Surajmal, Marathas and Third Battle of Panipat

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Surajmal, Marathas and Third Battle of Panipat

(This article by Nihalsingh Arya was published long ago – reproduced for the benefit of all)

सूरजमल, मराठा और पानीपत का तीसरा युद्ध

सूरजमल बाल्यकाल से ही उत्साही वीर थे । उन्हें ये संस्कार अपने पूर्वजों से विरासत में मिले थे । उन्होंने अपने वीर पिता बदन सिंह के सामने ही सन् 1755 ईस्वी तक कई युद्धों में शत्रुओं को पराजित कर विजयश्री का सुन्दर कीर्तिमान स्थापित किया था । इनके पूर्वज गोकुलदेव, राजाराम और चूड़ामन भी क्रान्तिकारी, वीर्यवान, स्वाधीनता-प्रिय सेनानी थे जिन्होंने मुगलों के छठे बादशाह औरंगजेब के शासन के प्रजापीड़न, शोषण एवं दमनचक्र के विरुद्ध निरन्तर बीसों वर्ष तक सफल संघर्ष करके अन्याय का निवारण किया था । यहां पर व्रजराज वीर गोकुलदेव के अमर बलिदान की अमर गाथा का कीर्तन करना प्रासंगिक ही है जो प्राचीन विशाल हरयाणा की सर्वखाप पंचायत के इतिहास में इस प्रकार है ।

औरंगजेब की धर्मान्धता

मुगल खानदान के छठे बादशाह औरंगजेब ने धर्मान्ध होकर जब सारे भारत में हिंसा, अन्याय और धर्म के दमन का चक्र चलाया तो सारी जनता त्राहि-त्राहि कर उठी । तब शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास ने सारे भारत में विद्रोह का प्रबल प्रचार किया । बुन्देले राजा छत्रसाल के गुरु स्वामी प्राणनाथ और गुरु गोविन्दसिंह भी उनके सहयोगी प्रचारक थे । गुरु समर्थराम ने दिल्ली के चारों ओर तथा गंगा-जमना के तीर्थ मेलों और सारे विशाल हरयाणा में भी वि. सं. 1723 से 1725 तक सर्वत्र प्रचार किया और गढ़मुक्तेश्वर गंगा के मेले में1725 वि. में एक तलवार और पान का बीड़ा धारण किया । कार्तिक की पूर्णमासी को तिलपत ग्राम के 54 धड़ी भार के मल्ल योद्धा गोकुलदेव ने वह पान का बीड़ा चबा लिया और हरयाणा के पांच हजार मल्लों सहित गंगाजल में खड़े होकर देश और धर्म रक्षा की प्रतिज्ञा की । मथुरा के शासकों द्वारा कुछ हिन्दू लड़कियों का अपमान करने पर बीस हजार मल्लों सहित गोकुलदेव ने आक्रमण करके मई 1669 ईस्वी को मथुरा के हाकिम अब्दुल नबी खां को मार दिया और लगातार पांच मोर्चों पर लड़ाई जीत ली । अत्याचारों के विरुद्ध यह योद्धा सारे भारत का सर्वप्रथम विद्रोही नेता था जो देशद्रोही विश्वासघातियों के षड्यंत्र से पकड़ा गया । आगरा लाल किले के दक्षिणी पक्ष में एक कुऐं के पास ऊंचे टीले पर उसके अंग-अंग काटने पर भी भारत मां का वीर सपूत देश-धर्म की जय के उदघोष के साथ हंसता ही रहा और गीता के उपदेश "हतो वा प्राप्यसि स्वर्गं" के अनुसार स्वर्गारोहण के अमर पद को प्राप्त हुआ । श्रद्धालु जनता के सहस्रों देशभक्त रोते रह गए परन्तु उस नेता का बलिदान अपने पीछे विद्रोही संघर्ष की सतत श्रंखला का संकलन कर गया जिसे आगे चलकर राजाराम और चूड़ामन ने निरन्तर चालू रखा । सन् 1683 ईस्वी के पश्चात् मराठों ने भी लड़ाई छेड़ दी । मराठी सेना को झपट्टा मार युद्ध का प्रशिक्षण हरयाणा के मल्लों ने ही दिया था जिन्हें कुरड़ी नांगल (छपरौली) के टीले के मल्ल सेना प्रदर्शन में से गुरु समर्थराम दास ही अपने साथ ले गए थे । उनमें तीन मुख्य मल्ल मोहनचन्द्र जाट, हरिराम राजपूत और कलीराम अहीर थे । तब से ही वीर शिवाजी ने मराठा मण्डल का वीर संगठन खड़ा किया था ।

महाराजा सूरजमल की धमनियों में पैतृक देन से क्रमशः गोकुलदेव से बदनसिंह तक का अदम्य स्वाभिमानी विशुद्ध रक्त संचार कर रहा था । जनक और जन्य समान संस्कारी होते हैं और उत्तम दादा पिता के संतान भी उत्तम होते हैं । अतः सूरजमल को आत्मविश्वास, स्वाधीनता, धर्मध्रुवता, उदारता, प्रजावात्सल्य, सौहार्द और सजगता आदि गुण इन्हीं पूर्वजों से मिले थे ।

एक विख्यात दुर्दान्त योद्धा, सफल राजनीतिज्ञ. सहिष्णु तथा धर्मवीर राजा होने के कारण सूरजमल भारत के इतिहास में उन्नत प्रतिष्ठा सहित उच्चासन रखते हैं , अतः इतिहासकारों की लेखनी के प्रशंसा पात्र बने हैं । यहां पाठकों के लिए सर्वखाप पंचायत के अभिलेखागार में से सन् 1761 ईस्वी के पानीपत के युद्ध में मराठे, राजा सूरजमल और पंचायती मल्लों का अछूता प्रसंग संक्षेप से प्रस्तुत किया जाता है जिसे ध्यानपूर्वक पढ़कर इतिहास लेखक अपनी भ्रान्तियां दूर करके तथ्यों का उचित मूल्यांकन कर अपनी मान्यता, स्मृति और लेखों को स्थायी अंग बनायेंगे ।

महाराजा सूरजमल के समय भारत की निर्बलता

उस समय मुगल शासन के पैर लड़खड़ा रहे थे । बादशाह इतने चरित्रहीन हो गए थे कि खौफजदा होकर कभी किसी का सहारा पकड़ते कभी किसी का । इसी दौड़ में मुगल दरबार में कत्ले-आम मच रहा था । आज किसी पर शक हुआ तो कल उसे किसी बहाने से मरवा डाला या जहर तक देने की नौबत आ जाती । इस रस्साकशी में मुगल बादशाही के घर की यह हालत थी तो उनका खयाल मुल्क की बिगड़ी हुई हालत को सुधारने में कैसे जाता ? मुगल खानदान का हर बच्चा और बूढ़ा या तो बादशाह या वजीर बनना चाहता था । ये सब इसी गुटबाजी में फंसे थे । मुगल राज्य की हड्डियों का ढ़ांचा जरूर खड़ा था मगर उसमें खून, मांस और चमड़ा सब गल चुका था । अब उस मसनुयी ढ़ांचे को एक धक्का मारकर गिराने से हड्डी अलग-अलग होकर बिखर सकती थी ।

उस वक्त भारत पर नादिरशाह और अब्दाली के दो हमले हुए थे । इन दोनों हमलावरों को मुगल दरबार के सरदारों और दरबारियों ने ही न्यौता देकर बुलवाया था । अहमदशाह अब्दाली को सन् 1760 ईस्वी में नजीब खां ने बुलवाया । पानीपत के मैदान में अब्दाली ढ़ाई लाख सेना सहित आ डटा । वह भारत की बिखरी हुई हालत को जानकर पहले भी कई आक्रमण कर चुका था । पानीपत के मैदान में उसके मुकाबले के लिए प्रमुख मराठा सेना थी जिसे पेशवा का भाई सदाशिवराव भाऊ लेकर आया था । आगरा, मथुरा और दिल्ली में सूरजमल और भाऊ की भेंट हुई थी । भाऊ अपनी सेना के साथ हजारों स्त्रियों को श्रंगार कर लाया था और आक्रमण से बहुत दिन पहले ही उसकी सेना आ चुकी थी । महीनों तक शत्रु की तथा भाऊ की सेना आमने-सामने मैदान में डंटी रही । भाऊ की मराठा सेना आस-पास के ग्रामों की जनता को भी पीटा करती और लूट लेती थी ।

सेनापति भाऊ को राजा सूरजमल के उत्तम सुझाव

सूरजमल राजनीति में बहुत प्रवीण थे । उन्होंने देश की सारी परिस्थितियों को देखकर सदाशिवराव भाऊ को बहुत अनुभवपूर्ण विजयकारी सुझाव दिए थे ।

1. अब्दाली की सेना पर अभी आक्रमण मत करो । अभी सर्दी है । गर्मी को ये लोग सहन नहीं कर सकते, अतः हम गर्मी में ही हमला करेंगे ।

2. कई हजार स्त्रियों और बच्चों को युद्ध में साथ लिए-लिए मत फिरो क्योंकि हमारा ध्यान इनकी सुरक्षा में बंट जाएगा । अतः इन्हें हमारे डीग के किले में सुरक्षित रखो ताकि हम निश्चिन्त होकर लड़ सकें ।

3. शत्रु की सेना पर सीधा आक्रमण नहीं करना चाहिए, क्योंकि इनकी सेना बहुत अधिक है और भारत के बहुत मुस्लिम भी इनके पक्ष में हैं । अतः इनसे झपट्टा मार लड़ाई करके छापे मारो । (यह गुरिल्ला युद्ध ही था जो प्राचीन काल से ही हरयाणा के यौधेयगण और पंचायती मल्ल करते आ रहे थे और सारे भारत को सिखाया था । मनुस्मृति में भी इसका विधान है ।)

4. लालकिले की सम्पत्ति मत लूटो नहीं तो मुस्लिम शासक सरदार रुष्ट होकर अब्दाली के पक्ष में हमारा विरोध करेंगे । हम भरतपुर कोष से मराठा सेनाओं का वेतन भी दे देंगे ।

5. किसी मुगल सरदार की अध्यक्षता में एक दरबार लगाकर स्वदेश रक्षा और युद्ध योजना निश्चित करो ताकि भारत के मुसलमान भी सन्तुष्ट होकर हमारे सहयोगी बने रहें ।

6. जनता को मत लूटो और खड़ी फसलों को मत जलाओ । हम सारे भोजन पदार्थों का प्रबन्ध कर देंगे ।

7. शत्रु की खाद्य टुकड़ी को काटने की योजना बनाओ ।

8. गर्मी आते ही मिलकर शत्रु सेना पर हमला कर देंगे । अब्दाली को भारत के बाहर ही रोकना चाहिए था ।

भाऊ तगड़ा जवान और घमंडी था । उसने महाराजा के इन उत्तम सुझावों को भी उपेक्षा सहित ठुकरा दिया । वह अल्पायु और अनुभवहीन था । उसने महाराजा का अपमान भी किया । इस पर सूरजमल और इन्दौर के राजा ने भाऊ का साथ छोड़ दिया परन्तु सूरजमल ने फिर भी मराठों की सहायतार्थ अपनी आठ हजार सेना लड़ाई में भेजी थी और मराठों को भोजन, चारे और वस्त्रों की भी सहायता दी थी क्योंकि बहुत पहले से आई हुई सेना भूखी मरने लगी थी । भाऊ ने इन सुझावों के विपरीत बड़ी भारी भूल की । उसने लाल किले की दीवाने-खास की चांदी की छत को तोड़ कर 36 लाख रुपये के सिक्के ढ़लवा लिए और अपने भतीजे विश्वासराय की अध्यक्षता में एक सभा की जिससे भारत के अधिकांश मुसलमान नाराज होकर अहमदशाह अब्दाली के साथ हो लिए । भाऊ ने किसानों की खड़ी खेती को भी जला दिया, अपनी स्त्री-बच्चों को भी युद्धस्थल में साथ रखा और शरद् ऋतु जनवरी 1761 में गर्मी से पहले ही अफगान सेना पर सीधा आक्रमण कर दिया ।

पानीपत युद्ध में भाऊ और सर्वखाप पंचायत के मल्ल

सदाशिवराव भाऊ ने अब्दाली के युद्ध में सहायतार्थ हरयाणा की सर्वखाप पंचायत शौरम को चैत शुदी तीज संवत् 1816 विक्रमी (1759 ई०) को एक पत्र भेजा था जिस पर विचारार्थ शिशौली ग्राम में चौ. दानतराय की अध्यक्षता में एक सभा ज्येष्ष्ट शुदी नवमी को हुई और पांच प्रस्ताव पारित करके भाऊ की सहायता के लिए बीस हजार पैदल मल्ल सेना और दो हजार घुड़सवार भेजने का निश्चय किया । इनके सेनापति सौरम के चौ. श्योलाल और उपसेनापति रामकला तथा पं० कान्हाराय बनाये गए । सौरम के पं० कान्हाराय का महाराजा सूरजमल से घनिष्ठ सम्बन्ध बताना भी आवश्यक है ।

पं० कान्हाराय सर्वखाप पंचायत के सहयोगी प्रचारक प्रशिक्षक मल्ल योद्धा थे । राजस्थान के राजाओं, महाराष्ट्र के सरदारों तथा सूरजमल के दरबार में इनका पर्याप्त सम्मान था । ये आठ भाषाओं के विद्वान थे । पंचायत इन्हें सारा खर्चा देती थी । ये पंचायत के युद्ध, तोड़-फोड़ के पटु नेता थे और 24 धड़ी की जोड़ी मोगरी को फिराते थे । पंचायती पाठशालाओं और मल्ल अखाड़ों के निरीक्षक थे । इन्होंने पंचायती संगठन को सुदृढ़ बनाकर उन्नत किया था । ये सम्मानपूर्वक मुगल दरबार में भी जाते थे । राजा सूरजमल भी इनको हर वर्ष अपने हाथी पर बिठाकर बुलाते थे और दरबार में बहुत सम्मान करते थे । इनको 101 रुपये तथा सब ऋतुओं के गरम, सरद वस्त्र और पगड़ी देते थे और पांच-छः दिन तक इनको स्वादिष्ट, रुचिकर भोजन खिलाते थे ।

मराठा सेना की हार के कारण

पंचायती उपसेनापति पं० कान्हाराय ने जमना नदी के ऊंचे इस्सोपुर टीले पर अपनी सेना चौकी स्थापित की थी, जहां से पानीपत का सारा युद्धक्षेत्र स्पष्ट दिखाई देता था । बीस हजार पंचायती पैदल मल्ल तथा दो हजार घुड़सवार मराठा सेना के साथ पानीपत के पास कुंजपुरा के मैदान में लड़े थे । एक हजार मल्ल अपनी तथा मराठा सेना को इसी टीले से तीन मार्गों से भोजन सामग्री पहुंचाते थे । यह टीला संस्कृत भाषा, देश-प्रेम, सैनिक शिक्षा का प्राचीन स्थान है । भाऊ ने पंचायत के तीनों सेनापतियों तथा सैनिकों का बहुत आदर किया और जमना के जल में प्रवेश कर स्वदेश रक्षा की प्रतिज्ञा की और कुंजपुरे के मैदान में शत्रु की सेना पर जनवरी 1761 मास में धावा बोल दिया । बहुत घमासान युद्ध हुआ । दोपहर तक अफगानों के 50 सरदार और 50 हजार सैनिक मार गिराये । दोपहर के पश्चात् भाऊ के तोपखानों और घुड़सवारों की मार से इब्राहीम गार्दी घायल होकर पकड़ा गया । फिर भाऊ के भतीजे विश्वासराय के हाथी के हौदे में तोप का गोला गिरा । यह सुनकर भाऊ वहां पहुंचा । इतने में अफगानों ने भाऊ के मरने की झूठी खबर फैला दी जिसे सुनकर मराठों का साहस टूट गया । इस युद्ध में चार हजार पंचायती मल्ल भी बलिदान हुए । मराठों की बहुत सी स्त्रियां मारी गईं । कुछ पकड़ी गईं, कुछ यहीं रह गईं । बहुत स्त्री-बच्चे और सैनिक भरतपुर के डीग दुर्ग में पहुंचाये जहां महाराजा सूरजमल मे उनका भरपूर स्वागत सम्मान और भोजन वस्त्र का प्रबंध किया । सैंकड़ों स्त्रियों सहित भाऊ की धर्मपत्नी पार्वती को जमना के पूर्व में एलम ग्राम में एक मास तक सम्मानपूर्वक रखकर डीग किले में भेज दिया और वहां से पूना भेज दिया । वहां जाकर पार्वती देवी ने हरयाणा के आतिथ्य, सम्मान और शिष्टाचार की बहुत प्रशंसा की थी । भाऊ की सेनाओं के साथ उसके बहुत घोड़े और खच्चर अशर्फियों और अथाह धन से लदे हुए थे । वे युद्ध के उपरान्त सारे इधर-उधर भाग गए थे जो जनता ने लूट लिए । यह घटना भाऊ की लूट के नाम से प्रसिद्ध है ।

पंचायती उपसेनापति पं० कान्हाराय ने इस युद्ध का वास्तविक वर्णन तथा हार के कारणों पर बहुत सुन्दर प्रकाश डाला है जो ध्यानपूर्वक पढ़ना और समझना आवश्यक है ।

1. महाराष्ट्र मंडल के सरदारों में असन्तोष और परस्पर द्वेष था ।

2. सदाशिवराव भाऊ बड़ा वीर होते हुए भी अल्पायु, नीतिहीन तथा घमण्डी था ।

3. भाऊ ने जवानी के जोश में भरतपुर के महाराज सूरजमल की नीति योजना को टाल दिया जो हानिकारक सिद्ध हुई क्योंकि उससे महाराज सूरजमल सर्व शिरोमणि नीति निपुण नेता, शूरवीर सेनापति थे । राजस्थान के सारे सेनापति उनको गुरु मानते थे । अतः सूरजमल को भाऊ से अलग होना पड़ा ।

4. राजस्थान के राजाओं ने महाराणा प्रताप का आदर्श छोड़ दिया और मुगलों की पराधीनता का विष पीकर भाऊ का साथ नहीं दिया ।

5. 14 जनवरी 1761 को दोपहर पश्चात भाऊ के मरने की झूठी सूचना से ही मराठों का साहस टूटा था ।

6. मुगल शासकों, हैदराबाद और लखनऊ के नवाबों ने अब्दाली से मिल कर मराठों का भोजन मार्ग रोक लिया तो पंचायती सेना ने ही रातों-रात मराठा सेना को तीन मार्गों से रसद पहुंचाई थी । एक रात को जब अब्दाली ने मराठों पर आक्रमण किया तो आठ हजार पंचायती वीरों ने, बीस हजार मराठे और ग्यारह हजार भरतपुर के सैनिकों ने बीच में पहुंचकर उन्हें रोक कर बलपूर्वक आक्रमण विफल कर दिया । इस हमले में 8000 सैनिक और सरदार मारे गये ।

7. भाऊ की जो 4000 मुस्लिम सेना अब्दाली सेना से रूठ रही थी, वह इब्राहीम गार्दी के पकड़े जाने पर इस्लाम के नाम पर धोखा देकर अब्दाली से मिल गई । फिर भाऊ भी मैदान से हट गया और मराठों की हार हो गई ।

एक स्थान पर लिखा है - जब मराठा सेना ने पानीपत जाते समय एक दिन छपरौली के पास पड़ाव डाला तो उनके साथ राजा सूरजमल के भी सैनिक थे । इस बात का पता लगने पर छपरौली खाप के लोगों ने इन सबका बहुत आदर स्वागत किया और अपने भी 500 जवान इनके साथ युद्ध में भेजे । एक स्थान पर ऐसा लेख है कि अब्दाली के इस पानीपत युद्ध के पूर्व ही भारत आगमन से पहले ही राजा सूरजमल ने कहा था कि हमें अब्दाली को सिन्ध में ही रोक देना चाहिए ।

युद्ध के पश्चात् सदाशिवराव भाऊ और पं० कान्हाराय

इस युद्ध में हार कर भाऊ ने साधु बनकर भवानीराम नाम रखा और पहले 11 वर्ष तक तो रोहतक के पास सांघी ग्राम में चौ० सभाचन्द के पास रहे । फिर हरद्वार में अपनी हवेली बनाई जो अब भी है और उनके दो और नाम श्रवणनाथ तथा भवानन्द पुकारे गए थे । वे तीर्थस्थानों तथा मेले उत्सवों में प्रसिद्ध क्षत्रिय कुलों, वीर पुरुषों तथा नेताओं से मिलते रहे । इस्सोपुर के टीले पर आकर सन्त देवानन्द (पं० कान्हाराय का सन्यस्त नाम) से भी मिलते रहते थे । हरयाणा के कई वृद्ध पुरुषों ने उन्हें देखा था । भाऊ ने 32 वर्ष तक शेष सारा जीवन हरयाणा में ही साधु-सन्तों में व्यतीत किया था । पं० कान्हाराय ने संन्यासी बनकर देवानन्द नाम धारण किया और शेष सारा जीवन इस्सोपुर के टीले पर ईश्वर भक्ति उपदेश तथा यज्ञ में ही लगाया । इन्होंने 119 वर्ष की आयु में शरीर छोड़ा था । दाह संस्कार में चार हजार पाँच सौ पुरुष-स्त्रियों ने शामिल होकर कई मन घी सामग्री लगाई थी ।

भाऊ की विचारहीनता एवं अहंकार के कारण ही सूरजमल को इस युद्ध में तटस्थ रहना पड़ा । यदि ऐसे अप्रतिम योद्धा की नीति मान कर इनके नेतृत्व में संगठित होकर देश के सारे राजा सरदार लड़ते तो अब्दाली बच कर नहीं जा सकता था और भारत माता को ये दुर्दिन नहीं देखने पड़ते ।

1761 की गर्मी में सूरजमल ने आगरा भी जीत लिया । इनका सुपुत्र वीर जवाहरसिंह भी इनके अनुरूप ही था । दिल्ली की ओर किसी ने मुख नहीं किया था जिसे सूरजमल और जवाहरसिंह ने ही जीता था । सन् 1763 की सर्दी में सूरजमल ने शाहदरे में मोर्चा लगा कर तीन-चार दिन के युद्ध में देशद्रोही नजीब खां की सेना को लालकिले में छुपने के लिए बाध्य कर दिया । परन्तु 25 दिसम्बर को भ्रमण करते समय एक देशद्रोही पूर्वी ब्राह्मण की जासूसी सूचना से घेर लिए गए और लड़ कर बलिदान हो गए जहां आजकल उनकी समाधि बनी हुई हुई है ।

वृन्दावन की पंचायत के सभापति राजा सूरजमल

सन् 1754 ईस्वी में भादों बदि अष्टमी अर्थात् श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर एक बड़ी पंचायत वृन्दावन के तीर्थ पर 205 खापों, पालों के पंचों की पंचायत हुई थी । महाराजा सूरज सुजान अर्थात् भरतपुर नरेश महाराजा सूरजमल इसके सभापति बनाए गए थे । कारण यह था कि कुछ लोगों ने शादी विवाहों में झगड़े करने आरम्भ कर दिए थे । इस पंचायत में सारे विशाल हरयाणा प्रदेश में खापवार पंचों के विचारों की बात सर्वसम्मति से मानी गई थी और ये तीन प्रस्ताव माने गए थे ।

1. कोई लड़के वाला लड़की वाले से दहेज न मांगे । पुत्र बेचना महापाप है और लड़की वाला भी लड़की पर किसी से रुपए न मांगे क्योंकि बेचना हजार पापों का पाप है । लड़की का बाप गरीब हो तो शादी में लड़के वाला सादा भोजन खाकर या पानी पीकर लड़की ब्याह ले जाए । उसकी इज्जत करो । किसी का गोत्र जबरदस्ती न बदलवाओ ।

2. यदि किसी खाप या गोत्र का आदमी दूसरी खाप में जाकर बसे तो उसे अपने गोत्र के साथ उस खाप या गांव का गोत्र भी बराबर मानना पड़ेगा ।

3. किसी की बहू बेटी को भगा लेना या छीनाझपटी करना सबसे बड़ा दोष है तथा बहू-बेटी को कष्ट देना बड़ा जुर्म है । इससे अच्छा तो उसको उसके बाप के घर छोड़ दो और उसका खर्चा भी दो वर्ना उसको इज्जत से अपने घर ले आओ । किसी का गोत्र नहीं बदला जाता । उसका सम्बन्ध खून से है ।

यह लेख हरिप्रकाश भाट की पोथी का है जो उसने किसी दूसरे लेखक की पोथी से लिखा था । इस भाट को सन् 1940 में बाल्याण खाप के प्रधान ग्राम शिषौली में बुला कर पगड़ी और 250 रुपये से उसका सम्मान किया था ।

संदर्भ: “सर्वखाप पंचायत का राष्ट्रीय पराक्रम”, पृष्ठ 289-299, लेखक - निहालसिंह आर्य

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