From Jatland Wiki
Jump to navigation Jump to search

Andhaka (अंधक) was a janapda known to Panini and mentioned in Mahabharata. Andhaka was Brother of Maharaja Vrishni and son of Bhīma (Sātvata), descendant of Yadu in Yadavavansha. [1] The Andhak vansha started after him. Andhak is also a gotra in Jats, who are descendants of Maharaja Andhak. [2] They fought Mahabharata War in Kaurava's side


  • Andhaka (अंधक) (AS, p.5)
  • Andhak (अंधक)

Mention by Panini

Andhaka (अंधक) is a janapda mentioned by Panini in Ashtadhyayi. [3]

Genealogy of Andhaka

Hukum Singh Panwar[4] has given the ancestry of Bharatpur rulers starting from 1. Yadu. Shini is at S.No. 38 and Krishna at S.No. 43 as under[5]:

34. Andhaka → 35. Bhajmana → 36. Viduratha → 37. Shura → 38. Shini → 39. Bhoja → 40. Hardika → 41. Devamidha → 42. Vasudeva → 43. Krishna → 44. Pradyumna → 45. Aniruddha → 46. Vajra

Jat gotras from Andhaka

Andhaka in Hindu mythology

Andhaka Ancestry as per Bhagavata Purana
Andhaka Ancestry as per Bhagavata Purana

In Hinduism, Andhaka often refers to a malevolent demon. Andhaka was the demon son of Shiva, and was created from a drop of his sweat. He was born blind. After birth, Andhaka was given to Hiranyaksha to be raised, as he had no sons. Later, Andhaka became the king of Hiranyaksha's kingdom. Shortly after becoming king Andhaka discovered that his cousins were plotting to overthrow him, so he retreated to the forest to meditate. He fasted and stood upon one leg for more than one million years, chopping off parts of his body as a sacrifice to Brahma as he waited. Brahma then duly appeared and Andhaka asked that he be allowed to see, and become immortal — to be able to be killed by no-one. Brahma agreed so long as Andhaka named the circumstances of his own death, to which Andhaka said he would die if he ever chose to marry a woman who is like a mother to him. Andhaka returned to his kingdom and quickly calmed the problems with his cousins. Some millions of years later, three of Andhaka's generals (Duryodhana, Vighasa and Hasti) happened upon Shiva and his wife Parvati in a cave, but did not recognise them. They thought that the woman beautiful enough for their king, and so hurried back to tell him the good news. Andhaka asked them to return and ask for the woman in marriage. Shiva refused and Andhaka rushed to the cave to do battle. There then followed a battle that lasted for hundreds of years and involved many other gods and demons, but finally Shiva killed Andhaka by thrusting his trident through his son's chest.


Vasudeva Saran Agrawala[8] writes that The Lichchhavis are said to have comprised 7707 rajans living in Vesali, and it is stated in Lilita-vistara that each one of them thought: I am King, I am King. Panini mentions that Vrijis, of whose confederation the Lichchhavis formed part. There is reference in the Jatakas to the Lichchhavi rulers consecrated to rulership by sprinkling sacred water on them (Jat. IV.148). A similar custom prevailed among the Andhaka-Vrishnis and other Sanghas.

V. S. Agrawala[9] writes that besides the Ayudhajivi Sanghas stated as such in the Ashtadhyayi, there were some other communities in Panini’s time, which as we know from other sources were republics. These include :Andhaka-Vrishni (VI.2.34) – The Puranas make them identical with the Satvatas whom Panini mentions as a Sangha in the Ganapatha. The Mahabharata refers to them as a Sangha and so does Kautilya. Panini refers to Rajanya leaders amongst the Andhaka-Vrishnis, which as explained by Kashika denoted members of such families as were entitled to be consecrated to rulership (abhishikta vamsya) . The chief feature of Andhaka-Vrishni constitution appears to be a full-fledged party system. The party of Akrura and that of Vasudeva are referred to by Patanjali showing that the followers of each leader were designated in accordance with their respective party leaders, e.g., Akruta-vargya, Akrura-vargina, and Vasudeva-vargya, Vasudeva –vargina.

Mathura was the capital of the closely linked clans of Vrishni, Andhaka, and Bhoja. [10] They are generally known as Yadavas after their eponymous ancestor Yadu, and sometimes as Surasenas after another famed ancestor. The kingdom of Andhakas was at place called Ānjaī to the north of Mathura Janapada. [11]

In Mahabharata

Andhaka (अन्धक) is mentioned in Mahabharata (I.221.1,2), (I.221),(II.48.42), (III.13.1), (III.48.18),(VI.20.14),(V.7.1),(V.19.17),(VI.20.14), (XIII.26.31),(XIV.84.15),

Anusasana Parva/Book XIII Chapter 26 mentions the sacred waters on the earth. Andhaka (अन्धक) is mentioned in Mahabharata (XIII.26.31).[12].....He that bathes in Analamba or in eternal Andhaka, or in Naimisha, or the tirtha called Swarga, and offers oblations of water to the Pitris, subduing his senses the while, acquires the Merit of a human sacrifice.

यदुवंश के शाखागोत्र

यदुवंश के शाखागोत्र - : 1. वृष्णि 2. अन्धक 3. हाला 4. शिवस्कन्दे-सौकन्दे 5. डागुर-डीगराणा 6. खिरवार-खरे 7. बलहारा 8. सारन 9. सिनसिनवाल 10. छोंकर 11. सोगरवार 12. हांगा 13. घनिहार 14. भोज[13]

अंधक गणराज्य

विजयेन्द्र कुमार माथुर[14] ने लेख किया है ... अंधक (AS, p.5): महाभारत कालीन गणराज्य जिसकी स्थिति यमुनातट पर थी. यह मथुरा के परवर्ती प्रदेश में स्थित था. श्रीक़ृष्ण का जन्म इसी प्रदेश के निवासी अंधकों के वंश में हुआ था. महाभारत अनुशासन पर्व के अंतर्गत तीर्थ वर्णन में अंधक नामक तीर्थ का नैमिषारण्य के साथ उल्लेख है-- 'मतंगवाप्यां य: स्नानादेकरात्रेण सिद्धयति, विगाहति ह्यनालंबमंधकं वै सनातनम्'। महाभारत शांतिपर्व में अंधकों और वृष्णियों को कृष्ण से संबंधित बताया गया है--'यादवा: कुकुरा भोजा: सर्वे चान्धकवृष्णय:, त्वय्यासक्ता: महाबाहो लोकालोकेश्वराश्च ये। ('महाभारत शांति. 81,29). इसी प्रसंग में कृष्ण को संघ-मुख्य भी कहा गया है--भेदाद् विनाश: संघानां संघमुख्योऽसि केशव' (महाभारत शांति. 81,25) जिससे सूचित होता है कि वृष्णि तथा अंधक गणराज्य थे।

अंधक का वर्णन

अंधक मधु राजा के सौ पुत्रों में ज्येष्ठ था, जो एक यादवराज था। इसी के कुल में श्रीकृष्ण पैदा हुए थे और इसी कारण 'वार्ष्णेय' कहलाए। इनका वंश 'वृष्णि वंशीय यादव' कहलाता था। ये लोग द्वारिका में निवास करते थे। प्रभास क्षेत्र में यादवों के गृह कलह में यह वंश भी समाप्त हो गया। वृष्णि-गणराज्य शूरसेन-प्रदेश में स्थित था। वृष्णियों का तथा अंधकों का प्राचीन साहित्य में साथ-साथ उल्लेख है। पाणिनि [15] में वृष्णियों तथा अंधको का उल्लेख हैं।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र [कौटिल्य का अर्थशास्त्र (पृ. 12)] में वृष्णियों के संघ-राज्य का वर्णन है।

वृष्णि राजज्ञागणस्य भुभरस्य। ' यह सिक्का वृष्णि-गणराज्य द्वारा प्रचलित किया गया था और इसकी तिथि प्रथम या द्वितीय शती ई.पू. है।[16]

अंधक एवं वृष्णि संघ सम्भवतः यदुवंशियों के राजा भीम सात्वत के पुत्रों के नाम पर बने थे। कृष्ण वृष्णि थे एवं उग्रसेन और कंस अंधक थे।

मथुरा में तीर्थंकर नेमिनाथ भी अंधक कहे गये हैं। कुछ ग्रंथों में कृष्ण को अंधक भी कहा गया है। मथुरा अंधक संघ की राजधानी थी और द्वारिका वृष्णियों की। श्री राम के पश्चात् जब अयोध्या की गद्दी पर कुश थे और लव युवराज थे, तब मथुरा में भीम सात्वत के पुत्र अंधक राज्य करते थे। उनके बाद अंधक वंशियों का मथुरा पर अधिकार रहा, जो उग्रसेन और उनके पुत्र कंस तक क़ायम रहा था। भीम सात्वत के दूसरे पुत्र का नाम वृष्णि था। उनके वंश में उत्पन्न शूर ने शौरीपुर (वर्तमान बटेश्वर) बसा कर अपना पृथक् राज्य स्थापित किया था। शूर के पुत्र वसुदेव हुए, जिनके पुत्र बलराम तथा श्री कृष्ण थे।

वैदिक साहित्य में उत्तरी पांचाल के पौरव-राजा दिवोदास और उनके वंशज सुदास की विजय-गाथाओं का उल्लेख मिलता है। सुदास ने हस्तिनापुर के पौरव राजा संवरण को उनके नौ साथी राजाओं की विशाल सेना सहित पराजित किया था। 10 राजाओं के उस भीषण संघर्ष को प्राचीन वांग्मय में 'दशहराज्ञ युद्ध' कहा गया है। वीरवर सुदास से पराजित होने वाले उन नौ राजाओं में एक यादव नरेश भी था।

श्री कृष्णदत्त वाजपेयी का अनुमान है कि यादव राजा भीम सात्वत का पुत्र अंधक रहा होगा, जो सुदास के समय यादवों की मुख्य शाखा का अधिपति और शूरसेन जनपद के तत्कालीन गणराज्य का अध्यक्ष था। वह संभवत: अपने पिता भीम के समान वीर नहीं था। अंधक के वंश में कुकुर हुआ था। कुकुर की कई पीढ़ी के बाद आहुक हुआ, जिसके दो पुत्र उग्रसेन और देवक हुए थे। उग्रसेन का पुत्र कंस था और देवक की पुत्री देवकी थी। उग्रसेन, देवक और कंस अपने पूर्वज अंधक और कुकुर के नाम पर अंधक वंशीय अथवा कुकुर वंशीय कहलाते थे। अंधक के भाई वृष्णि के दो पुत्र हुए, जिनके नाम देवमीढूष और युधाजित थे। देवमीढूष के पुत्र श्र्वफल्क और उनके पुत्र अक्रूर थे। वृष्णि के वंशज वाष्णि वंशीय अथवा वार्ष्णेय कहलाते थे।

अंधक और वृष्णि वंशीय द्वारा शासित शूरसेन प्रदेशांतर्गत मथुरा और शौरिपुर के दोनों राज्य 'गणराज्य' थे। उनका शासन वंश-परंपरागत न होकर समय-समय पर जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा होता था। वे प्रतिनिधि अपने-अपने गणों के मुखिया होते थे, और राजा कहलाते थे।

महाभारत युद्ध से पूर्व उन दोनों राज्यों का संघ था, जो 'अंधक-वृष्णि-संघ' कहलाता था। उस संघ में अंधकों के मुखिया आहुक-पुत्र उग्रसेन थे और वृष्णियों के शूर-पुत्र वसुदेव थे। उस संघीय गणराज्य का राष्ट्रपति उग्रसेन था। इस संघ राज्य के केंद्र मन्त्रियों में एक उद्धव भी थे। उग्रसेन की भतीजी देवकी का विवाह वसुदेव के साथ हुआ था, जिनके पुत्र भगवान कृष्ण थे। उग्रसेन के पुत्र कंस का विवाह उस काल के सर्वाधिक शक्तिशाली मगध साम्राज्य के अधिपति जरासंध की दो पुत्रियों के साथ हुआ था। वसुदेव की बहिन कुन्ती का विवाह कुरु प्रदेश के प्रतापी महाराजा पांडु के साथ हुआ था, जिनके पुत्र सुप्रसिद्ध पांडव थे। वसुदेव की दूसरी बहिन श्रुतश्रवा हैहयवंशी चेदिराज दमघोष को व्याही थी, जिसका पुत्र शिशुपाल था। इस प्रकार शूरसेन प्रदेश के यादवों का पारिवारिक संबंध भारतवर्ष के कई विख्यात राज्यों के अधिपतियों के साथ था। उग्रसेन का पुत्र कंस बड़ा शूरवीर और महत्त्वाकांक्षी युवक था। फिर उन्हें अपने श्वसुर जरासंध के अपार सैन्य बल का भी अभिमान था। वह गणतंत्र की अपेक्षा राजतंत्र में विश्वास रखता था। उन्होंने अपने साथियों के साथ संघ राज्य के विरुद्ध उपद्रव करना आरम्भ किया। अपनी वीरता और अपने श्वसुर की सहायता से उन्होंने अपने पिता उग्रसेन और बहनोई वसुदेव को शासनाधिकार से वंचित कर उन्हें कारागृह में बन्द कर दिया और स्वयं अंधक-वृष्णि संघ का स्वेच्छाचारी राजा बन गया था। वह यादवों से घृणा करता था और अपने को यादव मानने में लज्जित होता था। उसने मदांध होकर प्रजा पर नाना प्रकार के अत्याचार किये थे। अंत में श्री कृष्ण द्वारा उनका अंत हुआ था।

संदर्भ: [भारतकोश-अंधक

अन्धक- वृष्णि ज्ञाति राज्य

ठाकुर देशराज लिखते हैं - भगवान् कृष्ण ने पहले-पहल अन्धक और वृष्णि लोगों को सम्मिलित करके ही ज्ञाति राज्य की नींव डाली थी, जिसका कि हम पीछे के पृष्ठों में वर्णन कर चुके हैं। अन्धक लोग मथुरा से उत्तर की ओर आजकल के आंजई नामक स्थान के आसपास गणतंत्र प्रणाली से शासन करते थे। साम्राज्यवादी जरासंध से तंग आकर ये वृष्णियों के साथ समुद्र-स्थित द्वारिका में जा बसे थे। राजपूताने से होकर ये किस समय संयुक्त-प्रदेश में वापस आए, यह कुछ पता नहीं चलता। किन्तु आजकल ये औंध, अन्तल और अनलक नामों से पुकारे जाते हैं। अन्धक शब्द का औंध, अन्तल और अनलक बन जाना भाषा-शास्त्र से बिल्कुल सम्भव है। (जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठ -556)

Migration of Andhakas to Dwaraka

Jarasandha, father-in-law of Kans, invaded Mathura with a vast army; and though Krishna destroyed his army of demons, another asura, Kalayavan by name, surrounded Mathura with another army of thirty million monstrous fiends. Then Krishna thought it well to depart to Dwaraka along with his people Vrishnis, Bhojas and Andhakas. [17]

Formation of Jat sangha

Krishna departed to Dwaraka along with Andhakas, Vrishnis, Bhojas etc clans. Mahabharata mentions in chapter 25, shloka 26 that Lord Krishna founded a federation ‘Gana-sangha’ of Andhak and Vrishni clans. This federation was known as ‘Gyati-sangh’. Each member of this ‘Gyati-sangh’ was known as ‘Gyat’. Krishna was chief of this sangha. The chief of Andhaka republic was Ugrasena. Over a period of time ‘Gyati’ became ‘Gyat’ and it changed to Jat. The use of sutra - Jat jhat sanghate in sanskrit by Panini's grammar seems to have started from here. Thus Krishna is the real ancestor and founder of Jats. [18] [19]

In Mahabharata

Andhaka (अन्धक) is mentioned in Mahabharata (I.221.1,2), (I.221),(II.48.42),(III.48.18),(VI.20.14),(V.7.1),(V.19.17),(VI.20.14),


  1. Bhaleram Beniwal: Jāton kā Ādikālīn Itihās, Jaypal Agencies,Agra 2005 (Page 152)
  2. Mahendra Singh Arya et al.: Adhunik Jat Itihas,
  3. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.77
  4. The Jats:Their Origin, Antiquity and Migrations/Appendices/Appendix No.1
  5. Yadu Vamsavali of Bharatpur given by Ganga Singh in his book 'Yadu Vamsa', Part 1, Bharatpur Rajvansa Ka Itihas (1637-1768), Bharatpur, 1967, pp. 19-21
  6. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Parishisht-I, s.n. अ-9
  7. Jat History Thakur Deshraj/Chapter VIII, s.n. 17, p-585
  8. India as Known to Panini, p. 428-429
  9. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.451-452
  10. Genealogy of Yadavas
  11. Mahendra Singh Arya et al: Adhunik Jat Itihas, p. 225
  12. मतङ्ग वाप्यां यः सनायाद एकरात्रेण सिध्यति, विगाहति हय अनालम्बम अन्धकं वै सनातनम (XIII.26.31)
  13. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ.187
  14. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.5
  15. पाणिनि 4,1,114 तथा 6,2,34
  16. मजुमदार-कार्पोरेट लाइफ इन ऐंशेंट इंडिया–पृ. 280
  17. Myths and Legends of the Hindus and Bhuddhists,
  18. Mahabharata: Krishna – Narad Uvach
  19. Thakur Deshraj: Jat Itihas, pp. 106-109

Back to Jat Gotras/The Ancient Jats/ Jat Organizations