacoit or he will dye. The dacoits were very afraid of Tara Chand. It was first event in the history of police in India that Tara Chand IPS and SP Jodhpur was martyred in an encounter with dacoit, Kalyan Singh but not before the gang of Kalyan Singh had been liquidated on 12 March 1958. He was awarded posthumously the “President Police and Fire Medal for Gallantry” on 2 October, 1959 by the then Prime Minister of India, Pandit Jawahar Lal Nehru, in Nagaur. He had received 81 letters of appreciation from his seniors during his service.

Tara Chand Memorials

जीवन परिचय


ताराचन्द का जन्म ६ जून १९१३ को हनुमानगढ़ जिले के एक छोटे से गाँव मक्कासर में चौधरी केशोराम सारण के घर पर एक सामान्य जाट किसान परिवार में हुआ था. इनके दो बड़े भाई थे. बड़े का नाम चुन्नीलाल तथा दूसरे का नाम गंगाराम था. इनकी माता जी का नाम जैताबाई था.

इनके पैदा होते ही इनके पिताजी का स्वर्गवास हो गया तथा परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. इनके पिताजी ने इनका मुख तक नहीं देखा था. इनकी माताजी ने बालक को अभिशप्त समझा और चिंता में खाना पीना छोड़ दिया. पड़ोस की स्त्रियों को पता लगा तो उन्होंने खूब समझाया पर नहीं मानी और सेहत दिन-प्रतिदिन गिरती गई. उनके दूध उतरना भी बंद हो गया पर यह विचित्र बालक उस समय भी बिना रोये निश्चल लेटा रहता था. उसी समय एक घटना ऐसी घटी कि पड़ोस का एक आठ वर्ष का बालक वहां से गुजर रहा था वह बालक ताराचंद को देख कर बोला कि आप यह मन्दिर की मूर्ती क्यों उठा कर ले आए. यह तो हमारे भगवान की मूर्ती है. इस बात का असर इनकी माता जी पर ऐसा पड़ा कि उसने समझ लिया यह बालक होनहार है तथा एक दिन कुल का नाम ऊँचा करेगा. इनकी माताजी ने अनशन छोड़ दिया तथा तीनों बेटों का लालन-पालन करने लगी.


उन्ही दिनों संगरिया में एक विद्यालय खुला था. उसी समय स्वामी मंसानाथ जी उस गाँव में आए उन्होंने उस तीक्ष्ण बुद्धि बालक को देखा तथा उसको पढ़ने के लिए संगरिया ले गए वहां पर इस बालक ने इतनी मेहनत से पढ़ाई में अपना मन लगाया कि वह प्रथम आया. इन्ही दिनों गाँव से दो मील की दूरी पर हनुमानगढ़ में भी एक स्कूल खुल गया. बालक को संगरिया से हनुमानगढ़ के स्कूल में दाखिल करा दिया. गांवों से कई और बच्चे भी स्कूल में जाते थे. वे उन सभी के नेता थे. वे जो नाटक खेलते थे उस में वे तहसीलदार का रोल करते थे. इसके कारण इनका नाम ही तहसीलदार पड़ गया.

एक बार स्कूल में जाते समय रस्ते में एक १३ रुपयों की थैली मिली. किसी ने भी उसे नहीं उठाया. तब ताराचंद ने इसे उठाकर इसे गुरूजी की मेज पर रख दिया. घर में इतनी गरीबी थी कि माताजी उसकी किताबों के पैसे ही मुश्किल से जुटा पाती थी. एक बार छुटियाँ समाप्त होने वाली थी. माताजी के पास पैसे नहीं थे . बालक उदास रहने लगा तब उनकी बड़ी भाभी ने उनको ढाई रुपये दिए. जिससे उसने अपनी जूती और पुस्तकें खरीदी. उसके माताजी व बड़े भाई जब खेत में काम करते थे तो ताराचंद भी स्कूल से आकर घर का सारा काम करता था, पशुओं को घास व गोबर, कूड़ा आदि साफ़ कर देता था.

हनुमानगढ़ में केवल पांचवीं तक स्कूल थी. इसलिए मिडिल पास करने के लिए संगरिया जाना पड़ा. इन्होने अपनी लगन से ही छात्रवृति प्राप्त की. जिससे पढ़ाई का कार्य सुचारू ढंग से चल सका. आठवीं पास करने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि दूर जाकर दसवीं कर सकते. आस पास कोई भी दसवीं की स्कूल नहीं थी. इसलिए प्राईवेट दसवीं करने का फ़ैसला किया. इस काम के लिए भी पास में पैसे नहीं थे इसलिए घग्गर नदी के खुदाई के कार्य में भाग लेकर कुछ पैसे इकट्ठे किए तब ताराचंद ने पढ़ाई शुरू की. यूनिवर्सिटी की फीस देने के पैसे उनके पास नहीं थे. इस बात का पता जब समाज सेवी वकील चौधरी हरीश चन्द्र नैन को लगा तो उन्होंने ताराचंद को २५ रुपये दिए. इस प्रकार ताराचंद ने दसवीं की परीक्षा पास करली. यह परीक्षा उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से की थी. अपने गाँव में 10 वीं पास करने वाला वह पहला विद्यार्थी था.


ताराचंद जब संगरिया में पढ़ते थे तो चौधरी हरिश्चंद्र नैन इनके काम से बहुत प्रभावित हुए. वह उनको अपने परिवार का दामाद बनाना चाहते थे. उन्होंने दिनांक १८-११-१९३० को एक पत्र ताराचंद को लिख कर प्रस्ताव दिया कि वह उनके बड़े भाई हिमताराम की बड़ी पुत्री खींवणीं से शादी करलें. पत्र में प्रस्तावित किया कि यह शादी वैदिक रीती रिवाज से सामाजिक कुरीतियों को दूर करते हुए की जायेगी. इस पर ताराचंद ने सहमती दी. उनकी शादी आर्य समाजी तरीके से की गई. लेकिन ६ साल बाद एक पुत्र के पैदा करते ही इनकी पत्नी का देहांत हो गया. यह पुत्र धर्मवीर था जो बाद में भारतीय प्रसाशनिक सेवा में आया. पुनः इनकी शादी खींवणीं देवी की बहिन सुलभा से कर दी गई. सुलभा से इनको तीन पुत्रियाँ पैदा हुई.

नौकरी की तलास

मेट्रिक परीक्षा पास करने के बाद इन्होने कई जगह नौकरी की तलास की. उन दिनों सिफारिसों का दौर था जो ताराचंद के पास नहीं थी. इनका चयन पोस्ट मास्टर के लिए हुआ पर वे यह नौकरी नहीं करना चाहते थे. बाद में जोधपुर में सरदार इन्फैन्ट्री में भरती हो गए. चौधरी बलदेव राम मिर्धा उस समय उप पुलिस महानिरीक्षक थे. उन्होंने इनको चरित्र प्रमाण पत्र दिया. वे शीघ्र ही पदोन्नति पाकर हवलदार बन गए. दिनांक २०-२-१९३१ को इन्होने चौधरी हरिश्चंद्र नैन को पत्र लिखा -

"इस रियासत में एक बड़ी चीज की आवश्यकता होती है और वह है सिफारिश. यहाँ जिसकी सिफारिश नहीं होती है, इससे कोई बुरा हाल कहीं नहीं देखा."

जोधपुर में बाहर से आने वालों के साथ बहुत बुरा व्यवहार किया जाता था. ताराचंद ने वार सम्बन्धी तरीकों में ९३ प्रतिशत अंक प्राप्त हुए थे. इसके बाद उनको ट्रेनिंग के लिए कराची बलूच रेजिमेंट में भेजा गया. अंग्रेज अड्वाइसरी ऑफिसर गैर क्षेत्रीय होने के कारण इनका बहुत तगड़ा विरोध किया गया. इस बात का इनपर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा तथा ये छुट्टी लेकर घर आगये. ये बीकानेर के पुलिस महा निरीक्षक से मिले. वे इनके व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुए और इनको थानेदार के पद पर नियुक्ति का विश्वास दिलाया. इन्होने २९ अगस्त १९३५ को सैन्य जीवन से विदाई ली. इनके साथियों और अधिकारियों ने बहुत समझाया कि जल्दी ही सेना में सेकंड लेफ्टिनेंट के पद पर तरक्की हो जायेगी किन्तु इनको इतनी नफरत हो गई थी कि सेना की नौकरी छोड़ दी. उस समय इन्होने कहा था कि -

"I am the master of my fate,
I am the captain of my soul."

बीकानेर पहुँच कर २ सितम्बर १९३५ को बतौर थानेदार इन्होने ३० रुपये माहवार नौकरी शुरू की. आप पीटी व हथियार चलाने में पहले ही दक्ष थे. आपकी पहली नियुक्ति पुलिस लाइन बीकानेर में की गई. यहाँ पर आपने एक प्रशिक्षक के रूप में कार्य किया. तीन मास के पश्चात आपको एक साल के लिए पुलिस प्रशिक्षण केन्द्र मुरादाबाद भेजा गया. प्रशिक्षण में सेक्शन कमांडर के पद पर नियुक्ति पाने वाले वे पहले अधिकारी थे. आप सूरतगढ़, हनुमानगढ़, रायसिंह नगर, पुरहानापुर , टीपी करनपुर, मंगोनगर आदि थानों के प्रभार में रहे. १९४४ में पदोन्नत होकर इंस्पेक्टर बने. तीन साल बाद १३-२-१९४८ को उप खंड अधिकारी तथा एक वर्ष पश्चात पुलिस अधीक्षक बने.


आप लंबे और ऊँचे कद के व्यक्ति थे. आपका कद ५ फ़ुट ९ इंच था. छाती चोडी तथा शरीर गठीला एवं बलिष्ट था. एक बार एक पहलवान आपके गाँव में आए. उसके सर पर एक मोटी चोटी थी. उसका चैलेंज था कि कोई भी चोटी को पकड़े मैं छुड़वा सकता हूँ. उसकी चुटिया को अनेक लोगों ने पकड़ा पर वह छुटा लेते थे. एक दिन पहलवान का पाला ताराचंद से पड़ा. ताराचंद ने चुटिया को कस के पकड़ लिया. पहलवान ने झटका मारा और साथ ही अट्टहास भी कि देखो मैंने चोटी छुड़ाली है. पहलवान बड़ा खुश नजर आया पर गाँव वाले सब जोर जोर से हंस रहे थे. पहलवान ने सर पर हाथ फेरा देखा चोटी तो है ही नहीं. चोटी तो ताराचंद के हाथ में आ गई थी.

वे ११-१२ फ़ुट ऊँची दिवार पर भागकर चढ़ जाते थे. एक बार आप की ड्यूटी कानपुर मेले में लगी थी. आपको चेकिंग करनी थी. मेले में एक कोठे पर तहसीलदार एवं डॉ आदि बैठे थे. ऊपर बैठे हुए व्यक्ति में से किसी ने कहा कि ऊपर आ जाओ. ताराचंद ने पूछा सीधा ही आऊं क्या. उस व्यक्ति ने कहा पुलिस वाले हो तो आओ . वे वर्दी समेत जूतों में दौड़कर सीधे ऊपर छत पर पहुँच गए. जिन लोगों ने देखा वे स्तंभित रह गए.

वे मुश्किल से मुश्किल काम हंसकर कर लेते थे. पुलिस में होते हुए भी वे इतना अच्छा व्यवहार लोगों एवं दोषियों के साथ करते थे कि इनके व्यवहार से लोग दंग रह जाते थे. ताराचंद की मान्यता थी कि इस प्रजातंत्र में यह मानव समाज के लिए घातक है कि पुलिस वाले ऐसा क्रूर व कटु व्यवहार करे.

इस विभाग में केवल योगी पुरूष ही आने के अधिकारी हैं क्योंकि एक पुलिस कर्मचारी का वास्ता तो हमेशा बुरे लोगों और बुराई से ही पड़ता है इसलिए उनको सद्मार्ग पर लाने के लिए पुलिस में स्वच्छ-छवि एवं उच्च चरित्र वाले लोग ही आने चाहिये. एक पुलिस अधिकारी के नाते वे इतने सरल, समझदार, कर्तव्य परायण थे कि एक बार एक आदमी को हथकडी न लगाने के लिए उन्हें १८००० रुपये देने की पेशकश की गई तथा तफसिश को बिगाड़ने के लिए एक लाख रुपये की आफर दी गई. घर तथा रिश्तेदारों ने भी कहा कि दुनियादारी की तरह रहना सीखो वरना पिछड़ जाओगे. उस समय उन्होंने कहा था कि - "मुझे यह जानकर महान आतंरिक वेदना हुई है कि जिनके हाथों मैं जन्मा हूँ, मेरा विकास हुआ है, वे निज जन भी अब तक समझ नहीं पाए."

इन्होने कभी भी १०००-१५०० से ज्यादा धनराशी इकट्ठी नहीं की. उनका १ फरवरी १९५१ का डायरी का अंश बताता है कि -"आज वेतन मिला. इस महीने की बचत व वेतन मिलाकर अब मेरे पास ५१०/- रुपये हैं. १२००/- पिछले सालों की बचत के हैं. मेरे २० साल के सेवाकाल में बस इतना ही बचा पाया हूँ."

चौधरी ताराचंद का व्यवहार एक पुलिस अधिकारी के तौर पर बड़ा सराहनीय एवं विचित्र था. जब भी कोई व्यक्ति शिकायत लेकर आता तो वे उसकी बात ध्यान पूर्वक सुनते थे तथा उसी की बातों से सचाई का पता लगा लेते थे. उन्होंने कभी भी अपने जीवन में किसी दुखिया को दुत्कारा नहीं. परन्तु हमेशा प्यार से सहायता की. एक बार बीकानेर में हिंदू मुस्लिम दंगा हो गया. शहर में अफवाहें फ़ैल गई कि मुसलमानों ने हिन्दुओं को मारा है तो एक भारी हिंदू समूह ने मुसलमानों के मुहल्ले पर हमला कर दिया. रास्ते में चौधरी ताराचंद मिल गए थे उन्होंने हिन्दुओं को आगे बढ़ने से रोक दिया तथा कहा ऐसी कोई बात नहीं है. जब भीड़ न मानी और कहने लगी कि हम मुसलमानों को मारेंगे. ठीक उसी समय चौधरी साहब ने अपनी रिवाल्वर में ६ गोलियां भरी थी, भीड़ की और फेंक दी और कहा उठाओ इस रिवाल्वर को और मारो मेरे को गोली. जहाँ रिवाल्वर गिरी थी सभी लोग वहां से २-२ गज दूर हो गए. लोग उनकी इस बात से सहम गए और अपने अपने घरों को वापिस लौट गए. रात के समय सारे शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया. इस प्रकार एक घटना के कारण सैंकडों मनुष्यों के खून के फव्वारे बंद हो गए तथा वातावरण में शान्ति छा गई.

स्वतंत्रता के दिनों में

भारत की स्वतंत्रता के दिनों एक दिन वे अपनी ससुराल से आ रहे थे. रास्ते में उनको एक वृद्ध औरत मिली जो लाठी के सहारे चल रही थी. उस समय चौधरी ताराचंद ने बुढ़िया से पूछा कहाँ जाओगी?

उत्तर मिला पाकिस्तान,

कहाँ है पाकिस्तान जानती हो?

जानती तो नहीं.

घर वाले कहाँ हैं?

छोड़कर चले गए हैं मेरे से चला नहीं गया मैं पीछे रह गई हूँ.

क्या ही ह्रदय विदारक दृश्य था. आज बेटे मां को भूल गए. ताराचंद बुढ़िया को गाड़ी में बैठाने लगे तो साथ वाले कहने लगे कि चौधरी साहब किस-किस का दुःख दूर करोगे. यहाँ तो सारी दुनिया ही दुखी है. लेकिन वे माने नहीं. पाँच मील जाकर काफिले को पीछे से पकड़ा व बुढ़िया के बेटे को तलाश कर उन्हें धिक्कारा तथा उनकी मां को उनके सुपुर्द किया.

भारत के बँटवारे के समय उनके साथ अनेकों घटनाएँ घटी . वे सभी मुसलमानों को बाईज्जत अपनी सुरक्षा से सीमा पार कराते थे तथा उनको पाकिस्तान भेजते थे. एक बार एक सिक्ख ने एक मुस्लमान की लड़की के साथ बलात्कार से मुक्त कराया. उसको अपने घर अपनी मां के संरक्षण में रखा तथा मां से कहा यह मुसलमान है. इसको प्यार से रखना. इसके आने से अपना घर पवित्र हुआ है. एक महीने बाद जब उसी लड़की के माता पिता मिले तो उनको उस लड़की को सौंप दिया.

उन्ही दिनों बीकानेर राजा का संदेश आया कि दो डाक्टर हिंदू औरत पाकिस्तान में फंस गई हैं. उनको भारत में लाना है. चौधरी ताराचंद छोटे से पुलिस काफिले के साथ पाकिस्तान पहुंचे तो वहां के लोग बंदूकों और गंडासों से लेस हमला करने के उद्देश्य से उनके पास आए लेकिन जब देखा कि चौधरी ताराचंद एस.पी. हैं तो वे उनके पैरों में पड़ गए और माफ़ी मांगी. चौधरी साहब और दोनों डाक्टर औरतों को २०० आदमियों का काफिला सुरक्षित सीमा तक छोड़ कर आया. यह उनकी मानवता के प्रति सच्ची वफादारी के कारण हुआ था.

डाकुओं से अन्तिम लडाई : शहीद हुए

चौधरी ताराचंद अपने पुलिस जीवन में अनेकों बार डाकुओं से भिड़े थे. अनेक डाकुओं को मारा था. वे फर्ज में मरने को बहादुरी समझते थे. जीवन के अन्तिम दिन भी उन्होंने जो बातें काफी समय पूर्व लिखी थी का शब्दशः पालन किया. १९ सितम्बर १९५३ को अपनी डायरी में लिखा था -

"मैं जानता हूँ कि मैं एक बहादुर की मौत मरूँगा".

इस बात को चरितार्थ किया उन की अन्तिम लड़ाई ने. ११-३-१९५८ को मुखबिर से सूचना मिली कि कल्याण सिंह डाकू एक राजपूत के घर ठहरा हुआ है तो पुलिस ने फ़ौरन अपनी तैयारी के साथ पार्टियाँ भेजी. एक पार्टी का नेतृत्व जोधपुर पुलिस कप्तान चौधरी ताराचंद को बनाया. साथ में थे उप पुलिस अधीक्षक दीनदयाल. ११ मार्च १९५८ की रात को उन जगहों का घेरा डाला तथा १२ मार्च १९५८ को शुबह अभियान शुरू हुआ. दोनों तरफ़ से फायरिंग होने लगी. डाकू कल्याण सिंह वहां से भाग खड़ा हुआ. पुलिस ने पीछा किया और डाकू को घेर लिया. डाकुओं की संख्या सात थी. भागते हुए डाकुओं ने जटिया की ढाणी में एक ऊँचे पक्के मकान में मोर्चा लिया. वहां से २५० गज की दूरी पर पुलिस ने भी मोर्चा लिया. डाकुओं की गोली के वार पुलिस पर सीधे आ रहे थे. पुलिस के वार उन पर सीधे नहीं जा रहे थे. यहीं पर बने एक नाले में चौधरी ताराचंद सहित तीन पुलिस अफसरों ने मोर्चा ले रखा था. डाकुओं पर कोई निशाना फिट नहीं बैठा तो ताराचंद ने लेटी पोजीसन छोड़कर आधी खड़ी पोजीसन ले ली. उन्होंने पहली ही गोली से एक डकैत को निशाना बनाया. लेकिन ठीक उसी समय एक डकैत की गोली भी उनकी छाती पर आकर लगी जो दिल व फेफडों को चीरती हुई गुर्दे के हिस्से से बाहर निकल कर दीन दयाल के हाथ में लगी. चौधरी ताराचंद वीर गति को प्राप्त हुए. इस तरह उन्होंने अपना जीवन सार्थक बनाया तथा अपनी ड्यूटी निभाते हुए भारत मां की सेवा में सदा के लिए १२ मार्च १९५८ को शहीद हो गए.


चौधरी ताराचंद के शहीद होने की ख़बर जोधपुर पहुँची तो सारे शहर व राजस्थान में मातम छा गया. हजारों लोग उनके रातानाडा रोड़ पर स्थित निवास स्थान पर पहुंचे. सड़कों पर हजारों लोग दोनों तरफ़ अपने सच्चे रक्षक के अन्तिम दर्शन में मानों गा रहे हों :

विचार लो कि मर्त्य हो, न मृत्यु से डरो कभी, मरो परन्तु यों मरो ।
कि याद जो करें सभी, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे ।।
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले ।
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा ।।

भारत के इस सच्चे सपूत को मरणोपरांत २ अक्टूबर १९५९ को नागौर में तत्कालीन प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उनकी विधवा पत्नी को राष्ट्रपति पुलिस एवं गैलंट्री पदक से सम्मानित किया.

चौधरी ताराचंद पर पुस्तक

अमर शहीद चौधरी ताराचंद, आवरण पृष्ठ
अमर शहीद चौधरी ताराचंद
लेखक - जोग राम सारण
प्रकाशक एवं वितरक - राजस्थानी ग्रंथागार , सोजती गेट जोधपुर
फोन: 0291-2657531,2623933 (O) 0291-2432567 (R)
ISBN : 81-86103-15-7
पहला संस्करण 2012

कवियों की नजर में

चौधरी ताराचंद शहीद के बारे में कवियों की कलमें उठी तथा लिखे बिना नहीं रह सकी. चुरू के कवि श्री वासुदेव कृष्ण जोशी ने लिखा:

तारों में वह चाँद समान ।
था प्रकाश का पुंज महान ।।
आत्म बल का श्रोत था वह,
था वह पुलिस की शान ।।
कितना भद्र विनयशाली था,
जनता की करता रखवाली था ।।
सत्य वाटिका का माली था,
था वीरत्व की खान ।।

प्रो. प्रेम अरोडा की लेखनी से :

सपनों में भी क्रोध जिसे था छुआ नहीं
जीवन भर जो माया के वश हुआ नहीं
कर्तव्य के रण में जो रणधीर हुआ
अर्जुन हुआ, एवं साथ ही कबीर हुआ
हुआ मरण भी जिसका ब्रह्मानंद था
तारा, वह ध्रुव तारा, ताराचंद था

दसवीं के एक छात्र चिंतामणि ने लिखा:

रहेगा जग में सुनाम ताराचंद का
शेरों में वह सवा सेर था
और देवों में महादेव था

राजस्थान के लोक कवि मोहन आलो की लेखनी से:

सत्य अहिंसा और कर्म में, था जिसका विश्वास,
पग-पग पर दोहराया जिसने गाँधी का इतिहास ।
निज समाज रक्षा में जिसने, जीवन सकल गुजारा,
अमर होगा ताराचंद ज्यों तारों में ध्रुवतारा ।

राजस्थान के लोक कवि मोहन आलो की कविता "तुमने ज्योति प्रज्वलित कर दी" के कुछ अंश:

लाज नहीं लगने दी मरू की माटी के विश्वास में,
अपना नाम जोड़कर तुमने वीरों के इतिहास में,
इससे पहले, देश भूलता मीरा के वैराग्य को,
सांगा के सौ घाव और पन्ना धाई के त्याग को ।
तुमने ज्योति प्रज्वलित करदी, महाराणा की आन को,
परम्परा जो सदा रही, गर्वीले राजस्थान की ।
कोई फर्क नहीं तुझ में और तब के दुर्गादास में
फल की इच्छा बिना, बढ़ा सदैव कर्म की राह पर,
रहा झेलता जीवन भर, संकट निर्बल की आह पर ।
नर को जहाँ झुका देती है, माया की मजबूरियां,
ठोकर से ठुकराई तुमने, धन से भरी तोजोरियाँ ।

साभार - चौधरी ताराचंद सारण के बारे में हिन्दी का यह लेख इतिहासकार भलेराम बेनीवाल जी की पुस्तक :जाट योद्धाओं का इतिहास (Jāt Yodhāon kā Itihāsa) (2008) पर आधारित है.

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  • भलेराम बेनीवाल:जाट योद्धाओं का इतिहास (Jāt Yodhāon kā Itihāsa) (2008), प्रकाशक - बेनीवाल पुब्लिकेशन , ग्राम - दुपेडी, फफडाना, जिला- करनाल , हरयाणा, p.575-593
  • Jatbandhu, Agra, 25 March 2007
  • Dr Mahendra Singh Arya, Dharmpal Singh Dudee, Kishan Singh Faujdar & Vijendra Singh Narwar: Ādhunik Jat Itihasa (The modern history of Jats), Agra 1998, p.351
  • Jat Samaj Smarika Sangaria-2006, p.13

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