Bairad

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Bairad (बैरड़) Vairad (वैरड़) [1] Berad/Berar (बेरड़)[2] Barad (बरड़) is a Gotra of Jats living in Rajasthan, Madhya Pradesh, Haryana and Gujarat.

Genealogy of Bairad clan

Ajayapala (Founder of Ajmer) → Raja VisalRaja DeshepalSomeshwaraPrithviraj ChauhanLakanManakramBairasiBairad (Founder of Bairad Gotra in 1045 AD) → Begad AnjiKajala Ram (Founded Kajalasar in 1065 AD) → Gordhan RamKalu RamChutra RamPesujiAsojiDedarjiDujonjiKirtonjiHimmarji (Founder of Tapoo 1367 AD) → Kanwarpal (Founded Cherai in 1475 AD) → BegojiAsrajLalaji

Note - This Genealogy is based on 'History of Berad clan' by Amesh Bairad

History

Bairad is branch of Chauhans of Ajmer originated from chieftain named Bairad son of Bairasi in year 1045 AD.

Villages founded by Bairad clan

Distribution in Rajasthan

Villages in Barmer district

Akdara, Akadli, Amarji Ki Dhani, Anta Barmer, Bachhraoo, Badha Chohtan, Baganwas, Bairdon Ki Dhani, Balau Jati, Baldevnagar, Balod, Balotra, Bariyada, Barmer, Banas Barmer, Bandra, Baniya Sanda Dhora, Banta Barmer, Bataru, Baytu, Bayatu Panji, Beradpura, Besania Chohtan, Bhiyar, Bhurtiya Barmer, Chawa, Chibi, Chochra, Dandali, Dhanera, Dhaniyasar, Dhorimanna, Doogar, Dudha Beri, Goliyar, Gudha Malani, Gugari, Gurisar, Hathitala, Hudo Ki Dhani, Hodoo, Holani, Jhakh Barmer, Kagoda, Kalanada Barmer, Kamthai, Kanor, Kashmir Barmer, Khed, Khari Barmer, Kharin, Khokhsar, Kist, Kudla, Kumpaliya, Mel, Mokhab Khurd, Naktal, Nand, Navtala, Neemba Ki Dhani, Netrar, Pabubera, Pabusar Barmer, Pachpadra, Padardi Kalan, Pala Barmer, Phalsund, Piprali Barmer, Ramderiya, Ratasar, Rateu, Rawatsar Barmer, Rid, Ridu, Rodwa, Sahar, Sanawada, Sanchor, Sanchor Khara, Sanjata, Sankad, Sansau, Sarla, Sarli, Sawau, Sawau Padamsingh, Sawau Moolraj Baytu, Sheo, Shivpura Barmer, Simrakhiya, Sintara, Tibd, Uchawada, Udankhan, Undkha, Undoo, Vayatu,

Villages in Jodhpur district

Baithwasiya, Balesar Durgawatan, Banaras Jodhpur, Baran Khurd, Barnau, Bawarli, Bedoo Kalan, Berdon Ka Bas, Bhakhri, Bhandoo Kalan, Bhandoo Khurd, Bheeyadiya, Bijariya Bavri, Chamu, Chand Sama, Chandaliya Jodhpur, Cherai, Danwara, Dasaniya, Dhundhara, Ekalkhori, Gopasariya, Janadesar, Jati Bhandu, Khabra Kalan Osian, Kharda Mewasa, Kiramsariya, Luni, Madla Kalan, Moria Mujhar, Paboosar, Pabusar, Panchla Khurd, Rataniyo ki Dhani Shekhala, Sumaliya, Ummednagar,

Villages in Jaisalmer district

Bhaniyana,

Villages in Jalor district

Jalor,

Viillages in Hanumangarh district

Berad Jats live in: Dhaban, Dhilki Jatan, Nathwana, Pichkarain, Ratanpura, Rawatsar, Sangaria,

Villages in Ganganagar district

Berad Jats live in: Daulatpura Ganganagar, Fathui

Villages in Bikaner district

Dhelki, Jaitpur Bikaner, Lunkaransar, Nokha Bikaner, Thoomli,

Villages in Churu district

Baniyasar (tah:Sardarshahar)

Villages in Jalor district

Bheemgura, Kagoda,

Villages in Nagaur district

Chheela Nagaur, Jayal,

Distribution in Madhya Pradesh

Villages in Bhopal district

Barad(बरड़) Jats live in: Bhopal,

Villages in Harda district

Barad(बरड़) Jats live in: Bhonkhedi, Gangiya Khedi, Gogiya (Harda), Goyat Harda, Pratappura Harda, Rundlay,

Villages in Dewas district

Barad(बरड़) Jats live in: Khategaon,

Distribution in Haryana

Villages in Fatehabad district

Fatehabad, Pili Mandori,

Villages in Sirsa district

Munnawali Sirsa,

Distribution in Gujarat

Banta Gujarat,

बैरड़ गोत्र का इतिहास

बैरड़ अग्नि वंशी चौहान कुल में जाट शाखा के क्षेत्रीय हैं। इनका नख चौहान और निकास अजमेर से है। बैरड़ का इतिहास जया पुराणिक रावजी की बहियों में मिलता है। बैरड़ गोत्र की शुरुआत बैरड़ नामक व्यक्ति से हुई जिनके पिता का नाम बैरसी था। बैरड़ शब्द की शुरुआत सर्वप्रथम विक्रम संवत 1102 (=1045 ई.) में अजमेर से हुई। उस समय अजमेर पृथ्वीराज चौहन के अधीन था। उनके वंश में ही एक बैरसी हुये जिनके पुत्र बैरड़ थे जिनके नाम पर यह बैरड़ गोत्र चला। [3]


बैरड़ गोत्र की कुलदेवी- आशापुरी माता थी, जिनका मंदिर नाडोल में है। बैरड़ लोग जब अजमेर छोडकर बिकानेर आ गए तो आशापुरी माता का नाम ब्राह्मणी माता हो गया। बैरड़ लोग इसी को कुलदेवी मानने लगे। ब्राह्मणी माता का सहयोग इस गोत्र के साथ उत्पत्ति से लेकर आजतक रहा है। ये नागेश्वर भगवान की उपासना करते हैं। [4]

बैरड़ लोगों ने ब्राह्मणी माता के आशीर्वाद से वि. स. 1122 (=1065 ई.) में काजलासर गाँव की नींव डाली। यहाँ से जाकर वि. स. 1300 (=1243 ई.) में ढेलकी का खेड़ा गाँव की नींव रखी। इसके बाद यह गाँव छोडकर वि. स. 1385 (=1328 ई.) में लाडमसर गाँव बसाया। [5]

बैरड़ लोगों लाडमसर गाँव छोडकर तापू आए और तापू को बसाया। वहाँ वि. स. 1424 (=1367 ई.) में 'गाडो वाला बास' बसाया। 'गाडो वाला बास' नाम इसलिए पड़ा कि बैरड़ जब अजमेर छोडकर आए तो अपना सामान बैलगाड़ियों पर लाद कर लाये थे। ये गाडियाँ जब तापू आकर रुकी तो जहां वे रुके थे उस बस्ती का नाम 'गाडो वाला बास' दे दिया। बैरड़ों ने वहाँ हनुमानसागर नामक कुआ भी खोदा जो आज भी दर्शनीय है। [6]

तापू नामक गाँव में ही हिम्मीरजी बैरड़ पैदा हुये। इनके तीन पुत्र पैदा हुये: 1. कंवरपाल, 2. मुमदेव और 3. पन्नाराम। [7]

तापू में हिम्मीरजी बैरड़ का रावले के ठाकुर उदय सिंह से झगड़ा हो गया और उन्होने उदयसिंह को मार दिया। इसके बाद तापू गाँव छोडकर अन्यत्र स्थान के लिए रवाना हो गए। हिम्मीरजी बैरड़ की एक कुँवारी पुत्री दुर्गा थी जिसके लिए वे चिंतित थे। ब्राह्मणी माता ने आशीर्वाद दिया कि चिंता मत करो चलते जाओ जहां गाड़ी रुक जाए वहीं बस जाना। आपके वंश की खूब बढ़ोतरी होगी और ब्राह्मणी माता हमेशा आपके साथ रहेगी। गाड़ियों का काफिला चेराई नामक गाँव में आकर रुका। हिम्मीरजी बैरड़ के पुत्र कंवरपाल ने ब्राह्मणी माता के आदेशानुसार वहीं गाडियाँ रोक कर गाँव की नींव वि.स. 1532 (1475 ई.) में रखी तब जोधपुर में राव जोधा का शासन था। [8]


गाँव चेराई की नींव हिम्मीरजी बैरड़ के पुत्र कंवरपाल ने वि.स. 1532 (1475 ई.) में रखी। कंवरपाल ने ही काजला नामक क्षेत्र बसाया। [9]

कंवरपाल के छोटे भाई मुमदेव ने वि.स. 1532 (1475 ई.) में किरमसरिया गाँव (तहसील ओसियां) की नींव रखी। इसी गाँव में नाड़ी पर किसी कारण झगड़ा हो गया जिसमें बैरड़ गोत्र के तीन सपूत जुझार हो गए। आज इस गाँव में इनके थान मौजूद हैं जो पूजनीय हैं। [10]

कंवरपाल के छोटे भाई पन्नाराम ने विशनोई संप्रदाय को आगे बढ़ाया। वह जंभोजी के अनुयाई हो गए। उन्होने मोरिया मुंजार (तहसील फलौदी) गाँव बसाया।[11]

बैरड़ गोत्र के लोगों ने वि. स. 1805 में बैरड़ो बास बसाया। यहाँ बैरड़ गोत्र के असराज के दो पुत्र लालाजी व पालाजी हुये। असराज ने आसोलाव तालाब बनाया जो वर्तमान बड़े बास तथा बाना बास के बीच स्थित है। इसे वर्तमान में अवला नाड़ी के नाम से जाना जाता है। इसे असराज जी बाइराद ने वि. सं. 1700 में खुदाया था। असराज वि. सं. 1753 में वीरगति को प्राप्त हुये। उनकी मृत्यु पर उनके बेटों ने उनके द्वारा बनाए गए तालाब आसोलाव पर छतरी बनाई जो आज भी मौजूद है। [12]

असराज के दो पुत्र लालाजी व पालाजी हुये। लालाजी की शादी भणियाणा गाँव के निवासी सेंसाराम सारण की पुत्री पन्नी देवी के साथ हुआ। किसी आपसी रंजिस के कारण पालाजी ने अपने बड़े भाई लालाजी की हत्या कर दी। तब पन्नीदेवी पालाजी के वंश का नाश होने का स्राप देकर सती हो गई। यह छतरी बेरडो बास में मौजूद है। कहते हैं पन्नी देवी के श्राप के कारण पालाजी का वंश नष्ट हो गया। पालाजी के वंश में मात्र 7 घर ही बचे हैं। जो वर्तमान में बाड़मेर जिले के नांद गाँव में बस रहे हैं जो वर्तमान में दारामाणी कहलाते हैं। [13]

लालजी का परिवार विशाल रूप में फैला हुआ है। लालाजी के वंश की खूब बढ़ोतरी हुई। वर्तमान में लालाजी के वंश में राजस्थान में कोई 7 हजार परिवार फल-फूल रहे हैं। लालजी के तीन पुत्र हुये - 1. पिथाजी 2. सुजाजी 3. नेताजी. पिथाजी का परिवार वर्तमान में चेराई- बैरड़ो बास में बसा हुआ है तथा 6 धड़ों या खंडों में विभक्त है - 1. गंगाणी 2. रताणी 3. मुलाणी 4. तुलछाणी 5. लचिरामाणी 6. चेनाणी जो वर्तमान में चेराई- बैरड़ो बास में हैं। सुजाजी का परिवार भी वर्तमान में चेराई- बैरड़ो बास में है और तीन धड़ों या खंडों में विभक्त है - 1. बेगाणी 2. मेकाणी 3. मंदरूपाणी। नेताजी का वंश आगे नहीं बढ़ पाया। [14]

बैरड़ गोत्र का वंशवृक्ष

बैरड़ गोत्र का वंशवृक्ष बड़वा के अभिलेख के आधार पर निम्नानुसार है[15]:

राजा अजयपाल (अजमेर बसाया) → राजा बिसल → राजा देशेपाल → राजा सोमेश्वरपृथ्वीराज चौहान → लाकन → माणकरामबैरसीबैरड़ (गोत्र के संस्थापक) → बेगड़ आणजी → कजला राम → गोरधन राम → कालुराम → चुतरा राम → पेसूजी → आसोजी → देदड़जी → दुजोणजी → किरतोणजी → हिम्मरजी (तापू गाँव बसाया वि.स. 1424) → कंवरपाल (चेराई गाँव बसाया) → बेगोजी → असराज → लालाजी

बैरड़ गोत्र का विस्तार

बैरड़ गोत्र का विस्तार प्रदेशवार और जिलावार निम्नानुसार है [16]:

मध्य प्रदेश जिला हरदा, तहसील हरदा, गाँव भुवनखेड़ी, गोगिया, गांगिया खेड़ी, गोयत, प्रतापपुरा, रुंदलाय में ये Barad (बरड़) लिखते हैं। Barad (बरड़) लोग देवास जिले के खातेगांव में भी बसे हैं।

गुजरात - गाँव बांटा

हरयाणा - फतेहाबाद में पीली मंदोरी, फतेहाबाद, भटटू, सिरसा में मुनावाली

राजस्थान -

जिला जोधपुर तहसील ओसियां, गाँव: बैरड़ों का बास, चेराई, बिजारिया बावड़ी, खाबड़ा, भियाडिया, बेडू कला, धूंधाड़ा, किरमसरिया, बारा खुर्द, डांवरा, पांचला खुर्द, गोपासरिया, उम्मेद नगर, बैठवासिया, चंडालिया, एकल खोरी, मेवासा, भाखरी,

तहसील शेरगढ़ - चामू, बावरली , बारनाऊ, सेखाला, चाँदसमा, दासाणिया, पाबुसर,सुमालिया, बालेसर, जाटी भांडु,

तहसील फलौदी - मडला कला, बनारस, मोरिया मुझार (विश्नोई बैरड़)

तहसील लूनी: जानादेसर, लूनी, भांडु खुर्द), भाण्डू कलां

जिला बाड़मेर - तहसील शिव गाँव रामदेरिया , मोखाब , उण्डू, तहसील बायतू - सवाऊ, कानोड़, फलसुण्ड, सिमरखिया, बटाडु, , बाँदरा (कवास), मेल, गुड़ामालानी, कमठाई, सारला, बाधा, चोहटन बेसानिया, बांटा, सनावड़ा, धानेरा, बनास, सांकड़ तालुका, पाबूबेरा, सरली , गुड़ामालानी, रोड़वा, किस्त, पाला, पचपदरा, खेड़, खारी, धोरीमना बाड़मेर , गुगड़ी, खोखसर, रतेऊ, चवा, आकड़ली, बलाऊ, बेरड़पुरा खोखसर, पश्चिम बाड़मेर, उंड़खा, बरियाड़ा, बाड़मेर शहर, सिणतरा, अकदड़ा, कुरला, रिड़, होलानी, बाछड़ाऊ , चीबी, बायतू, भुरटिया, रावतसर, नेतडियार, साँड़ा, खड़ीन, गोलियार, हाथीतला, आन्टा, निम्बा की ढानी, कुंपालिया, नकतला, पादरड़ी, पीपराली बाड़मेर, धणियासर, नांद, उड़णखां, चवा, भियाड़, बागांवास, डंडाली, झाक, कालानाड़ा , ड़ूगर, कासमेर, उचावडा, चोचरा, होडु, पाबुसर, बलोड, रिड़ू, हुडों की ढाणी बाड़मेर, कागोड़ा, बाँदरा, संसाऊ , नोंद बाड़मेर, शिवपुरा, नवतला, शिव, नोंद बाड़मेर, आदर्श बस्ती नोंद, सांजटा बाड़मेर, उचावडा, टीबड़ी, गुड़ीसर, सांचोर खारा, सांचोर, बैरडों की ढाणी

जिला बीकानेर - नोखा, जैतपुर, लूणकरणसर, ढेलकी, थूमली,

जिला चुरू - बनियासर (सरदारशहर),

जिला जालोर - कागोड़ा, भीमगुड़ा,

जिला नागौर - छीला, जायल,

जिला हनुमानगढ़ - ढिलकी जाटान, ढाबां संगरिया, रावतसर, दौलतपुरा गंगानगर

बेरड़ों का बास गाँव का इतिहास

बेरडों का बास ओसियां तहसील जिला जोधपुर में बैरड़ जाटों के नाम से गांव बसा हैं । बेरड़ों का बास या बेरड़ों बास गाँव की स्थापना वि. सं. 1805 (=1748 ई.) में हुई। उस समय चेराई गाँव में ठिकानेदार मूल सिंह थे उनके समय में इस गाँव की स्थापना हुई। बेरड़ों बास गाँव की स्थापना के पूर्व ही गाँव में ब्राह्ममणी माता की मूर्ति वि. सं. 1532 (=1475 ई.) में स्थापित हो चुकी थी। जिस समय वि. सं. 1532 में कंवरपाल बेरड़ ने चेराई गाँव की स्थापना की थी उसी समय बेरड़ों बास गाँव में ब्राह्ममणी माता की मूर्ति वि. सं. 1532 (=1475 ई.) में स्थापित की। उस दिन चैत्र सुदी 8 का दिन था। उस समय ब्राह्ममणी माता का छोटा सा मंदिर था। जिस समय बेरड़ों बास गाँव की स्थापना हुई थी उसके पूर्व यहाँ नागेश्वर भगवान ने जीवित समाधि ली थी। इसलिए बेरड़ों ने ब्राह्ममणी माता और नागेश्वर को अपना ईष्ट देव मान लिया। बेरड़ों ने यहाँ एक कुएं का निर्वाण कराया जो आज भी विद्यमान है। कुए पर हनुमान जी की मूर्ति स्थापित है। इस कुए को बनाने का श्रेय भैया राम बेरड़ को जाता है जो इस समय बलाऊ जिला बाड़मेर में बसे हुये हैं।

बेरड़ों बास गाँव में पहले बेरड़ों की संख्या कम थी परंतु जनसंख्या बढने के साथ ही उनका विस्तार अन्य क्षेत्रों में हुआ। बेरड़ों बास गाँव में बेरड़ों के 700 परिवार हैं। बेरडों का बास ग्राम पंचायत में वार्ड न. 6 रतानियो की ढाणी में बैरड़ समाज के 440 घर हैं। बेरड़ों की आर्थिक स्थिति अच्छी हुई तथा इन्होने बेरड़ों बास गाँव में नागेश्वर भगवान और ब्राह्ममणी माता के भव्य मंदिर बनाए हैं। यहाँ पर वीर तेजा स्टेडियम का भी सन् 2014 से निर्माण शुरू हुआ है। बैरड़ जाति के द्धारा निर्मित माँ ब्राह्मणी देवी और नागेश्वर महादेव मंदिर ओसियां की माँ सच्चियाय मंदिर के बाद सबसे प्रसिद हैं ।

ब्राह्ममणी माता मंदिर - बेरड़ों में ब्राह्ममणी माता को कुलदेवी माना गया है। बालक का मुंडन संस्कार ब्राह्ममणी माता मंदिर में होता है जिसे जडूला कहते हैं। ब्राह्ममणी माता को मीठे दलिए का भोग लगाया जाता है। शादी के बाद जागरण भी ब्राह्ममणी माता के मंदिर में ही होता है। नवरात्रा में एकम से लेकर अष्टमी तक ब्राह्ममणी माता की स्तुति की जाती है। ब्राह्ममणी माता में मूर्ति स्थापना वि. सं. 2059 (=2002 ई.) में की गई थी। बाहर से आने वाले भक्तों के लिए यहाँ सराय बन रही हैं। ब्राह्ममणी माता की पूजा वर्तमान में संतोष महाराज करते हैं। [17]


नागेश्वर भगवान मंदिर - बेरड़ों ने जब बेरड़ों बास आबाद किया उस समय एक नागा साधू यहाँ रहते थे। वे शिव के भक्त थे तथा गले में जीवित नाग रखते थे। वि. सं. 1805 में इस गाँव की नींव रखी गई थी उससे पहले नागा साधू ने जीवित समाधि ली थी। उस दिन श्रावण मास दिन 13 सोमवार था।उस दिन से बेरड़ों द्वारा नागेश्वर भगवान को ईष्ट देव मानकर पूजा शुरू की। बेरड़ों ने मिलकर सन 2005 में जीवित समाधि के स्थान पर एक भव्य मंदिर का निर्माण किया। नागेश्वर भगवान की पूजा गोस्वामी द्वारा की जाती है। [18]

उपरोक्त जानकारी 'बेरड़ जाति का गौरवपूर्ण इतिहास' से ली गई है, जिसके लेखक हैं - अमेश बैरड पुत्र श्री फत्ताराम जी बैरड, रतानियो की ढाणी, ग्रा. पो. बेरडों का बास, तहसील ओसियां, जिला जोधपुर, Abairad36@gmail.com, Mob: 9602695924

Notable persons

Amesh Bairad
  • Amesh Bairad - Social worker, बैरड़ इतिहासकार, प्रदेश महामन्त्री जाट सेना, सदस्यता प्रभारी राजस्थान आदर्श जाट स्टूडेंट यूनियन, Village: Ratanion Ki Dhani,VPO: Berdon Ka Bas, Tah:Osian, Jodhpur, Rajasthan. Author of Book- Bairad Jati Ka Gauravmay Itihas, Mo. 9602695924/9462605924, Email: Abairad36@gmail.com
  • Shiv Lal Bairad - Jat Washing Co. Balotra, Barmer. Mob - 9414531724
  • Dev Raj Bairad - Scientist from village Nand (Barmer)
  • Prem Singh Bairad - President Govt. College [[Osian], VPO: (बेरडों का बास), Teh. Osian , dist. Jodhpur

External links

http://www.jatland.com/home/Bairad

See also

Gallery of images

References

  1. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Parishisht-I, s.n. व-63
  2. Jat History Thakur Deshraj/Chapter IX,p.695
  3. अमेश बैरड:बेरड़ जाति का गौरवपूर्ण इतिहास, पृ.5
  4. अमेश बैरड:बेरड़ जाति का गौरवपूर्ण इतिहास, पृ.6
  5. अमेश बैरड:बेरड़ जाति का गौरवपूर्ण इतिहास, पृ.6
  6. अमेश बैरड:बेरड़ जाति का गौरवपूर्ण इतिहास, पृ.6
  7. अमेश बैरड:बेरड़ जाति का गौरवपूर्ण इतिहास, पृ.6
  8. अमेश बैरड:बेरड़ जाति का गौरवपूर्ण इतिहास, पृ.6
  9. अमेश बैरड:बेरड़ जाति का गौरवपूर्ण इतिहास, पृ.7
  10. अमेश बैरड:बेरड़ जाति का गौरवपूर्ण इतिहास, पृ.7
  11. अमेश बैरड:बेरड़ जाति का गौरवपूर्ण इतिहास, पृ.7
  12. अमेश बैरड:बेरड़ जाति का गौरवपूर्ण इतिहास, पृ.7
  13. अमेश बैरड:बेरड़ जाति का गौरवपूर्ण इतिहास, पृ.7
  14. अमेश बैरड:बेरड़ जाति का गौरवपूर्ण इतिहास, पृ.7
  15. अमेश बैरड:बेरड़ जाति का गौरवपूर्ण इतिहास, पृ.8
  16. अमेश बैरड:बेरड़ जाति का गौरवपूर्ण इतिहास, पृ.8-9
  17. अमेश बैरड:बेरड़ जाति का गौरवपूर्ण इतिहास, पृ. 11
  18. अमेश बैरड:बेरड़ जाति का गौरवपूर्ण इतिहास, पृ. 12

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