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Nihal Singh Takshak

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Nihal Singh Takshak

Choudhary Nihal Singh Takshak (born:25.5.1913) (निहालसिंह तक्षक) was a great freedom fighter from village Bhagvi in district Bhiwani, Haryana. He was first Jat student who got admission in Birla College Pilani. He was a social worker and reformer who worked for extension of education in Rajasthan and Haryana as Inspector of School in Birla Education Trust. He was married to Smt Durgawati younger sister of Nanak Chand Jakhad of Alwar.[1]

Career

He was elected MLA in Jind State during the elections held in 1937. Earlier he was an Education Inspector with Birla Institute of Technology and Science/(Birla Education Trust) Pilani. He starting Basic Education schools with the help of Birla Education Trust in the villages of the then Loharu and Jind native states which now fall in district Bhiwani.

Freedom Fighter

Major portion of the Dadri Tesil formed part of the native state of Jind since long. When the flames of freedom movement started engulfing the territories of native states, Shri Takshak started Paraja Mandal Movement in Jind state.

Social service

He was Education minister in PEPSU Patiala State in Sardar Gyan Singh Radewala Ministry. He did a great job in the field of Rural Education. He also founded Birhi Kalan Teachers' Training School; and the Art and craft teacher training school in Arya Hindi Maha Vidyalaya, Charkhi Dadri.

जाट जन सेवक

ठाकुर देशराज[2] ने लिखा है ...कुंवर निहालसिंह तक्षक - [पृ.521]: [दिल्ली]] से दादरी की सड़क पर झज्जर से 12 कोस पश्चिम दादरी से 5 कोस पूर्व में भागवी एक ऐतिहासिक तक्षक (टोकस) वंशीय जाटों का प्रसिद्ध गांव है। चौधरी दोदरामजी महल (हवेली) छतरी कुआं मंदिर 19वीं शताब्दी के


[पृ.522]: बने हुए अभी तक मौजूद हैं। उस समय की कच्ची गढ़ी (गढ़) 32 बीघा का बाग व हाथी, काठ आदि इस समय के अंग्रेजी राज्य में नहीं टिक सके। नवाब झज्जर से मित्रता के संबंध थे। वह प्राय वहां आया करते थे। छतरी व कुएं पर उनके नमाज पढ़ने के लिए स्थान निश्चित किया हुआ था। सैकड़ों गांवों का कर चौधरी दोदाराम जी वसूल करके कुछ भाग नवाब झज्जर को देते थे। सन 1914 विक्रमी (1857 ई. ) के स्वतंत्रता युद्ध में आसपास सब गांवों की स्त्रियां आप के महल में रक्षा पाई। सब आभूषण आदि भोरे (तहखाने) में रख दिया गया।

जब कश्मीर महाराज की सेना उधर से निकली तो 32 मन चावलों से उन्हें भोजन कराया गया। नवाब झज्जर के पतन के पश्चात महाराजा जींद ने आपको स्वरूपगढ़, आसावरीभारीवास आदि के बीड़ देना चाहा तो आपने इनकार कर दिया और एक छोटा जमीदार रहना पसंद किया।

आप के पौत्र चौधरी घनश्यामसिंह जिला दादरी के सबसे बड़े ओजस्वी वह प्रतापी नंबरदार थे। अपने गांव के तो राजा के समान थे। एक बार एक थानेदार ने एक निर्धन को पीट दिया। जब उन्हें सूचना मिली तो वहां पहुंचे और छतरी पर चढ़ते ही ऐसे जोर से थप्पड़ लगाया कि थानेदार को चक्कर आ गया।

चौधरी घनश्यामसिंह के पौत्र सरदार अमरसिंह जी के छह पुत्रों में से कुंवर निहालसिंह तक्षक चौथे पुत्र हैं। 25 मई 1913 को आपका जन्म हुआ।

कुंवर निहालसिंह के बड़े भाई भगवानसिंह जी भागवी में अपनी जम्मीदारी का कार्य करते हैं। दूसरे भाई रामानंद जी सिनसिनी (भरतपुर राज्य) में अपने चक की देखभाल करते हैं। तीसरे भाई मास्टर गंगाराम जी अपने गांव के हिंदी मिडिल


[पृ.523]: स्कूल में अध्यापक हैं। 5 वें भाई कुंवर दलीपसिंह ने जाट कॉलेज लखावटी से एफ़एसएजी तक शिक्षा प्राप्त करके धनबाद, चकलाला व खिड़की में इंजीनियरिंग की शिक्षा ली और आजकल आगरा में सर्विस में है। छटे व सबसे छोटे भाई की मई 1940 में 18 वर्ष की आयु में ही मोती ज्वर से अकाल मृत्यु हो गई।

आपके मकान के पास ही मंदिर में एक पंडित पढ़ाते थे। आप 3 वर्ष की आयु में ही पहाड़े कहलवाने के समय वहां चले जाया करते थे। आपकी बुद्धि इतनी तीव्र थी कि 3 वर्ष की आयु में ही 100 तक गिनती सीख गए थे। एक साल के बाद डेढ वर्ष प्राइवेट पढने पर बामला (जिला हिसार) तीसरी कक्षा में भर्ती हुए। चौथी कक्षा की छात्रवृत्ति परीक्षा में आप तहसील भिवाणी में सर्वप्रथम रहे। पर जींद राज्य निवासी होने के कारण आपको छात्रवृत्ति नहीं दी गई। आयु 14 वर्ष भी नहीं हो पाई थी कि मिडिल परीक्षा में 600 में से 437 अंक प्राप्त करके जिला हिसार में द्वितीय स्थान पर रहकर छात्रवृत्ति प्राप्त की। अध्यापकों के सुझाव पर आप गवर्नमेंट हाई स्कूल हिसार में भर्ती हो गए।

सन 1927 में अखिल भारतीय जाट विद्यार्थी कांफ्रेंस रोहतक में सम्मिलित हुए।

1928 में हिसार जाट विद्यार्थी कॉन्फ्रेंस में सेवा की।

1929 खेड़ागढ़ी में वाद विवाद प्रतियोगिता में जजै स्कूल हिसार के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया।

1930 में जाट हाई स्कूल से मैट्रिक पास करके बिरला कॉलेज पिलानी में पहले जाट विद्यार्थी कॉलेज में भर्ती हुए। राजपूताना में आकर जाटों की स्थिति में परिवर्तन देखा। दूसरे विद्यार्थी भी एक जाट विद्यार्थी को कॉलेज में देख


[पृ.524]: कर आश्चर्य करते थे। आप पढ़ाई व खेलों में अच्छे होने के कारण अपने सहपाठियों से आदर पाते थे। कुछ महीने बाद घरड़ाना के मोहरसिंह राव दूसरे जाट विद्यार्थी कॉलेज में भर्ती हुए। कुंवर निहालसिंह तक्षक ने पिलानी के 2 वर्ष के जीवन में बहुत शारीरिक उन्नति की। फुटबॉल के कप्तान थे, सभी दौड़ो व कुदाई और अन्य स्पोर्ट्स में सर्वप्रथम रहते थे। लगातार दो वर्ष तक चैंपियन रहे। छात्रावास व कॉलेज की अन्य प्रगतियों में भी बड़ा भाग लेते थे। कालेज परिषद तथा हॉस्टल परिषद में मंत्री थे।

सन 1932 में जाट महासभा के झुंझुनू में होने वाले वार्षिक उत्सव में आपके नेतृत्व में 40 स्वयंसेवकों का एक दल गया और प्रबंध में बड़ी सहायता दी। पिलानी आते ही कुंवर पन्नेसिंह देवरोड़ से आपकी मित्रता हो गई थी और चौधरी रतनसिंह के साथ मिलकर शेखावाटी के जाटों में जनजागृति के लिए कुछ न कुछ करते रहते थे। 1932 ई में पिलानी कॉलेज के विद्यार्थियों की एक टीम लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी सम्मेलन में रोहतक गए और आपने ही अन्य जातियों की समिति ना होते हुए भी अपनी जिम्मेदारी पर 1933 के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी सम्मेलन को निमंत्रण दिया। उसकी सफलता किसी जानने वाले से छिपी नहीं है। जाट महायज्ञ सीकर के समय भी आपके नेतृत्व में सेवादल गया और श्री देवासिंह बोचल्या के साथ आपने सहायक सेनापति का कार्य किया। हाथी चुराने के षड्यंत्र का भेद आप ने लगाया और वहां आप की ही ड्यूटी लगाई थी।

1934 ई. में आप रामजस कॉलेज दिल्ली में भर्ती हुए। 3 महीने की छुट्टियों में गोरीर (जयपुर राज्य) स्कूल की


[पृ.525]: स्थापना की और सैकड़ों छात्र कर दिए। सैकड़ों जाटों का यज्ञोपवित संस्कार कराया। कुंवर नेतराम सिंह के साथ किसान आंदोलन का नेतृत्व किया। जाट बोर्डिंग हाउस झुंझुनू का चंदा करवाया।

1934 को अखिल भारतीय जाट विद्यार्थी कॉन्फ्रेंस सोनीपत में वाद विवाद प्रतियोगिता में आप का भाषण सबसे अच्छा रहा।

जुलाई से अक्टूबर 1935 ई में चौधरी टीकाराम, चौधरी शादीराम के आग्रह पर कंपिटीशन परीक्षा की तैयारी छोड़ कर 3 महीने तक जाट हाई स्कूल सोनीपत की सेवा की और नवमी और दशमी को अंग्रेजी, गणित, नागरिक शिक्षा विषय पढ़ाये।

दिसंबर 1935 में अखिल भारतीय विद्यार्थी सम्मेलन को रामजस कॉलेज में करवाया। प्रबंध की सारी जिम्मेदारी आप पर थी क्योंकि जाट विद्यार्थियों के दोनों दलों ने आप पर भरोसा डाल दिया था। बीए परीक्षा में आप अपनी कक्षा के 90 छात्रों में सर्वप्रथम और दिल्ली विश्वविद्यालय में द्वीतीय स्थान पर रहकर शानदार सफलता प्राप्त की।

बीए परीक्षा पास करने के बाद 28 जून 1936 को आपका विवाह चौधरी नानकचंद जी ठेकेदार म्यूनिसिपल कमिश्नर अलवर की छोटी बहन श्रीमती दुर्गावती के साथ हुआ।

बिरला एजुकेशन ट्रस्ट की ओर से इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल के पद पर नियुक्ति का बुलावा प्रस्ताव आने पर आपने राजपूताना को अपने कार्य का क्षेत्र बनाया और नवंबर 1936 से शेखावाटी में शिक्षा प्रचार का कार्य आरंभ कर दिया।


[पृ.526]: आप ने कार्य संभाला। उस समय ट्रस्ट की ओर से केवल 21 पाठशालाएं पिलानी के आसपास चल रही थी। ऐसी धारणा बनी हुई थी कि ग्रामों में पाठशालाएं उन्हीं ग्रामों में चल सकती हैं जहां ब्राह्मणों, राजपूतों व महाजनों की जनसंख्या पर्याप्त हो। आप ने कार्यभार संभालते ही दिनरात का ध्यान न करके तूफानी दौरे आरंभ किए और एक महीने भीतर ही पाठशालाओं की संख्या 50 से ऊपर होगई। 3 महीने में 75 और जून 1937 तक स्कूलों की संख्या 100 से ऊपर होगई। नई पाठशालाये जाटों के गांवों में खोली गई थी और उनमें छात्र संख्या खूब बढी। उससे पूर्व रूढ़िवादी ब्राह्मण, राजपूत व महाजन जाट अध्यापकों से अपने छात्र नहीं पढ़ाना चाहते थे। वे जन्म से जाट को गुरु की पदवी नहीं देना चाहते थे। पर जब जाट अध्यापकों द्वारा बड़ा अच्छा काम जाटों के गांव में होते देखा तो सभी लोग जाट अध्यापक की मांग करने लग गए। ट्रस्ट के मंत्रीजी ने भी जब कुछ स्कूलों को देखा तो अपनी रिपोर्ट में लिखा कि जाटों के गांवों में बड़ा अच्छा शिक्षा प्रेम है और राजपूतों के गांव में कम उत्साह है। जब कुंवर निहालसिंह ने निरीक्षण के समय देखा कि जाट विद्यार्थियों के नाम अधूरे व अशुद्ध हैं और नाम के साथ सिंह का प्रयोग नहीं किया जा रहा है तो सभी स्कूलों में पूरे नाम लिखे गए। ट्रस्ट के 400 स्कूलों में से 350 से अधिक ऐसे गांव हैं जिनमें जाटों की जनसंख्या अधिक है। लगभग 17000 छात्रों में से 13000 विद्यार्थी गांव के स्कूलों में शिक्षा पा रहे हैं। संवत 1995-1996 के दुर्भिक्ष के समय 100 से ऊपर जाट अध्यापकों को काम देकर सहायता की गई। इन स्कूलों द्वारा जींद राज्य के जिला दादरी में जन जागृति का बड़ा भारी


[पृ.527]: काम हुआ है। सैकड़ों छात्र मिडिल पास करके हाई स्कूल व कॉलेज में शिक्षा पा रहे हैं और कितने ही मैट्रिक व मिडिल परीक्षा पास करने के पश्चात 100 रुपये मासिक वेतन पा रहे हैं।

सन 1935 ई. अक्टूबर में में आप बहुत भारी बहुमत से (66%) जींद राज्य प्रतिनिधि समिति व लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य चुने गए। पहले अधिवेशन में ही आपने स्पष्टवादिता निर्भीकता का परिचय देकर तथा जनहित संबंधी बिल पर प्रभावशाली भाषण देकर अपनी छाप लगा दी। 60 में से 42 किसान सदस्यों ने तो उसी समय अपना नेता मान लिया। जींद राज्य की सरकार पूंजीपतियों के हाथ में होने के कारण प्रजाहित व किसानहित की मांगों का सरकार की ओर से विरोध होता था और आपको विरोधी दल का नेतृत्व करना पड़ता था।

फरवरी 1944 के चुनाव में आप जिला दादरी से जिंद राज्य धारासभा लेजिस्लेटिव असेंबली के सदस्य चुने गए।

मई 1945 में होने वाले राज्य व्यवस्थापक सभा के अधिवेशन में भूमि कर पर एक पैसा प्रति रुपया बढ़ाने के सरकारी बिल का आपने बड़ा विरोध किया जो उस समय में पास नहीं हो सका। प्राथमिक शिक्षा व प्राइवेट स्कूलों को सहायता संबंधी बजट की शिक्षामद पर आप का बड़ा प्रभावशाली भाषण रहा।

जनवरी 1946 ई के होने वाले अधिवेशन में तो आपके नेतृत्व में सभी सदस्यों ने नागरिक अधिकारों को कुचलने वाले बिल को सर्वसम्मति से ठुकरा दिया और सभी सरकारी दांव-पेच विफल हुए।

अप्रैल 1939 में जींद राज्य प्रजामंडल की स्थापना हुई। प्रारंभ से ही आप प्रजामंडल में सहयोग देते रहे। आप


[पृ.528]: के राष्ट्रीय विचारों को जानते हुए तथा प्रोत्साहन मिलने पर सभी अध्यापकों तथा छात्रों ने पूरा पूरा सहयोग दिया और प्रजामंडल को सफल बनाया। जींद राज्य की सरकार किसान विरोधी थी।

श्री ठाकुर देशराज जी के चुनाव संबंध में आप जघीना पोलिंग पर भी गए पर ठाकुर देशराज की सेवाओं का ध्यान करके ग्राम पंचायतों ने उन्हें सर्वसम्मति से चुन लिया। दशहरा 1943 के श्री ब्रिज जया प्रतिनिधि समिति के उद्घाटन के समय आप भरतपुर में थे जब श्री ठाकुर देशराज जी वाइस प्रेसिडेंट चुने गए थे।

जींद राज्य के नए विधान द्वारा जब किसानों के उचित अधिकारों को चीना गया तब 20 अगस्त से अब तक आप प्रजामंडल के द्वारा किसानों का संगठन करने में लगे हुए थे। पत्रों व पेंप्लेटो द्वारा किसानों की आवाज को ऊंचा उठाने में आपने पूरा प्रयत्न किया। 24 सितंबर 1945 से 6 अक्टूबर तक पैदल दौरा करके और ग्रामों की पंचायतें करके इसके विरोध में प्रस्ताव भिजवाए। जन जागृति व व्यवस्थापक सभा के लिए मतदाताओं के नाम लिखवाने के लिए आपने विशेष परिश्रम किया। अगस्त से अब तक आप इसी कार्य में अधिक व्यस्त रहे हैं। बीच के दौरान में आप जींद की लोकप्रिय सरकार में मंत्री चुने गए और अब पंजाब रियासती संघ में शिक्षा मंत्री हैं।

खंडेलावाटी में स्कूल प्रारम्भ

ठाकुर देशराज[3] ने लिखा है ....मोहनसिंह वर्मा फोगावट का दिल व दिमाग हमेशा अपने प्रांत की अशिक्षा को दूर करने में ही लगा रहता था। सब ओर निराश हो ये बिरला एजुकेशन ट्रस्ट के जनरल इंस्पेक्टर श्री निहाल सिंह जी तक्षक ने इन्हें आश्वासन दिया और हमारे यहां 5 स्कूल चालू करने का वायदा किया। इन्हें इससे बड़ा भरी संतोष हुआ। चटपट इन्होंने आकर ठिकाने वालों के विरोध करने पर भी अपनी ढाणी फोगावट की में इन्होंने स्कूल चालू कर दिया। एक साल के अंदर ही उन्होंने गढ़वालों की ढाणी, जयरामपुरा, सुजाना, चला आदि आदि में स्कूल चालू करवाने की व्यवस्था कर दी।

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References


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