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Location of Maroth in Nagaur district

Maroth (मारोठ) (Marot) is a town Situated in Nawan tehsil of Nagaur District in Marwar, Rajasthan. Its ancient name was Marukotta (मरुकोट्ट). [1] Dasharatha Sharma [2] writes about Hammira's Digvijaya. He has mentioned Marot as Maharashtra (महाराष्ट्र).


Situated 11 kms away from Nawan & 11 kms away from the Kuchaman Road railway station. PIN - 341507, STD Code - 01586-770. Population as of 2001 is 9074 out of them 2198 are SC and 134 ST. Coordinates N 27.15 E 75.26

Jat Places Namesake

Jat Gotra from Maroth

  • Mitharwal (मिठारवाल)- Mitharwal (मिठारवाल) Mitharwar (मिठारवाड़) gotra of Jats originated from place called Maroth (मारौठ). [4]


Rao Kailan, Bhatti Chief had established his authority over nine castles, heads of districts, viz., Asini Kot or Aswini-kote, Beekumpoor, Marote, Poogul, Deorawul, Kerore (twenty-two coss, or about forty miles, from Bahawalpur), Guman, Bahun, Nadno, and Matailoh, on the Indus. [5]

During the rule of Chauhan Dynasties, Of people who agreed and supported Vigraharaja IV's policy and cooperated fully with him special mention might be made of his maternal uncle, Simhabala, the Johiya chief of Marukotta at least from V. 1217 to V. 1232. (=1160-1175 AD) [6]

Maroth is associated with the history of Dahiya and Karwasra Jat clans. Karwasra gotra gets name from their most prominent ruler Karhwa Rao.[7] A rock inscription inscribed by his grandson was found in village Mangalana (tahsil-Parbatsar, Nagaur) district of Maroth in Jodhpur princely state, in which they have been called as Dahiyas. It was inscribed in 1215 AD and has been referred to in the book 'Indians in the Cauvery' on pages 87 and 88.

Jats of Karwasra, Karwa, Bhagasra and Dahiya gotras are considered as brothers and marriages are not allowed among each of these gotras.

According to Thakur Deshraj [8]Kulhari is a branch of Johiya Jats, who ruled in Marwar area in 11-12th century. Bahipal was their king and Kot-Marot was their capital. There was a fort also at Kot-Marot. Bahipal had a war with the subedar of Hisar in which he lost his kingdom. Bahipal moved to Kathod (कठोद) and established a new kingdom there. Kathod is about 22 km from Ajmer. The descendants of Bahipal constructed a fort at Koliya.

James Tod writes that Bhatti Chief Rao Lakhar was the contemporary of Kanardeo Sonigara, whose life was saved by his (Lakhar's) wife's knowledge of omens. Lakhur was ruled by this Rani, who was of the Soda tribe. She invited her brethren from Amarkot ; but the madman, her husband, put them to death, and threw their bodies over the walls. He was allowed to rule four years, and was then replaced by his son, Punpal. This prince was of a temper so violent that the nobles dethroned him, and recalled the exiled Jaitsi from Gujarat. Punpal had a residence assigned him in a remote quarter of the state. He had a son, Lakamsi, who had a son called Rao Raningdeo, who by a stratagem pointed out by a Khurl Rajpoot, took Maroth from the Johyas, and Poogal from the Thories, whose chief, styled Rao, he made captive ; and in Poogal he settled his family. [9]

James Tod writes that When the sons of Bhatti Rao Raningdeo became converts to Islam, in order to avenge their father's feud with the Rathore prince of Nagore, they forfeited their inheritance of Poogul and Marot, and thenceforward mixed with the Abhoria Bhattis, and their descendants are termed Momun Musalman Bhutti. [10]

On this event, Kailan, the third son of the Rawal Kehar II, took possession of the forfeited lands, and besides Beekampur, regained Deorawul, which had been conquered by their ancient foes, the Dahya Rajputs.[11]

Dasharatha Sharma[12] writes....[p.123]: Hammira was the last and most famous of the Chauhans of Ranthambhor. Hammira had ascended the throne in V.1339. Not very long after this, he started, according to the Hammiramahakavya, on a digvijaya or conquest of all the quarters. He first defeated Ajuna, the ruler of Bhamarasa, and then exacted tribute from the fort of Mandalakrita (मण्डलकृत) or Mandalgarh. Striking southwards from here, he reached Ujjayini and Dhara and defeated the Paramara ruler Bhoja. From here he turned northwards, and reached home passing through Chittor, Abu, Vardhanapura (वर्धनपुर) (Badnore), Changa (चंगा) (fortress of the mers still retains old name), Pushkar, Maharashtra (Marot), Sakambhari, Khandilla (खंडिल्ल) (Khandela), Champa (चम्पा) (Chaksu), and Karkarala (कर्कराला) (Karkaralagiri of the Balvan Inscription == Karauli), at the last of which places he received the homage of the ruler of Tribhuvanagiri (Tahangarh).

[p.124]: after came a Koti-yajna which was very much like the asvamedha of Samudragupta. It was under the direction of his purohita Vishvarupa. This digvijaya, or rather a number of raids from time to time magnified into one systematic digvijaya (Balvan Inscription, EI, XIX, pp.49 ff) by Nayachandra, took place before V. 1345 (c. 1288 A.D.). The Balvan inscription of the year mentions the performance of not only one but two Kotiyagna by Hammira and describes the capture of the elephant force of Arjuna, the ruler of Malwa, a kingdom the condition of which was indeed bad enough to invite interference from all sides.


साहित्यिक ग्रंथों और शिलालेखों से पता चलता है कि मारोठ प्राचीनकाल में महाराष्ट्र नगर के नाम से प्रसिद्ध था. नयनचन्द्र सूरि लिखित हम्मीर महाकाव्य में (14 शताब्दी) तथा सकलकीर्ति सुभाषतावली में उसका यही नाम मिलता है कुछ ग्रंथों में इसे महारोठ लिखा है जो कालांतर में अपभ्रंश होकर मारोठ हो गया. इतिहासकार डॉ कैलाश चन्द्र जैन के अनुसार यहाँ लोक देवता भैरव का एक प्राचीन स्थान विद्यमान है, जिसके कारण अतीत में यह स्थल गढ़ का भराव के नाम से प्रसिद्ध था.[13]

प्रारम्भ में यहाँ चंदेल और दहिया क्षत्रिय शासक रहे जो कभी स्वतंत्र रूप से और कभी चौहानों के सामंतों के रूप में मारोठ और समीपवर्ती प्रदेश पर शासन किया. चंदेलों द्वारा अन्य नगर रेवासा भी मारोठ के पास ही है, जो कि सम्भवतः उनकी राजधानी रहा था. दहिया वंश के च्च्च के किणसरिया शिलालेख विसं 1056 (999 ई.) से पता चलता है कि उक्त वंश शासकों का इस क्षेत्र पर दीर्घकाल तक आधिपत्य रहा. दहिया शाखा का राव बिल्हण यहाँ का प्रतापी राजा हुआ. तदन्तर रणथम्भोर के शासक हम्मीर द्वारा अपने दिग्विजय के समय अन्य गाँवों और नगरों के अलावा मारोठ को भी पदाक्रांत करने का हम्मीर महाकाव्य में उल्लेख है.[14]

तत्पश्चात वामनदेव के वंशज गौड़ शासकों का मारोठ तथा निकटवर्ती भू-भाग पर लबे समय तक वर्चस्व रहा. जयपुर जिले के भैसलाना गाँव से उपलब्ध शिवलिंग की आकृति के एक दुर्लभ ताम्रपत्र से पता चलता है कि मारोठ और आस-पास के इलाके का नाम गौड़ाती अर्से ताल प्रचलित रहा. [15]

मारोठ कस्बे के पश्चिम में एक पर्वतीय खोह के भीतर जीणमाता का एक छोटा, किन्तु भव्य मंदिर बना है. मारोठ की नदी के उद्गम स्थल पर यह मंदिर बना है और कई कि.मी. पैदल चलकर ही यहाँ पहुंचा जा सकता है. जीणमाता की एक संगमरमर की भव्य प्रतिमा प्रतिष्ठापित है. मंदिर के प्रवेश द्वार पर विसं 1858 (1891 ई.) का एक शिलालेख उत्कीर्ण है जिसके अनुसार उक्त मंदिर का निर्माण मारोठ के गोयंद दासोत मेड़तिया शासक सलीम सिंह के पुत्र महाराजा महेशदान सिंह ने करवाया था. [16]

मारोठ प्राचीनकाल से जैन धर्म और संस्कृति का एक प्रमुख केंद्र रहा है.

जाटों का तैमूर से युद्ध

दलीप सिंह अहलावत[17] ने लिखा है कि मध्यएशिया में जाटों को परास्त करके तैमूर ने अपनी राजधानी समरकन्द में स्थापित की। उसने अपनी विशाल सेना से तुर्किस्तान, फारस, अफगानिस्तान आदि देशों को जीतकर भारत पर आक्रमण करने का निश्चय किया जो उस समय बड़ी अव्यवस्थित दशा में था। दिल्ली सल्तनत पर तुगलक वंश का अन्तिम बादशाह महमूद तुगलक था जो कि एक निर्बल शासक था। भारत में फैली हुई अराजकता को दबाने में वह असफल था। इस दशा से लाभ उठाते हुए तैमूर ने भारत पर आक्रमण कर दिया।

तैमूर ने सबसे पहले अपने पौत्र पीर मुहम्मद को सेना के अग्रभाग का सेनापति बनाकर भेजा। उसने सिन्ध को पार कर कच्छ को जीत लिया। उसने आगे बढ़कर मुलतान, दिपालपुर और पाकपटन को जीत लिया। इसके बाद वह सतलुज नदी तक पहुंच गया जहां वह अपने दादा के आने की प्रतीक्षा करने लगा। तैमूर ने 92000 घुड़सवारों के साथ 24 सितम्बर 1398 ई० में हिन्दुकुश मे मार्ग से आकर सिन्ध को पार किया। वह पेशावर से मुलतान पहुंचा। वहां से आगे बढ़ने पर खोखर जाटों से इसकी सख्त टक्कर हुई जिनको परास्त करके वह सतलुज नदी पर अपने पौत्र से जा मिला। मुलतान युद्ध में तथा आगे मार्ग में जाटों ने तैमूर का बड़ी वीरता से मुकाबला किया था। अब उसने भटनेर पर आक्रमण कर दिया जहां से उस पर जाटों का आक्रमण होने का डर

जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-377

था। भटनेर की स्थिति भटिण्डा से बीकानेर जाने वाले मार्ग पर थी[18]

वाक़ए-राजपूताना, जिल्द 3 में लेखक मुंशी ज्वालासहाय ने लिखा है कि “भटनेर जो अब रियासत बीकानेर का भाग है, पुराने जमाने में जाटों के दूसरे समूह की राजधानी थी। ये जाट ऐसे प्रबल थे कि उत्थान के समय में बादशाहों का मुक़ाबला किया और जब आपत्ति आई, हाथ संभाले। भाटी जाटों की आबादी की वजह से इस इलाके का नाम भटनेर हुआ है। जो लोग मध्यएशिया से भारत पर आक्रमण करते थे, उनके मार्ग में स्थित होने से भटनेर ने इतिहास में प्रसिद्धि प्राप्त की है। तैमूर के आक्रमण का भी मुकाबिला किया।”

तैमूर ने भटनेर को जीत लिया और यहां पर अपने हाकिम चिगात खां को नियुक्त करके आगे को बढ़ा। इस हमले के थोड़े दिन बाद जाटों ने अपने राज्य को वापिस लेने हेतु अपने सरदार वीरसिंह या वैरीसाल के नेतृत्व में मारोट और फूलरा से निकलकर भटनेर पर आक्रमण कर दिया। विजय प्राप्त करके फिर से भटनेर को अपने अधिकार में ले लिया। [19]

वैरीसाल ने सत्ताईस वर्ष हुकुमत की और उसका बेटा भारू उसके बाद भटनेर का शासक हुआ। वैरीसाल के समय में चगताखां ने दिल्ली के बादशाह से मदद लेकर भटनेर पर चढ़ाई की। दो बार तो उन्हें हारकर लौटना पड़ा। तीसरी बार फिर चढ़ाई की। भटनेर के लोग हमलों से तंग आ गये थे, इसलिए भारू ने सुलह के लिए प्रार्थना की। कहा जाता है कि आखिर में भारू और उसके साथी मुसलमान हो गए। जब राठौर प्रबल हुए तो उनके सरदार रायसिंह ने भटनेर को जीत लिया। [20]

तैमूर के साथ जाटों ने बड़ी वीरता से युद्ध किए। इसीलिए तो उसने कहा था कि

“जाट एक अत्यन्त मज़बूत जाति है। देखने में वे दैत्य जैसे, चींटी और टिड्डियों की तरह बहुत संख्या वाले और शत्रुओं के लिए सच्ची महामारी हैं।”

शाह तैमूर दस हजार चुनींदा सवारों के साथ जंगलों से भरे मार्गों से होकर टोहाना गांव में पहुंचा वह अपने विजय संस्मरणों में लिखता है कि

टोहाना पहुंचने पर मुझे पता लगा कि यहां के निवासी वज्र देहधारी जाति के हैं और ये जाट कहलाते हैं। ये केवल नाम से मुसलमान हैं, लेकिन डकैती और राहज़नी में इनके मुकाबिले की अन्य कोई जाति नहीं है। ये जाट कबीले सड़कों पर आने-जाने वाले कारवां को लूटते हैं और इन लोगों ने मुसलमान अथवा यात्रियों के हृदय में भय उत्पन्न कर दिया है।”

प्रथम अभियान में तैमूर जाटों को शान्त नहीं कर सका और उसे आगे बढ़कर अधिक सैनिक शक्ति का प्रयोग करना पड़ा। आगे वह लिखता है कि

“वास्तव में हिन्दुस्तान विजय का मेरा उद्देश्य मूर्तिपूजक हिन्दुओं के विरुद्ध धर्मयुद्ध संचालन करने तथा मुहम्मद के आदेश अनुसार इस्लाम धर्म कबूल करवाने का रहा है। अतः यह आवश्यक था कि मैं इन जाटों की हस्ती मिटा दूं।”

तैमूर ने 2000 दैत्याकार जाटों का वध किया। उनकी पत्नी तथा बच्चों को बन्दी बनाया। पशु और धन सम्पत्ति लूटी। उनको दबाकर सन्तोष की श्वास ली। [21]

External links


  1. Encyclopaedia of Jainism, Volume-1 By Indo-European Jain Research Foundation p.5528
  2. Dasharatha Sharma, Early Chauhan Dynasties", Ch. XI, pp. 123
  3. Encyclopaedia of Jainism, Volume-1 By Indo-European Jain Research Foundation p.5528
  4. Dr Mahendra Singh Arya, Dharmpal Singh Dudee, Kishan Singh Faujdar & Vijendra Singh Narwar: Ādhunik Jat Itihasa (The modern history of Jats), Agra 1998, p.276
  5. James Tod: Annals and Antiquities of Rajasthan, Volume II, Annals of Jaisalmer, p.236,fn-2
  6. "Early Chauhan Dynasties" by Dasharatha Sharma, p.69
  7. Dr Mahendra Singh Arya, Dharmpal Singh Dudee, Kishan Singh Faujdar & Vijendra Singh Narwar: Ādhunik Jat Itihasa (The modern history of Jats), Agra 1998, p. 229
  8. Jat History Thakur Deshraj/Chapter IX, p.606
  9. James Tod: Annals and Antiquities of Rajasthan, Volume II, Annals of Jaisalmer, p.225
  10. James Tod: Annals and Antiquities of Rajasthan, Volume II, Annals of Jaisalmer, p.232
  11. James Tod: Annals and Antiquities of Rajasthan, Volume II, Annals of Jaisalmer, p.232
  12. Dasharatha Sharma, Early Chauhan Dynasties", Ch. XI, pp. 123-124.
  13. Dr. Raghavendra Singh Manohar:Rajasthan Ke Prachin Nagar Aur Kasbe, 2010,p.109
  14. Dr. Raghavendra Singh Manohar:Rajasthan Ke Prachin Nagar Aur Kasbe, 2010,p.109
  15. Dr. Raghavendra Singh Manohar:Rajasthan Ke Prachin Nagar Aur Kasbe, 2010,p.110
  16. Dr. Raghavendra Singh Manohar:Rajasthan Ke Prachin Nagar Aur Kasbe, 2010,p.111
  17. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ.377-378
  18. सहायक पुस्तक - मध्यकालीन भारत का संक्षिप्त इतिहास पृ० 161-163 लेखक ईश्वरीप्रसाद; हिन्दुस्तान का इतिहास उर्दू पृ० 186-189; जाटों का उत्कर्ष पृ० 115 लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री; जाट इतिहास पृ० 596-598, लेखक ठा० देशराज।
  19. Jat History Thakur Deshraj/Chapter_IX, p.602
  20. Jat History Thakur Deshraj/Chapter_IX, p.602
  21. ई० तथा डा० तुजुके तैमूरी भाग 3, पृ० 429 और शरफद्दीन अली यज्दी कृत जफ़रनामा, भाग 3, पृ० 492-493)।

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