Tohana

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Map of Fatehabad district

Tohana (टोहाना) is a town and tahsil in Fatehabad district in Haryana.

Variants of name

Origin

Location

Villages in Tohana tahsil

Akanwali, Amani, Badhai Khera, Balianwala, Bhatoo, Bhimawala, Bhodi, Bhodia Khera, Bhurtholi, Bosti, Budhanpur, Chander Kalan, Chander Khurd, Chandpura Tohana, Chilewal, Chitan, Chuharpur, Damkora, Dangra, Dharsul Kalan, Dharsul Khurd, Dher, Diwana, Fatehpuri, Gajuwala, Girnu, Gularwala, Hansawala, Himatpura, Hindalwala, Indachhoi, Jakhal, Jakhalmandi (MC), Jamalpur Shekhan, Kamalwala, Kana Khera, Kanhri, Karandi, Kasampur, Khanora, Kudni, Kullan, Lalauda, Lalluwal, Loha Khera, Maduwala, Malaheri, Mamupur, Manghera, Marthala, Mayemadh, Meod Begamwali, Meod Boghanwali, Musa Khera, Nangla, Nangli, Nanheri, Narel, Nathuwal, Parta, Pirthla, Pokhri, Puru Majra, Rainwali, Rasulpur, Ratta Khera, Ratta Theh, Rupan Wali, Sadhanwas, Salempuri, Samain, Sambalwala, Sanchla, Saniyana, Shakarpura, Sidhani, Talwara, Talwari, Tharvi, Tohana (MC), Udepur, Zabtawala,

Jat Gotra

Tuhade (टुहाड़े) gotra originated from place name Tohana (टोहना) or Tuhana (टुहाना). [1]

In Mahabharata

Shalya Parva, Mahabharata/Book IX Chapter 44 shloka 66 mentions Tuhana attended the ceremony for investing Kartikeya with the status of generalissimo. [2]

History

V. S. Agrawala[3] writes that Panini mentions Taushayana (Taushāyaṇa) (तौषायण) (IV.2.80) - modern Tohana (Ṭohānā), a place of historical and archaeological interest in the Fatehabad tahsil of Hisar district.


The districts of Jamalpur and Tohana: The last Harriana districts for consideration, were Jamalpur and Tohana.

Jat History

Jatoo khap has 84 villages in Haryana in Hansi and Tohana areas. This khap includes many villages of Gurjars also. The Jatwan of this khap had played a great historical role in fighting against Muhammad Ghori (1173-1205). Jats of this khap under Jatwan besieged the Muslim commander of Hansi, Haryana, Nasrat Uddin; raised the siege and in an obstinate and fierce battle defeated the Muslims under Kutb Uddin Aibak (1193). [4]


Dr Girish Chandra Dwivedi[5] writes about Jats and Timur:

The Jat rose again when Timur invaded India. Malmuzat-i-Timuri testifies to his satisfaction over killing 2,000 Jats of a village Tohna near Sarsuti. He found them "demon like", "robust", "marauding" and "as numorous as ants, and locusts".[6] We learnt that in order to hold deliberations over the problem of his invasion, a Sarva Khap Panchayat meeting was held in Samvat 1455 (1398 AD.) in the forest of Chaugama under the presidentship of Deo Pal Rana. It passed the resolutions that they should "vacate the villagers, sending the children and women to the forests and that the able-bodied persons should take up arms and destroy the arm'y of Timur".[7] The Panchayat militia harassed the forces of Timur, while they were advancing from Meerut towards Hardwar. In the process the former lost 6,000 men.[8]

H.A. Rose[9] writes that In November 1398 Timur marched through the jungle from Ahruni in Karnal to Tohana, through a tract which he found inhabited by Jats, Musulmans only in name, and without equals in theft and high-way robbery: they plundered caravans on the road and were a terror to Musulmans and travellers. On Timur's approach the Jats had abandoned the village (Tohana) and fled to their sugarcane fields, valleys, and jungles, but Timur pursued them, apparently after a contest in which the Jats had held their own, and put 2,000 of the demon-like Jats to the sword.

जाटों का तैमूर से युद्ध

दलीप सिंह अहलावत[10] ने लिखा है कि मध्यएशिया में जाटों को परास्त करके तैमूर ने अपनी राजधानी समरकन्द में स्थापित की। उसने अपनी विशाल सेना से तुर्किस्तान, फारस, अफगानिस्तान आदि देशों को जीतकर भारत पर आक्रमण करने का निश्चय किया जो उस समय बड़ी अव्यवस्थित दशा में था। दिल्ली सल्तनत पर तुगलक वंश का अन्तिम बादशाह महमूद तुगलक था जो कि एक निर्बल शासक था। भारत में फैली हुई अराजकता को दबाने में वह असफल था। इस दशा से लाभ उठाते हुए तैमूर ने भारत पर आक्रमण कर दिया।

तैमूर ने सबसे पहले अपने पौत्र पीर मुहम्मद को सेना के अग्रभाग का सेनापति बनाकर भेजा। उसने सिन्ध को पार कर कच्छ को जीत लिया। उसने आगे बढ़कर मुलतान, दिपालपुर और पाकपटन को जीत लिया। इसके बाद वह सतलुज नदी तक पहुंच गया जहां वह अपने दादा के आने की प्रतीक्षा करने लगा। तैमूर ने 92000 घुड़सवारों के साथ 24 सितम्बर 1398 ई० में हिन्दुकुश मे मार्ग से आकर सिन्ध को पार किया। वह पेशावर से मुलतान पहुंचा। वहां से आगे बढ़ने पर खोखर जाटों से इसकी सख्त टक्कर हुई जिनको परास्त करके वह सतलुज नदी पर अपने पौत्र से जा मिला। मुलतान युद्ध में तथा आगे मार्ग में जाटों ने तैमूर का बड़ी वीरता से मुकाबला किया था। अब उसने भटनेर पर आक्रमण कर दिया जहां से उस पर जाटों का आक्रमण होने का डर


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-377


था। भटनेर की स्थिति भटिण्डा से बीकानेर जाने वाले मार्ग पर थी[11]

वाक़ए-राजपूताना, जिल्द 3 में लेखक मुंशी ज्वालासहाय ने लिखा है कि “भटनेर जो अब रियासत बीकानेर का भाग है, पुराने जमाने में जाटों के दूसरे समूह की राजधानी थी। ये जाट ऐसे प्रबल थे कि उत्थान के समय में बादशाहों का मुक़ाबला किया और जब आपत्ति आई, हाथ संभाले। भाटी जाटों की आबादी की वजह से इस इलाके का नाम भटनेर हुआ है। जो लोग मध्यएशिया से भारत पर आक्रमण करते थे, उनके मार्ग में स्थित होने से भटनेर ने इतिहास में प्रसिद्धि प्राप्त की है। तैमूर के आक्रमण का भी मुकाबिला किया।”

तैमूर ने भटनेर को जीत लिया और यहां पर अपने हाकिम चिगात खां को नियुक्त करके आगे को बढ़ा। इस हमले के थोड़े दिन बाद जाटों ने अपने राज्य को वापिस लेने हेतु अपने सरदार वीरसिंह या वैरीसाल के नेतृत्व में मारोट और फूलरा से निकलकर भटनेर पर आक्रमण कर दिया। विजय प्राप्त करके फिर से भटनेर को अपने अधिकार में ले लिया। (जाट इतिहास पृ० 596-597, लेखक ठा० देशराज)।

तैमूर के साथ जाटों ने बड़ी वीरता से युद्ध किए। इसीलिए तो उसने कहा था कि

“जाट एक अत्यन्त मज़बूत जाति है। देखने में वे दैत्य जैसे, चींटी और टिड्डियों की तरह बहुत संख्या वाले और शत्रुओं के लिए सच्ची महामारी हैं।”

शाह तैमूर दस हजार चुनींदा सवारों के साथ जंगलों से भरे मार्गों से होकर टोहाना गांव में पहुंचा वह अपने विजय संस्मरणों में लिखता है कि

टोहाना पहुंचने पर मुझे पता लगा कि यहां के निवासी वज्र देहधारी जाति के हैं और ये जाट कहलाते हैं। ये केवल नाम से मुसलमान हैं, लेकिन डकैती और राहज़नी में इनके मुकाबिले की अन्य कोई जाति नहीं है। ये जाट कबीले सड़कों पर आने-जाने वाले कारवां को लूटते हैं और इन लोगों ने मुसलमान अथवा यात्रियों के हृदय में भय उत्पन्न कर दिया है।”

प्रथम अभियान में तैमूर जाटों को शान्त नहीं कर सका और उसे आगे बढ़कर अधिक सैनिक शक्ति का प्रयोग करना पड़ा। आगे वह लिखता है कि

“वास्तव में हिन्दुस्तान विजय का मेरा उद्देश्य मूर्तिपूजक हिन्दुओं के विरुद्ध धर्मयुद्ध संचालन करने तथा मुहम्मद के आदेश अनुसार इस्लाम धर्म कबूल करवाने का रहा है। अतः यह आवश्यक था कि मैं इन जाटों की हस्ती मिटा दूं।”

तैमूर ने 2000 दैत्याकार जाटों का वध किया। उनकी पत्नी तथा बच्चों को बन्दी बनाया। पशु और धन सम्पत्ति लूटी। उनको दबाकर सन्तोष की श्वास ली। [12]

Notable persons

External links

References

  1. Mahendra Singh Arya : Ādhunik Jat Itihas, Agra 1998, p. 249
  2. तुहनश च तुहानश च चित्रदेवश च वीर्यवान, मधुरः सुप्रसादश च किरीटी च महाबलः Mahabharata (IX.44.66)
  3. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.72
  4. Dr Ompal Singh Tugania, Jat Samuday ke Pramukh Adhar Bindu, p. 16
  5. The Jats - Their Role in the Mughal Empire/Introduction,p.11
  6. Malfuzat-i-Timuri and following it Zafarnama in Elliot, III, 248-249 and 491.
  7. http://www.jatland.com/w/index.php?title=Kanha_Ram&action=edit&redlink=1
  8. Kanha Ram (Hindi Ms.), 13.
  9. A glossary of the Tribes and Castes of the Punjab and North-West Frontier Province By H.A. Rose Vol II/J,p.359
  10. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ.377-378
  11. सहायक पुस्तक - मध्यकालीन भारत का संक्षिप्त इतिहास पृ० 161-163 लेखक ईश्वरीप्रसाद; हिन्दुस्तान का इतिहास उर्दू पृ० 186-189; जाटों का उत्कर्ष पृ० 115 लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री; जाट इतिहास पृ० 596-598, लेखक ठा० देशराज।
  12. ई० तथा डा० तुजुके तैमूरी भाग 3, पृ० 429 और शरफद्दीन अली यज्दी कृत जफ़रनामा, भाग 3, पृ० 492-493)।

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