Kunda

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Kunda (कुन्द)/(कुन्दा)[1] is gotra of Jats in Punjab.

Origin

Kunda (कुन्द) are said to be descendants of Kundika (कुन्दीक). [2]

History

The Mahabharata Tribe - Kundamana (कुन्दमान) figures in the tribute list Mahabharata (II.48.13). [3]

The Mahabharata Tribe - Kundamana (कुन्दमान) may be identified with Jat Gotra - Kunda (कुन्द) + Maan (मान)

The Mahabharata Tribe - Kundika (कुनदीक) figure in Shalya Parva Mahabharata (IX.44.53) [4]

In Mahabharata

Kundamana (कुन्दमान) Mahabharata (II.48.13)

Kundika (कुण्डिक) Mahabharata (I.89.51)

Kundika (कुनदीक) Mahabharata (IX.44.54)


Sabha Parva, Mahabharata/Book II Chapter 48 describes Kings who presented tributes to Yudhishthira. Kundamana (कुन्दमान) is mentioned in Mahabharata (II.48.13).[5].... the Kashmiras, the Kundamanas, the Paurakas, the Hansakayanas, the Sivis, the Trigartas, the Yauddheyas, the Rajanyas, Madras and the Kaikeyas,....


Adi Parva, Mahabharata/Mahabharata Book I Chapter 89 verse 51 tells us that Dhritarashtra had eight sons, viz., Kundika, Hasti, Vitarka, Kratha, Havihsravas, Indrabha, and Bhumanyu. [6]


Shalya Parva, Mahabharata/Book IX Chapter 44 tells us about the ceremony for investing Kartikeya with the status of generalissimo (सेनागणाध्यक्ष), the diverse gods, various clans who joined it. According to Verse-53 Kundika was one of them who joined this ceremony. [7]

कुंदुज

विजयेन्द्र कुमार माथुर[8] ने लेख किया है ...कुंदुज (AS (p.198) निवासियों को महाभारत, सभा पर्व 52 में कुंदमान कहा गया है. यह देश संभवत है जैसा कि प्रसंग से इंगित होता है अफगानिस्तान की उत्तरी सीमा पर रहा होगा (देखें डॉ.मोतीचंद्र: उपायन पर्व- ए स्टूडी)

कुन्दा/कुण्डू जाटवंश का जनपद

दलीप सिंह अहलावत[9] के अनुसार महाभारतकाल में भारतवर्ष में इस कुन्दा (कुण्डू) जाटवंश का भी एक जनपद था। (महाभारत भीष्मपर्व, अध्याय 9)।

जाट्स दी ऐन्शन्ट रूलर्ज लेखक बी० एस० दहिया ने पृ० 46 पर वायुपुराण 47/43 का हवाला देकर लिखा है कि “कुन्दा (कुण्डू) लोग मध्य एशिया में सीता नदी के तट पर रहते थे।” आगे यही सज्जन पृ० 73, 262 पर लिखते हैं कि “कुन्दा” कुण्डू ही हैं। सीता नदी को तारिम नदी सिद्ध किया गया है। (S.M. Ali, OP. Cit P. 105) यह तारिम नदी पामीर पठार से निकलकर उत्तरपूर्व की ओर बहती हुई लोपनोर झील में गिरती है। जे० सी० विद्यालंकार का कहना है कि यह यारकन्द या जरफशान नदी है, जिसको चीनी लोग आजकल भी सीटो कहते हैं। (भारतभूमि पृ० 123)। कुण्डू लोगों के नाम पर पामीर पठार में कुण्डू नगर है1। काशिका पुस्तक में बहुत जाटवंशों का उल्लेख है। उस में लिखा है कि Trigarta (त्रिगर्त) संघ के लिए छः सभासद नियुक्त किये हुए थे। उनमें से दो जाति कुण्डूपर्थ और डांडाकी थी। ये लोग कुण्डू एवं डांढा जाटगोत्र हैं। पाणिनि ऋषि ने भी लिखा है कि कुण्डूपर्थ, जालन्धर राज्य त्रिगर्त संघ का ही खण्ड (भाग) था।


1. Through the Pamirs, P. 209, जाट्स दी ऐनशन्ट रूलर्ज पृ० 23 लेखक बी० एस० दहिया।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-294


कुण्डुवों के राजा अमोघभूति के सिक्के पंजाब के जिला होशियारपुर में गांव तप्पा मेव में पाये गये हैं।

कुण्डू जाटों के गांव जिला सोनीपत में बुटाना (आधा), ढूराणा,

जि० रोहतक में टिटोली, सुन्दरपुर (आधा)।

जि० जींद में 10-12 गांव हैं।

जि० रोहतक तहसील झज्जर में चांदपुर गांव,

जि० पानीपत में काथ, शाहपुर, बीजावा,

जि० मेरठ में हेवा गांव आदि कुण्डू जाटों के हैं।

नोट - देहली पर गुलामिया सल्तनत के समय कुण्डू जाटों का दादरी पर राज्य था। औरंगजेब के समय दादरी पर फौगाटों का शासन हो गया। (जाटों का उत्कर्ष पृष्ठ 376, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री)।

Distribution in Punjab

Villages in Gurdaspur district

Kunda named village is in Pathankot tahsil of Gurdaspur district in Punjab, India.

Reference

  1. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Parishisht-I, s.n. क-45
  2. Mahendra Singh Arya et al.: Adhunik Jat Itihas, Agra 1998, p.227,s.n. 30
  3. काश्मीराः कुन्दमानाश च पौरका हंसकायनाः । शिबित्रिगर्तयौधेया राजन्या मद्रकेकयाः (II.48.13)
  4. द्रॊण शरवाः कपिस्कन्धः काञ्चनाक्षॊ जलं धमः । अक्षसंतर्जनॊ राजन कुनदीकस तमॊ ऽभरकृत ।। (IX.44.53)
  5. काश्मीराः कुन्दमानाशपौरका हंसकायनाः, शिबित्रिगर्तयौधेया राजन्या मद्रकेकयाः (II.48.13)
  6. धृतराष्ट्रॊ ऽथ राजासीत तस्य पुत्रॊ ऽथ कुण्डिकः, हस्ती वितर्कः क्राथश च कुण्डलश चापि पञ्चमः, हविः श्रवास तथेन्द्राभः सुमन्युश चापराजितः (Mahabharata:I.89.51)
  7. द्रॊण शरवाः कपिस्कन्धः काञ्चनाक्षॊ जलं धमः, अक्षसंतर्जनॊ राजन कुनदीकस तमॊ ऽभरकृत (Mahabharata:IX.44.53) एकाक्षॊ द्वादशाक्षश च तदैवैक जटः परभुः, सहस्रबाहुर विकटॊ वयाघ्राक्षः क्षितिकम्पनः (Mahabharata:IX.44.54)
  8. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.198
  9. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ.294-295

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